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किराये के घर में शिफ्ट होने से पहले अपनाएं ये वास्तु उपाय, बनी रहेगी सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा

नई दिल्ली। आज के समय में बढ़ती आबादी और शहरीकरण के कारण बड़ी संख्या में लोग किराये के घरों में रहते हैं। हालांकि अक्सर लोग अपना घर खरीदने के बाद ही वास्तु शास्त्र पर ध्यान देते हैं लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार किराये के घर में रहने वाले लोगों के लिए भी वास्तु के नियम उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। यदि किराये के घर में प्रवेश करते समय कुछ जरूरी वास्तु उपायों का ध्यान रखा जाए तो जीवन में सुख शांति समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने में मदद मिल सकती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार जब भी कोई व्यक्ति नए घर में प्रवेश करता है चाहे वह अपना घर हो या किराये का तो शुभ समय और शुभ मुहूर्त में ही प्रवेश करना बेहतर माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार उस समय ग्रहों की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है विशेष रूप से शुक्र ग्रह की स्थिति का विचार करना लाभकारी माना जाता है। हालांकि किराये के घर में प्रवेश करते समय खरमास जैसी स्थितियों को लेकर अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती। विशेषज्ञों के अनुसार घर में प्रवेश के दिन नवग्रह पूजा और हवन करवाना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम होता है। इसके साथ ही घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण लगाना भी शुभ माना जाता है क्योंकि यह समृद्धि और शुभता का प्रतीक होता है। ज्योतिषाचार्य पंडित मनोत्पल झा के अनुसार किराये के मकान में प्रवेश करते समय कुछ सरल नियमों का पालन करने से घर में सुख समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। उनका कहना है कि नए घर में प्रवेश के शुरुआती दिनों में मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित हो सकती है। किराये के घर में भी पूजा के लिए उत्तर पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को सबसे शुभ माना जाता है। इसलिए घर में पूजा स्थान इसी दिशा में बनाना चाहिए और उस स्थान को साफ सुथरा तथा व्यवस्थित रखना चाहिए। इसके अलावा घर में कहीं भी पानी के नल या पाइप से लगातार पानी टपकता नहीं रहना चाहिए क्योंकि वास्तु के अनुसार यह धन हानि का संकेत माना जाता है। वास्तु शास्त्र यह भी सुझाव देता है कि घर के अंदर बहुत गहरे रंग जैसे काला या गहरा लाल अधिक मात्रा में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इन रंगों का अधिक प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ा सकता है। इसके बजाय हल्के और सकारात्मक रंगों का उपयोग घर के वातावरण को शांत और सुखद बनाता है। घर में सात्विकता और सकारात्मक माहौल बनाए रखने के लिए कुछ लोग हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करने की भी सलाह देते हैं। सुबह और शाम उनकी पूजा करने से घर में सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। इसके साथ ही उत्तर पश्चिम दिशा में सुगंधित अगरबत्ती जलाने से वातावरण पवित्र और शांत रहता है। वास्तु विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे घर किराये का हो या अपना यदि उसमें रहने वाले लोग साफ सफाई सकारात्मक सोच और धार्मिक परंपराओं का पालन करें तो घर में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है।

शीतला अष्टमी 2026: कब है बासोड़ा पूजा? जानिए तारीख, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी का पर्व विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन शीतला माता की पूजा-अर्चना कर परिवार के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। शीतला अष्टमी को कई जगहों पर बासोड़ा या बासोड़ा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत हर वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन माता शीतला को ठंडे या बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता। वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च बुधवार को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र कृष्ण अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 मार्च को रात 1 बजकर 54 मिनट से हो रही है और यह तिथि 12 मार्च को सुबह 4 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर शीतला अष्टमी का व्रत 11 मार्च को रखा जाएगा। इस दिन श्रद्धालुओं को पूजा के लिए लगभग 12 घंटे का शुभ समय प्राप्त होगा। शीतला अष्टमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 36 मिनट से प्रारंभ होकर शाम 6 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। वहीं इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 58 मिनट से 5 बजकर 47 मिनट तक रहेगा जिसे स्नान और ध्यान के लिए उत्तम समय माना जाता है। हालांकि इस दिन अभिजीत मुहूर्त नहीं है। वहीं राहुकाल दोपहर 12 बजकर 31 मिनट से 2 बजे तक रहेगा इसलिए इस समय में पूजा या शुभ कार्य करने से बचना चाहिए। इस वर्ष शीतला अष्टमी पर वज्र योग सिद्धि योग और ज्येष्ठा नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। वज्र योग सुबह से लेकर 9 बजकर 12 मिनट तक रहेगा जिसके बाद सिद्धि योग प्रारंभ होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार वज्र योग को अधिक शुभ नहीं माना जाता इसलिए शीतला माता की पूजा सिद्धि योग में करना अधिक फलदायी माना जाता है। इस योग में की गई पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। शीतला अष्टमी का पर्व स्वास्थ्य और रोगों से सुरक्षा से जुड़ा हुआ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से चेचक जैसे संक्रामक रोगों से रक्षा होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। शीतला माता को ठंडा भोजन प्रिय माना जाता है इसलिए इस दिन घर में नया भोजन नहीं बनाया जाता। परंपरा के अनुसार शीतला सप्तमी यानी  एक दिन पहले भोजन बनाकर रखा जाता है और अगले दिन वही ठंडा भोजन माता शीतला को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के लोग भी उसी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से माता शीतला प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को स्वास्थ्य सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

आज रंग पंचमी पर लगाएं लड्डू गोपाल को ये प्रिय भोग, घर में बनी रहेगी सुख, समृद्धि और खुशहाली

नई दिल्ली । रंग पंचमी का त्योहार भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी लीलाओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। होली के पांच दिन बाद आने वाला यह पर्व भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है और इस दिन कई घरों और मंदिरों में लड्डू गोपाल का श्रृंगार और पूजा होती है। माना जाता है कि जिस घर में लड्डू गोपाल की सेवा होती है वहां हमेशा सुख समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल को बच्चे की तरह ही समझा जाता है। उनकी देखभाल और पूजा भी उसी तरह की जाती है जैसे घर के छोटे बच्चों की। त्योहारों के समय उनके लिए विशेष मिठाइयाँ और व्यंजन बनाना एक परंपरा रही है। रंग पंचमी पर भी भक्त लड्डू गोपाल का श्रृंगार करते हैं और उन्हें स्वादिष्ट भोग अर्पित करते हैं। इस दिन लड्डू गोपाल को भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है। सबसे प्रिय माना जाने वाला भोग गुजिया है। होली के समय बनने वाली यह मिठाई भगवान को बहुत प्रिय मानी जाती है। कई घरों और मंदिरों में रंग पंचमी पर सबसे पहले गुजिया लड्डू गोपाल को अर्पित की जाती है। माना जाता है कि इससे भगवान प्रसन्न होते हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। गुजिया के अलावा चंद्रकला और अन्य पारंपरिक मिठाइयाँ भी भोग में लगाई जाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण को दही बहुत प्रिय है इसलिए इस दिन लड्डू गोपाल को दही या मीठी दही का भोग लगाना भी शुभ माना जाता है। अगर घर में दही से कोई व्यंजन उपलब्ध हो तो उसे भी अर्पित किया जा सकता है। केवल दही और चीनी मिलाकर भोग लगाना भी भगवान को प्रिय होता है और इससे परिवार में प्रेम और आपसी सद्भाव बना रहता है। जलेबी और मालपुए का भोग भी इस दिन लगाना विशेष लाभकारी माना जाता है। कई मंदिरों में रंग पंचमी पर जलेबी और मालपुए का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है। मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और भगवान की कृपा से घर में खुशहाली आती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान को भोग लगाने में सबसे महत्वपूर्ण तत्व श्रद्धा और भक्ति है। अगर भक्त सच्चे मन से भोग अर्पित करता है तो भगवान प्रसन्न होते हैं। इसलिए रंग पंचमी पर लड्डू गोपाल की सेवा करते समय प्रेम और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भोग लगाने के बाद भगवान की आरती करना और प्रसाद को परिवार में बाँटना भी शुभ माना जाता है। रंग पंचमी का त्योहार ब्रज क्षेत्र की परंपराओं से जुड़ा है जहां इस दिन रंगों और गुलाल के साथ भगवान कृष्ण की पूजा होती है। मंदिरों में भजन-कीर्तन और उत्सव का आयोजन किया जाता है। यह पर्व प्रेम भक्ति और आनंद का प्रतीक है और भक्त इस दिन भगवान श्रीकृष्ण से सुख समृद्धि और शांति की कामना करते हैं। घर में लड्डू गोपाल की पूजा सुबह स्नान के बाद करें। सबसे पहले उनका श्रृंगार करें उन्हें नए वस्त्र पहनाएं और फूलों से सजाएं। इसके बाद मिठाइयाँ और दही का भोग लगाएं भगवान की आरती करें और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करें। छोटे बच्चों को पूजा में शामिल करना भी शुभ माना जाता है क्योंकि इससे उनमें भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति बढ़ती है।

देवताओं की होली रंग पंचमी कल जानें तिथि पूजा विधि और भगवान को किस रंग का गुलाल चढ़ाना होता है शुभ

नई दिल्ली। हिंदू धर्म में होली के बाद आने वाला रंग पंचमी का पर्व बेहद खास और आध्यात्मिक महत्व वाला माना जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी को अबीर गुलाल अर्पित करने की परंपरा है इसलिए इसे देवताओं की होली भी कहा जाता है। देश के कई हिस्सों में यह पर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना की जाती है और भगवान को रंग अर्पित कर भक्त उनकी कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवी देवताओं को अबीर गुलाल चढ़ाने से कुंडली के दोष कम होते हैं और जीवन में सुख समृद्धि तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार रंग पंचमी का पर्व चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष पंचमी तिथि 7 मार्च को शाम 7 बजकर 17 मिनट से शुरू होकर 8 मार्च को रात 9 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। पंचमी तिथि उदया तिथि के अनुसार 8 मार्च को पड़ रही है इसलिए इस वर्ष रंग पंचमी का पर्व 8 मार्च रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन कई स्थानों पर धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा होती है और कई जगह भव्य शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं। ढोल नगाड़ों की गूंज और भक्ति संगीत के साथ पूरा वातावरण उत्सवमय हो जाता है। रंग पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी की पूजा करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। कई श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की भी पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि विधि विधान के साथ पूजा करने से घर परिवार में सुख समृद्धि और शांति बनी रहती है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद घर के पूजा स्थान पर एक चौकी रखकर उस पर राधा कृष्ण की प्रतिमा स्थापित की जाती है। भगवान को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराया जाता है और उन्हें फूल माला तथा फल अर्पित कर सुंदर श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद श्रद्धा भाव से भगवान को अबीर गुलाल अर्पित किया जाता है। पूजा के दौरान दीपक और धूप जलाकर मंत्रों का जाप किया जाता है और अंत में भगवान की आरती उतारी जाती है तथा प्रसाद का वितरण किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में रंग पंचमी के दिन अलग अलग रंग के गुलाल का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि अलग अलग रंग जीवन के अलग अलग क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। लाल रंग को ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है और इसे सूर्य तथा मंगल से जुड़ा हुआ रंग बताया गया है। यदि किसी व्यक्ति के कामों में बाधा आ रही हो या आत्मविश्वास में कमी महसूस हो रही हो तो भगवान को लाल रंग का गुलाल अर्पित करना शुभ माना जाता है। पीला रंग शुभता और मंगल कार्यों से जुड़ा माना जाता है और इसे देवगुरु बृहस्पति का रंग कहा जाता है। यदि विवाह या अन्य मांगलिक कार्यों में रुकावट आ रही हो या संतान की शिक्षा में परेशानी हो तो भगवान को पीले रंग का गुलाल अर्पित करना लाभकारी माना जाता है। हरा रंग समृद्धि शांति और संतुलन का प्रतीक माना जाता है और ज्योतिष के अनुसार इसका संबंध बुध ग्रह से होता है। यदि वाणी और बुद्धि में असंतुलन के कारण जीवन में समस्याएं आ रही हों तो रंग पंचमी के दिन भगवान को हरे रंग का गुलाल चढ़ाना शुभ माना जाता है। वहीं नीले रंग को वास्तु और ज्योतिष दोनों में विशेष महत्व दिया गया है। यह रंग सुरक्षा सत्य और गहराई का प्रतीक माना जाता है और इसे शनि ग्रह से जोड़ा जाता है। जीवन में आ रही कठिनाइयों को दूर करने और मानसिक स्थिरता प्राप्त करने के लिए भगवान को नीले रंग का गुलाल अर्पित करना लाभकारी माना जाता है। इस तरह रंग पंचमी केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और भक्ति भाव से पूजा करने से जीवन में सुख शांति और समृद्धि आने की मान्यता है।

चैत्र अमावस्या 2026: क्यों होगा पितरों का श्राद्ध एक दिन पहले? जानिए तारीख, मुहूर्त और महत्व

नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र अमावस्या का दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को आता है और इस दिन स्नान दान तर्पण पिंडदान और श्राद्ध जैसे कार्य पितरों के लिए किए जाते हैं। इस वर्ष विशेष बात यह है कि पितरों के लिए श्राद्ध कर्म चैत्र अमावस्या से एक दिन पहले यानी 18 मार्च बुधवार को किए जाएंगे। वैदिक पंचांग के अनुसार 2026 में चैत्र अमावस्या तिथि की शुरुआत 18 मार्च सुबह 8:25 बजे से हो रही है और समाप्ति 19 मार्च गुरुवार को सुबह 6:52 बजे होगी। अमावस्या तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे समाप्त हो जाने के कारण पितरों के श्राद्ध और तर्पण का मुहूर्त 18 मार्च के दिन ही आता है। इसे दर्श अमावस्या कहा जाता है। इस समय में 11:30 बजे से लेकर दोपहर 2:30 बजे के बीच श्राद्ध पिंडदान और दान आदि किए जा सकते हैं। चैत्र अमावस्या के दिन का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:51 बजे से 5:39 बजे तक है जो स्नान और धार्मिक क्रियाओं के लिए उत्तम माना जाता है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। इस बार अमावस्या शुक्ल योग और उत्तर भाद्रपद नक्षत्र में है। शुक्ल योग प्रातः से देर रात 1:17 बजे तक रहेगा जबकि उत्तर भाद्रपद नक्षत्र प्रातः से 20 मार्च को सुबह 4:05 बजे तक रहेगा। चैत्र अमावस्या और दर्श अमावस्या दोनों ही दिन राज पंचक में आते हैं। राज पंचक इस वर्ष 16 मार्च सोमवार शाम 6:14 बजे से प्रारंभ होकर 19 मार्च तक चलेगा। इसे शुभ फलदायी पंचक माना जाता है जो दान और धार्मिक कार्यों के लिए बेहद लाभकारी है। धार्मिक मान्यता है कि चैत्र अमावस्या के दिन पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करने से पितृ दोष की शांति होती है। इससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। वहीं जो लोग पितरों को तृप्त नहीं करते उन्हें जीवन में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। स्नान और दान करना इस दिन विशेष पुण्य का कार्य माना जाता है। इस दिन लोग पितरों को तृप्त कर पुण्य अर्जित करते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस प्रकार इस वर्ष चैत्र अमावस्या और दर्श अमावस्या का यह समय पितृ पूजा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रंग पंचमी: क्यों कहा जाता है इसे देवताओं की होली, जानिए धार्मिक महत्व और खास परंपराएं

नई दिल्ली। होली के रंगों और उत्साह से भरे माहौल के बीच आने वाला रंग पंचमी का पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। यह त्योहार हर वर्ष होली के पांचवें दिन यानी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष रंग पंचमी का पर्व 8 मार्च रविवार को मनाया जाएगा। भारत के कई हिस्सों में इसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है हालांकि मध्यप्रदेश महाराष्ट्र गुजरात और ब्रज क्षेत्र में इसका विशेष महत्व माना जाता है। रंग पंचमी को देव पंचमी या कृष्ण पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी देवता पृथ्वी पर आकर भक्तों के साथ होली खेलते हैं। यही कारण है कि इसे देवताओं की होली भी कहा जाता है। जिस तरह कार्तिक पूर्णिमा को देवताओं की दिवाली मानी जाती है उसी तरह रंग पंचमी को देवताओं की होली के रूप में देखा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ब्रज में इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने राधारानी और गोपियों के साथ रंगों की होली खेली थी। इसी परंपरा के चलते आज भी कई मंदिरों में इस दिन विशेष रंगोत्सव आयोजित किए जाते हैं। मंदिरों में चंदन हल्दी और फूलों से बने प्राकृतिक रंगों से भगवान को गुलाल अर्पित किया जाता है और भक्त भी एक दूसरे पर रंग लगाकर इस उत्सव में शामिल होते हैं। ब्रज क्षेत्र में होली का उत्सव लगभग 40 दिनों तक चलता है और रंग पंचमी के साथ इस उत्सव का समापन माना जाता है। इसलिए यह पर्व होली की विदाई का भी प्रतीक है। इस दिन लोग एक दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं देते हैं और आपसी प्रेम भाईचारे और सद्भाव का संदेश फैलाते हैं। रंग पंचमी के दिन मंदिरों और घरों में विशेष पूजा अर्चना की जाती है। भक्त सबसे पहले राधा कृष्ण की पूजा करते हैं और गुलाल उनके चरणों में अर्पित करते हैं। कई मंदिरों में इस दिन भगवान की विशेष झांकियां सजाई जाती हैं और श्रद्धालुओं के लिए दर्शन की व्यवस्था की जाती है। इसके साथ ही सामूहिक रंगोत्सव भी आयोजित किए जाते हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं। इस अवसर पर कई जगहों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं जिनमें लोकगीत नृत्य और पारंपरिक कार्यक्रम शामिल होते हैं। शहरों कस्बों और गांवों में लोग मिलकर रंगों का उत्सव मनाते हैं और पुराने मतभेदों को भुलाकर नए सिरे से रिश्तों को मजबूत करते हैं। घर घर में इस दिन विशेष पकवान भी बनाए जाते हैं और परिवार के सभी सदस्य मिलकर उत्सव का आनंद लेते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई रंग पंचमी के रंगों में सराबोर दिखाई देता है। इस तरह रंग पंचमी न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है बल्कि यह सामाजिक एकता प्रेम और भाईचारे का भी प्रतीक माना जाता है।

पूजा सामग्री का पुनः उपयोग: शास्त्र क्या कहते हैं, जानें नियम और अपवाद

नई दिल्ली । पूजा-पाठ के दौरान अक्सर घरों में यह सवाल उठता है कि क्या भगवान को अर्पित की गई सामग्री को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। कई लोग फूल माला अक्षत या जल को फिर से पूजा में उपयोग कर लेते हैं। लेकिन हिंदू शास्त्र इस विषय में स्पष्ट नियम बताते हैं। पूजा की शुद्धता और पवित्रता को बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इसी वजह से पूजा सामग्री के पुनः उपयोग को लेकर कुछ दिशानिर्देश तय किए गए हैं। शास्त्रों में पूजा में अर्पित सामग्री को निर्माल्य कहा गया है। इसका अर्थ है वह सामग्री जो एक बार भगवान को अर्पित की जा चुकी हो। नियम के अनुसार जो फूल माला या अक्षत भगवान को अर्पित कर दिए जाते हैं वे उनके प्रसाद का हिस्सा बन जाते हैं। इन्हें दोबारा धोकर या साफ करके पूजा में इस्तेमाल करना अशुद्ध माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं होता और भगवान को अर्पण का महत्व भी कम हो जाता है। जल और दीपक के संबंध में भी शास्त्र स्पष्ट हैं। पूजा में इस्तेमाल होने वाला जल हमेशा ताजा होना चाहिए। अगर कलश में रखा जल किसी कारण अशुद्ध स्पर्श में आ जाए तो उसे फिर से पूजा में उपयोग नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार तांबे या पीतल के बर्तनों को हर पूजा के बाद शुद्ध मिट्टी या नींबू से धोकर ही इस्तेमाल करना चाहिए। दीपक जलाते समय पुराने दीये की जली हुई बत्ती और बचा हुआ तेल हटा देना चाहिए। इससे पूजा की पवित्रता और नियमों का पालन सुनिश्चित होता है। हालांकि कुछ अपवाद भी हैं। गंगाजल को कभी बासी नहीं माना जाता इसलिए इसे बार-बार उपयोग किया जा सकता है। तुलसी के पत्तों को भी विशेष परिस्थितियों में धोकर दोबारा अर्पित किया जा सकता है। इसी तरह भगवान की मूर्ति शालिग्राम घंटी शंख मंत्र जाप की माला और पूजा के धातु के पात्रों को धोकर पुनः इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ सामग्री को दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि भगवान शिव को अर्पित बेलपत्र को भी बशर्ते खंडित या दागदार न हो दोबारा अर्पित किया जा सकता है। लेकिन फूल माला भोग चंदन कुमकुम धूप-दीप नारियल अक्षत या दीपक में बचा तेल दोबारा पूजा में नहीं इस्तेमाल करना चाहिए। पूजा सामग्री का सम्मान करना ही धार्मिक नियमों का पालन माना जाता है और इससे श्रद्धालु को आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस प्रकार पूजा सामग्री के पुनः उपयोग में शास्त्र के नियमों और अपवादों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। इससे पूजा की पवित्रता भगवान को अर्पण की श्रद्धा और धार्मिक परंपराओं की महत्ता बनी रहती है। श्रद्धालु इस नियम का पालन करके पूजा के दौरान आध्यात्मिक लाभ और मानसिक संतोष प्राप्त कर सकते हैं।

Kharmas 2026 : एक माह तक मांगलिक कार्यों पर ब्रेक, जानें पवित्र स्नान और वर्जित कार्य

नई दिल्ली । साल का दूसरा खरमास 2026 बस कुछ ही दिनों में शुरू होने वाला है। ज्योतिष गणना के अनुसार जब सूर्य देव धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं उसी समय को खरमास कहा जाता है। इस वर्ष वैदिक पंचांग के अनुसार सूर्य 14 मार्च को मीन राशि में गोचर करेंगे जिससे साल का दूसरा खरमास प्रारंभ होगा। पहले खरमास की अवधि 16 दिसंबर से 14 जनवरी तक रही थी। हिंदू कैलेंडर के अनुसार इस वर्ष खरमास की अवधि चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि से लेकर वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि तक होगी। इस समय के दौरान धार्मिक और मांगलिक कार्यों पर ब्रेक लगाया जाता है। इस अवधि को विशेष ध्यान और संयम का समय माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि खरमास में पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत शुभ होता है। ऐसा करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती है। इस दौरान नदी में दीपदान करना भी शुभ फलदायी माना जाता है। इसलिए श्रद्धालु इस समय साधना और आत्मशुद्धि पर अधिक ध्यान देते हैं। खरमास में कई मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। इस दौरान विवाह करना शुभ नहीं माना जाता। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि यदि इस समय विवाह किया जाए तो दांपत्य जीवन में परेशानियां और भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है। इसके अलावा गृह प्रवेश नया घर बनवाना और अन्य शुभ कार्य भी नहीं किए जाते। नए कार्यों की शुरुआत से भी बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इस समय कोई नया व्यवसाय या निवेश शुरू करने से आर्थिक हानि और कार्यों में सफलता नहीं मिलती। इसी प्रकार मुंडन संस्कार नामकरण और अन्य मांगलिक कार्य भी इस अवधि में नहीं किए जाते। इस समय को संयम साधना जप-तप और आत्मचिंतन का समय माना जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार खरमास के दौरान धार्मिक नियमों का पालन करना व्यक्ति के लिए लाभकारी होता है। इस समय अपने कर्तव्यों और साधना पर ध्यान देना मानसिक शांति बनाए रखना और पवित्र नदियों में स्नान करना आर्थिक और मानसिक उन्नति के लिए शुभ माना गया है। श्रद्धालु इस अवधि में उपवास दान और धर्म-कर्म के कार्यों में अधिक ध्यान देते हैं। इसका उद्देश्य जीवन में संयम बनाए रखना और अपने कर्मों को शुद्ध करना है। खरमास के बाद ही मांगलिक कार्य और नए काम की शुरुआत को शुभ माना जाता है। इस तरह खरमास 2026 के दौरान धार्मिक नियमों और परंपराओं का पालन करना विशेष महत्व रखता है। यह समय अपने मन शरीर और कर्मों की शुद्धि का होता है जिससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और संतुलन बना रहता है।

चैत्र नवरात्रि 2026: 19 मार्च से शुरू, जानें कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त और देवी आगमन की खास बातें

नई दिल्ली । साल में चार नवरात्रि आती हैं लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 19 मार्च 2026 को पड़ेगी जिसे हिंदू नव वर्ष की शुरुआत के रूप में भी माना जाता है। इस साल चैत्र नवरात्रि गुरुवार 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक रामनवमी के साथ समाप्त होंगे। यह नौ दिन का पर्व भक्तों के लिए मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा और आराधना का अवसर लेकर आता है जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि आती है। चैत्र नवरात्रि की शुरुआत प्रतिपदा तिथि से होती है। 19 मार्च गुरुवार सुबह 6.52 बजे से प्रतिपदा तिथि प्रारंभ होगी और 20 मार्च शुक्रवार सुबह 4.52 बजे समाप्त होगी। धार्मिक मान्यता अनुसार उदया तिथि के आधार पर नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से मानी जाएगी। इस दिन से भक्त मां दुर्गा के नौ रूपों की नौ दिनों तक पूजा अर्चना करेंगे। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना का विशेष महत्व है। इस दिन देवी के आवाहन के लिए घर या मंदिर में कलश स्थापित किया जाता है। साल 2026 में कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। पहला मुहूर्त सुबह 6.52 बजे से 7.43 बजे तक रहेगा जबकि दूसरा मुहूर्त दोपहर 12.5 बजे से 12.53 बजे तक रहेगा। इन दोनों समयों में श्रद्धालु अपनी विधिपूर्वक पूजा और कलश स्थापना कर सकते हैं। नवरात्रि से पहले देवी आगमन का तरीका भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस साल मां दुर्गा का आगमन डोली पर नहीं होगा क्योंकि गुरुवार से नवरात्रि प्रारंभ होने के कारण इसे अशुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता अनुसार डोली पर देवी का आगमन अस्थिरता और समाज तथा राजनीति में उथल पुथल का संकेत माना जाता है। इसके विपरीत इस वर्ष मां दुर्गा का गमन हाथी पर होगा जिसे शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। हाथी पर गमन सुख समृद्धि और अच्छी वर्षा का संकेत देता है जिससे पूरे देश में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है। इस बार की विशेषता यह है कि चैत्र नवरात्रि में किसी भी तिथि का क्षय या वृद्धि नहीं होगी। यानी पूरे नौ दिनों तक श्रद्धालु बिना किसी बाधा के मां दुर्गा के नौ अलग अलग रूपों की पूजा कर सकेंगे। 19 मार्च से 27 मार्च तक चलने वाले इन नवरात्रियों में भक्तों को मां के पूरे नौ दिन की आराधना करने का अवसर मिलेगा। चैत्र नवरात्रि 2026 श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक शांति समृद्धि और घर में खुशहाली का संदेश लेकर आ रहा है। कलश स्थापना से लेकर देवी आगमन तक हर चरण में धार्मिक मान्यताओं का पालन करना शुभ फलदायी माना गया है। इसलिए इस नवरात्रि पर भक्त अपने घर या मंदिर में विधिपूर्वक पूजा कर घर में सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य की प्राप्ति कर सकते हैं।

चारधाम यात्रा 2026: ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू, 19 अप्रैल से शुरू होगी यात्रा

नई दिल्ली ।उत्तराखंड सरकार ने चारधाम यात्रा 2026 के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शुरू कर दी है। अब श्रद्धालु घर बैठे मोबाइल कंप्यूटर ऐप या वॉट्सएप के माध्यम से यात्रा के लिए पंजीकरण कर सकते हैं। यात्रा में शामिल होने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है ताकि प्रशासन संख्या सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन बेहतर ढंग से संभाल सके। इस साल चारधाम यात्रा की शुरुआत 19 अप्रैल से होगी। यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट इसी दिन श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे। केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल और बद्रीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल 2026 को खुलेंगे। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के तीन तरीके हैं: वेबसाइट से रजिस्ट्रेशन:उत्तराखंड सरकार की वेबसाइट registrationandtouristcare.uk.gov.in पर अकाउंट बनाकर यात्रा की तारीख धाम और यात्रियों की जानकारी भरनी होगी। प्रक्रिया पूरी होने पर रजिस्ट्रेशन स्लिप डाउनलोड की जा सकती है। मोबाइल ऐप से रजिस्ट्रेशन: Tourist Care Uttarakhand मोबाइल ऐप डाउनलोड कर अकाउंट बनाने के बाद यात्रा संबंधी जानकारी भरें और पास डाउनलोड करें। वॉट्सएप से रजिस्ट्रेशन:8394833833 नंबर पर Yatra मैसेज भेजकर चैटबॉट के जरिए रजिस्ट्रेशन पूरा कर सकते हैं। सरकार ने 0135-1364 हेल्पलाइन नंबर जारी किया है जिससे ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन या यात्रा संबंधित जानकारी ली जा सकती है। केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल 2026 को सुबह 8 बजे खुलेंगे। यह महाशिवरात्रि 15 फरवरी 2026 के पंचांग गणना के अनुसार तय किया गया है। बद्रीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल 2026 को सुबह 6:15 बजे खुलेंगे। यमुनोत्री और गंगोत्री धाम के कपाट 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर भक्तों के लिए खोल दिए जाएंगे। पिछली यात्रा के दौरान 2025 में केदारनाथ धाम के कपाट 2 मई को और बद्रीनाथ के 25 नवंबर को बंद किए गए थे। गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट 22 और 23 अक्टूबर 2025 को बंद हुए थे।श्रद्धालु ध्यान दें कि ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन 17 अप्रैल से शुरू होगा और हरिद्वार ऋषिकेश समेत कई प्रमुख स्थानों पर बायोमेट्रिक रजिस्ट्रेशन काउंटर लगाए जाएंगे।