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होली की आग से दूर रहें ये महिलाएं: साल 2026 का चंद्र ग्रहण और होलिका दहन, भूलकर भी न करें ये गलतियां!

नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति में होली का त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात को जब होलिका का दहन किया जाता है, तो इसके साथ ही नकारात्मक शक्तियों के अंत और नई ऊर्जा के आगमन की कामना की जाती है। हालांकि, साल 2026 का होलिका दहन बेहद खास और संवेदनशील है, क्योंकि इसी दिन चंद्र ग्रहण का संयोग भी बन रहा है। इस खगोलीय घटना के कारण इंटरनेट पर 2 मार्च और 3 मार्च की तारीखों को लेकर खासी बहस छिड़ी हुई है। लेकिन तिथियों के इस भ्रम के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर किन लोगों के लिए जलती हुई होली को देखना वर्जित है? अक्सर लोग जानते हैं कि नई दुल्हन को शादी के बाद पहली होली नहीं देखनी चाहिए, लेकिन शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार कुछ अन्य महिलाओं और बच्चों के लिए भी होलिका दहन की अग्नि के दर्शन शुभ नहीं माने जाते। सबसे पहले बात करें गर्भवती महिलाओं की, तो उन्हें होलिका दहन से पूरी तरह दूर रहने की सलाह दी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, यह अग्नि भक्त प्रहलाद को जलाने के लिए जलाई गई थी, जो एक नकारात्मक भाव का प्रतीक है। ज्योतिषीय और वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोणों से, अग्नि का तीव्र ताप और उससे निकलने वाला धुआं गर्भवती महिला और गर्भस्थ शिशु के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। ऐसी महिलाओं को होलिका की परिक्रमा करने से भी बचना चाहिए। इसी तरह, नवजात शिशुओं को भी होलिका दहन के स्थान पर नहीं ले जाना चाहिए। माना जाता है कि पूर्णिमा की इस रात को नकारात्मक शक्तियां अत्यंत प्रबल होती हैं, जिससे छोटे बच्चों को “बुरी नजर” लगने का खतरा रहता है। उनकी कोमल सेहत के लिए धुआं और शोर भी हानिकारक हो सकता है। एक दिलचस्प सामाजिक मान्यता सास-बहू के रिश्ते को लेकर भी है। कई क्षेत्रों में यह माना जाता है कि सास और बहू को कभी भी एक साथ खड़े होकर होलिका दहन नहीं देखना चाहिए। ऐसा करने से उनके आपसी रिश्तों में खटास आ सकती है और घर में कलह का वातावरण बन सकता है। परिवार की सुख-शांति के लिए दोनों का एक साथ वहां मौजूद होना वर्जित बताया गया है। इसके अलावा, इकलौती संतान की मां को भी होलिका दहन देखने से परहेज करना चाहिए। इसके पीछे का तर्क भक्त प्रहलाद से जुड़ा है, जो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे। अंत में, ऐसी लड़कियां जिनकी शादी तय हो चुकी है और कुछ ही महीनों में उनका विवाह होने वाला है, उन्हें भी जलती हुई होली देखने से बचना चाहिए। चूंकि वे जीवन के एक नए और मांगलिक पड़ाव में कदम रखने जा रही हैं, इसलिए उन्हें इस “दहन” की प्रक्रिया से दूर रहकर केवल सकारात्मक उत्सवों में ही भाग लेना चाहिए।

शनि अस्त 2026: साढ़ेसाती झेल रहे जातकों के लिए वरदान साबित होगा यह गोचर, जानें किन राशियों को मिलेगा राजसुख!

नई दिल्ली। ज्योतिष शास्त्र में शनि देव को न्याय का देवता और कर्मफल दाता माना जाता है। शनि की चाल में आने वाला हर छोटा बदलाव भी सभी 12 राशियों के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। वर्ष 2026 में एक ऐसी ही महत्वपूर्ण खगोलीय घटना होने जा रही हैजो कई जातकों के लिए राहत की खबर लेकर आएगी। द्रिक पंचांग के अनुसार13 मार्च 2026 की शाम 7 बजकर 14 मिनट पर शनि देव मीन राशि में अस्त होने जा रहे हैं। सामान्यतः किसी ग्रह का अस्त होना उसके प्रभाव को कम करता हैलेकिन शनि के मामले में यहअस्त होना उन लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैजो लंबे समय से शनि की टेढ़ी नजर या साढ़ेसाती का कष्ट झेल रहे थे। जैसे ही सूर्य देव मीन राशि में प्रवेश करेंगेशनि का तेज कम होने लगेगाजिससे उनके क्रूर या अशुभ फलों में भारी कमी आएगी। यह समय विशेष रूप से उन तीन राशियों के लिएमहा-भाग्योदय का मार्ग प्रशस्त करेगाजिन्हें शनि अब तक कड़ी परीक्षा में डाल रहे थे। इनमें मेषवृश्चिक और कुंभ राशि शामिल हैं। ज्योतिषियों का मानना है कि शनि का यह अस्त काल 13 मार्च से शुरू होकर 22 अप्रैल 2026 तक रहेगाऔर इन 40 दिनों में इन राशियों के करियर और आर्थिक स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल सकते हैं। मेष राशि के जातकों की बात करें तो उन पर वर्तमान में शनि की साढ़ेसाती का प्रथम चरण चल रहा है। शनि का अस्त होना इनके लिए किसी बड़ी मानसिक और आर्थिक राहत जैसा होगा। अब तक जो काम अटके हुए थे या जिन प्रयासों का फल नहीं मिल रहा थावहां से सफलता मिलनी शुरू होगी। फिजूलखर्ची पर लगाम लगेगी और संचय की गई पूंजी में वृद्धि होगी। यदि आप लंबे समय से किसी विदेशी स्रोत से धन लाभ की प्रतीक्षा कर रहे थेतो वह इच्छा अब पूर्ण हो सकती है। साथ हीनौकरीपेशा जातकों को नए और बेहतर अवसर प्राप्त होंगेजिससे करियर की गाड़ी पटरी पर लौट आएगी। वहींवृश्चिक राशि के लिए शनि का अस्त होना आत्मविश्वास के नए द्वार खोलेगा। इस अवधि में आपके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होगाजो आपको साहसी निर्णय लेने के लिए प्रेरित करेगा। रुके हुए कार्यों में गति आएगी और व्यापारिक क्षेत्र में आप कोई बड़ी डील फाइनल कर सकते हैं। जो लोग नौकरी में प्रमोशन या वेतन वृद्धि की उम्मीद लगाए बैठे थेउनके लिए यह समय बेहद अनुकूल रहने वाला है। हालांकिइस दौरान संतान पक्ष को लेकर थोड़ी सावधानी बरतने की सलाह दी जाती हैलेकिन कुल मिलाकर यह समय आपके वैभव और सम्मान में वृद्धि करने वाला साबित होगा। अंत मेंकुंभ राशि के जातकों के लिए यह गोचर अत्यंत महत्वपूर्ण हैक्योंकि उन पर शनि की साढ़ेसाती का अंतिम और तीसरा चरण चल रहा है। शनि के अस्त होते ही आपके कंधों से भारी बोझ उतरता हुआ महसूस होगा। आय के नए स्रोत बनेंगे और किसी पुरानी संपत्ति के क्रय-विक्रय से आपको मोटा मुनाफा होने के योग हैं। कार्यक्षेत्र में आपके प्रदर्शन की सराहना होगी और वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग प्राप्त होगा। बस एक बात का विशेष ध्यान रखें कि अपनीवाणी पर संयम रखेंक्योंकि छोटी सी बहस बड़े विवाद का रूप ले सकती है। 13 मार्च से 22 अप्रैल के बीच का यह समय इन राशियों के लिएगोल्डन पीरियड की तरह हैजहां संयम और सही योजना के साथ ये जातकों अपने जीवन की दिशा बदल सकते हैं।

उत्तराखंड का रहस्यमयी धर्मेश्वर महादेव मंदिर जहां मृत्यु के बाद लगती है यमराज की अदालत

नई दिल्ली। भारतीय परंपराओं में यह मान्यता प्रचलित है कि मृत्यु के बाद हर मनुष्य को अपने कर्मों का हिसाब देना होता है। जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्म ही उसके अगले जन्म और भाग्य का निर्धारण करते हैं। लेकिन उत्तराखंड में एक ऐसा प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर मौजूद है जिसके बारे में कहा जाता है कि मृत्यु के बाद यहीं यमराज की अदालत लगती है और मनुष्य के कर्मों का लेखा जोखा किया जाता है। हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड स्थित Dharmeshwar Mahadev Temple की जो चौरासी मंदिर परिसर के भीतर स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह स्थान केवल एक शिव मंदिर नहीं बल्कि कर्मों के अंतिम निर्णय का प्रतीक स्थल माना जाता है। यहां गर्भगृह में मटके के आकार का शिवलिंग स्थापित है जिसे भगवान शिव का धर्मराज स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि यही रूप मृत्यु के बाद जीवात्मा के कर्मों का निर्णय करता है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति जीवनकाल में इस मंदिर के दर्शन नहीं करता उसे मृत्यु के बाद यहां आकर भगवान धर्मेश्वर महादेव का सामना करना पड़ता है। इसीलिए कई श्रद्धालु मानते हैं कि जीते जी यहां दर्शन करने से कर्मों के बोझ से मुक्ति मिल सकती है। विशेष रूप से भाई दूज के अवसर पर यहां भारी भीड़ उमड़ती है। बहनें अपने भाइयों की लंबी आयु और सुख समृद्धि की कामना के लिए विशेष पूजा अर्चना करती हैं। स्थानीय कथाओं के अनुसार भगवान शिव यहां साक्षात यमराज के रूप में विराजित हैं और उनके साथ चित्रगुप्त भी उपस्थित रहते हैं जो मनुष्यों के कर्मों का लेखा जोखा तैयार करते हैं। मंदिर के पीछे एक स्थान चित्रगुप्त को समर्पित माना जाता है जहां एक काली शिला और पत्थर पर बनी लकीरें दिखाई देती हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यही प्रतीकात्मक व्यवस्था यह तय करती है कि आत्मा को स्वर्ग प्राप्त होगा या नर्क। मंदिर से कुछ दूरी पर ढाई पौड़ी नामक एक स्थान भी स्थित है। मान्यता है कि जिन लोगों की अकाल मृत्यु होती है उन्हें अपने शेष जीवन काल का समय यहीं व्यतीत करना पड़ता है। इसलिए धर्मेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन करने वाले भक्त इन तीनों स्थलों के दर्शन को पूर्ण तीर्थ माना करते हैं। मंदिर के इतिहास को लेकर भी अनेक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इसी स्थान पर महाराज कृष्ण गिरि ने कठोर साधना की थी और इसे एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में स्थापित किया। समय के साथ यह स्थान आस्था और रहस्य का केंद्र बन गया। धर्मेश्वर महादेव मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि कर्म और न्याय की उस अवधारणा का प्रतीक है जो भारतीय संस्कृति की गहराई में रची बसी है। यहां आने वाले श्रद्धालु जीवन के कर्मों पर चिंतन करते हैं और सद्कर्म की प्रेरणा लेकर लौटते हैं

रंगभरी एकादशी 2026 : 27 या 28 फरवरी? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण समय

नई दिल्ली । 2026 में रंगभरी एकादशी जिसे अमलकी एकादशी भी कहा जाता है का व्रत फाल्गुन महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर मनाया जाएगा। यह पवित्र व्रत होली के उत्सव से कुछ दिनों पहले आता है और विशेष रूप से भगवान विष्णु साथ ही भगवान शिव पार्वती के पूजन के लिए प्रसिद्ध है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव माता पार्वती के साथ काशी वाराणसी आए थे जहां नगरवासियों ने उनका रंगों और गुलाल से स्वागत किया था। तब से इस दिवस को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है और काशी में होली उत्सव की शुभ शुरुआत भी इसी दिन मानी जाती है। रंगभरी एकादशी 2026 की तिथि  वेदिक पंचांग के अनुसार: फाल्गुन शुक्ल एकादशी तिथि 27 फरवरी 2026 की रात 12:33 बजे से प्रारंभ होकर 10:32 बजे तक रहेगी।  उदय तिथि के नियम के अनुसार सुबह के समय पर यह तिथि मौजूद रहने के कारण 27 फरवरी शुक्रवार को ही रंगभरी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। रंगभरी एकादशी पर पूजा का शुभ मुहूर्त पूजा और उपवास के दौरान शुभ मुहूर्त निम्नलिखित हैं: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:09 बजे से सुबह 05:59 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:11 बजे से 12:57 बजे तक  विजय मुहूर्त: दोपहर 02:29 बजे से 03:15 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग: लगभग सुबह 10:48 बजे से रात तक शुभ रहता है व्रत पारण कब करें? रंगभरी एकादशी का व्रत पारण 28 फरवरी 2026 को सुबह 06:47 बजे से 09:06 बजे के बीच किया जा सकता है जो पारण के लिए विशेष शुभ समय माना जाता है।  इस दिन व्रत में निर्जला उपवास या फलाहारी व्रत रखा जा सकता है जैसा श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार करते हैं। पूजा का महत्व और विधि रंगभरी एकादशी के दिन श्रद्धालु स्नान के बाद भगवान विष्णु की भक्ति में लीन होकर पूजा करते हैं। मुख्य पूजन में आमलकी आंवला का फल दान निवेद्य के रूप में चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ तुलसी दीप धूप और नारियल का भी प्रयोग किया जाता है।  धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से जीवन में शांति सौहार्द सुख समृद्धि और भक्ति भाव की प्राप्ति होती है। साथ ही इस व्रत से भगवान विष्णु के आशीर्वाद से मानसिक उन्नति भी होती है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ वाराणसी में रंगभरी एकादशी को होली का शुभ शुभारंभ माना जाता है। मंदिरों एवं घाटों पर भक्त रंग गुलाल के साथ पूजा करते हैं और काशी में होली खेल के प्रचलन की शुरुआत इसी दिन से होती है।

होली 2026: रंगों का त्योहार सुरक्षित और खुशहाल बनाने के लिए जरूरी सावधानियाँ

नई दिल्ली। होली का त्योहार उमंग, उत्साह और रंगों के मेलजोल का प्रतीक है, लेकिन बिना तैयारी के खेली गई होली स्वास्थ्य के लिए खतरनाक भी साबित हो सकती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि इस बार होली खेलने से पहले कुछ जरूरी सावधानियां अपनाई जाएँ ताकि त्योहार सुरक्षित और खुशहाल रहे। सबसे पहले त्वचा की सुरक्षा का ध्यान रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार होली खेलने से पहले चेहरे और शरीर पर नारियल तेल या मॉइस्चराइज़र लगाना चाहिए। यह एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करता है और रंगों को सीधे त्वचा से संपर्क करने से रोकता है। बाद में रंग आसानी से साफ भी हो जाते हैं। जिन लोगों की त्वचा संवेदनशील है, उन्हें हर्बल या प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करना चाहिए। केमिकल युक्त रंगों से त्वचा में जलन, एलर्जी और रैशेज जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। आंखों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि होली खेलते समय चश्मा पहनना या आंखों को रंग से बचाना चाहिए। यदि रंग आंखों में चला जाए तो तुरंत साफ पानी से धोएं और जलन बनी रहने पर चिकित्सक से सलाह लें। बच्चों के साथ होली खेलते समय अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी है क्योंकि उनकी त्वचा और आंखें संवेदनशील होती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ पानी और भोजन की सुरक्षा पर भी जोर देते हैं। होली के दौरान शरीर में पानी की कमी न हो इसके लिए पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना जरूरी है। बाहर मिलने वाले खुले खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए। स्वच्छ और घर का बना भोजन ही प्राथमिकता होनी चाहिए। यह न केवल पेट को सुरक्षित रखता है बल्कि संक्रमण के जोखिम को भी कम करता है। इसके अलावा, सुरक्षित होली खेलने के लिए कपड़ों और पर्यावरण का भी ध्यान रखना आवश्यक है। पुराने कपड़े पहनें जिन्हें रंग लगने पर फेंका जा सके। प्राकृतिक और इको-फ्रेंडली रंगों का इस्तेमाल करें ताकि त्वचा और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहें। पानी का अत्यधिक उपयोग न करें और आसपास के लोगों की सहमति के बिना रंग न डालें। विशेषज्ञों का कहना है कि सावधानी और संयम के साथ खेली गई होली ही सबसे आनंददायक होती है। थोड़ी सी तैयारी और सुरक्षा के उपाय अपनाकर लोग त्योहार का भरपूर मज़ा ले सकते हैं। घर पर बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करें और उन्हें हर्बल रंगों के महत्व के बारे में बताएं। इस तरह होली न केवल उमंग और उत्साह का त्योहार बनी रहती है बल्कि स्वास्थ्य और सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी सुरक्षित और सुखद अनुभव बनती है। इस बार त्योहार के रंगों में सुरक्षा और आनंद दोनों का संगम सुनिश्चित करें और सभी के लिए खुशियाँ और उत्साह फैलाएं।

मार्च 2026 में बैंक 18 दिन बंद, जरूरी लेनदेन पहले निपटाएं

नई दिल्ली। मार्च 2026 में देशभर के बैंक कुल 18 दिन बंद रहेंगे। भारतीय रिज़र्व बैंक के आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार इसमें पांच रविवार, दूसरे और चौथे शनिवार के नियमित अवकाश के साथ-साथ अलग-अलग राज्यों में 11 अतिरिक्त छुट्टियाँ शामिल हैं। यह अवधि शाखा-स्तरीय बैंकिंग सेवाओं को प्रभावित करेगी इसलिए ग्राहकों को जरूरी वित्तीय काम पहले से निपटाने की सलाह दी जा रही है। अवकाश की व्यवस्था क्षेत्रीय त्योहारों, धार्मिक आयोजनों और प्रशासनिक छुट्टियों के आधार पर तय की जाती है। इसलिए सभी राज्यों में एक साथ बैंक बंद नहीं रहेंगे। जहां संबंधित पर्व या स्थानीय छुट्टी घोषित होगी, वहीं शाखाएँ बंद रहेंगी। इस तरह बैंकिंग संचालन संतुलित रहता है और आवश्यक सेवाएँ पूरी तरह बाधित नहीं होतीं। हालांकि, बैंक बंद रहने के बावजूद डिजिटल माध्यमों की सेवाएँ सामान्य रूप से चालू रहेंगी। ऑनलाइन बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और एटीएम सेवाओं के जरिए ग्राहक धन हस्तांतरण, बिल भुगतान और अन्य लेनदेन आसानी से कर सकेंगे। विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल बैंकिंग ने छुट्टियों के दौरान सेवा व्यवधान के प्रभाव को काफी हद तक कम कर दिया है। फिर भी शाखा आधारित सेवाएँ जैसे चेक क्लियरेंस और कैश डिपॉजिट अवकाश के दौरान प्रभावित हो सकती हैं। वित्तीय गतिविधियों की दृष्टि से मार्च में शेयर बाजार में भी सीमित कारोबारी दिन रहेंगे। सप्ताहांत अवकाश और कुछ प्रमुख त्योहारों के कारण बाजार बंद रहेगा। निवेशकों और ट्रेडरों को अपने सौदों की योजना समय से बनानी होगी ताकि किसी तरह की वित्तीय हानि न हो। लगातार अवकाश वाले महीनों में नकदी प्रबंधन और भुगतान चक्र पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है। बैंकिंग क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि छुट्टियों की पूर्व जानकारी ग्राहकों को वित्तीय अनुशासन बनाए रखने में मदद करती है। व्यापारियों, वेतनभोगी कर्मचारियों और लोनधारकों के लिए भुगतान तिथियों का समुचित प्रबंधन जरूरी है। समय पर ईएमआई, चेक जमा और अन्य भुगतान सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल विकल्पों का उपयोग करना लाभकारी रहेगा। यह अवकाश सूची सार्वजनिक हित के लिए जारी की गई है ताकि आम नागरिक, व्यापारी और संस्थान अपनी वित्तीय गतिविधियों की पूर्व योजना बना सकें। बैंकिंग प्रणाली के सुचारु संचालन और उपभोक्ता सुविधा के लिए समय-समय पर ऐसे अपडेट जारी किए जाते हैं। मार्च 2026 के अवकाश कार्यक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि बदलते वित्तीय परिवेश में डिजिटल बैंकिंग अब वैकल्पिक नहीं बल्कि आवश्यक सेवा बन चुकी है। इसलिए ग्राहकों को सलाह दी गई है कि वे अपने राज्य के अनुसार अवकाश सूची की पुष्टि कर अपने जरूरी कार्य समय रहते पूरा कर लें।

गुरुवार का दिन: व्रत, पूजा और दान से जीवन में सुख और समृद्धि पाएं

नई दिल्ली। गुरुवार को धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व प्राप्त है। इसे श्रद्धा संयम और गुरु तत्व के सम्मान का दिन माना जाता है। आस्था और सेवा भाव के साथ किए गए छोटे-छोटे उपाय भी जीवन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। पंचांग और धर्मग्रंथों के अनुसार गुरुवार भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की उपासना का अनुकूल दिन है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से ज्ञान, समृद्धि और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गुरुवार को पीले रंग का विशेष महत्व है। पीले रंग को गुरु का प्रतीक माना गया है। इसलिए व्रत पूजा और दान में पीले पदार्थों का प्रयोग शुभ माना जाता है। प्रातः स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण करना चाहिए और भगवान विष्णु के समक्ष दीप प्रज्वलित करना चाहिए। इसके बाद तुलसी की माला से 11 या 21 बार “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का जाप करने से गुरु कृपा प्राप्त होती है। पूजा के बाद चने की दाल गुड़ या पीले फलों का भोग अर्पित करना लाभकारी माना गया है। गुरुवार को केले के वृक्ष की पूजा भी अत्यंत फलदायी मानी गई है। पूजा विधि में वृक्ष के नीचे जल अर्पित करें हल्दी का तिलक लगाएं और दीपक जलाकर समृद्धि की कामना करें। धार्मिक परंपरा अनुसार गुरुवार को हल्दी चने की दाल पीले फल या बेसन से बने प्रसाद का दान करना शुभ फल देता है। श्रद्धालु सुख समृद्धि और पारिवारिक शांति के लिए गुरुवार व्रत रखते हैं और सत्यनारायण कथा का श्रवण करते हैं। गुरुवार के दिन माथे पर हल्दी या केसर का तिलक लगाना गुरु कृपा का प्रतीक माना गया है। संयमित व्यवहार और सकारात्मक संकल्प इस दिन की आध्यात्मिक साधना को पूर्णता देते हैं। इस दिन किए गए कर्म और पूजा के प्रभाव से जीवन में मानसिक संतुलन और स्थिरता आती है। हालांकि परंपराओं में गुरुवार को कुछ कार्यों से बचने की सलाह भी दी गई है। सिर धोना या बाल कटवाना, हल्दी या धन उधार देना, घर में पोछा लगाना या पीली वस्तुओं का अपमान करना वर्जित कार्य माने गए हैं। इन बातों का पालन करने से गुरुवार की पूजा और व्रत का पूर्ण लाभ मिलता है। धार्मिक दृष्टि से गुरुवार का दिन साधना ध्यान और पूजा के लिए विशेष फलदायी है। यह दिन जीवन में समृद्धि सुख और ज्ञान के मार्ग खोलता है। गुरु और भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए नियमित पूजा व मंत्र जाप अत्यंत आवश्यक है। छोटे उपाय जैसे पीले वस्त्र, केले के वृक्ष की पूजा और दान-पुण्य जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आशीर्वाद लाते हैं।इस प्रकार गुरुवार केवल सप्ताह का एक दिन नहीं है बल्कि जीवन में स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश देता है। श्रद्धा संयम और सेवा भाव के माध्यम से इस दिन की पूजा करना हर व्यक्ति के लिए लाभकारी और फलदायी है।

आज का पंचांग 26 फरवरी 2026, फाल्गुन शुक्ल दशमी: प्रीति योग और शुभ मुहूर्त से दिन बने विशेष

नई दिल्ली। आज 26 फरवरी 2026 गुरुवार को फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष दशमी तिथि के साथ दिन की शुरुआत हुई। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यह दिन आध्यात्मिक साधना, ज्ञानार्जन, दान-पुण्य और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पंचांग के अनुसार दशमी तिथि रात्रि 12 बजकर 33 मिनट तक प्रभावी रहेगी और ग्रहों की स्थिति मानव जीवन के बौद्धिक और सामाजिक पक्ष को सुदृढ़ करने में सहायक होगी। खगोलीय दृष्टि से आज सूर्य मंगल बुध शुक्र और राहु कुंभ राशि में स्थित हैं जबकि चंद्रमा मिथुन राशि के मृगशिरा नक्षत्र में विराजमान हैं। मृगशिरा नक्षत्र ज्ञान, खोज और मानसिक शांति का प्रतीक माना जाता है। इस नक्षत्र के देवता सोम माने जाते हैं जो अमृत और चंद्र ऊर्जा के प्रतिनिधि हैं। इसलिए आज का दिन ध्यान, जप, साधना और नए विचारों पर मनन के लिए विशेष रूप से फलदायी रहेगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार आज रात्रि 10 बजकर 33 मिनट तक प्रीति योग रहेगा। धार्मिक दृष्टि से यह योग आपसी सद्भाव, संबंधों में मधुरता और रुके हुए कार्यों की सिद्धि का संकेत देता है। इसी प्रकार अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 11 मिनट से 12 बजकर 57 मिनट तक रहेगा जिसे दिन का सर्वश्रेष्ठ शुभ काल माना जाता है। वहीं अमृत काल रात्रि 1 बजकर 23 मिनट से 2 बजकर 53 मिनट तक रहेगा जो साधना और आध्यात्मिक चिंतन के लिए बेहद अनुकूल समय है। हालांकि पंचांग में कुछ अशुभ काल भी बताए गए हैं। राहुकाल दोपहर 2 बजे से 3 बजकर 27 मिनट तक रहेगा और इस अवधि में नए कार्य, यात्रा या महत्वपूर्ण निर्णय से बचने की परंपरा रही है। इसके अतिरिक्त गुलिकाल और यमगण्ड भी दिन के अलग-अलग समय में प्रभावी रहेंगे जिनमें सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। सूर्योदय प्रातः 6 बजकर 49 मिनट और सूर्यास्त सायं 6 बजकर 19 मिनट पर होगा। चंद्रोदय दोपहर 12 बजकर 54 मिनट पर तथा चंद्रास्त अगले दिन प्रातः 3 बजकर 46 मिनट पर होगा। धार्मिक दृष्टि से यह समय क्रम दैनिक पूजा, व्रत और आध्यात्मिक अनुशासन के निर्धारण में महत्वपूर्ण माना जाता है। धर्माचार्यों का मत है कि आज का दिन आत्मसंयम, ज्ञानार्जन और ईश्वर स्मरण के लिए विशेष फलदायी है। ग्रहों की स्थिति मानसिक संतुलन विवेकपूर्ण निर्णय और सामाजिक मेल-जोल के संकेत देती है। श्रद्धालुओं को आज प्रार्थना दान और सकारात्मक संकल्प के माध्यम से जीवन में शांति और समृद्धि की कामना करनी चाहिए। इस प्रकार आज का दिन आस्था, विवेक और सद्भाव के समन्वय का संदेश देता है। कर्म श्रद्धा और संयम जीवन को संतुलित दिशा प्रदान करते हैं। ध्यान साधना और ज्ञानार्जन के लिए अनुकूल यह दिन प्रत्येक व्यक्ति को अपने कार्यों और जीवन के प्रति जागरूक और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है।

27 फरवरी को आमलकी/रंगभरी एकादशी: जानें व्रत, पूजा और शुभ मुहूर्त..

नई दिल्ली। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि इस साल 27 फरवरी को पड़ रही है। इसे आमलकी एकादशी या रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन का धार्मिक महत्व विशेष है क्योंकि मान्यता है कि नारायण के साथ-साथ महादेव से भी इसका गहरा संबंध है। आमलकी एकादशी का व्रत भक्ति भाव से रखने पर सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा आती है। आंवले के वृक्ष में नारायण का निवास माना जाता है, इसलिए इस दिन आंवले की पूजा करना अत्यंत फलदायी है। भक्त इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की भी आराधना करते हैं। रंगभरी एकादशी का संबंध शिव और पार्वती से भी है। धार्मिक मान्यता है कि विवाह के बाद भगवान शिव पहली बार माता पार्वती के साथ काशी आए थे और माता पार्वती का गौना इसी दिन हुआ था। यही कारण है कि इस दिन से रंगों के पर्व होली का जश्न भी शुरू माना जाता है। दृक पंचांग के अनुसार, 27 फरवरी की एकादशी तिथि रात 10:32 बजे तक रहेगी, इसके बाद द्वादशी शुरू होगी। नक्षत्र की स्थिति के अनुसार आर्द्रा नक्षत्र सुबह 10:48 बजे तक रहेगा, उसके बाद पुनर्वसु नक्षत्र शुरू होगा। योग आयुष्मान शाम 7:44 बजे तक रहेगा। करण वणिज सुबह 11:31 बजे तक रहेगा और उसके बाद विष्टि करण रहेगा। शुभ योगों की बात करें तो सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 10:48 बजे से अगले दिन 6:47 बजे तक रहेगा, वहीं रवि योग सुबह 6:48 बजे से 10:48 बजे तक रहेगा। सूर्योदय शुक्रवार को 6:48 बजे और सूर्यास्त 6:20 बजे होगा। शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:09 बजे से 5:59 बजे तक, अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:11 बजे से 12:57 बजे तक, विजय मुहूर्त दोपहर 2:29 बजे से 3:15 बजे तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 6:17 बजे से 6:42 बजे तक रहेगा। अशुभ समय में राहुकाल सुबह 11:08 बजे से 12:34 बजे तक, यमगण्ड दोपहर 3:27 बजे से 4:53 बजे तक, गुलिक काल सुबह 8:15 बजे से 9:41 बजे तक और दुर्मुहूर्त सुबह 9:07 बजे से 9:53 बजे तक रहेगा। भद्रा दोपहर 11:31 बजे से रात 10:32 बजे तक रहेगी।इस प्रकार 27 फरवरी की आमलकी या रंगभरी एकादशी धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखती है और इस दिन के शुभ मुहूर्त और व्रत पालन से जीवन में समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

होली पर 3 मार्च को चंद्र ग्रहण और भद्रा काल का साया, जानें होलिका दहन का सही मुहूर्त

नई दिल्ली । इस साल फाल्गुन पूर्णिमा के दिन यानी 3 मार्च 2026 को भारत में पूर्ण चंद्र ग्रहण लगने वाला है। ज्योतिष के अनुसार चंद्र ग्रहण और इसका सूतक काल शुभ कार्यों पर प्रभाव डालते हैं जिससे होलिका दहन की तारीख पर भी भ्रम पैदा हो गया है। इस साल चंद्र ग्रहण की शुरुआत दोपहर 3:20 बजे होगी और शाम 6:46 बजे समाप्त होगी। ग्रहण का सूतक काल इससे लगभग 9 घंटे पहले सुबह 6:20 बजे से प्रारंभ हो जाएगा। इस दौरान मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे पूजा-पाठ नहीं किया जाएगा और बुजुर्गों बीमारों और गर्भवती महिलाओं को छोड़कर भोजन भी वर्जित माना जाएगा। इस दिन भारत में ब्लड मून भी दिखाई देगा जो इसे और भी विशेष बना देगा। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि और स्नान-दान पंचांग के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा की तिथि 2 मार्च की शाम 5:15 बजे से शुरू होकर 3 मार्च दोपहर 4:33 बजे तक रहेगी। स्नान-दान के लिए पूर्णिमा तिथि 3 मार्च को मानी जाएगी जबकि पूर्णिमा व्रत 2 मार्च को रखना उचित होगा। होलिका दहन और भद्रा काल धर्म-शास्त्र के अनुसार होलिका दहन के लिए तीन चीजें जरूरी हैं: पूर्णिमा तिथि रात्रि काल और भद्रा मुक्त समय। इस साल अगर 3 मार्च को पूर्णिमा मानें तो चंद्र ग्रहण और उसके सूतक काल के कारण होलिका दहन नहीं किया जा सकता। वहीं 2 मार्च को रात में होलिका दहन करने पर भद्रा काल खेल बिगाड़ रहा है। भद्रा काल 2 मार्च की शाम 5:15 बजे से 3 मार्च की तड़के 4:46 बजे तक रहेगा।उत्तम मुहूर्त शास्त्रों के अनुसार इस स्थिति में होलिका दहन मध्य रात्रि से पूर्व कर लेना ही सर्वोत्तम माना गया है। इस साल 2 मार्च की रात 12:50 बजे से 2:38 बजे तक का समय सबसे शुभ मुहूर्त रहेगा। इसके बाद 3 मार्च या 4 मार्च को होली खेलना या धुलैंडी मनाना उचित होगा। Disclaimer यह खबर केवल जागरूक करने के उद्देश्‍य से लिखी गई है। हमने इसको लिखने में सामान्य जानकारियों की मदद ली है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते है।