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जब सरकारी फरमान के आगे नहीं झुके संगीत के सरताज किशोर कुमार, 'आंधी' फिल्म के गानों पर प्रतिबंध से लेकर राजनीतिक टकराव की पूरी कहानी

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा और संगीत के इतिहास में सत्तर का दशक अपनी बेहतरीन कलात्मकता के साथ-साथ राजनीतिक उथल-पुथल के लिए भी जाना जाता है। इस दौर में जहां एक तरफ आरडी बर्मन, गुलजार और किशोर कुमार जैसे दिग्गज मिलकर संगीत के नए कीर्तिमान रच रहे थे, वहीं दूसरी तरफ देश में लागू आपातकाल का साया कला जगत पर भी पड़ने लगा था। इसी दौर की एक बेहद चर्चित और विवादित कहानी फिल्म ‘आंधी’ और उसके सदाबहार गाने ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं’ से जुड़ी हुई है। किशोर कुमार और लता मंगेशकर की जादुई आवाज से सजे इस दर्दभरे और रूहानी गाने को एक समय पर सरकारी कोपभाजन का शिकार होना पड़ा था और इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। संजीव कुमार और सुचित्रा सेन की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म और इसके गानों को प्रतिबंधित किए जाने के पीछे राजनीतिक गलियारों में उठी एक बड़ी अफवाह थी। उस समय देश के राजनीतिक हालातों को देखते हुए यह बात तेजी से फैली कि फिल्म ‘आंधी’ की कहानी और सुचित्रा सेन का किरदार पूरी तरह से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन और उनके व्यक्तित्व पर आधारित है। इस अफवाह के सामने आते ही तत्कालीन सरकार ने फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी और इसके चलते ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन जैसे सरकारी माध्यमों पर इस फिल्म के गानों के प्रसारण को पूरी तरह बंद कर दिया गया। हालांकि यह प्रतिबंध बहुत लंबा नहीं चला और कुछ महीनों के बाद जब फिल्म से बैन हटा, तो यह सिनेमाघरों में रिलीज हुई और इसके गाने एक बार फिर दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए। लेकिन इस प्रतिबंध के पीछे सिर्फ फिल्म की कहानी ही एकमात्र वजह नहीं थी, बल्कि इसके पीछे किशोर कुमार और तत्कालीन सरकार के बीच का सीधा टकराव भी था। कई मीडिया रिपोर्ट्स और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के प्रचारक और तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला ने किशोर कुमार तक एक सरकारी संदेश भिजवाया था। इस संदेश में किशोर कुमार से सरकार और इंदिरा गांधी के नीतियों के समर्थन में एक विशेष गाना गाने के लिए कहा गया था। अपनी मर्जी के मालिक और बेहद स्वाभिमानी स्वभाव के धनी किशोर कुमार ने इस सरकारी फरमान को मानने से साफ इनकार कर दिया। किशोर कुमार का यह कड़ा रुख सरकार को नागवार गुजरा और इसके बाद उनके गानों को सरकारी रेडियो और दूरदर्शन चैनलों पर बजाने से पूरी तरह रोक दिया गया। इस विवाद पर किशोर कुमार ने बेहद बेबाकी से कहा था कि कोई भी ताकत उनसे वह काम नहीं करवा सकती जो वह खुद अपनी मर्जी से न करना चाहें और वह किसी और के इशारों पर काम नहीं करेंगे। इस ऐतिहासिक गाने के बनने की कहानी भी अपने आप में बेहद दिलचस्प है। संगीत निर्देशक आरडी बर्मन यानी पंचम दा ने इस गाने की मूल धुन असल में एक बंगाली दुर्गा पूजा एल्बम के लिए तैयार की थी, जिसके बोल ‘जेते जेते पथे होलो देरी’ थे। इस बंगाली गाने को खुद पंचम दा ने अपनी आवाज दी थी, जो मशहूर गीतकार गुलजार को बेहद पसंद आई थी। इसके बाद गुलजार के कहने पर इस धुन को फिल्म ‘आंधी’ में शामिल करने का फैसला किया गया और उन्होंने इस पर ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं’ जैसे कालजयी बोल लिखे। किशोर कुमार भले ही तेरह अक्टूबर उन्नीस सौ सतासी को इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन सरकारी पाबंदियों के आगे न झुकने का उनका यह हौसला और उनकी जादुई आवाज आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में हमेशा के लिए अमर है।

कुमार सानू का वो ऐतिहासिक रिकॉर्ड जिसे आज तक कोई सिंगर नहीं तोड़ पाया, जानिए आखिर क्यों एक ही दिन में रिकॉर्ड करने पड़े थे इतने सारे गाने

नई दिल्ली। भारतीय संगीत जगत में नव्वै का दशक एक ऐसा स्वर्णिम काल माना जाता है जिसने बॉलीवुड को कई सदाबहार और यादगार गाने दिए। इस दौर में अपनी मखमली आवाज से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले दिग्गज पाशर्व गायक कुमार सानू ने सफलता के कई नए आयाम स्थापित किए। आज के समय में जहां आधुनिक तकनीक के बावजूद सिंगर्स के लिए एक दिन में एक गाना पूरी तरह रिकॉर्ड करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है, वहीं कुमार सानू ने करीब तैंतीस साल पहले एक ऐसा ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया था जिसे आज तक कोई भी छू नहीं सका है। उन्होंने महज एक दिन के भीतर रिकॉर्ड अठाइस गाने गाकर अपना नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में हमेशा के लिए दर्ज करा लिया था। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने यह रिकॉर्ड किसी पुरस्कार या प्रसिद्धि की चाह में नहीं बनाया था, बल्कि इसके पीछे एक बेहद व्यावहारिक वजह थी। कुमार सानू को उन दिनों करीब चालीस दिनों के लंबे अमेरिकी दौरे पर जाना था और वह नहीं चाहते थे कि उनके विदेश जाने की वजह से किसी भी संगीतकार का काम रुके या फिल्म की शूटिंग प्रभावित हो, इसलिए उन्होंने जाने से पहले अपना सारा लंबित काम खत्म करने का फैसला किया और मैराथन रिकॉर्डिंग करते हुए यह अद्भुत मुकाम हासिल कर लिया। कोलकाता के एक बंगाली परिवार में जन्मे इस महान गायक का असली नाम सानू भट्टाचार्य है, लेकिन उनके संगीत के सफर में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उस दौर की मशहूर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने जब पहली बार सानू की आवाज सुनी, तो उन्हें उसमें महान गायक किशोर कुमार की झलक दिखाई दी। इसके बाद उन्होंने सानू भट्टाचार्य को अपना नाम बदलकर कुमार सानू रखने की सलाह दी ताकि फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें एक नई पहचान मिल सके। कुमार सानू के करियर को सबसे बड़ी उड़ान साल उन्नीस सौ नब्बे में आई फिल्म आशिकी से मिली। इस फिल्म के गानों ने भारतीय संगीत उद्योग के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए और इसकी ब्लॉकबस्टर कामयाबी ने कुमार सानू को रातों-रात देश का सबसे बड़ा सुपरस्टार सिंगर बना दिया। इसके बाद तो जैसे हिंदी सिनेमा में उनके नाम की आंधी चल पड़ी और वह हर बड़े अभिनेता और निर्माता-निर्देशक की पहली पसंद बन गए। कुमार सानू की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने साल उन्नीस सौ इक्यानवे से लेकर उन्नीस सौ पंचानवे तक लगातार पांच सालों तक फिल्मफेयर बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर का पुरस्कार जीतकर एक नया इतिहास रच दिया था। उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान साजन, दीवाना, बाजीगर और नाइन्टीन फोर्टी टू ए लव स्टोरी जैसी सुपरहिट फिल्मों के गानों के लिए मिला था। कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के बाद जब छठे साल भी उन्हें फिल्मफेयर के लिए नामांकित किया गया, तो उन्होंने अपनी दरियादिली और बड़प्पन का परिचय देते हुए इस अवॉर्ड को लेने से साफ मना कर दिया। उनका मानना था कि अब उन्हें लगातार मिलने वाले इस सम्मान की जगह किसी नए, प्रतिभावान और उभरते हुए कलाकार को मौका मिलना चाहिए ताकि फिल्म इंडस्ट्री में नए चेहरों को प्रोत्साहन मिल सके। अपने पूरे करियर में कुमार सानू ने न सिर्फ हिंदी और अपनी मातृभाषा बंगाली में गाने गाए, बल्कि उन्होंने देश की पंद्रह से अधिक क्षेत्रीय भाषाओं में सैकड़ों सुपरहिट गानों को अपनी सुरीली आवाज से सजाया। भारतीय संगीत जगत और संस्कृति में उनके इस बेमिसाल और अभूतपूर्व योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने साल दो हजार नौ में उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा था। आज भी उनके गाए रोमांटिक गाने युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं और उनका यह सफर संगीत के नए साधकों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा।

रणवीर सिंह ने घटाई फीस, लेकिन मुनाफे में हिस्सेदारी से करेंगे बड़ी कमाई

नई दिल्ली। रणवीर सिंह की ब्लॉकबस्टर फिल्म सीरीज ‘धुरंधर’ ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल की। फिल्म की को-प्रोड्यूसर ज्योति देशपांडे ने खुलासा किया कि रणवीर ने इस प्रोजेक्ट के लिए पारंपरिक तरीके से बड़ी फीस नहीं ली थी। इसके बजाय उन्होंने एक छोटी निश्चित फीस के साथ “बैकएंड डील” यानी फिल्म के मुनाफे में हिस्सेदारी का विकल्प चुना। यही रणनीति बाद में उनके लिए बेहद फायदेमंद साबित हुई। निर्देशक आदित्य धर ने भी लिया रिस्कफिल्म के निर्देशक आदित्य धर ने भी इसी मॉडल को अपनाया। उन्होंने भी कम फिक्स्ड फीस लेकर फिल्म के लाभ में हिस्सेदारी स्वीकार की।निर्माताओं के अनुसार इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि फिल्म से जुड़े प्रमुख लोगों की सफलता में सीधी भागीदारी हो और सभी का फोकस बेहतर परिणाम देने पर रहे। जब बजट बढ़ा, लेकिन दांव सफल रहाज्योति देशपांडे के मुताबिक फिल्म का वास्तविक खर्च शुरुआती अनुमान से काफी अधिक हो गया था। शुरुआत में जो बजट तय किया गया था, वह बाद में लगभग दोगुना हो गया। हालांकि फिल्म की शानदार कमाई ने इस जोखिम को सफलता में बदल दिया और निवेशकों से लेकर कलाकारों तक सभी को इसका लाभ मिला। एक फिल्म से बनी दो फिल्मों की फ्रेंचाइजीनिर्माताओं का कहना है कि शुरुआत में ‘धुरंधर’ को एक ही फिल्म के रूप में बनाया जा रहा था। लेकिन पहले शेड्यूल की शूटिंग पूरी होने के बाद कहानी और फुटेज का दायरा इतना बढ़ गया कि इसे दो भागों में रिलीज करने का फैसला लिया गया। यही निर्णय बाद में फ्रेंचाइजी की सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ। शानदार स्टारकास्ट ने बढ़ाई फिल्म की ताकतफिल्म में रणवीर सिंह के अलावा अक्षय खन्ना, आर. माधवन, अर्जुन रामपाल, गौरव गेरा, सारा अर्जुन और राकेश बेदी जैसे कलाकार नजर आए। रिकॉर्ड बुक में दर्ज हुई ‘धुरंधर 2रिपोर्ट्स के अनुसार ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर 2’ ने मिलकर दुनिया भर में लगभग 3000 करोड़ रुपये का कारोबार किया। वहीं ‘धुरंधर 2’ भारतीय सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में दूसरे स्थान पर पहुंच गई। इस सूची में शीर्ष स्थान पर दंगल बनी हुई है। ‘धुरंधर’ की सफलता यह दिखाती है कि फिल्म इंडस्ट्री में केवल बड़ी फीस ही कमाई का रास्ता नहीं होती। सही रणनीति, जोखिम उठाने की क्षमता और मुनाफे में हिस्सेदारी का मॉडल कलाकारों और निर्माताओं दोनों के लिए बेहद लाभदायक साबित हो सकता है।

डॉन 3 पर नया बवाल, रणवीर सिंह ने FWICE के खिलाफ उठाया कानूनी कदम

नई दिल्ली। रणवीर सिंह और FWICE के बीच चल रहा विवाद अब कानूनी स्तर तक पहुंच गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रणवीर सिंह ने संगठन को लीगल नोटिस भेजा है। बताया जा रहा है कि नोटिस भेजे जाने के बाद FWICE को अदालत या कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखना पड़ सकता है। हालांकि नोटिस में की गई मांगों का आधिकारिक विवरण अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है। FWICE ने जारी किया था गैर-सहयोग निर्देशपिछले सप्ताह FWICE ने अपने सदस्यों से रणवीर सिंह के साथ काम नहीं करने का आग्रह किया था। संगठन का यह कदम ‘डॉन 3’ परियोजना से जुड़े विवाद के बाद सामने आया। FWICE का कहना था कि फिल्म से अचानक अलग होने के कारण निर्माताओं को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है, जिसके चलते संगठन ने यह रुख अपनाया। फरहान अख्तर और एक्सेल एंटरटेनमेंट की शिकायतरिपोर्ट्स के अनुसार फरहान अख्तर और Excel Entertainment ने FWICE को शिकायत भेजी थी। शिकायत में कहा गया था कि फिल्म के प्री-प्रोडक्शन पर लगभग 45 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे। ऐसे में मुख्य अभिनेता के परियोजना से हटने से निर्माण प्रक्रिया प्रभावित हुई और आर्थिक नुकसान हुआ। क्या है पूरा मामला?कुछ वर्ष पहले Don 3 की घोषणा हुई थी, जिसमें रणवीर सिंह को नए ‘डॉन’ के रूप में पेश किया गया था। यह भूमिका पहले शाहरुख खान निभा चुके हैं। बाद में खबरें आईं कि रणवीर अब इस फिल्म का हिस्सा नहीं हैं। इसके बाद निर्माताओं और अभिनेता के बीच मतभेदों की चर्चा शुरू हुई, जो अब कानूनी नोटिस तक पहुंच गई है। आगे क्या हो सकता है?फिल्म इंडस्ट्री की नजरें अब इस मामले पर टिकी हैं। यदि दोनों पक्ष बातचीत से समाधान नहीं निकालते, तो विवाद लंबी कानूनी प्रक्रिया का रूप ले सकता है। वहीं, उद्योग जगत यह भी देख रहा है कि इसका असर रणवीर सिंह की आगामी फिल्मों और ‘डॉन 3’ की प्रगति पर कितना पड़ता है। रणवीर के आगामी प्रोजेक्ट्सविवादों के बीच रणवीर सिंह अपने अन्य प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहे हैं। खबरों के मुताबिक वह निर्देशक आदित्य धर की एक नई फिल्म से जुड़े हैं। इसके अलावा निर्देशक जय मेहता की एक ज़ॉम्बी-आधारित फिल्म में भी उनके काम करने की चर्चा है।

‘जब रफी साहब की आवाज ने बदल दी राजेश खन्ना की जिद्द’: एक गाने ने रच दिया था इतिहास

नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार राजेश खन्ना अपने करियर के चरम पर थे। उस समय उनके कई हिट गाने किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड हो रहे थे। राजेश खन्ना को यह विश्वास था कि किशोर कुमार उनकी सफलता की “लकी आवाज” हैं। लेकिन फिल्म ‘दो रास्ते’ के एक गाने को लेकर स्थिति बदल गई, जब संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल ने अलग राय रखी। मखमली आवाज की तलाश और रफी की एंट्रीम्यूजिक डायरेक्टर्स का मानना था कि इस खास गाने के लिए एक ऐसी आवाज चाहिए जो नरम, भावपूर्ण और रूहानी हो। इसी कारण उन्होंने मोहम्मद रफी को चुना। राजेश खन्ना इसके खिलाफ थे और उन्होंने किशोर कुमार की आवाज की जिद्द रखी, लेकिन संगीतकारों ने स्पष्ट कहा कि इस गाने के साथ सिर्फ रफी साहब ही न्याय कर सकते हैं। स्टूडियो में हुआ वो जादू जिसने सब बदल दियाजब मोहम्मद रफी ने स्टूडियो में “रेशमी जुल्फें” गाया, तो पूरा माहौल बदल गया। उनकी आवाज में ऐसा जादू था कि हर कोई मंत्रमुग्ध रह गया। रिकॉर्डिंग सुनने के बाद खुद राजेश खन्ना भी इस गाने के फैन बन गए। कहा जाता है कि इसी पल उन्होंने स्वीकार किया कि यह गाना सिर्फ रफी साहब की आवाज में ही सही लग सकता है। फिल्म, कास्ट और दिलचस्प किस्सेफिल्म के लिए पहले संजय खान को अप्रोच किया गया था, लेकिन बाद में यह रोल संजय खान से हटकर राजेश खन्ना को मिला। फिल्म में मुमताज पहली बार बतौर लीड ए-ग्रेड अभिनेत्री नजर आईं और उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। रफी की विरासत और दीवानगीमोहम्मद रफी की आवाज का जादू ऐसा था कि संगीतकारों से लेकर दर्शकों तक हर कोई उनके गीतों का दीवाना था। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके अंतिम संस्कार में भारी बारिश के बावजूद हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। यह किस्सा सिर्फ एक गाने का नहीं, बल्कि उस दौर की संगीत परंपरा और कलाकारों की समझ का प्रतीक है, जहां सही आवाज और सही भाव ही किसी गीत को अमर बना देते थे। “रेशमी जुल्फें” ने न सिर्फ राजेश खन्ना की सोच बदली, बल्कि मोहम्मद रफी की गायकी को एक और ऐतिहासिक ऊंचाई दी

‘फिल्म इंडस्ट्री से दूरी जरूरी थी’ – भारत भाग्य विधाता से पहले कंगना रनौत का बड़ा बयान, जानिए वजह

नई दिल्ली। अपनी अपकमिंग फिल्म को लेकर चल रहे प्रमोशन के दौरान कंगना रनौत ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय तक रहने के बाद अक्सर कलाकार एक “बबल” में जीने लगते हैं, जहां वास्तविक जीवन से दूरी बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने अपनी नई फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ के किरदार में खुद को ढालना शुरू किया, तो उन्हें एहसास हुआ कि इस भूमिका को सही तरीके से निभाने के लिए वास्तविक जीवन के अनुभव जरूरी हैं। नर्स के किरदार ने बदला नजरियाकंगना इस फिल्म में एक नर्स का किरदार निभा रही हैं, जो 2008 के मुंबई आतंकी हमलों की पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि यह किरदार केवल अभिनय नहीं, बल्कि “एक तरह की तपस्या” जैसा अनुभव था। उनके मुताबिक, मिडल क्लास बैकग्राउंड से आने के बावजूद लंबे समय तक फिल्म इंडस्ट्री में रहने के कारण असल जिंदगी से दूरी बढ़ जाती है। राजनीति और आम लोगों से जुड़ाव का असरकंगना रनौत ने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में राजनीति से जुड़े रहने के कारण उन्हें आम लोगों से सीधे बातचीत का मौका मिला, जिससे उनके अभिनय में और गहराई आई। उनके अनुसार, एक कलाकार के लिए सिर्फ ग्लैमर नहीं बल्कि समाज की वास्तविकता को समझना भी जरूरी है। फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ पर चर्चा तेजफिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ 12 जून को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है। फिल्म में कंगना का किरदार मुंबई हमलों के दौरान मेडिकल स्टाफ की भूमिका पर केंद्रित है। फिल्म का ट्रेलर रिलीज होने के बाद दर्शकों में उत्सुकता बढ़ गई है और सोशल मीडिया पर इसे लेकर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कंगना रनौत का कहना है कि वास्तविक जीवन से दूरी कभी-कभी कलाकारों के लिए जरूरी हो सकती है, ताकि वे अपने किरदारों को ज्यादा प्रामाणिक तरीके से निभा सकें। ‘भारत भाग्य विधाता’ के जरिए वह एक बार फिर गंभीर और संवेदनशील भूमिका में नजर आने वाली हैं।

आज विश्व साइकिल दिवस: प्रदूषण मुक्त भविष्य और बेहतर स्वास्थ्य की ओर एक कदम

प्रतिवर्ष 3 जून को विश्वभर में विश्व साइकिल दिवस (वर्ल्ड बाइसिकल डे) मनाया जाता है। पाठकों को बताता चलूं कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 12 अप्रैल 2018 को एक प्रस्ताव पारित कर 3 जून को विश्व साइकिल दिवस घोषित किया था तथा इस पहल को सफल बनाने में पोलैंड के सामाजिक वैज्ञानिक प्रोफेसर लेशेक सिबिल्स्की तथा उनके विद्यार्थियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने अपने समाजशास्त्र के छात्रों के साथ मिलकर विश्व साइकिल दिवस घोषित करने के लिए व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाया तथा उनके सतत प्रयासों और विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के सहयोग से संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को स्वीकार किया। तब से यह दिवस दुनिया भर में उत्साहपूर्वक मनाया जा रहा है।वास्तव में, विश्व साइकिल दिवस को मनाने के पीछे का मुख्य उद्देश्य साइकिल को एक सरल, सस्ता, विश्वसनीय, पर्यावरण-अनुकूल और स्वास्थ्यवर्धक परिवहन साधन के रूप में बढ़ावा देना है। वास्तव में, यह दिवस लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक होने, धरती से कार्बन उत्सर्जन कम करने तथा सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। साथ ही यह सड़क सुरक्षा, सस्ती परिवहन व्यवस्था और हरित भविष्य के निर्माण का संदेश भी देता है। साइकिल का इतिहास अत्यंत रोचक है।आधुनिक साइकिल के विकास की शुरुआत वर्ष 1817 में जर्मनी के आविष्कारक कार्ल वॉन ड्रैस द्वारा निर्मित ‘ड्रैसिन’ या ‘हॉबी हॉर्स’ से मानी जाती है। यह पूरी तरह लकड़ी की बनी होती थी और इसमें आज की तरह पैडल नहीं होते थे। इसे चलाने के लिए सवार को अपने पैरों से जमीन को पीछे की ओर धकेलना पड़ता था। बाद के वर्षों में स्कॉटलैंड के किर्कपैट्रिक मैकमिलन सहित अनेक आविष्कारकों ने साइकिल के विकास में योगदान दिया।एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 1860 के दशक में फ्रांस में पैडलयुक्त साइकिलों का विकास हुआ। पाठकों को बताता चलूं कि फ्रांसीसी आविष्कारक पियरे लालेमें द्वारा पैडल युक्त पहिए के विकास को साइकिल के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। उस समय की साइकिलों को ‘वेलॉसिपीड’ कहा जाता था। आरंभिक साइकिलों के पहिए लोहे या लकड़ी के होते थे तथा सड़कें भी अत्यंत ऊबड़-खाबड़ थीं। परिणामस्वरूप सवारी के दौरान इतना अधिक कंपन होता था कि इन्हें ‘बोनशेकर’ अर्थात ‘हड्डियां हिला देने वाली साइकिल’ कहा जाने लगा। बाद में वर्ष 1888 में जॉन बॉयड डनलप द्वारा हवा भरे रबर टायर के आविष्कार ने साइकिल यात्रा को अधिक आरामदायक, सुरक्षित और लोकप्रिय बना दिया। साइकिल की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका के निर्माताओं ने इसमें अनेक सुधार किए, जिनमें पतले तीलियों वाले पहिए, बॉल बेयरिंग और ब्रेक जैसी सुविधाएं शामिल थीं। आज साइकिल केवल एक परिवहन साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बन चुकी है। यह ईंधन रहित साधन होने के कारण वायु प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बढ़ते जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस गैसों की समस्या के बीच साइकिल एक प्रभावी और टिकाऊ समाधान के रूप में उभर रही है। यही कारण है कि दुनिया के अनेक देशों में लोग पुनः साइकिल की ओर लौट रहे हैं। कोरोना महामारी के दौरान अमेरिका सहित कई देशों में साइकिलों की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, क्योंकि यह सामाजिक दूरी(सोशल डिस्टेंस) बनाए रखने का सुरक्षित व शानदार माध्यम भी थी। विश्व में साइकिल की लोकप्रियता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि नीदरलैंड ऐसा देश है, जहां इंसानों से अधिक साइकिलें हैं। लगभग 1.8 करोड़ की आबादी वाले इस देश में 2.3 करोड़ से अधिक साइकिलें हैं और लगभग 27 प्रतिशत यात्राएं केवल साइकिल के माध्यम से पूरी की जाती हैं। इंग्लैंड, बेल्जियम तथा अन्य यूरोपीय देशों में भी बड़ी संख्या में लोग अपने दैनिक जीवन में साइकिल का उपयोग करते हैं। कई देशों में ‘साइकिल टू वर्क’ जैसी योजनाएं लागू हैं, जिनके माध्यम से लोगों को कार्यस्थल तक साइकिल से जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। चीन में भी लंबे समय तक ईंधन की बचत और सस्ती परिवहन व्यवस्था के लिए बड़े पैमाने पर साइकिलों का उपयोग किया जाता रहा है। भारत में भी साइकिल ने आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कई दशकों तक यह देश की परिवहन व्यवस्था का प्रमुख साधन रही। विशेष रूप से 1960 से 1990 के बीच अधिकांश भारतीय परिवारों के पास साइकिल होती थी। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपनी उपज मंडियों तक पहुंचाने, दूध विक्रेता दुग्ध आपूर्ति करने तथा विद्यार्थी विद्यालय और महाविद्यालय जाने के लिए साइकिल का व्यापक उपयोग करते थे। भारतीय डाक विभाग का बड़ा हिस्सा भी लंबे समय तक साइकिल आधारित रहा और आज भी अनेक डाक कर्मी साइकिल से पत्र वितरित करते हैं। इस दृष्टि से साइकिल ने देश की आर्थिक गतिविधियों और ग्रामीण जीवन को गति प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत संबंधित उत्पादसाइकिल चलाने के अनेक स्वास्थ्य लाभ हैं। नियमित रूप से प्रतिदिन लगभग 30 मिनट साइकिल चलाने से हृदय मजबूत होता है, रक्त संचार बेहतर होता है तथा शरीर की अतिरिक्त कैलोरी खर्च होती है। इससे मोटापा नियंत्रित रहता है और मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोगों का जोखिम कम होता है। साइकिल चलाने से मांसपेशियां मजबूत बनती हैं, जोड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होती है तथा शरीर की सहनशक्ति बढ़ती है। विशेषज्ञों के अनुसार नियमित शारीरिक गतिविधि रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में भी सहायक होती है। साइकिल चलाने से तनाव कम होता है, मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है तथा मस्तिष्क की सक्रियता में वृद्धि होती है। यही कारण है कि इसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ सबसे सरल और प्रभावी व्यायामों में से एक मानते हैं।हालांकि, साइकिल के अनेक लाभ हैं, फिर भी इसके उपयोग में कुछ चुनौतियां मौजूद हैं। सुरक्षित साइकिल ट्रैक और आधारभूत सुविधाओं का अभाव, मोटर वाहनों की बढ़ती संख्या, सड़क दुर्घटनाओं का खतरा, साइकिल के प्रति बदलती सामाजिक सोच तथा महानगरों में अनुकूल यातायात व्यवस्था की कमी इसके प्रमुख अवरोध हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए शहरों में समर्पित साइकिल लेन विकसित करना, सार्वजनिक साइकिल शेयरिंग योजनाओं का विस्तार करना, स्कूलों एवं कॉलेजों में साइकिल उपयोग को प्रोत्साहित करना, सड़क सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना

आज का राशिफल: सिंह राशि के लिए शुभ संकेत, कई राशियों को मिलेगा लाभ

नई दिल्ली । 3 जून 2026 का राशिफल बताता है कि सिंह राशि वालों के लिए दिन शुभ रहेगा और खुशखबरी मिलने के संकेत हैं। अन्य राशियों के लिए भी करियर, धन और रिश्तों में मिले-जुले परिणाम रहेंगे। मेष राशआज आत्मविश्वास बढ़ेगा और कार्यों में गति आएगी। भाग्य का सहयोग मिलेगा। करियर में प्रगति के संकेत हैं और सम्मान बढ़ सकता है। वृषभ राशिधोखे और गलत लोगों से सावधान रहें। निर्णय सोच-समझकर लें। स्वास्थ्य और कार्यों में सतर्कता जरूरी है। मिथुन राशिकारोबार और साझेदारी में लाभ के योग हैं। नए प्रस्ताव मिल सकते हैं और रिश्तों में मजबूती आएगी। कर्क राशिकार्यस्थल पर मेहनत अधिक करनी होगी। अनजान लोगों से दूरी रखें और काम समय पर पूरा करें। सिंह राशिआज का दिन बेहद शुभ रहेगा। मित्रों और सहयोगियों का साथ मिलेगा। आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और कोई शुभ सूचना मिल सकती है। खुशखबरी मिलने के संकेत हैं। कन्या राशिअहंकार और जिद से बचें। पारिवारिक मामलों में संयम रखें और संबंधों को सुधारने पर ध्यान दें। तुला राशिकामकाज संतुलित रहेगा। आर्थिक लाभ के योग बनेंगे और सामाजिक संपर्क मजबूत होंगे। वृश्चिक राशिपरिवार में शुभ कार्यों की संभावना है। रिश्तों में सुधार होगा और माहौल सकारात्मक रहेगा। धनु राशिरचनात्मक कार्यों में सफलता मिलेगी। मान-सम्मान बढ़ेगा और पारिवारिक सहयोग मिलेगा। मकर राशिवित्तीय मामलों में सावधानी रखें। निवेश से पहले सोच-विचार जरूरी है। जल्दबाजी से बचें। कुंभ राशिआर्थिक स्थिति मजबूत होगी। कार्यक्षेत्र में सफलता मिलेगी और मान-सम्मान बढ़ेगा। मीन राशिकामकाज में तेजी आएगी। आय में वृद्धि के संकेत हैं और नए अवसर मिल सकते हैं।

ढीली हो गई है जींस? बिना टेलर के घर पर ऐसे पाएं फिर से परफेक्ट फिटिंग

नई दिल्ली । जींस आज के दौर में लगभग हर व्यक्ति की वॉर्डरोब का अहम हिस्सा बन चुकी है। चाहे ऑफिस जाना हो, कॉलेज की क्लास अटेंड करनी हो, दोस्तों के साथ घूमने का प्लान हो या फिर किसी छोटी यात्रा पर निकलना हो, जींस हर अवसर पर आराम और स्टाइल का बेहतरीन मेल प्रदान करती है। इसकी खासियत यही है कि यह लंबे समय तक इस्तेमाल की जा सकती है, लेकिन लगातार पहनने और बार-बार धोने के कारण इसकी फिटिंग धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है। कई बार पसंदीदा जींस इतनी ढीली हो जाती है कि उसे पहनने का मन नहीं करता, जबकि वह अभी भी अच्छी स्थिति में होती है। विशेषज्ञों के अनुसार डेनिम फैब्रिक समय के साथ अपने मूल आकार में बदलाव महसूस कर सकता है। शरीर की गतिविधियों, लगातार खिंचाव और नियमित उपयोग के कारण कपड़े के रेशे थोड़े फैल जाते हैं। यही वजह है कि नई जींस कुछ महीनों बाद पहले जैसी फिट महसूस नहीं होती। कई लोग इस समस्या का समाधान टेलरिंग के जरिए ढूंढ़ते हैं, लेकिन हर बार कपड़े में बदलाव करवाना जरूरी नहीं होता। कुछ आसान घरेलू उपायों की मदद से भी फिटिंग में सुधार लाया जा सकता है। ऐसा ही एक तरीका ठंडे पानी का उपयोग है, जिसे कई लोग डेनिम केयर के लिए अपनाते हैं। माना जाता है कि बहुत ठंडा पानी कुछ प्रकार के फैब्रिक को अपनी मूल संरचना के करीब लौटने में मदद कर सकता है। इसके लिए किसी बड़ी बाल्टी या टब में पर्याप्त मात्रा में पानी भरकर उसमें बर्फ के टुकड़े डाल दिए जाते हैं। जब पानी पूरी तरह ठंडा हो जाए तो जींस को उसमें अच्छी तरह डुबोकर कुछ समय के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके बाद जींस को निकालकर अतिरिक्त पानी हल्के हाथों से निचोड़ा जाता है और सीधी धूप की बजाय छांव में सुखाया जाता है। जींस पूरी तरह सूखने के बाद कई लोगों को उसकी फिटिंग में हल्का बदलाव महसूस हो सकता है। हालांकि यह तरीका हर प्रकार के डेनिम या हर ब्रांड की जींस पर एक जैसा असर नहीं दिखाता, क्योंकि कपड़े की गुणवत्ता और उसमें इस्तेमाल किए गए फैब्रिक मिश्रण का प्रभाव भी महत्वपूर्ण होता है। फिर भी यह एक ऐसा उपाय है जिसे बिना किसी अतिरिक्त खर्च के घर पर आजमाया जा सकता है। खास बात यह है कि इसमें जींस को काटने, सिलने या स्थायी बदलाव करने की जरूरत नहीं पड़ती। फैशन विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि जींस की फिटिंग लंबे समय तक बनाए रखने के लिए उसे जरूरत से ज्यादा बार न धोएं और हमेशा देखभाल संबंधी निर्देशों का पालन करें। सही तरीके से धुलाई और सुखाने की आदतें डेनिम की उम्र बढ़ाने में मदद करती हैं। इसके अलावा अत्यधिक गर्म पानी और तेज ड्रायर का उपयोग करने से भी बचना चाहिए, क्योंकि इससे कपड़े की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। अगर आपकी पसंदीदा जींस ढीली हो गई है और आप उसकी फिटिंग सुधारना चाहते हैं, तो यह आसान घरेलू तरीका उपयोगी साबित हो सकता है। सही देखभाल के साथ आपकी जींस लंबे समय तक बेहतर फिटिंग और आकर्षक लुक बनाए रख सकती है।

फिटनेस का नया फॉर्मूला: बिना बाहर निकले रोजाना 10,000 कदम चलने का आसान रूटीन

नई दिल्ली । आधुनिक जीवनशैली में व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि लोगों के लिए नियमित व्यायाम और शारीरिक गतिविधियों के लिए समय निकालना चुनौती बनता जा रहा है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, सीमित शारीरिक गतिविधि और अनियमित दिनचर्या कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञ और फिटनेस प्रशिक्षक अक्सर लोगों को रोजाना अधिक चलने-फिरने की सलाह देते हैं। इसी क्रम में प्रतिदिन 10,000 कदम चलने का लक्ष्य लंबे समय से फिटनेस जगत में लोकप्रिय माना जाता रहा है। माना जाता है कि यह आदत शरीर को सक्रिय रखने और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार नियमित रूप से पर्याप्त कदम चलना हृदय स्वास्थ्य को मजबूत बनाने में सहायक होता है। इसके अलावा यह शरीर में रक्त संचार को बेहतर करता है और अतिरिक्त कैलोरी खर्च करने में मदद करता है। रोजाना सक्रिय रहने से वजन नियंत्रित रखने, मांसपेशियों को मजबूत बनाने और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भी सहायता मिल सकती है। यही कारण है कि कई लोग अपने दैनिक कदमों की संख्या को ट्रैक करने के लिए स्मार्टवॉच या फिटनेस बैंड का उपयोग करते हैं। हालांकि व्यस्त दिनचर्या, खराब मौसम, प्रदूषण या अन्य कारणों से कई लोगों के लिए बाहर जाकर नियमित वॉक करना संभव नहीं हो पाता। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए फिटनेस कोच रीत कौर ने एक ऐसा इनडोर रूटीन साझा किया है, जिसके जरिए घर के अंदर ही 10,000 कदम पूरे किए जा सकते हैं। उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति लगभग 65 मिनट तक लगातार सक्रिय रहते हुए हर मिनट करीब 167 कदम की औसत गति बनाए रखता है, तो वह अपना दैनिक लक्ष्य हासिल कर सकता है। इस तरह का इनडोर वॉकिंग रूटीन उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है जो घर से काम करते हैं, जिनके पास पार्क या खुली जगह उपलब्ध नहीं है या जो मौसम की वजह से बाहर नहीं जा पाते। घर के अंदर चलने को अधिक रोचक बनाने के लिए लोग अलग-अलग गतिविधियों को भी शामिल कर सकते हैं। जैसे संगीत सुनते हुए चलना, टीवी देखते समय वॉक करना या घर के विभिन्न हिस्सों में निर्धारित समय तक लगातार घूमना। इससे एक ही स्थान पर चलने से होने वाली बोरियत कम हो सकती है और नियमितता बनाए रखना आसान हो सकता है। साथ ही छोटे-छोटे अंतराल में दिनभर चलने की आदत भी कुल कदमों की संख्या बढ़ाने में मदद करती है। फिटनेस विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल कदमों की संख्या ही स्वास्थ्य का एकमात्र पैमाना नहीं है। संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और तनाव प्रबंधन भी स्वस्थ जीवनशैली के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। फिर भी नियमित रूप से अधिक चलना एक ऐसी आदत है जिसे लगभग हर आयु वर्ग का व्यक्ति अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकता है। यही कारण है कि दैनिक वॉकिंग को फिटनेस बनाए रखने के सबसे सरल और प्रभावी उपायों में गिना जाता है। रोजाना 10,000 कदम चलने का लक्ष्य लोगों को अधिक सक्रिय जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है। चाहे बाहर खुली हवा में वॉक हो या घर के भीतर किया गया इनडोर रूटीन, नियमित शारीरिक गतिविधि लंबे समय में बेहतर स्वास्थ्य और फिटनेस की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।