आज का राशिफल 26 अप्रैल: मेष से मीन तक सभी राशियों का दैनिक भविष्यफल

नई दिल्ली । 26 अप्रैल का दिन सभी 12 राशियों के लिए अलग-अलग प्रभाव लेकर आया है। कहीं करियर में प्रगति के संकेत हैं तो कहीं धैर्य और सावधानी की जरूरत है। ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति आज के दिन कई लोगों के जीवन में नए अवसर और चुनौतियां दोनों लेकर आ सकती है। आइए जानते हैं मेष से मीन तक सभी राशियों का आज का भविष्यफल। मेष राशि के जातकों के लिए आज का दिन ऊर्जा से भरपूर रहेगा। कामकाज में तेजी आएगी और रुके हुए कार्य पूरे हो सकते हैं। हालांकि जल्दबाजी से बचना जरूरी है। वृषभ राशि वालों के लिए आर्थिक मामलों में सुधार के संकेत हैं। कोई पुराना रुका हुआ पैसा मिल सकता है। परिवार में शांति बनी रहेगी। मिथुन राशि के जातकों को आज अपने शब्दों पर नियंत्रण रखने की जरूरत है। कार्यस्थल पर छोटी बातों को लेकर तनाव हो सकता है, इसलिए धैर्य रखें। कर्क राशि वालों के लिए दिन सामान्य रहेगा। स्वास्थ्य को लेकर थोड़ी सावधानी जरूरी है। खानपान पर ध्यान दें और अनावश्यक तनाव से बचें। सिंह राशि के जातकों के लिए आज का दिन सफलता देने वाला हो सकता है। नौकरी और व्यवसाय में नए अवसर मिल सकते हैं। आत्मविश्वास बढ़ेगा। कन्या राशि वालों को आज काम में अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। हालांकि मेहनत का परिणाम भविष्य में अच्छा मिलेगा। खर्चों पर नियंत्रण रखें। तुला राशि के लिए दिन सकारात्मक रहेगा। किसी पुराने मित्र से मुलाकात हो सकती है। प्रेम संबंधों में मधुरता बढ़ेगी और मन प्रसन्न रहेगा। वृश्चिक राशि वालों के लिए आज का दिन थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। कार्यस्थल पर दबाव रहेगा, लेकिन संयम से स्थिति संभल जाएगी। धनु राशि के जातकों के लिए यात्रा के योग बन सकते हैं। नौकरी या व्यवसाय में लाभ के संकेत हैं। नई योजनाओं पर काम शुरू हो सकता है। मकर राशि वालों को आज वित्तीय मामलों में सतर्क रहने की जरूरत है। निवेश सोच-समझकर करें और किसी पर भी जल्दी भरोसा न करें। कुंभ राशि के लिए दिन अच्छा रहेगा। सामाजिक मान-सम्मान बढ़ेगा और नए लोगों से संपर्क लाभकारी साबित हो सकता है। मीन राशि के जातकों के लिए आज का दिन रचनात्मक कार्यों में सफलता दिलाने वाला हो सकता है। कला और शिक्षा से जुड़े लोगों को विशेष लाभ मिलेगा।
रामायण में असली त्याग की मूर्ति कौन, उर्मिला भरत या मांडवी जानकर भावुक हो जाएंगे

नई दिल्ली। रामायण को अक्सर श्रीराम और रावण के युद्ध या भगवान राम के वनवास की कथा के रूप में देखा जाता है, लेकिन इस महाकाव्य के भीतर कई ऐसे पात्र हैं जिनका त्याग उतना ही महान है जितना मुख्य नायकों का। इन्हीं में कुछ ऐसे नाम शामिल हैं जिन्हें इतिहास में कम चर्चा मिली, लेकिन उनका योगदान अत्यंत भावनात्मक और प्रेरणादायक है। इनमें सबसे अधिक भावुक करने वाली कहानी लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की मानी जाती है। उर्मिला ने अपने पति के साथ वन जाने की बजाय 14 वर्षों तक राजमहल में अकेले रहकर विरह और त्याग का जीवन जिया। उन्होंने बिना किसी शिकायत के अपने सुख और साथ की इच्छा को त्याग दिया और पति के कर्तव्य मार्ग को स्वीकार किया। यही कारण है कि उन्हें “त्याग की मूर्ति” कहा जाता है। रामायण के एक और महत्वपूर्ण पात्र भरत का त्याग भी अद्भुत माना जाता है। जब उन्हें अयोध्या का राज सिंहासन प्राप्त हुआ, तो उन्होंने उसे स्वीकार करने के बजाय भगवान राम की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राज्य का संचालन किया और स्वयं नंदीग्राम में साधारण जीवन व्यतीत किया। उनका यह निर्णय भ्रातृ प्रेम और कर्तव्य का अद्वितीय उदाहरण माना जाता है। इसके अलावा मांडवी का त्याग भी उतना ही महत्वपूर्ण है, हालांकि उनकी चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। मांडवी ने अपने पति भरत के साथ सुख-सुविधाओं को छोड़कर कठिन जीवन को स्वीकार किया और अयोध्या की मर्यादा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रामायण की इन कहानियों से यह स्पष्ट होता है कि यह केवल युद्ध और विजय की कथा नहीं है, बल्कि त्याग, प्रेम और कर्तव्य का भी एक गहरा संदेश देती है। उर्मिला, भरत और मांडवी जैसे पात्र यह दर्शाते हैं कि असली महानता केवल सिंहासन पर नहीं बल्कि त्याग और समर्पण में भी होती है।
हथेली की रेखाएं खोलती हैं, भविष्य का राज सूर्य और भाग्य रेखा, से बनता है धन योग

नई दिल्ली । हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार हथेली की रेखाएं केवल शरीर की बनावट नहीं होतीं बल्कि इन्हें व्यक्ति के जीवन, भाग्य और भविष्य का संकेत माना जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार हथेली में मौजूद विभिन्न रेखाएं और पर्वत यह बताते हैं कि व्यक्ति के जीवन में धन, सफलता और प्रसिद्धि का योग कितना मजबूत है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली रेखा है भाग्य रेखा जो हथेली के निचले हिस्से से शुरू होकर शनि पर्वत की ओर बढ़ती है। यदि यह रेखा गहरी, स्पष्ट और बिना टूटे शनि पर्वत तक पहुंचती है तो इसे मजबूत आर्थिक स्थिरता और जीवन में निरंतर सफलता का संकेत माना जाता है। इसके साथ ही सूर्य पर्वत जो अनामिका उंगली के नीचे स्थित होता है व्यक्ति के नाम, यश और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। यदि यह पर्वत उभरा हुआ और स्पष्ट हो तो व्यक्ति को समाज में सम्मान और प्रसिद्धि मिलने की संभावना बढ़ जाती है। कई बार सूर्य पर्वत और भाग्य रेखा का मेल व्यक्ति को कम प्रयास में बड़ी सफलता दिलाने वाला माना जाता है। शनि पर्वत, जो मध्यमा उंगली के नीचे होता है, व्यक्ति के जीवन में स्थायित्व और धन संचय का संकेत देता है। इस पर्वत से जुड़ी रेखाएं अगर मजबूत हों तो व्यक्ति धीरे-धीरे लेकिन स्थायी रूप से आर्थिक उन्नति करता है और अक्सर बड़ी संपत्ति का मालिक बनता है। वहीं बुध पर्वत, जो छोटी उंगली के नीचे स्थित होता है, बुद्धिमत्ता, व्यापारिक कौशल और संचार क्षमता का प्रतीक माना जाता है। इस क्षेत्र की रेखाएं यदि स्पष्ट और सही दिशा में हों तो व्यक्ति व्यापार और निवेश में सफलता प्राप्त कर सकता है। इसके अलावा मस्तिष्क रेखा, जीवन रेखा और शुक्र पर्वत का संतुलन भी व्यक्ति के सुख-सुविधा और जीवन की गुणवत्ता को दर्शाता है। लंबी और साफ रेखाएं जीवन में स्थिरता और अच्छे अवसरों का संकेत मानी जाती हैं। हालांकि हस्तरेखा शास्त्र को एक पारंपरिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण माना जाता है और यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है, फिर भी कई लोग इसे जीवन की संभावनाओं को समझने और आत्मविश्लेषण के रूप में देखते हैं।
शनि कृपा पाने का अचूक उपाय शनिवार को करें इन खास मंत्रों का जाप

नई दिल्ली । शनि देव की पूजा अर्चना करने के लिए शनिवार का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। कहते हैं आज के दिन जो जातक शनि देव का व्रत रखता है उसके घर में हमेशा तरक्की होती है। शनि देव उसे प्रसन्न होकर उसकी आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं करते हैं जिससे उनके घर में खुशियां आती है। आज के दिन आपको शनिदेव के कुछ चमत्कारी मंत्रों का भी जाप करना चाहिए ऐसा करने से शनि देव आपसे प्रसन्न होते हैं। पूजा विधिशनि देव की पूजा अर्चना करने के लिए आपको सुबह जल्दी उठना चाहिए। शनि मंदिर जाकर आप शनि भगवान के दर्शन करें और उनका व्रत रखने का संकल्प लें। अगर आपकी कुंडली में शनि दोष है तो आज पूजा के दौरान आप काला वस्त्र ही पहनें। क्योंकि कल वस्त्र शनिदेव को बहुत प्रिय है इसीलिए आप ये धारण करें। इसके बाद आप शनि देव की पूजा अर्चना के दौरान उन्हें सरसों का तेल काली तिल चढ़ा सकते हैं इससे भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं। इन मंत्रों का करें जाप ॐ शं शनिश्चराय नम: ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम । उर्वारुक मिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात । ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।शंयोरभिश्रवन्तु नः। ऊँ शं शनैश्चराय नमः शनि महामंत्र – ॐ निलान्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥ शनि दोष निवारण मंत्र – ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम। उर्वारुक मिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात।। शनि का पौराणिक मंत्र – ऊँ ह्रिं नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम। छाया मार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।। शनि का वैदिक मंत्र – ऊँ शन्नोदेवीर-भिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तुनः। शनि गायत्री मंत्र – ऊँ भगभवाय विद्महैं मृत्युरुपाय धीमहि तन्नो शनिः प्रचोद्यात्। ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।शंयोरभिश्रवन्तु नः इस प्रकार करें शनि देव को प्रसन्नशनि देव को प्रसन्न करने के लिए शनिवार के दिन आपको शनि देव के मंदिर जाना चाहिए। उनकी पूजा अर्चना करते समय आपको सरसों का तेल काला तिल उन्हें जरूर अर्पित करना चाहिए। आज के दिन आपको काला वस्त्र धारण करना चाहिए क्योंकि काला वस्त्र शनिदेव को बहुत प्रिय है।
एकादशी पर चावल खाने की अनोखी परंपरा जगन्नाथ पुरी मंदिर का चमत्कारी रहस्य

नई दिल्ली। ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर अपनी अद्भुत परंपराओं और रहस्यों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां भगवान जगन्नाथ की पूजा भक्ति और आस्था के विशेष नियमों के साथ की जाती है। इन्हीं नियमों में से एक ऐसा अनोखा नियम है जो एकादशी तिथि से जुड़ा हुआ है। आमतौर पर हिंदू धर्म में एकादशी के दिन चावल और अनाज का सेवन पूर्ण रूप से वर्जित माना जाता है। व्रत रखने वाले भक्त इस दिन केवल फलाहार या निर्जल व्रत का पालन करते हैं। लेकिन जगन्नाथ पुरी मंदिर में इसका नियम बिल्कुल अलग है। इस मंदिर में एकादशी के दिन भी भगवान को चावल का महाप्रसाद अर्पित किया जाता है और भक्त इसे श्रद्धा के साथ ग्रहण करते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जो भक्त एकादशी का व्रत रखते हैं वे भी इस महाप्रसाद को स्वीकार करते हैं और इसके बावजूद उनका व्रत टूटता नहीं माना जाता। यह परंपरा श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का विषय है और इसे भगवान की विशेष कृपा के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर में भगवान स्वयं अपने भक्तों के नियमों से ऊपर हैं और यहां भक्ति सबसे बड़ा धर्म है। इसलिए यहां प्रसाद को सामान्य भोजन नहीं बल्कि दिव्य आशीर्वाद माना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर में अर्पित किया गया भोजन पहले भगवान का हो जाता है और फिर प्रसाद के रूप में वितरित होता है। इसी कारण एकादशी जैसे पवित्र व्रत के नियम भी यहां भक्ति के आगे गौण हो जाते हैं। पौराणिक कथाओं में इस परंपरा का एक रोचक प्रसंग भी मिलता है। कहा जाता है कि एक बार ब्रह्मा जी को भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद ग्रहण करने की इच्छा हुई। जब वे मंदिर पहुंचे तब तक प्रसाद समाप्त हो चुका था। उसी समय उन्होंने एक कुत्ते को पत्तल में बचा हुआ चावल खाते देखा। ब्रह्मा जी ने बिना संकोच उस कुत्ते के साथ बैठकर वही प्रसाद ग्रहण किया। उस दिन एकादशी तिथि थी। यह दृश्य देखकर भगवान जगन्नाथ स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने घोषणा की कि अब से उनके महाप्रसाद पर एकादशी का कोई नियम लागू नहीं होगा। एक अन्य मान्यता के अनुसार एकादशी के दिन चावल का संबंध महर्षि मेधा से बताया जाता है। कहा जाता है कि वे मां शक्ति के क्रोध से बचने के लिए अपने शरीर का त्याग कर चावल और जौ के रूप में पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। इसलिए एकादशी के दिन चावल का सेवन उनके शरीर का भाग माना जाता है और इसे वर्जित किया गया है। लेकिन जगन्नाथ पुरी में भक्ति और प्रसाद की दिव्यता इस नियम से ऊपर मानी जाती है। इसी कारण यह मंदिर आस्था और चमत्कार का अद्भुत केंद्र माना जाता है जहां नियम नहीं बल्कि भक्ति सर्वोपरि है।
astrology Hindi : 25 अप्रैल राशिफल: आज सितारे क्या संकेत दे रहे हैं?

astrology Hindi : नई दिल्ली । 25 अप्रैल 2026, शनिवार का दिन ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इस दिन का स्वामी ग्रह शनि कर्म, न्याय और फल देने वाला ग्रह है। शनि व्यक्ति के कर्मों के अनुसार उसे परिणाम प्रदान करता है, इसलिए इस दिन ग्रह-नक्षत्रों की चाल सभी राशियों पर अलग-अलग प्रभाव डाल रही है। कुछ राशियों के लिए यह दिन सफलता और लाभ के नए द्वार खोल रहा है, तो कुछ को धैर्य और सावधानी के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता होगी। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार यह दिन जीवन के कई क्षेत्रों में बदलाव और अवसर लेकर आ सकता है। 2. मेष से कर्क राशि तक कैसा रहेगा दिन मेष राशि के जातकों के लिए दिन मिश्रित परिणाम लेकर आएगा। स्वभाव में हल्कापन और मजाकिया अंदाज रहेगा, लेकिन परिवार में तनाव की स्थिति बन सकती है। आर्थिक लाभ के योग बन रहे हैं, हालांकि जीवनसाथी के खर्चों पर नियंत्रण जरूरी होगा। वृषभ राशि के लिए दिन शुभ है, कार्यक्षेत्र में सराहना और परिवार से खुशखबरी मिल सकती है। मिथुन राशि वालों पर काम का दबाव बढ़ेगा लेकिन रुका हुआ धन मिलने की संभावना है। कर्क राशि के लिए यह दिन आर्थिक और करियर दोनों दृष्टि से लाभकारी रहेगा, स्वास्थ्य में भी सुधार देखने को मिलेगा। 3. सिंह से तुला राशि तक मिलाजुला असर सिंह राशि के जातकों को कार्यस्थल की राजनीति से दूर रहने की सलाह दी जा रही है, क्योंकि अधिक दबाव से स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। परिवार और भाई-बहनों से सहयोग मिलेगा। कन्या राशि के लिए यह दिन नए अवसरों से भरा रहेगा, लेकिन खर्चों में बढ़ोतरी संभव है। तुला राशि के लिए आर्थिक मामलों में सतर्कता जरूरी है, हालांकि सही निर्णय से लाभ और नए संपर्क बन सकते हैं। पारिवारिक मामलों में आपकी भूमिका अहम रहेगी और संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा। 4. वृश्चिक से कुंभ राशि तक बनेंगे शुभ योग वृश्चिक राशि के लिए यह दिन लाभकारी साबित होगा, रुका हुआ धन वापस मिलने और करियर में प्रगति के योग हैं। धनु राशि वालों को प्रॉपर्टी और कानूनी मामलों में सावधानी रखनी होगी, क्योंकि निर्णय मनमाफिक नहीं हो सकते। मकर राशि के जातकों का आत्मविश्वास बढ़ेगा और निवेश से लाभ मिलेगा, साथ ही परिवार में शुभ कार्य के संकेत हैं। कुंभ राशि के लिए भाग्य का पूरा साथ मिलेगा, दोस्तों के साथ समय अच्छा बीतेगा और कार्यक्षेत्र में बदलाव के योग बन रहे हैं। 5. मीन राशि के लिए सतर्कता जरूरी, दिन रहेगा संतुलित मीन राशि के जातकों के लिए यह दिन सतर्क रहने का संकेत दे रहा है। ऑफिस में राजनीति से बचना जरूरी होगा और कार्यभार बढ़ सकता है। आर्थिक स्थिति में खर्च बढ़ने के योग हैं, इसलिए संतुलन बनाकर चलना जरूरी रहेगा। परिवार और दोस्तों का सहयोग मिलेगा, जिससे मानसिक शांति बनी रहेगी। प्रेम जीवन में विश्वास बढ़ेगा, लेकिन सेहत को लेकर लापरवाही नहीं करनी चाहिए। कुल मिलाकर यह दिन कई राशियों के लिए अवसरों से भरा रहेगा, जबकि कुछ को संयम और समझदारी के साथ आगे बढ़ने की सलाह दी जा रही है।
astrology tips : शनि दोष से मुक्ति के अचूक उपाय हर शनिवार करें ये सरल काम और पाए सफलता

astrology tips : नई दिल्ली । हिंदू धर्म में शनि देव को न्याय का देवता और कर्मों का फल देने वाला माना जाता है इसलिए उनका प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर गहरा असर डालता है। बहुत से लोग शनि का नाम सुनते ही डर जाते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि शनि देव केवल उन लोगों को दंड देते हैं जो गलत मार्ग पर चलते हैं जबकि सच्चे और मेहनती लोगों को ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं। यदि किसी की कुंडली में साढ़ेसाती ढैय्या या शनि दोष चल रहा हो तो जीवन में कई तरह की परेशानियां सामने आने लगती हैं जैसे आर्थिक संकट मानसिक तनाव और काम में रुकावट। ऐसे में शनिवार के दिन किए गए कुछ विशेष उपाय जीवन की दिशा बदल सकते हैं और शनि देव की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। शनिवार की शाम सूर्यास्त के बाद पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। दीपक जलाते समय ॐ शं शनैश्चराय नमः मंत्र का जप करना चाहिए। मान्यता है कि पीपल के वृक्ष में सभी देवी देवताओं का वास होता है और शनि देव विशेष रूप से इससे प्रसन्न होते हैं। दीपक जलाने के बाद पीपल की सात बार परिक्रमा करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक प्रभाव धीरे धीरे समाप्त होने लगते हैं। MORENA ILLEGAL MINING: मुरैना में अवैध खनन पर बड़ी कार्रवाई, डंपर और ट्रैक्टर-ट्रॉली जब्त छाया दान को शनि दोष दूर करने का अत्यंत प्रभावी उपाय माना गया है। इसके लिए एक लोहे या मिट्टी के पात्र में सरसों का तेल लें और उसमें अपना चेहरा देखें। इसके बाद उस तेल को किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दान कर दें या शनि मंदिर में अर्पित करें। ऐसा करने से यह माना जाता है कि व्यक्ति के जीवन की नकारात्मकता उस तेल के माध्यम से दूर हो जाती है और ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम होने लगते हैं। हनुमान जी की पूजा भी शनि दोष से मुक्ति का सरल और प्रभावी मार्ग है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी ने शनि देव को कष्ट से मुक्त कराया था जिसके बाद शनि देव ने वचन दिया कि जो भी व्यक्ति हनुमान जी की भक्ति करेगा उसे वे कष्ट नहीं देंगे। इसलिए शनिवार के दिन हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करना विशेष लाभकारी माना जाता है। इससे मन को शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है। इसके अलावा जानवरों और पक्षियों की सेवा भी शनि देव को प्रसन्न करने का श्रेष्ठ तरीका है। शनिवार के दिन काले कुत्ते को सरसों के तेल लगी रोटी खिलाना और पक्षियों को सात प्रकार के अनाज देना पुण्यदायी माना जाता है। यह सेवा भावना शनि देव को प्रिय है और इससे जीवन में स्थिरता और संतुलन आता है। 25 अप्रैल राशिफल: आज सितारे क्या संकेत दे रहे हैं? जरूरतमंदों की सहायता करना भी शनि कृपा प्राप्त करने का महत्वपूर्ण उपाय है। शनिवार को काले तिल काली उड़द काला कपड़ा कंबल या जूते दान करने से व्यक्ति के जीवन में सुख समृद्धि का मार्ग खुलता है। यह कर्म शनि देव को अत्यंत प्रिय होता है क्योंकि वे न्याय और सेवा भावना को महत्व देते हैं। कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है। शनिवार के दिन लोहा नमक सरसों का तेल और लकड़ी खरीदने से बचना चाहिए। साथ ही इस दिन मांस और शराब जैसे तामसिक पदार्थों से दूर रहना चाहिए और किसी के साथ भी गलत व्यवहार नहीं करना चाहिए। सही आचरण और इन उपायों का पालन करने से शनि देव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में नई रोशनी आती है।
सच्चे समर्पण की ताकत क्या है प्रेमानंद जी महाराज का जीवन बदलने वाला उपदेश

नई दिल्ली । आध्यात्मिक प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध श्री प्रेमानंद जी महाराज ने जीवन और भक्ति को लेकर एक गहरा संदेश दिया है जिसमें उन्होंने बताया कि इंसान के जीवन में केवल एक सही निर्णय ही उसकी पूरी दिशा बदल सकता है। उनके अनुसार जीवन में प्रवचन सुनना और बोलना आसान है लेकिन असली कठिनाई अपने मन शरीर और प्राण को पूरी तरह भगवान के प्रति समर्पित करने में है। महाराज जी का कहना है कि अक्सर लोग यह दावा करते हैं कि वे भगवान के प्रति समर्पित हैं लेकिन जब जीवन में कठिन परिस्थितियां आती हैं तो उनका विश्वास डगमगा जाता है। ऐसे समय में व्यक्ति फिर से माया और सांसारिक चीजों की ओर झुक जाता है। उनके अनुसार इस संसार में स्थायी कुछ भी नहीं है न परिवार न धन और न ही प्रतिष्ठा। केवल एक ही सत्य है सच्चिदानंद परमात्मा जो इस पूरी सृष्टि का संचालन करता है। उन्होंने समझाया कि हर इंसान के सामने जीवन में एक बड़ा विकल्प हमेशा होता है कि वह दुनिया के आकर्षण यानी माया को चुने या भगवान और गुरु का मार्ग अपनाए। अधिकतर लोग सांसारिक चीजों को चुन लेते हैं और यही उनके दुख का कारण बनता है। लेकिन जो व्यक्ति भगवान का सहारा पकड़ लेता है उसके लिए यही दुनिया बंधन नहीं बल्कि मुक्ति का माध्यम बन जाती है। प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार सच्चा समर्पण यही है कि व्यक्ति यह भाव रखे कि उसका शरीर मन और प्राण भगवान के अधीन हैं न कि स्वयं के। जब यह भावना जीवन में आ जाती है तो इंसान अपनी इच्छाओं और मन के भटकाव से ऊपर उठ जाता है। चाहे सुख हो या दुख बीमारी हो या अपमान वह हर परिस्थिति को भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार करता है। उन्होंने पौराणिक उदाहरण देते हुए राजा मोरध्वज और राजा बलि की कथा का उल्लेख किया। राजा मोरध्वज ने भगवान की परीक्षा में अपने पुत्र का बलिदान स्वीकार कर लिया जबकि राजा बलि ने अपने वचन का पालन करते हुए सब कुछ भगवान को समर्पित कर दिया। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि सच्चा समर्पण त्याग और विश्वास का दूसरा नाम है। महाराज जी कहते हैं कि जीवन की असली परीक्षा किसी कागज पर नहीं होती बल्कि परिस्थितियों के रूप में सामने आती है। कभी सुख और लालच के रूप में तो कभी दुख और अपमान के रूप में। जो व्यक्ति हर स्थिति में भगवान के साथ बना रहता है वही सच्चा साधक कहलाता है। उन्होंने यह भी बताया कि यदि व्यक्ति माया के अस्थायी सहारों को छोड़कर भगवान और गुरु का सहारा पकड़ ले तो उसका जीवन पूरी तरह बदल सकता है। एक सरल लेकिन शक्तिशाली नियम उन्होंने दिया कि जो भी भगवान की इच्छा है वही स्वीकार करना चाहिए। अंत में उन्होंने कहा कि यह संसार केवल एक भ्रम है और जब व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है तो उसके भीतर का भय समाप्त हो जाता है। जो व्यक्ति सांसारिक चीजों को छोड़कर ईश्वर को अपना लेता है वही सच्ची शांति और आनंद को प्राप्त करता है। उनके अनुसार समर्पण ही वह मार्ग है जो साधारण जीवन को असाधारण आध्यात्मिक अनुभव में बदल देता है।
सीता नवमी 2026: माता सीता की पूजा से वैवाहिक जीवन में आती है सुख-शांति और समृद्धि

नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सीता नवमी का पर्व अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह दिन माता सीता के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है और विशेष रूप से आदर्श पतिव्रता, त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति मां जानकी को समर्पित होता है। वर्ष 2026 में यह शुभ अवसर 25 अप्रैल शनिवार को मनाया जाएगा। वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की शुरुआत 24 अप्रैल 2026 की रात 7 बजकर 21 मिनट पर होगी और इसका समापन 25 अप्रैल 2026 की शाम 6 बजकर 27 मिनट पर होगा। इसी कारण इस वर्ष सीता नवमी का पर्व 25 अप्रैल को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्रीराम और माता सीता की पूजा करने से घर में सुख शांति समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन की गई पूजा से जीवन में आने वाले दुख और संकट दूर हो जाते हैं और वैवाहिक जीवन में खुशहाली आती है। विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है क्योंकि इससे पति की लंबी उम्र और दांपत्य जीवन की मजबूती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। सीता नवमी पर पूजा के लिए कई शुभ मुहूर्त बताए गए हैं जिनमें ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 51 मिनट से 5 बजकर 35 मिनट तक रहता है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 19 मिनट से 1 बजकर 10 मिनट तक और विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 52 मिनट से 3 बजकर 43 मिनट तक शुभ माना जाता है। वहीं अमृत काल शाम 6 बजकर 29 मिनट से रात 8 बजकर 4 मिनट तक विशेष रूप से फलदायी माना गया है। पूजा विधि के अनुसार इस दिन प्रातः काल स्नान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद घर के मंदिर में माता सीता और भगवान राम की प्रतिमा स्थापित कर विधिवत पूजा करनी चाहिए। उन्हें पीले फूल वस्त्र और शृंगार सामग्री अर्पित की जाती है। इसके साथ ही भोग लगाकर श्री जानकी रामाभ्यां नमः मंत्र का 108 बार जाप करना शुभ माना जाता है। सीता नवमी की कथा का पाठ करने के बाद आरती करना आवश्यक होता है। मंत्रों में ॐ सीतायै नमः और ॐ श्री सीता रामाय नमः का जाप भी विशेष फलदायी माना गया है। इसके अलावा वैदिक मंत्र ॐ जनकनंदिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि तन्नो सीता प्रचोदयात् का उच्चारण भी किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सीता नवमी का पर्व केवल एक पूजा नहीं बल्कि भक्ति और आदर्श जीवन मूल्यों का प्रतीक है। इस दिन की गई आराधना से जीवन में सुख समृद्धि धन धान्य और वैवाहिक सौहार्द बढ़ता है। कुल मिलाकर सीता नवमी का यह पावन पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है और यह भक्तों के जीवन में सकारात्मकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है।
इस मंदिर में छिपी है महाभारत काल की सबसे भावुक प्रेम और बलिदान की अनकही दास्तां

नई दिल्ली। भारत रहस्यों और विविध परंपराओं की भूमि है, जहाँ हर मंदिर और उत्सव के पीछे कोई न कोई गहरी पौराणिक गाथा छिपी होती है। तमिलनाडु के कूवगम क्षेत्र में स्थापित एक विशेष मंदिर, जिसे अरावन मंदिर के नाम से जाना जाता है, एक ऐसी ही अनोखी और भावुक परंपरा का गवाह है। यह मंदिर विशेष रूप से एक विशिष्ट समाज के लिए पवित्र माना जाता है, क्योंकि यहाँ पूजे जाने वाले देवता अरावन, महाभारत के महान योद्धा अर्जुन के पुत्र थे। हर साल यहाँ एक भव्य उत्सव आयोजित किया जाता है, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में लोग जुटते हैं। इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ पहले विवाह का उल्लास मनाया जाता है और अगले ही पल चारों ओर वियोग का मातम छा जाता है। इस अनूठी परंपरा के पीछे महाभारत काल की एक मार्मिक कथा जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों की विजय सुनिश्चित करने के लिए एक कठिन परीक्षा की घड़ी आई थी, जहाँ धर्म की रक्षा के लिए एक महान योद्धा की बलि आवश्यक थी। अर्जुन के पुत्र अरावन स्वेच्छा से अपना बलिदान देने के लिए आगे आए, लेकिन उनकी एक अंतिम शर्त थी कि वे अविवाहित रहकर मृत्यु को प्राप्त नहीं होना चाहते। संकट यह था कि जो व्यक्ति अगले दिन ही वीरगति को प्राप्त होने वाला हो, उससे अपनी पुत्री का विवाह करने के लिए कोई तैयार नहीं था। ऐसी स्थिति में भगवान विष्णु ने स्वयं ‘मोहिनी’ का रूप धारण किया और अरावन से विवाह रचाया। विवाह की अगली सुबह अरावन ने अपना बलिदान दे दिया और मोहिनी रूपी भगवान ने एक विधवा की तरह उनकी मृत्यु पर विलाप किया। यही कारण है कि आज भी एक विशेष समुदाय के लोग खुद को मोहिनी का रूप मानते हैं और अरावन देवता को अपना आराध्य स्वीकार करते हैं। उत्सव के दौरान, मंदिर में विवाह का प्रतीक माने जाने वाले सूत्र बांधे जाते हैं, जो अरावन देवता के साथ उनके मिलन का प्रतीक होता है। उस रात पूरा परिसर उत्सव और खुशियों से सराबोर रहता है। लेकिन जैसे ही अगली सुबह होती है और अरावन की प्रतिमा के बलिदान की प्रक्रिया पूरी की जाती है, वैसे ही खुशियां मातम में बदल जाती हैं। लोग अपनी चूड़ियां तोड़ देते हैं, सुहाग के प्रतीक हटा देते हैं और सफेद वस्त्र धारण कर अपने देवता की मृत्यु का शोक मनाते हैं। करीब 18 दिनों तक चलने वाले इस पारंपरिक उत्सव में केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं होते, बल्कि कला, सौंदर्य और गायन जैसी कई प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है, जो इस समुदाय की प्रतिभा को प्रदर्शित करती हैं। यह मंदिर और यहाँ की परंपरा इस बात का जीवंत उदाहरण है कि आस्था और बलिदान की कहानियाँ किस तरह सदियों बाद भी समाज के एक विशिष्ट वर्ग की पहचान का आधार बनी हुई हैं। अरावन का बलिदान न केवल इतिहास की एक घटना थी, बल्कि इसने एक ऐसे देवता को जन्म दिया जो आज भी लाखों लोगों के सुख और दुख का एकमात्र सहारा हैं।