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होली खेलते समय रहें सावधान, कान में गया रंग बना सकता है सूजन दर्द और फंगल इंफेक्शन की वजह

नई दिल्ली :होली का त्योहार खुशियों रंगों और उत्साह का प्रतीक है। इस दिन लोग एक-दूसरे पर रंग और पानी डालकर जश्न मनाते हैं। लेकिन मस्ती के बीच अक्सर कुछ छोटी लापरवाहियां बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन जाती हैं। आमतौर पर लोग होली के रंग से त्वचा और बालों को होने वाले नुकसान की बात करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही रंग कान की नली को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। कान की नली बेहद पतली और संवेदनशील त्वचा से बनी होती है। जब सूखा या गीला रंग कान के अंदर चला जाता है तो यह नमी के संपर्क में आकर अंदर ही चिपक सकता है। धीरे-धीरे यह रंग कान के मैल के साथ मिलकर सख्त परत बना देता है, जिससे कान में भारीपन महसूस होने लगता है। कई बार लोगों को लगता है कि यह सामान्य गंदगी है और वे कॉटन बड या पिन जैसी नुकीली चीजों से इसे निकालने की कोशिश करते हैं। यह आदत स्थिति को और बिगाड़ सकती है। इससे मैल और रंग और अंदर धकेल दिया जाता है, कान की नली में सूजन बढ़ जाती है और तेज दर्द शुरू हो सकता है। रंगों में मौजूद केमिकल्स भी समस्या को गंभीर बना सकते हैं। ये केमिकल त्वचा की प्राकृतिक सुरक्षा परत को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे एलर्जिक रिएक्शन शुरू हो सकता है। कान की नली में यह प्रतिक्रिया ज्यादा तीव्र होती है, जिसके कारण खुजली, जलन और सूजन महसूस होती है। अगर कान में लगातार नमी बनी रहती है तो फंगल संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। कुछ मामलों में बैक्टीरियल संक्रमण विकसित होकर मवाद जैसा स्राव, तेज दर्द और सुनाई कम देने जैसी परेशानी पैदा कर सकता है। होली खेलने के बाद अगर कान में लगातार खुजली हो रही है, दर्द या इरिटेशन महसूस हो रहा है, पानी या मवाद जैसा तरल निकल रहा है या सुनने की क्षमता कम हो रही है तो इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि रंग या पानी कान के ज्यादा अंदर तक चला गया हो तो चक्कर आने की शिकायत भी हो सकती है। बच्चों में यह समस्या अधिक देखी जाती है क्योंकि वे खेलते समय सावधानी कम बरतते हैं। अगर होली खेलते समय कान में रंग चला जाए तो घबराने की जरूरत नहीं है। सबसे जरूरी बात है कि कान में कोई भी नुकीली वस्तु बिल्कुल न डालें। सिर को एक तरफ झुकाकर हल्के से बाहर की ओर थपथपाएं ताकि फंसा हुआ पानी या ढीला रंग बाहर निकल सके। अगर कान में पानी गया है तो बाहरी हिस्से को सूखे और साफ कपड़े से धीरे से पोंछ लें। यदि 24 से 48 घंटे के भीतर लक्षण कम नहीं होते या दर्द बढ़ता है तो ईएनटी विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है। डॉक्टर माइक्रोस्कोप की मदद से सुरक्षित तरीके से कान की सफाई करते हैं और जरूरत पड़ने पर एंटीबायोटिक या एंटीफंगल ड्रॉप्स देते हैं। होली खेलने से पहले कुछ सावधानियां अपनाकर इन समस्याओं से बचा जा सकता है। कान के बाहरी हिस्से में हल्की पेट्रोलियम जेली लगाने से रंग सीधे त्वचा पर चिपकने से बचता है। होली खेलते समय किसी के कान में जबरदस्ती पानी न डालें। कोशिश करें कि ऑर्गेनिक या हर्बल रंगों का इस्तेमाल करें और संभव हो तो कानों को ढककर होली खेलें। थोड़ी सी सतर्कता आपको त्योहार की खुशियों के साथ स्वास्थ्य भी सुरक्षित रखने में मदद कर सकती है।

वजन घटाने में आ रही है रुकावट? स्लो मेटाबॉलिज्म हो सकता है बड़ा विलेन; डाइट, एक्सरसाइज और नींद के जरिए ऐसे बदलें अपने शरीर का गियर

नई दिल्ली :अक्सर लोग वजन बढ़ने या हर समय थकान महसूस होने की शिकायत करते हैं, लेकिन इसके पीछे की मुख्य वजह को नजरअंदाज कर देते हैं। मेडिकल साइंस की भाषा में इसे ‘स्लो मेटाबॉलिज्म’ कहा जाता है। सरल शब्दों में समझें तो मेटाबॉलिज्म हमारे शरीर की वह आंतरिक रासायनिक प्रक्रिया है, जो हमारे द्वारा खाए गए भोजन और पेय पदार्थों को ऊर्जा (एनर्जी) में बदलने का काम करती है। जब यह प्रक्रिया सुस्त पड़ जाती है, तो शरीर कैलोरी को जलाने के बजाय उसे फैट के रूप में जमा करने लगता है। लखनऊ के मेदांता हॉस्पिटल के इमरजेंसी हेड डॉ. लोकेंद्र गुप्ता के अनुसार, मेटाबॉलिज्म का सीधा संबंध हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यदि आपका मेटाबॉलिक रेट धीमा है, तो यह केवल वजन बढ़ने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शरीर के हर अंग को प्रभावित करना शुरू कर देता है। मेटाबॉलिज्म धीमा होने के लक्षण काफी स्पष्ट होते हैं, लेकिन लोग इन्हें सामान्य कमजोरी समझकर टाल देते हैं। इसका सबसे बड़ा संकेत है-बिना किसी खास कारण के वजन का बढ़ना या जिम और डाइटिंग के बावजूद वजन कम न होना। जब शरीर भोजन से पर्याप्त ऊर्जा का उत्पादन नहीं कर पाता, तो व्यक्ति हर समय थकान और कमजोरी महसूस करता है। इसके अलावा, स्लो मेटाबॉलिज्म के कारण त्वचा में रूखापन, बालों का अत्यधिक झड़ना और पाचन संबंधी गंभीर समस्याएं जैसे कब्ज की शिकायत रहने लगती है। इतना ही नहीं, यह स्थिति शरीर की आंतरिक गर्मी पैदा करने की क्षमता को भी कम कर देती है, जिससे व्यक्ति को सामान्य तापमान में भी दूसरों के मुकाबले ज्यादा ठंड महसूस होती है। मानसिक स्तर पर यह ‘ब्रेन फॉग’ पैदा करता है, जिससे एकाग्रता में कमी और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। अगर समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो यह इंसुलिन रेजिस्टेंस की ओर ले जा सकता है, जो भविष्य में डायबिटीज और थायराइड जैसी बीमारियों का मुख्य कारण बनता है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर मेटाबॉलिक रेट को फिर से कैसे सक्रिय या बूस्ट किया जाए? हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसके लिए जीवनशैली में चार बड़े बदलाव जरूरी हैं। सबसे पहले अपनी डाइट में सुधार करें और पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। शरीर में पानी की हल्की सी कमी भी इस प्रक्रिया को धीमा कर देती है। दूसरा महत्वपूर्ण टूल है-स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और हाई-इंटेंसिटी एक्सरसाइज। मांसपेशियों के ऊतक Muscle Tissues आराम की स्थिति में भी फैट के मुकाबले अधिक कैलोरी जलाते हैं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारक है ‘नींद’। अक्सर लोग इसे नजरअंदाज करते हैं, लेकिन अधूरी नींद ब्लड शुगर के स्तर को बिगाड़ती है और भूख को नियंत्रित करने वाले घ्रेलिन और लेप्टिन हार्मोन्स को असंतुलित कर देती है, जिससे मेटाबॉलिज्म पूरी तरह सुस्त पड़ जाता है। हर रात 7-8 घंटे की गहरी नींद शरीर को रिपेयर करने के लिए अनिवार्य है। सही पोषण, नियमित व्यायाम और तनाव मुक्त जीवन के जरिए आप अपने मेटाबॉलिज्म को तेज कर एक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

खाली पेट शराब पीना क्यों बन सकता है जानलेवा खतरा लिवर स्पेशलिस्ट की सख्त चेतावनी

नई दिल्ली :शराब का सेवन सेहत के लिए हानिकारक माना जाता है लेकिन जब इसे खाली पेट पिया जाता है तो इसका खतरा कई गुना बढ़ जाता है। अक्सर लोग पार्टियों या त्योहारों के दौरान बिना कुछ खाए ही शराब पीना शुरू कर देते हैं और यही लापरवाही आगे चलकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार खाली पेट शराब शरीर में बहुत तेजी से असर दिखाती है और यह तेजी ही सबसे बड़ा खतरा बन जाती है। नई दिल्ली स्थित एक गैस्ट्रो और लिवर विभाग के डॉ .के अनुसार जब पेट में भोजन नहीं होता तब शराब पेट में ठहरने के बजाय सीधे छोटी आंत में पहुंच जाती है। छोटी आंत शराब को बेहद तेजी से अवशोषित कर लेती है और वह तुरंत रक्त प्रवाह में मिल जाती है। इससे ब्लड अल्कोहल कंसंट्रेशन अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। यही वजह है कि खाली पेट शराब पीने वाला व्यक्ति जल्दी नशे में आ जाता है उसका मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है उसे चक्कर आ सकते हैं और कई मामलों में बेहोशी तक हो सकती है। खाली पेट शराब पीने का सबसे बड़ा असर लिवर पर पड़ता है। लिवर का मुख्य कार्य खून में मौजूद विषैले तत्वों को फिल्टर करना है। जब शराब तेजी से अवशोषित होकर लिवर तक पहुंचती है तो उसे कम समय में अधिक मात्रा में अल्कोहल को प्रोसेस करना पड़ता है। इससे लिवर पर अचानक दबाव बढ़ जाता है। लंबे समय तक ऐसा होने पर फैटी लिवर हेपेटाइटिस और लिवर सिरोसिस जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन की परत न होने पर शराब की तीव्रता लिवर कोशिकाओं को सीधे नुकसान पहुंचा सकती है। सिर्फ लिवर ही नहीं बल्कि पेट भी इससे बुरी तरह प्रभावित होता है। शराब की अम्लीय प्रकृति पेट की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाती है। जब पेट खाली होता है तो शराब और पाचक अम्ल मिलकर गैस्ट्राइटिस अल्सर और तेज जलन का कारण बन सकते हैं। कई लोगों को उल्टी मतली और पेट दर्द की शिकायत होने लगती है। यदि यह आदत लंबे समय तक जारी रहे तो पाचन तंत्र कमजोर हो सकता है और शरीर में पोषक तत्वों का अवशोषण भी प्रभावित हो सकता है। खाली पेट शराब का असर दिमाग पर भी तेजी से होता है। ब्लड में अल्कोहल की मात्रा अचानक बढ़ने से मस्तिष्क की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। निर्णय लेने की क्षमता कम हो जाती है शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है और ब्लैकआउट जैसी स्थिति भी बन सकती है। पोषक तत्वों की कमी के कारण नर्वस सिस्टम पर इसका प्रभाव और ज्यादा गहरा होता है जिससे भविष्य में न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों की साफ सलाह है कि यदि कोई व्यक्ति शराब का सेवन करता भी है तो उसे पहले पर्याप्त भोजन करना चाहिए और साथ में पर्याप्त पानी पीना चाहिए। इससे शराब का अवशोषण धीमा होता है और शरीर पर अचानक पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है। खाली पेट शराब पीना शरीर के साथ गंभीर खिलवाड़ है जिसके परिणाम लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकते हैं।

कोलेस्ट्रॉल बीमारी नहीं, लाइफस्टाइल का अलार्म! जानें आयुर्वेद क्या देता है संकेत

नई दिल्ली। सबसे पहले एक बात साफ कर लें-कोलेस्ट्रॉल कोई “जहर” नहीं है। यह एक वसा जैसा पदार्थ है, जिसे हमारा शरीर खुद भी बनाता है। कोशिकाओं की संरचना, हार्मोन बनाने और विटामिन D के निर्माण में इसकी अहम भूमिका होती है। समस्या तब शुरू होती है जब “बैड कोलेस्ट्रॉल” यानी LDL जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है और धमनियों में जमा होने लगता है। इससे दिल की बीमारी, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए इसे न तो नजरअंदाज करें, न ही बेवजह डरें-समझदारी से कंट्रोल करें। आयुर्वेद क्या कहता है? आयुर्वेद के अनुसार, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल शरीर में “कफ” और “मेद” की अधिकता से जुड़ा माना जाता है। यानी यह असंतुलित आहार, कम शारीरिक गतिविधि और गलत दिनचर्या का संकेत है। 1. लहसुन सुबह खाली पेट भुनी हुई 1–2 लहसुन की कलियां गुनगुने पानी के साथ लेने की सलाह दी जाती है। आयुर्वेद में माना जाता है कि लहसुन रक्त संचार सुधारने और वसा कम करने में मदद करता है। 2. मेथी दाना मेथी में घुलनशील फाइबर पाया जाता है। रातभर भिगोकर सुबह इसका पानी पीना या दाने चबाना लाभकारी माना जाता है। हालांकि रोज़ाना लगातार लेने के बजाय बीच-बीच में लेना बेहतर बताया जाता है। 3. अर्जुन की छाल अर्जुन की छाल को आयुर्वेद में हृदय के लिए लाभकारी माना गया है। इसका काढ़ा दिल की सेहत सुधारने और लिपिड प्रोफाइल संतुलित रखने में सहायक बताया जाता है।4. धनिया पानी धनिया का पानी लीवर फंक्शन को बेहतर करने में मददगार माना जाता है। चूंकि कोलेस्ट्रॉल का निर्माण लीवर में होता है, इसलिए लीवर स्वस्थ रहेगा तो लिपिड लेवल भी संतुलित रहेगा। लेकिन एक जरूरी सच यह समझना बहुत जरूरी है कि अगर आपका कोलेस्ट्रॉल बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है या पहले से दिल की बीमारी है, तो सिर्फ घरेलू उपायों पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह, ब्लड टेस्ट और दवाइयों की भी अहम भूमिका होती है। आयुर्वेदिक उपाय सहायक हो सकते हैं, लेकिन वे आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक हैं। लाइफस्टाइल ही असली गेम-चेंजर रोज़ कम से कम 30 मिनट तेज चलना या व्यायाम तला-भुना और प्रोसेस्ड फूड कम करना धूम्रपान और अत्यधिक शराब से दूरी वजन नियंत्रित रखना तनाव कम करना सीधी बात-कोलेस्ट्रॉल हमें चेतावनी देता है कि जीवनशैली सुधारने का समय आ गया है। घबराने के बजाय इसे एक संकेत मानिए, और शरीर के साथ दोस्ती कीजिए। दिल आपका है-देखभाल भी आपकी जिम्मेदारी है।

होली स्पेशल टिप्स: केमिकल रंगों से बचें और स्किन को सुरक्षित रखें

नई दिल्ली। होली रंगों और खुशियों का त्योहार है लेकिन आजकल बाजार में मिलने वाले रासायनिक Chemical युक्त रंग, गुलाल और पेंट हमारी त्वचा के लिए खतरा बन सकते हैं इससे त्वचा पर खुजली, रैशेज, जलन और रूखापन जैसी समस्याएं होना आम बात है इसलिए अगर आप चाहते हैं कि होली का मज़ा भी बना रहे और आपकी स्किन भी सुरक्षित रहे तो कुछ आसान और प्रभावी उपायों को अपनाना बेहद जरूरी है सबसे पहला कदम है तेल लगाना होली खेलने से कम से कम 20-30 मिनट पहले नारियल तेल, सरसों के तेल या ऑलिव ऑयल से पूरे शरीर पर अच्छी तरह मसाज करें यह तेल स्किन पर एक प्रोटेक्टिव बैरियर का काम करता है जिससे रंग पोर्स में नहीं जा पाते और बाद में उन्हें हटाना आसान हो जाता है इसके बाद जरूरी है सनस्क्रीन का इस्तेमाल होली अक्सर बाहर खेली जाती है धूप और रंगों के कॉम्बिनेशन से फोटोटॉक्सिक रिएक्शन हो सकता है जिससे स्किन जल सकती है या टैनिंग हो सकती है इसलिए तेल लगाने के बाद अच्छी मात्रा में वॉटरप्रूफ सनस्क्रीन लगाना न भूलें यह स्किन को सूरज की हानिकारक किरणों से भी बचाता है और रंग खेलने का आनंद बिना नुकसान के मिलता है होली पर हल्के और नैचुरल रंगों का चुनाव भी आपकी स्किन को सुरक्षित रखने का एक और तरीका है बाजार में मिलने वाले केमिकल रंगों के बजाय फूलों से बने रंग, हल्दी, चंदन या बेसन के रंग इस्तेमाल करें ये त्वचा को नुकसान नहीं पहुंचाते और स्किन को आराम देते हैं इसके अलावा होली के दिन पानी का प्रॉपर इस्तेमाल करें अत्यधिक पानी से बचें और रंग लगाने के बाद तुरंत स्नान करें स्नान के लिए हल्के और माइल्ड साबुन या शॉवर जेल का उपयोग करें ताकि त्वचा को नुकसान न पहुंचे होली के बाद स्किन की देखभाल करना भी जरूरी है स्नान के बाद मॉइस्चराइजर लगाना न भूलें यह स्किन को हाइड्रेट रखता है और रंगों के कारण होने वाले नुकसान को कम करता है इसके साथ ही अगर त्वचा पर कोई एलर्जी या जलन महसूस हो तो ठंडे पानी से कमप्रेस करें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से संपर्क करें इस तरह से होली के दिन कुछ सावधानियों और घरेलू उपायों को अपनाकर आप रंगों का मज़ा भी ले सकते हैं और अपनी त्वचा को भी सुरक्षित रख सकते हैं होली सिर्फ एक त्योहार नहीं है यह खुशियों का उत्सव है और इसे सही तरीके से मनाना सबसे महत्वपूर्ण है ताकि त्योहार के बाद कोई परेशानी न हो

मौसमी थकान का सच: सर्दियों से वसंत में बदलाव पर शरीर क्यों महसूस करता है कमजोरी

नई दिल्ली। जैसे ही सर्दियों का मौसम धीरे-धीरे खत्म होता है और वसंत की हल्की गर्मी शुरू होती है, कई लोग सामान्य से अधिक थकान महसूस करने लगते हैं। सुबह और रात में हल्की ठंड होती है और दिन में धूप निकलने से गर्मी लगती है। ऐसे में शरीर में सुस्ती, आलस और ऊर्जा की कमी महसूस होना आम बात हो गई है। इस स्थिति को सीजनल फटीग या मौसमी थकान कहते हैं। सीजनल फटीग तब होती है जब मौसम बदलता है और शरीर को नए तापमान और रोशनी के अनुसार एडजस्ट होना मुश्किल लगता है। सर्दियों में दिन छोटे और रातें लंबी होती हैं, जिससे प्राकृतिक प्रकाश कम मिलता है। इससे शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का संतुलन प्रभावित होता है, जो नींद, ऊर्जा और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है। जैसे ही वसंत आता है, दिन लंबे और उजाले बढ़ते हैं। शरीर को इस बदलाव के अनुसार अपनी दिनचर्या और ऊर्जा स्तर एडजस्ट करने में समय लगता है, और इसी दौरान अधिक थकान, सुस्ती और मानसिक कमजोरी महसूस हो सकती है। सीजनल फटीग से ग्रस्त व्यक्ति को कई बार पर्याप्त नींद के बावजूद थकान बनी रहती है। दिनचर्या प्रभावित हो सकती है और काम या पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो सकता है। व्यक्ति को मानसिक थकान, सुस्ती, आलस्य, एकाग्रता में कमी और कभी-कभी नींद न आने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। इसका मुख्य कारण मौसम में बदलाव के कारण शरीर की ऊर्जा और हार्मोनल प्रतिक्रिया है। सर्दियों में ठंड के कारण शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, और वसंत में अचानक गर्मी और रोशनी बढ़ने पर शरीर को फिर से ऊर्जा स्तर संतुलित करने में समय लगता है। इसके अलावा विटामिन डी की कमी भी थकान में योगदान कर सकती है क्योंकि सर्दियों में धूप कम मिलती है। सीजनल फटीग से बचने के लिए कुछ उपाय बेहद मददगार साबित होते हैं। रोजाना हल्की एक्सरसाइज या योग करने से शरीर का मेटाबॉलिज्म सक्रिय रहता है। पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना और प्राकृतिक प्रकाश में समय बिताना भी मदद करता है। नींद पूरी करना, स्ट्रेस कम करना और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। यदि थकान लंबे समय तक बनी रहे, मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो, नींद न आए या सामान्य गतिविधियों में कठिनाई हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। कभी-कभी ये लक्षण अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत भी हो सकते हैं। इस प्रकार सर्दियों से वसंत के मौसम में शरीर का एडजस्ट होना और ऊर्जा स्तर में बदलाव सामान्य है, लेकिन समझदारी और सावधानी से आप सीजनल फटीग को कम कर सकते हैं और स्वस्थ दिनचर्या बनाए रख सकते हैं।

ऑयली और डल स्किन से छुटकारा, समर में ऐसे रखें चेहरा फ्रेश और जवान

नई दिल्ली । जैसे ही तापमान चढ़ता है त्वचा की परेशानी भी बढ़ने लगती है। तेज धूप पसीना और उमस मिलकर स्किन को बेजान चिपचिपी और थकी हुई बना देते हैं। ऑयली स्किन और ज्यादा ऑयली हो जाती है जबकि ड्राई स्किन रूखी और खिंची खिंची महसूस होने लगती है। अगर आप चाहते हैं कि गर्मियों में भी आपकी त्वचा दमकती और जवां दिखे तो अब समय है अपना स्किनकेयर रूटीन बदलने का। सही देखभाल से न सिर्फ टैन और पिंपल्स से बचाव होगा बल्कि नेचुरल ग्लो भी बरकरार रहेगा। क्लींजिंग है सबसे पहला और जरूरी कदम गर्मियों में चेहरे पर धूल पसीना और एक्स्ट्रा ऑयल जल्दी जमा हो जाता है। इसलिए दिन में दो बार माइल्ड पीएच बैलेंस्ड और अल्कोहल फ्री फेस वॉश से चेहरा साफ करें। ऑयली स्किन वालों के लिए जेल बेस्ड क्लींजर बेहतर रहते हैं जबकि ड्राई स्किन वालों को नॉन फोमिंग क्लींजर चुनना चाहिए। इससे पोर्स साफ रहते हैं और मुंहासों का खतरा कम होता है। क्रीम नहीं जेल और वॉटर बेस्ड प्रोडक्ट्स चुनें गर्मियों में भारी क्रीम त्वचा को और चिपचिपा बना सकती हैं। ऐसे में हल्के जेल बेस्ड या वॉटर बेस्ड मॉइश्चराइज़र का इस्तेमाल करें। दिन में दो बार क्लींजिंग टोनिंग और मॉइश्चराइजिंग CTM रूटीन फॉलो करने से स्किन फ्रेश और हेल्दी बनी रहती है।एंटीऑक्सिडेंट सीरम से बढ़ाएं नैचुरल ग्लो अपने समर रूटीन में एंटीऑक्सिडेंट सीरम जरूर शामिल करें। विटामिन C जैसे एंटीऑक्सिडेंट्स फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं कोलेजन को बढ़ावा देते हैं और स्किन को ब्राइट बनाते हैं। साथ ही डाइट में खट्टे फल हरी पत्तेदार सब्जियां और ग्रीन टी शामिल करना भी फायदेमंद रहेगा। हाइड्रेशन है सबसे बड़ी कुंजी गर्मी में शरीर और त्वचा दोनों को ज्यादा पानी की जरूरत होती है। दिनभर पर्याप्त पानी पिएं और जरूरत हो तो हाइड्रेटिंग फेस मिस्ट या एलोवेरा जेल का इस्तेमाल करें। रात में सोने से पहले हाइड्रेटिंग फेस मास्क लगाने से स्किन को एक्स्ट्रा नमी मिलती है और सुबह चेहरा फ्रेश दिखता है।हफ्ते में दो बार करें एक्सफोलिएशन स्किन से डेड सेल्स हटाने के लिए हफ्ते में एक या दो बार हल्के स्क्रब से एक्सफोलिएट करें। इससे पोर्स साफ रहते हैं और चेहरा साफ सुथरा दिखता है। ध्यान रखें ज्यादा स्क्रबिंग से स्किन को नुकसान भी हो सकता है। सनस्क्रीन कभी न भूलें गर्मियों में यूवी ए और यूवी बी किरणें स्किन को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं। घर से बाहर निकलते समय SPF 30 या उससे अधिक वाला सनस्क्रीन जरूर लगाएं। घर के अंदर रहते हुए भी सनस्क्रीन लगाना फायदेमंद होता है क्योंकि धूप की किरणें खिड़कियों से भी अंदर आ सकती हैं।हल्का मेकअप और सही टोनर का इस्तेमाल भारी मेकअप से बचें क्योंकि यह पोर्स को बंद कर सकता है और पिंपल्स बढ़ा सकता है। एलोवेरा या खीरा बेस्ड टोनर का उपयोग करें जो त्वचा को ठंडक और ताजगी देता है।

बॉलीवुड की होली स्पेशल हिट्स, ‘रंग बरसे’ से लेकर ‘होली के दिन’ तक, आज भी हैं एवरग्रीन

नई दिल्ली: होली का त्योहार बस आने ही वाला है और हर तरफ उत्सव का माहौल है। रंग, गुलाल और मिठाईयों के बीच बॉलीवुड के एवरग्रीन होली गाने इस त्योहार को और भी खास बना देते हैं। ये गाने सिर्फ संगीत नहीं बल्कि यादों का हिस्सा बन गए हैं और दशकों से दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाए हुए हैं। आज हम बात करेंगे ऐसे 5 गानों की, जो हर होली को जश्न में बदल देते हैं। सबसे पहले आते हैं नरगिस दत्त और राजकुमार पर फिल्माए गए गीत ‘होली आई रे’ की। 1950 में रिलीज हुए इस गाने को शकील बदायूनी ने लिखा था। यह गाना बॉलीवुड के इतिहास में होली के सबसे बेहतरीन और कालजयी गीतों में से एक माना जाता है। आज भी जब यह गाना बजता है, त्योहार की खुशियाँ दोगुनी हो जाती हैं। 1975 की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘शोले’ का गाना ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं’ भी हर होली पर सुना और गाया जाता है। हेमा मालिनी और धर्मेंद्र पर फिल्माया गया यह गाना आनंद बक्शी के लिखे शब्दों और मस्त धुन के कारण हमेशा लोकप्रिय रहा। यह गाना इस त्योहार की मस्ती और उमंग का सबसे बेहतरीन प्रतीक बन चुका है। बॉलीवुड की क्लासिक फिल्मों में ‘सिलसिला’ का गाना ‘रंग बरसे’ कभी पीछे नहीं रहता। अमिताभ बच्चन और रेखा पर फिल्माया गया यह गीत त्रिकोणीय प्रेम कहानी की पृष्ठभूमि में बेहद लोकप्रिय हुआ। इस गाने के बोल हरिवंश राय बच्चन ने लिखे थे और आज भी यह गाना होली पार्टीज़ और उत्सवों में सबका फेवरेट बना हुआ है। 1990 के दशक की यादों में बसे जूही चावला और शाहरुख खान के फिल्म ‘डर’ का गाना ‘अंग से अंग लगाना’ भी होली की धूम में अपना खास स्थान रखता है। इस गीत को आनंद बक्शी ने लिखा और विनोद राठौड़, अल्का याग्निक और सुदेश भोसले ने अपनी आवाज दी। शाहरुख का नेगेटिव रोल और जूही के साथ उनकी केमिस्ट्री इसे आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाती है। और अंत में, अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी पर फिल्माया गया गाना ‘होली खेले रघुबीरा’ हमेशा होली के रंगों में चार चाँद लगा देता है। इसकी धुन और गीतकार की कला इसे हर होली पार्टी में बजाने योग्य बनाती है। ये पांच गाने सिर्फ संगीत का आनंद नहीं देते, बल्कि हर बार होली का जश्न और उत्साह दोगुना कर देते हैं। चाहे यह पुरानी फिल्में हों या आधुनिक पार्टीज़, इन गानों की धुन और बोल हर उम्र के लोगों के लिए होली के त्योहार को और रंगीन बना देते हैं। इस होली, इन गानों को सुनकर आप भी अपने घर और दोस्तों के साथ त्योहार का मजा दोगुना कर सकते हैं।

मिलावटी खोया से होली पर खतरा: घर पर पहचानें शुद्ध खोया

नई दिल्ली । होली का त्योहार नजदीक है और बाजारों में मिठाइयों की मांग बढ़ गई है। इसी बीच मिलावटखोर मिलावटी खोया बेचकर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन ने 12,800 किलो खोया बिक्री पर रोक दिया और 760 क्विंटल से अधिक खोया नष्ट कराया। ये कोई अलग मामला नहीं है, देशभर से मिलावटी खोया मिलने और उसकी बिक्री पर कार्रवाई की खबरें लगातार आ रही हैं। मिलावटी खोया दिखने में असली जैसा लगता है, लेकिन इसके सेवन से पेट दर्द, अपच, गैस, दस्त, फूड पॉइजनिंग, लिवर और किडनी की समस्या और हार्ट हेल्थ पर नकारात्मक असर हो सकता है। अगर इसमें डिटर्जेंट या यूरिया जैसी हानिकारक चीजें मिली हों, तो यह केमिकल टॉक्सिसिटी का कारण बन सकती है। डॉ. रोहित शर्मा, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, दिल्ली के अनुसार मिलावटी खोया अक्सर स्टार्च, मैदा, सिंथेटिक दूध, रिफाइंड तेल या वनस्पति घी, यहां तक कि साबुन या डिटर्जेंट जैसे हानिकारक पदार्थ मिलाकर बनाया जाता है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, हार्ट डिजीज का खतरा होता है और पाचन तंत्र प्रभावित होता है। घर पर असली और नकली खोया पहचानना आसान है। FSSAI के अनुसार असली खोया मुलायम, दानेदार और हल्का गुलाबी रंग का होता है, जबकि मिलावटी खोया चिपचिपा, बहुत चिकना या रासायनिक गंध वाला हो सकता है। अगर आप घर पर खोया बनाना चाहते हैं तो प्रक्रिया सरल है। दूध को कड़ाही में उबालें, मीडियम आंच पर लगातार चलाएं और किनारों पर जमने वाली मलाई को वापस मिलाएं। जैसे-जैसे पानी सूखता है, दूध गाढ़ा होकर रबड़ी जैसा हो जाएगा। जब मिश्रण पूरी तरह गाढ़ा होकर एक जगह इकट्ठा हो जाए, तो गैस बंद करें। ठंडा होने पर खोया और सख्त और दानेदार हो जाएगा। इसे एयरटाइट डिब्बे में फ्रिज में 4-5 दिन या फ्रीजर में महीने भर रखा जा सकता है। अगर किसी दुकान पर मिलावटी खोया मिलने का शक हो तो पहले दुकानदार से बात करें। संतोषजनक जवाब न मिले तो FSSAI के टोल-फ्री नंबर 1800112100 पर शिकायत दर्ज करें। स्थानीय पुलिस और जिले के खाद्य सुरक्षा विभाग को भी सूचना दी जा सकती है। शिकायत के लिए सैंपल और रसीद सुरक्षित रखें। मिलावटी फूड बेचने वालों पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट, 2006 के तहत कार्रवाई होती है। इसमें भारी जुर्माना, लाइसेंस निलंबन या रद्द, दुकान सील और गंभीर मामलों में जेल की सजा शामिल हो सकती है। फूड सेफ्टी ऑफिसर जांच के बाद सैंपल लैब में भेजते हैं और रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करते हैं। होली पर मिठाइयों का मज़ा लेते हुए मिलावटी खोया से बचना बेहद जरूरी है। घर पर शुद्ध खोया बनाएं और सुरक्षित मिठाइयों का आनंद लें।

बर्डवॉचिंग लवर्स के लिए खास, सर्दियां खत्म होने से पहले घूम आएं ये 4 जगह

नई दिल्ली । हर सर्दियों में उत्तर भारत परिंदों का स्वर्ग बन जाता है। साइबेरिया और दूसरे ठंडे इलाकों से हजारों पक्षी यहां की झीलों तालाबों और वेटलैंड्स में आकर डेरा डालते हैं। सर्दियों के खत्म होने से पहले इन परिंदों का दीदार करने के लिए आप उत्तर भारत की कुछ बेहतरीन जगहों पर जाने का प्लान कर सकते हैं। ​परिंदों का स्वर्ग​ साइबेरियन क्रेन बार हेडेड गीज फ्लेमिंगो और अलग अलग तरह की बतखें सर्दियों में उत्तर भारत की रौनक बढ़ा देती हैं। लेकिन ये नजारा हमेशा नहीं रहता। मार्च आते आते ये मेहमान पक्षी फिर से अपने देश की ओर उड़ान भरने लगते हैं। ​घूमने का बना लें प्लान​ धुंध के बीच से उड़ते बेहद खूबसूरत पक्षी को देखने के लिए सुबह का समय सबसे बढ़िया रहता है। आइए जानते हैं उत्तर भारत की कुछ बेहतरीन जगहों के बारे में जहां आप सर्दियों के खत्म होने से पहले इन परिंदों का दीदार कर सकते हैं।​केओलादेव राष्ट्रीय उद्यान​ राजस्थान के भरतपुर में स्थित यह नेशनल पार्क देश के सबसे मशहूर बर्ड सैंक्चुअरी में से एक है। पहले इसे भरतपुर बर्ड सैंक्चुअरी के नाम से जाना जाता था। यह जगह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी है।​हरियाणा में सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान​ मध्य एशिया यूरोप और साइबेरिया से हजारों पक्षी यहां आते हैं। यहां आप पेंटेड स्टॉर्क पेलिकन क्रेन कई तरह की बतखें और शिकारी पक्षी आसानी से देख सकते हैं।​पोंग बांध झील हिमाचल प्रदेश​ पोंग बांध झील जिसे महाराणा प्रताप सागर के नाम से भी जाना जाता है सर्दियों के महीनों में प्रवासी जलपक्षियों का एक विशाल ठिकाना बन जाती है। धौलाधार पर्वत श्रृंखला से घिरी यह झील एक सुंदर वातावरण प्रदान करती है।​हरिके आर्द्रभूमि पंजाब​ हरिके आर्द्रभूमि ब्यास और सतलुज नदियों के संगम पर स्थित है। इसे उत्तर भारत की सबसे बड़ी आर्द्रभूमियों में से एक माना जाता है। पक्षी प्रेमियों को यहां गुच्छेदार बत्तखें पोचार्ड और दलदली बाज देखने को मिलते हैं।