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फिटनेस का नया फॉर्मूला: बिना बाहर निकले रोजाना 10,000 कदम चलने का आसान रूटीन

नई दिल्ली । आधुनिक जीवनशैली में व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि लोगों के लिए नियमित व्यायाम और शारीरिक गतिविधियों के लिए समय निकालना चुनौती बनता जा रहा है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, सीमित शारीरिक गतिविधि और अनियमित दिनचर्या कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञ और फिटनेस प्रशिक्षक अक्सर लोगों को रोजाना अधिक चलने-फिरने की सलाह देते हैं। इसी क्रम में प्रतिदिन 10,000 कदम चलने का लक्ष्य लंबे समय से फिटनेस जगत में लोकप्रिय माना जाता रहा है। माना जाता है कि यह आदत शरीर को सक्रिय रखने और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार नियमित रूप से पर्याप्त कदम चलना हृदय स्वास्थ्य को मजबूत बनाने में सहायक होता है। इसके अलावा यह शरीर में रक्त संचार को बेहतर करता है और अतिरिक्त कैलोरी खर्च करने में मदद करता है। रोजाना सक्रिय रहने से वजन नियंत्रित रखने, मांसपेशियों को मजबूत बनाने और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भी सहायता मिल सकती है। यही कारण है कि कई लोग अपने दैनिक कदमों की संख्या को ट्रैक करने के लिए स्मार्टवॉच या फिटनेस बैंड का उपयोग करते हैं। हालांकि व्यस्त दिनचर्या, खराब मौसम, प्रदूषण या अन्य कारणों से कई लोगों के लिए बाहर जाकर नियमित वॉक करना संभव नहीं हो पाता। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए फिटनेस कोच रीत कौर ने एक ऐसा इनडोर रूटीन साझा किया है, जिसके जरिए घर के अंदर ही 10,000 कदम पूरे किए जा सकते हैं। उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति लगभग 65 मिनट तक लगातार सक्रिय रहते हुए हर मिनट करीब 167 कदम की औसत गति बनाए रखता है, तो वह अपना दैनिक लक्ष्य हासिल कर सकता है। इस तरह का इनडोर वॉकिंग रूटीन उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है जो घर से काम करते हैं, जिनके पास पार्क या खुली जगह उपलब्ध नहीं है या जो मौसम की वजह से बाहर नहीं जा पाते। घर के अंदर चलने को अधिक रोचक बनाने के लिए लोग अलग-अलग गतिविधियों को भी शामिल कर सकते हैं। जैसे संगीत सुनते हुए चलना, टीवी देखते समय वॉक करना या घर के विभिन्न हिस्सों में निर्धारित समय तक लगातार घूमना। इससे एक ही स्थान पर चलने से होने वाली बोरियत कम हो सकती है और नियमितता बनाए रखना आसान हो सकता है। साथ ही छोटे-छोटे अंतराल में दिनभर चलने की आदत भी कुल कदमों की संख्या बढ़ाने में मदद करती है। फिटनेस विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल कदमों की संख्या ही स्वास्थ्य का एकमात्र पैमाना नहीं है। संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और तनाव प्रबंधन भी स्वस्थ जीवनशैली के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। फिर भी नियमित रूप से अधिक चलना एक ऐसी आदत है जिसे लगभग हर आयु वर्ग का व्यक्ति अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकता है। यही कारण है कि दैनिक वॉकिंग को फिटनेस बनाए रखने के सबसे सरल और प्रभावी उपायों में गिना जाता है। रोजाना 10,000 कदम चलने का लक्ष्य लोगों को अधिक सक्रिय जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है। चाहे बाहर खुली हवा में वॉक हो या घर के भीतर किया गया इनडोर रूटीन, नियमित शारीरिक गतिविधि लंबे समय में बेहतर स्वास्थ्य और फिटनेस की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

स्क्रीन पर कॉपियां जांचने का सिरदर्द: सीबीएसई के नए सिस्टम से शिक्षक बेहाल

ज्ञान चंद पाटनीसेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) के नए ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम ने विद्यार्थियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इससे बोर्ड की साख भी प्रभावित हुई है। 12वीं कक्षा के हजारों विद्यार्थियों ने अपनी आंसर शीट की स्कैन कॉपी मांगी है क्योंकि वे परिणाम से संतुष्ट नहीं हैं। ओएसएम सिस्टम की वजह से परिणाम में गड़बड़ी के आरोप गंभीर बात है। बारहवीं के बाद विद्यार्थी प्रोफेशनल और उच्च शिक्षा की राह खोजने के लिए निकलते हैं। ऐसे समय में विद्यार्थी अपने परिणाम को लेकर आशंकित हैं, तो सवाल तो उठेंगे ही। सीबीएसई के नए ऑन स्क्रीन मार्किंग(ओएसएम) सिस्टम पर स्टूडेंट्स, अभिभावक और विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं। इस सिस्टम को उत्तरपुस्तिकाओं की जांच को सटीक और तेज बनाने के लिए लाया गया था, लेकिन सामने आ रही गड़बड़ियां दूसरी ही कहानी कह रही हैं। विद्यार्थी अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। पहले परीक्षा के बाद उत्तरपुस्तिकाओं के बंडल बनाकर अध्यापकों को दिए जाते थे। वे उन्हें जांचते थे, नंबर जोड़ते थे और साइन करते थे। इस बार सीबीएसई ने नया तरीका अपनाया। पहले सभी कॉपियां स्कैन की गईं। यानी उनकी डिजिटल फोटो खींची गईं। फिर यह फोटो ऑनलाइन सिस्टम पर अपलोड की गई। शिक्षकों ने कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन पर कॉपी की फोटो देखकर नंबर दिए। सीबीएसई ने ओएसएम सिस्टम को लेकर कहा कि इससे जांच की प्रक्रिया ज्यादा तेज और सटीक हो सकेगी। साथ ही मैनुअल गलतियां कम से कम रहेंगी लेकिन अब इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं। 12वीं कक्षा के बहुत से विद्यार्थी धुंधली उत्तरपुस्तिका और उत्तरपुस्तिका बदलने तक की शिकायत कर रहे हैं। मुद्दा इतना तूल पकड़ चुका है कि सीबीएसई के 12वीं बोर्ड परीक्षा में बैठे हर चार में से करीब एक छात्र ने अपनी जांची हुई आंसर शीट की स्कैन कॉपी मांगी है। एक छात्र वेदांत श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि बोर्ड ने उन्हें एक विषय की गलत आंसर शीट भेजी है। मामला तब और बढ़ गया जब उन्हें पाकिस्तानी बताकर ट्रोल किया गया। सोशल मीडिया पर हुए हल्ले के बाद सीबीएसई ने वेदांत के केस में हुई तकनीकी समस्या को तो हल कर दिया लेकिन नए असेसमेंट सिस्टम यानी ओएसएम से जुड़ी शिकायतें कम नहीं हुईं। कई विद्यार्थियों का कहना है कि स्कैन कॉपी में दिख रही उत्तरपुस्तिका उनकी है ही नहीं, जैसे वेदांत के मामले में हुआ था। कुछ विद्यार्थियों के मुताबिक, उनकी सप्लीमेंट्री शीट गायब है। कई जवाबों को जांचा ही नहीं गया। स्टेप मार्किंग के सिस्टम को नजरअंदाज किया गया। अगर छात्र ने सवाल का पूरा जवाब न लिखा हो, लेकिन कुछ स्टेप सही किए तो भी उसे नंबर मिलते थे, लेकिन कई विद्यार्थियों का आरोप है कि उनकी कॉपी जांचते समय इस प्रावधान का पालन नहीं हुआ। ओएसएम प्रणाली से कॉपी जांचने वाले परीक्षकों की ट्रेनिंग पर सवाल उठ रहे हैं। पहले अध्यापक ऑफलाइन में भी गड़बड़ियां करते थे। कभी टोटलिंग में नंबर छूट जाते थे, तो कभी सही जवाब को गलत मार्क कर दिया जाता था। इन सबसे बचने के लिए ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम लाया गया। एग्जाम ऑफलाइन लिया जा रहा है और जांच ऑनलाइन हो रही है। इस प्रक्रिया के लिए परीक्षकों को लंबी ट्रेनिंग मिलनी चाहिए थी, लेकिन सतही प्रशिक्षण के बाद सिस्टम लागू हो गया। बेहतर तो यह था कि जब तक शिक्षक इस तकनीक में पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं होते, तब तक इसे अपनाया नहीं जाता, लेकिन पता नहीं किस दबाव में इसे लागू कर दिया गया। इससे सीबीएसई की साख पर सवाल लगा ही, विद्यार्थी अपने भविष्य को लेकर आशंकित भी हो रहे हैं। बोर्ड को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक छात्र को न्याय मिले, उनका भरोसा बना रहे और उनका भविष्य प्रभावित न हो। तभी शिक्षा व्यवस्था विश्वसनीय बनी रहेगी। 12वीं के बाद अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन चाह रहे विद्यार्थी तनाव में हैं। अंकों में मामूली गड़बड़ी भी उनके भविष्य पर असर डाल सकती है। यह बात भी उठ रही है कि जब मैनुअल जांच पर ही भरोसा करना है तो ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम लागू ही क्यों हुआ? तकनीकी गड़बड़ी सीधे-सीधे छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर रही है। स्कैन कॉपी मिलने के बाद री-इवैल्यूएशन होगा, तब कहीं जाकर सही स्थिति पता लगेगी। इसमें समय लगेगा। इस बीच कई कॉलेजों में काउंसलिंग शुरू होने जा रही है। सीबीएसई के ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ऐसे में अचानक कई स्कूलों के प्रिंसिपल वीडियो जारी कर रहे हैं। इनमें वे दावा करते हुए दिखाई दे रहे हैं कि सीबीएसई की नई मार्किंग स्कीम ओएसएम अच्छी है, सुरक्षित है और छात्रों के लिए फायदेमंद है। असल में सीबीएसई को समझ नहीं आ रहा है कि वह अपने नए सिस्टम को कैसे बचाए। मां-बाप परेशान हैं, विद्यार्थियों के रिजल्ट पर सवाल उठ रहे हैं, स्कैन कॉपी में धुंधलापन, गलत आंसर शीट और नंबर न मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इस बीच प्रिंसिपल को पीआर वीडियो बनाने पर मजबूर किया जा रहा है। यह संकेत है कि सीबीएसई का संकट बहुत बड़ा है और वह अपने सिस्टम की सच्चाई को छिपाने के लिए अन्य तरीके अपना रहा है। 17 लाख 68 हजार विद्यार्थियों में से 4 लाख 4 हजार छात्रों ने स्कैन कॉपी के लिए आवेदन किया है। यह कुल विद्यार्थियों का 23 फीसदी है। इतनी बड़ी संख्या में छात्रों की शिकायतें हैं, लेकिन सीबीएसई प्रिंसिपल के वीडियो के जरिए यह बताने की कोशिश कर रहा है कि सब ठीक है। यह गलत संकेत है। सीबीएसई को छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से लेना चाहिए, न कि प्रचार के जरिए उन्हें छिपाना चाहिए। प्रिंसिपल के वीडियो क्यों आ रहे हैं? शायद स्कूल प्रबंधन पर सीबीएसई का दबाव है। शायद प्रिंसिपलों को आदेश दिया गया है कि वे ओएसएम के समर्थन में वीडियो बनाएं। यह डराने-धमकाने की प्रक्रिया हो सकती है। अगर ऐसा है, तो यह चिंता की बात है। सीबीएसई को समस्याओं को सुलझाना चाहिए। इन्हें छिपाने के लिए नए—नए हथकंडे नहीं अपनाने चाहिए। तकनीक का उपयोग समस्या के समाधान के लिए होना चाहिए, न कि समस्या बढ़ाने के लिए। विद्यार्थियों के भविष्य को जोखिम में डालकर कोई भी नया

डिजिटल क्रांति और सोशल मीडिया: क्या नए रूप में उभरेगा लोकतंत्र का चौथा स्तंभ?

सौरभ वार्ष्णेयआज की पत्रकारिता: संघर्ष, जिम्मेदारी और विश्वास की परीक्षा बन कर रह गई है। लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभों में पत्रकारिता को केवल कहने भर को विशेष स्थान प्राप्त है। पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन और प्रसारण भर नहीं है, बल्कि यह समाज को जागरूक करने, सत्ता से प्रश्न पूछने और जनभावनाओं को अभिव्यक्ति देने का सशक्त माध्यम भी है। किंतु वर्तमान समय में पत्रकारिता अनेक चुनौतियों, दबावों और संघर्षों के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में पत्रकारिता की भूमिका, जिम्मेदारी और विश्वसनीयता पर गंभीर चिंतन आवश्यक हो गया है। अभी ३० मई पत्रकारिता दिवस बीता है लेकिन सत्ता की तरफ से सिर्फ रस्म अदायगी? क्या वाकई पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ संविधान के तहत बन पायेगा या हम पत्रकार बिरादरी सिर्फ गाहे गवाये ढोल पीटते रह जायेंगे? पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ कहने भर का चौथा स्तंभ रह जायेगा। यह एक ज्वलंत विषय है। आज सूचना क्रांति का युग है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने समाचारों के प्रसार को अत्यंत तेज बना दिया है। जहां पहले एक समाचार को पाठकों तक पहुंचने में घंटों या दिनों का समय लगता था, वहीं अब कुछ ही सेकंड में खबरें दुनिया भर में पहुंच जाती हैं। लेकिन इस तेजी के साथ एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है—सत्य और असत्य के बीच अंतर करने की चुनौती। फर्जी खबरें, आधी-अधूरी जानकारी और भ्रामक प्रचार पत्रकारिता की विश्वसनीयता को प्रभावित कर रहे हैं। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य निष्पक्षता, सत्यता और जनहित की रक्षा करना है। लेकिन आज कई बार व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, टीआरपी की दौड़ और राजनीतिक प्रभाव के कारण पत्रकारिता अपने मूल सिद्धांतों से भटकती दिखाई देती है। समाचारों की प्रस्तुति में सनसनीखेजता बढ़ रही है, जबकि तथ्यों की गहराई और निष्पक्ष विश्लेषण को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पा रहा है। यह स्थिति लोकतंत्र और समाज दोनों के लिए चिंता का विषय है। दूसरी ओर, जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले पत्रकारों का संघर्ष भी कम नहीं है। अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों में काम करते हुए जनसमस्याओं को उजागर करने का प्रयास करते हैं। कई बार उन्हें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दबावों का सामना करना पड़ता है। दूर-दराज के क्षेत्रों में कार्यरत संवाददाता जनता और प्रशासन के बीच सेतु का कार्य करते हैं, लेकिन उनके योगदान को हमेशा उचित सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल पाती। डिजिटल युग ने पत्रकारिता को नए अवसर भी प्रदान किए हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता, वैकल्पिक मीडिया और ऑनलाइन समाचार मंचों ने आम लोगों की आवाज को व्यापक मंच दिया है। अब कोई भी महत्वपूर्ण मुद्दा सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय बहस का विषय बन सकता है। हालांकि, इस स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। बिना सत्यापन के सूचना साझा करना समाज में भ्रम और अविश्वास पैदा कर सकता है। आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी परीक्षा जनता के विश्वास को बनाए रखने की है। पाठक और दर्शक केवल खबर नहीं, बल्कि विश्वसनीय खबर चाहते हैं। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को यह समझना होगा कि उनका सबसे बड़ा पूंजीगत निवेश जनता का विश्वास है। यदि यह विश्वास कमजोर होता है, तो पत्रकारिता का प्रभाव और महत्व दोनों प्रभावित होंगे। आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता अपने मूल मूल्यों—सत्य, निष्पक्षता, पारदर्शिता और जनहित—को पुन: केंद्र में स्थापित करे। पत्रकारों को तथ्यपरक रिपोर्टिंग, नैतिक मानकों और सामाजिक जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही सरकारों और समाज को भी स्वतंत्र एवं निर्भीक पत्रकारिता के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को जीवंत रखने का माध्यम है। चुनौतियां चाहे कितनी भी बड़ी हों, यदि पत्रकारिता सत्य और जनहित के मार्ग पर अडिग रहती है, तो वह समाज का विश्वास जीतने में सफल होगी। आज की पत्रकारिता वास्तव में संघर्ष, जिम्मेदारी और विश्वास की परीक्षा के दौर से गुजर रही है, और यही परीक्षा उसके भविष्य की दिशा भी तय करेगी। भारतीय पत्रकारिता की गौरवशाली यात्राभारतीय पत्रकारिता का इतिहास केवल समाचारों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह जनचेतना, सामाजिक परिवर्तन, लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संघर्ष की भी कहानी है। वर्ष 1826 में प्रकाशित उदन्त मार्तण्ड से लेकर आज के डिजिटल युग तक पत्रकारिता ने लंबा सफर तय किया है। यह यात्रा अनेक चुनौतियों, संघर्षों, उपलब्धियों और जिम्मेदारियों से भरी रही है। 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा कोलकाता से प्रकाशित उदन्त मार्तण्ड हिंदी का पहला समाचार पत्र था। सीमित संसाधनों, आर्थिक कठिनाइयों और सरकारी उपेक्षा के बावजूद इस पत्र ने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी। यहीं से हिंदी भाषा में समाचारों और विचारों के प्रसार का एक नया युग प्रारंभ हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता ने देशभक्ति और जनजागरण का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया। अनेक समाचार पत्रों और पत्रकारों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज उठाई। समाचार पत्र केवल सूचना का माध्यम नहीं रहे, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के सशक्त हथियार बन गए। उस दौर की पत्रकारिता का मूल उद्देश्य राष्ट्रहित और जनहित था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पत्रकारिता ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका को और मजबूत किया। सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करना, जनता की समस्याओं को उठाना और सामाजिक मुद्दों को सामने लाना इसकी प्रमुख जिम्मेदारियां बनीं। प्रिंट मीडिया के साथ-साथ रेडियो और टेलीविजन ने भी पत्रकारिता के दायरे को व्यापक बनाया। इक्कीसवीं सदी में इंटरनेट और सोशल मीडिया के आगमन ने पत्रकारिता का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया। आज समाचार कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंच जाता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सूचना के प्रसार को तेज और व्यापक बनाया है, लेकिन इसके साथ फेक न्यूज, भ्रामक सूचनाएं, टीआरपी की प्रतिस्पर्धा और विश्वसनीयता का संकट जैसी नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। आज पत्रकारिता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां तकनीकी विकास और नैतिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी आवश्यकता है। पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सत्य, निष्पक्षता और जनहित की रक्षा करना भी है। यदि पत्रकारिता अपनी मूल भावना से भटकती है, तो समाज और लोकतंत्र दोनों कमजोर पड़ सकते हैं। विश्व प्रेस स्वतंत्रता और पत्रकारिता दिवस जैसे अवसर हमें याद दिलाते हैं कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य सत्ता या किसी विशेष विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता की आवाज बनना

अब कैमरे के सामने आने की ज़रूरत नहीं: Google Gemini Digital Avatar से बदलेगा वीडियो क्रिएशन

नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच Google ने अपने Gemini प्लेटफॉर्म पर एक नया Digital Avatar फीचर पेश किया है, जो वीडियो निर्माण की दुनिया में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। इस फीचर की मदद से यूजर्स अपना एक AI आधारित डिजिटल क्लोन तैयार कर सकते हैं, जो वीडियो में उनकी जगह वास्तविक व्यक्ति की तरह दिखाई देगा और काम करेगा। इस तकनीक को Google के उन्नत AI मॉडल पर आधारित बताया जा रहा है, जो चेहरे की पहचान और आवाज पैटर्न को समझकर एक यथार्थवादी डिजिटल रूप तैयार करता है। इस फीचर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अब वीडियो बनाने के लिए कैमरे के सामने आने की जरूरत नहीं रह जाएगी। कंटेंट क्रिएटर्स, शिक्षकों, सोशल मीडिया यूजर्स और डिजिटल मार्केटर्स के लिए यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। यूजर्स केवल एक बार अपनी फेस रिकॉर्डिंग और जरूरी डाटा सिस्टम में अपलोड करेंगे, जिसके बाद AI उनका डिजिटल अवतार तैयार कर देगा। यह अवतार आगे चलकर किसी भी वीडियो में उनकी जगह बोलने और प्रस्तुत करने का काम कर सकता है, जिससे वीडियो प्रोडक्शन की प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक सरल और तेज हो जाएगी। डिजिटल अवतार बनाने की प्रक्रिया भी काफी आसान बताई गई है। यूजर्स को Gemini प्लेटफॉर्म पर लॉगिन करने के बाद दिए गए विकल्पों के माध्यम से अपने चेहरे की अलग-अलग एंगल से रिकॉर्डिंग करनी होती है। इसके बाद सिस्टम उस डेटा को प्रोसेस कर एक यूनिक डिजिटल पहचान तैयार करता है, जिसे यूजर के अकाउंट से लिंक कर दिया जाता है। तैयार अवतार को बाद में प्रॉम्प्ट के जरिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां केवल एक कमांड देकर पूरा वीडियो जनरेट किया जा सकता है। इस तकनीक के इस्तेमाल के लिए फिलहाल सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल लागू किया गया है, जिसमें AI Pro और AI Ultra जैसे प्लान शामिल हैं। हालांकि कुछ टेलीकॉम कंपनियां अपने ग्राहकों को इस सुविधा का सीमित या पूर्ण एक्सेस भी प्रदान कर रही हैं, जिससे अधिक लोग इस नई तकनीक का लाभ उठा सकें। इससे डिजिटल क्रिएशन की दुनिया में AI टूल्स की पहुंच तेजी से बढ़ रही है और आम यूजर्स भी हाई-एंड वीडियो प्रोडक्शन का हिस्सा बन पा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में Digital Avatar तकनीक वीडियो कॉलिंग, ऑनलाइन मीटिंग्स, वर्चुअल एजुकेशन और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएशन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। लोग अपने डिजिटल रूप का इस्तेमाल करके बिना कैमरे के सामने आए प्रेजेंटेशन दे सकेंगे और वैश्विक स्तर पर संवाद स्थापित कर पाएंगे। इस तकनीक की तुलना पहले से मौजूद कुछ वर्चुअल सिस्टम्स से की जा रही है, लेकिन Gemini का यह कदम इसे और अधिक उन्नत और सहज बना सकता है। भविष्य में यह तकनीक न केवल समय की बचत करेगी बल्कि डिजिटल कंटेंट निर्माण की लागत को भी कम कर सकती है। हालांकि इसके साथ ही डेटा प्राइवेसी और AI एथिक्स जैसे मुद्दों पर भी चर्चा तेज हो गई है, क्योंकि डिजिटल अवतार का दुरुपयोग भी एक संभावित चुनौती बन सकता है। कुल मिलाकर Gemini का यह नया Digital Avatar फीचर तकनीक की दुनिया में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में डिजिटल इंटरैक्शन और वीडियो क्रिएशन के तरीके को पूरी तरह बदल सकता है।

Child Social Media Policy: 16 वर्ष से कम आयु वालों के लिए सोशल मीडिया बैन, दुनिया में छिड़ी नई बहस

नई दिल्ली । बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में बढ़ती चिंताओं के बीच मलेशिया ने एक बड़ा और चर्चित फैसला लिया है। देश में अब 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाना प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह नया नियम 1 जून से लागू हो चुका है और इसके बाद सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यूजर्स की उम्र की जांच करना अनिवार्य बना दिया गया है। इस फैसले ने वैश्विक स्तर पर नई बहस को जन्म दे दिया है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया के संभावित खतरों से बचाने के लिए क्या ऐसे कड़े कदम जरूरी हैं। नए प्रावधान के अनुसार फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब और अन्य बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नया अकाउंट बनाने से पहले यूजर की आयु की पुष्टि की जाएगी। इसके लिए कंपनियों को पहचान पत्र, पासपोर्ट या अन्य वैध सरकारी दस्तावेजों का उपयोग करना होगा। सरकार का मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच बच्चों को अनुचित सामग्री, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों से बचाने के लिए यह कदम आवश्यक हो गया था। इसी उद्देश्य से ऑनलाइन सुरक्षा कानून के तहत यह व्यवस्था लागू की गई है। नियम केवल नए यूजर्स तक सीमित नहीं है। पहले से सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे लोगों को भी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी उम्र का सत्यापन कराना होगा। सरकार ने प्लेटफॉर्म कंपनियों को इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए सीमित समय दिया है। यदि कोई कंपनी निर्धारित मानकों का पालन नहीं करती है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। नए कानून के तहत करोड़ों रुपये के बराबर भारी आर्थिक दंड का भी प्रावधान रखा गया है, जिससे कंपनियों पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ गया है। सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को केवल आयु सत्यापन तक सीमित जिम्मेदारी नहीं दी है। उन्हें हानिकारक, भ्रामक और फर्जी सामग्री पर भी सख्त निगरानी रखनी होगी। साथ ही विज्ञापनदाताओं की पहचान की पुष्टि करना, संदिग्ध कंटेंट की रिपोर्टिंग व्यवस्था को मजबूत करना और एडिट या कृत्रिम रूप से बदले गए कंटेंट को स्पष्ट रूप से चिह्नित करना भी आवश्यक होगा। इससे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। मलेशिया से पहले भी कई देश बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सख्त कदम उठा चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, फ्रांस, स्पेन, ग्रीस, डेनमार्क और नॉर्वे जैसे देशों में सोशल मीडिया उपयोग की न्यूनतम आयु और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े नियमों को लगातार मजबूत किया जा रहा है। इन देशों का मानना है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों के मानसिक विकास, सामाजिक व्यवहार और पढ़ाई पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, इसलिए आयु आधारित नियंत्रण आवश्यक है। भारत में फिलहाल 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कोई राष्ट्रीय प्रतिबंध लागू नहीं है। हालांकि डिजिटल सुरक्षा, डेटा संरक्षण और ऑनलाइन गोपनीयता को लेकर सरकार समय-समय पर नए नियम लाती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर बुलिंग, फर्जी खबरों, ऑनलाइन धोखाधड़ी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए भारत में भी इस विषय पर चर्चा और तेज हो सकती है। दुनिया के कई देशों में लागू हो रहे ऐसे नियम भविष्य में भारतीय नीति निर्माताओं के लिए भी विचार का विषय बन सकते हैं।

मोबाइल बाजार पर संकट: बढ़ती कीमतों के कारण लोग टाल रहे खरीदारी, बिक्री में गिरावट

नई दिल्ली । भारत के स्मार्टफोन बाजार में इस समय कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी का सीधा असर उपभोक्ता मांग पर दिखाई देने लगा है। जहां पहले फेस्टिव सीजन को मोबाइल कंपनियों के लिए सबसे बड़ा बिक्री अवसर माना जाता था, वहीं अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। ताजा रिपोर्ट और उपभोक्ता सर्वे में यह सामने आया है कि बढ़ती कीमतों के कारण बड़ी संख्या में लोग नया फोन खरीदने का फैसला टाल रहे हैं, जिससे बाजार में सुस्ती के संकेत गहराते जा रहे हैं। सर्वे के अनुसार, लगभग 54 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने स्वीकार किया है कि वे मौजूदा महंगे दामों के कारण नया स्मार्टफोन खरीदने की योजना को फिलहाल स्थगित कर सकते हैं। इनमें से एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो कीमतों के स्थिर होने का इंतजार कर रहा है। केवल एक छोटा हिस्सा ही सेकेंड हैंड या सस्ते विकल्पों की ओर रुख करने की बात कर रहा है। यह स्थिति दर्शाती है कि मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन फिलहाल उस पर एक स्पष्ट ब्रेक लग गया है। विशेषज्ञों के अनुसार स्मार्टफोन कीमतों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव और कंपोनेंट्स की बढ़ती लागत है। मेमोरी चिप्स की कमी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा सेंटर की बढ़ती मांग ने सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री पर दबाव बढ़ा दिया है। इसका असर सीधे कंज्यूमर डिवाइसेज पर पड़ रहा है, जिसके कारण फोन बनाने की लागत बढ़ गई है और कंपनियां नए मॉडल्स को ऊंची कीमतों पर लॉन्च कर रही हैं। पिछले कुछ महीनों में कई प्रमुख स्मार्टफोन ब्रांड्स ने अपने नए और पुराने दोनों मॉडल्स की कीमतों में बढ़ोतरी की है। जनवरी से मई के बीच औसतन 8 से 12 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ने की बात सामने आई है। इससे मिड-रेंज और बजट सेगमेंट के खरीदार सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जो भारत के स्मार्टफोन बाजार का बड़ा हिस्सा हैं। मार्केट ट्रेंड्स यह भी संकेत दे रहे हैं कि 2026 के फेस्टिव सीजन में भी बिक्री में अपेक्षित तेजी नहीं आ सकती। आमतौर पर इस समय कंपनियां भारी छूट और ऑफर्स के जरिए बिक्री बढ़ाती हैं, लेकिन इस बार महंगे प्राइस पॉइंट के कारण उपभोक्ता खर्च करने से बच सकते हैं। कई रिपोर्ट्स में यह भी अनुमान जताया गया है कि पूरे साल में स्मार्टफोन शिपमेंट में गिरावट देखी जा सकती है, जो पिछले कई वर्षों के मुकाबले एक बड़ा बदलाव होगा। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार की मांग खत्म नहीं हुई है, बल्कि उपभोक्ता फिलहाल कीमतों के स्थिर होने का इंतजार कर रहे हैं। जैसे ही कीमतों में स्थिरता आएगी, बाजार में फिर से खरीदारी बढ़ सकती है। फिलहाल कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कीमत और मांग के बीच संतुलन बनाने की है। यह स्थिति भारत के तेजी से बढ़ते टेक बाजार के लिए एक अहम मोड़ मानी जा रही है, जहां उपभोक्ता व्यवहार और वैश्विक सप्लाई चेन दोनों मिलकर भविष्य की दिशा तय करेंगे।

एआई का बड़ा खतरा: Mo Gawdat का दावा, 3 साल में बदल जाएगी पूरी दुनिया

नई दिल्ली । दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है और अब इस तकनीक के भविष्य को लेकर एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला अनुमान सामने आया है। गूगल एक्स के पूर्व बिजनेस चीफ मो गॉवडेट का कहना है कि आने वाले सिर्फ तीन वर्षों में एआई इतना विकसित हो जाएगा कि यह पूरी दुनिया की संरचना को बदल सकता है। उनके अनुसार आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस यानी AGI का दौर बहुत करीब है और इसका प्रभाव केवल तकनीक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह समाज, अर्थव्यवस्था और रोजगार व्यवस्था को भी पूरी तरह प्रभावित करेगा। मो गॉवडेट का मानना है कि आज हम एआई को जिस रूप में देख रहे हैं, वह सिर्फ उसकी शुरुआती झलक है। असली बदलाव तब आएगा जब मशीनें इंसानों की तरह सोचने, सीखने और निर्णय लेने लगेंगी। उनका कहना है कि यह बदलाव धीरे-धीरे नहीं बल्कि बहुत तेजी से होगा और दुनिया को इसके लिए तैयार रहने की जरूरत है। उन्होंने चेतावनी दी है कि इस ट्रांजिशन के दौरान कई पारंपरिक नौकरियां खत्म हो सकती हैं, खासकर वे काम जो दोहराव वाले और डिजिटल सिस्टम पर आधारित हैं। उनके अनुसार कॉल सेंटर, डेटा एंट्री, प्रशासनिक सहायक और ट्रैवल एजेंट जैसी नौकरियों पर सबसे पहले असर पड़ेगा। इसके विपरीत ऐसे काम जिनमें शारीरिक कौशल और वास्तविक दुनिया में काम करने की जरूरत होती है, जैसे बढ़ईगिरी या निर्माण कार्य, वे अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में रोबोटिक्स के विकास के साथ ये क्षेत्र भी धीरे-धीरे बदल सकते हैं। मो गॉवडेट ने यह भी जोर देकर कहा कि असली खतरा एआई खुद नहीं है, बल्कि इसका उपयोग कैसे किया जाता है, यह अधिक महत्वपूर्ण है। यदि बड़ी कंपनियां और सरकारें इसे सही दिशा में उपयोग नहीं करतीं, तो यह तकनीक सामाजिक असंतुलन और आर्थिक असमानता को बढ़ा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि एआई डेवलपमेंट लैब्स में जो क्षमताएं विकसित हो रही हैं, वे आम लोगों की समझ से कहीं आगे हैं और यही गैप सबसे बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2027 तक AGI वास्तव में विकसित हो जाता है, तो यह मानव जीवन के हर क्षेत्र में गहरा परिवर्तन ला सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और यहां तक कि रक्षा क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। कुछ जानकार इसे मानव सभ्यता के सबसे बड़े तकनीकी बदलावों में से एक मान रहे हैं। इस पूरी बहस के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या दुनिया इतनी तेजी से बदलती तकनीक के लिए तैयार है। एआई के बढ़ते प्रभाव ने जहां एक तरफ अवसरों के नए दरवाजे खोले हैं, वहीं दूसरी तरफ रोजगार और सामाजिक ढांचे को लेकर चिंता भी बढ़ा दी है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह तकनीक मानव जीवन को किस दिशा में ले जाती है और सरकारें तथा संस्थाएं इसे कैसे नियंत्रित करती हैं।

थोड़ा रेशम लगता है गाने की धुन चुराना हॉलीवुड कंपनी को पड़ा था भारी, बप्पी दा ने कॉपीराइट केस में दी थी मात

नई दिल्ली । भारतीय संगीत जगत में डिस्को किंग के नाम से मशहूर दिवंगत संगीतकार बप्पी लहरी न केवल अपनी अनूठी धुनों और सोने के गहनों के शौक के लिए जाने जाते थे, बल्कि वे अपने काम के प्रति बेहद सजग भी थे। साठ और सत्तर के दशक से लेकर आज तक बॉलीवुड के कई गानों पर विदेशी धुनों की नकल करने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन इतिहास में एक ऐसा अनोखा वाकया भी दर्ज है जब हॉलीवुड के एक बड़े संगीतकार ने बॉलीवुड के गाने की धुन चुराई थी। इस चोरी पर बप्पी लहरी ने कड़ा रुख अपनाते हुए अमेरिकी अदालत का दरवाजा खटखटाया और न केवल यह ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई जीती, बल्कि विदेशी कंपनी को भारी-भरकम हर्जाना देने पर भी मजबूर कर दिया था। यह पूरा मामला भारतीय सिनेमा के संगीत इतिहास में कॉपीराइट उल्लंघन के खिलाफ सबसे बड़ी जीतों में से एक माना जाता है। इस विवाद की जड़ें साल 1981 में आई बॉलीवुड फिल्म ‘ज्योति’ से जुड़ी हुई हैं। इस फिल्म के लिए बप्पी लहरी ने एक बेहद खूबसूरत और थिरकने पर मजबूर कर देने वाला गाना तैयार किया था, जिसके बोल थे ‘थोड़ा रेशम लगता है’। इस गाने को स्वर कोकिला दिवंगत लता मंगेशकर ने अपनी जादुई आवाज से सजाया था और रिलीज के बाद यह गाना देश के कोने-कोने में गूंजने लगा था। सब कुछ सामान्य चल रहा था और लोग इस गाने को पसंद कर रहे थे, लेकिन इस गाने के रिलीज होने के ठीक 21 साल बाद, यानी साल 2002 में अमेरिकी हिप-हॉप आर्टिस्ट ‘ट्रुथ हर्ट्स’ का एक नया गाना रिलीज हुआ जिसका टाइटल ‘एडिक्टिव’ था। जब भारतीय संगीत प्रेमियों ने इस अमेरिकी गाने को सुना, तो वे दंग रह गए क्योंकि इस गाने की पूरी शुरुआत और बैकग्राउंड म्यूजिक हूबहू लता मंगेशकर के उसी पुराने गाने से लिया गया था। जैसे ही यह बात बप्पी लहरी के संज्ञान में आई, उन्होंने तुरंत उस अमेरिकी गाने को पूरा सुना और म्यूजिक लेबल ‘सारेगामा’ के साथ मिलकर अमेरिकी अदालत में कानूनी कार्रवाई करने का फैसला किया। बप्पी दा ने ‘एडिक्टिव’ गाने के मशहूर अमेरिकी प्रोड्यूसर डॉ. ड्रे के खिलाफ कॉपीराइट उल्लंघन का मुकदमा दायर कर दिया। अदालत की कार्यवाही के दौरान अमेरिकी मेकर्स ने बचाव में यह अजीब तर्क दिया कि उन्होंने यह धुन एक विदेशी रेडियो स्टेशन पर बजते हुए सुनी थी और उन्हें इस बात की बिल्कुल जानकारी नहीं थी कि इसके वास्तविक कॉपीराइट्स किसके पास सुरक्षित हैं। हालांकि, बप्पी दा और सारेगामा की लीगल टीम ने अदालत के सामने पुख्ता सबूत पेश किए कि यह धुन पूरी तरह से भारतीय संगीतकार की मूल रचना है। बप्पी दा और डॉ. ड्रे के बीच यह कानूनी लड़ाई काफी समय तक अमेरिकी कोर्ट में चलती रही और अंततः अदालत ने भारतीय संगीतकार के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने कड़े आदेश में कहा कि जब तक इस अमेरिकी गाने में बप्पी लहरी और सारेगामा को आधिकारिक तौर पर क्रेडिट नहीं दिया जाता, तब तक ‘एडिक्टिव’ गाने की सीडी और पूरे एल्बम की बिक्री पर तुरंत प्रभाव से रोक लगी रहेगी। इसके साथ ही, अदालत ने हॉलीवुड की संबंधित म्यूजिक कंपनी पर बड़ा जुर्माना लगाया, जिसके तहत हर्जाना और रॉयल्टी मिलाकर उन्हें 500 मिलियन डॉलर यानी करीब 4,744 करोड़ रुपये देने का ऐतिहासिक आदेश जारी किया गया। इस कानूनी जीत ने दुनिया भर में भारतीय संगीत की ताकत और उसके कानूनी अधिकारों का लोहा मनवाया। जिस फिल्म ‘ज्योति’ के गाने पर यह पूरा विवाद हुआ था, वह फिल्म भी जितेंद्र के डबल रोल, हेमा मालिनी, अशोक कुमार, शशिकला और अजीत जैसे दिग्गज कलाकारों के अभिनय और बेहतरीन गानों की वजह से बॉक्स ऑफिस पर काफी सफल रही थी। भारतीय संगीत को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाने वाले बप्पी लहरी भले ही लंबे समय तक बीमार रहने और स्लीप एपनिया के कारण 15 फरवरी 2022 को इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन हॉलीवुड के खिलाफ दर्ज कराई गई उनकी यह ऐतिहासिक जीत हमेशा संगीत जगत की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

कृति सेनन का ग्लैमरस अवतार बना चर्चा का विषय, ‘Cocktail 2’ को लेकर बढ़ा उत्साह

नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेत्री Kriti Sanon एक बार फिर अपने स्टाइल और ग्लैमर को लेकर सुर्खियों में हैं। हाल ही में उनका नया समर-रेडी लुक सामने आया है, जिसमें वे एडन एम्बेलिश्ड आउटफिट में बेहद आकर्षक नजर आईं। उनके इस ग्लिट्ज और ग्रेस से भरपूर अंदाज ने सोशल मीडिया पर फैंस का ध्यान खींच लिया है। कृति सेनन अपनी सादगी, कॉन्फिडेंस और फैशन सेंस के लिए जानी जाती हैं, और इस बार भी उन्होंने अपने लुक से एक बार फिर साबित कर दिया कि वे बॉलीवुड की सबसे स्टाइलिश अभिनेत्रियों में से एक क्यों मानी जाती हैं। उनका यह नया अवतार तेजी से वायरल हो रहा है और फैंस लगातार उनकी तारीफ कर रहे हैं। इसके साथ ही उनकी आगामी फिल्म Cocktail 2 को लेकर भी दर्शकों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। माना जा रहा है कि इस फिल्म में कृति सेनन एक नए और दिलचस्प किरदार में नजर आ सकती हैं, जिसे लेकर फैंस लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों में कृति का स्टाइलिश और एलिगेंट अंदाज साफ झलक रहा है। उनका यह लुक समर फैशन के लिए भी ट्रेंड सेट करता नजर आ रहा है। वहीं, फिल्म ‘Cocktail 2’ को लेकर बढ़ती चर्चा ने उनके फैनबेस में उत्साह और बढ़ा दिया है। कुल मिलाकर, कृति सेनन का यह नया लुक और उनकी आने वाली फिल्म दोनों ही एंटरटेनमेंट और फैशन वर्ल्ड में चर्चा का बड़ा विषय बने हुए हैं।

प्रेग्नेंसी के ग्लो से लेकर डिलीवरी के बाद मोटापे के तानों तक, कियारा आडवाणी ने बयां किया मां बनने का दर्द

नई दिल्ली । बॉलीवुड की अग्रणी अभिनेत्रियों में शुमार कियारा आडवाणी ने मातृत्व और उसके बाद समाज में महिलाओं के प्रति बदलने वाले दृष्टिकोण पर बेहद संजीदगी से अपनी बात रखी है। एक हालिया इंटरव्यू में उन्होंने मां बनने के बाद महिलाओं के सामने आने वाली व्यावहारिक और मानसिक चुनौतियों पर खुलकर चर्चा की। कियारा ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि कैसे बच्चा होने के बाद समाज महिलाओं को लेकर बेहद आत्मकेंद्रित और जजमेंटल हो जाता है। उन्होंने कहा कि मां बनने के इस खूबसूरत लेकिन कठिन सफर के बाद वे दुनिया को और भी बेहतर और परिपक्व तरीके से समझने लगी हैं, जिसका सकारात्मक असर उनके अभिनय पर भी दिखेगा। अभिनेत्री के अनुसार, अब जो भी फिल्म निर्देशक उनके साथ काम करेंगे, उन्हें उनके अभिनय का एक बिल्कुल नया, गहरा और सबसे बेहतरीन वर्जन देखने को मिलेगा। कियारा आडवाणी ने बॉम्बे टाइम्स को दिए अपने विशेष इंटरव्यू में गर्भावस्था के दौरान और बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं के प्रति लोगों के बदलते व्यवहार के दोहरे मापदंडों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि जब कोई महिला गर्भवती होती है, तब हर कोई उसकी तारीफ करता है। लोग उसके चेहरे की चमक और खूबसूरती की सराहना करते हुए उसे पलकों पर बिठाकर रखते हैं। समाज का रवैया उस समय ऐसा होता है जैसे वे किसी देवी की तरह उस महिला का सम्मान कर रहे हों। लेकिन जैसे ही वह महिला बच्चे को जन्म देती है, अचानक लोगों की सोच और नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। लोग उसके मातृत्व की सराहना करने के बजाय उसके शारीरिक बदलावों पर टिप्पणियां करना शुरू कर देते हैं, जिससे महिलाओं को काफी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। अभिनेत्री ने समाज की इस कड़वी सच्चाई को बयां करते हुए कहा कि बच्चे के जन्म के तुरंत बाद लोग महिला के चेहरे की चमक को भूलकर उसके बढ़े हुए वजन यानी मोटापे पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं। समाज में यह उम्मीद की जाने लगती है कि मां बनने के तुरंत बाद वह महिला बिल्कुल फिट दिखने लगे और बिना समय लिए अपने पुराने रूटीन में वापस लौट आए। कियारा ने स्पष्ट किया कि असल में एक महिला के जीवन का सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण समय बच्चे के जन्म के बाद ही शुरू होता है, क्योंकि इसी नाजुक दौर में उसे सबसे ज्यादा पारिवारिक और सामाजिक सहयोग की आवश्यकता होती है। यह वह समय होता है जब महिला को शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर सबसे ज्यादा सहारा चाहिए होता है। अपनी बात को और अधिक सरल ढंग से समझाते हुए कियारा आडवाणी ने एक पुरानी कहावत का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जैसे अक्सर कहा जाता है कि एक बच्चे की सही परवरिश करने के लिए पूरे गांव के सहारे की जरूरत होती है, ठीक उसी तरह एक नई मां को संभालने और मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखने के लिए भी पूरे परिवार और समाज के सहयोग की जरूरत होती है। प्रसव के बाद का समय वह होता है जब आपको उस महिला का सबसे ज्यादा ख्याल रखना चाहिए, क्योंकि वह एक साथ दो मोर्चों पर जूझ रही होती है। वह अपने शरीर में होने वाले हार्मोनल और शारीरिक बदलावों का सामना करने के साथ-साथ एक मां के रूप में अपनी बिल्कुल नई भूमिका और जिम्मेदारियों में खुद को ढालने की कोशिश कर रही होती है। गौरतलब है कि कियारा आडवाणी ने साल 2023 में अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ सात फेरे लिए थे और शादी के दो साल बाद यानी 15 जुलाई, 2025 को उन्होंने अपनी बेटी सारायाह का दुनिया में स्वागत किया था। अपनी व्यक्तिगत जिंदगी के इस खूबसूरत अनुभव को जीने के बाद वे दोबारा काम पर लौटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। आने वाले समय में कियारा सुपरस्टार यश की बहुप्रतीक्षित और पैन इंडिया स्तर पर बनने वाली एक्शन फिल्म ‘टॉक्सिक’ में एक बेहद अहम भूमिका निभाती हुई नजर आएंगी। हालांकि इस बड़ी फिल्म की रिलीज डेट के बारे में मेकर्स ने अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन फैंस बड़े पर्दे पर कियारा के इस नए अवतार को देखने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। कियारा आडवाणी के इस बेबाक और संवेदनशील इंटरव्यू ने मनोरंजन जगत के साथ-साथ आम समाज में भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है। मातृत्व के बाद महिलाओं पर होने वाली बॉडी शेमिंग और अवास्तविक फिटनेस उम्मीदों के खिलाफ उठाई गई उनकी यह आवाज निश्चित रूप से समाज को इस विषय पर दोबारा सोचने और नई माताओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनने के लिए प्रेरित करेगी।