कुंभ राशि में 17 फरवरी को ग्रहों का लगेगा जमवाड़ा, देश-दुनिया को करेगा प्रभावित, इन राशियों पर भी पड़ेगा प्रभाव

भोपाल । एक ही राशि में पांच ग्रह इकट्ठे हो रहे हैं। यह पूर्व से चला आ रहा चतुरग्रह योग अब पंचग्रही योग में परिवर्तन हो रहा है। ज्योतिष मठ संस्थान भोपाल के प्रमुख आचार्य पंडित विनोद गौतम ने बताया कि आगामी 17 फरवरी मंगलवार को चंद्रमा के कुंभ राशि में पहुंचने के पश्चात सूर्य, बुध, शुक्र, राहु, चंद्रमा का पंचग्रही योग बनेगा, यह योग देश दुनिया को प्रभावित करेगा, कई देशों में तनाव की स्थिति लगातार बढ़ती जाएगी। इस योग के प्रभाव से कुंभ राशि वाले देशों के अतिरिक्त मेष, तुला वृश्चिक, वृष राशि वाले देश प्रभावित होंगे। इन देशों को सावधानी की आवश्यकता है । क्योंकि आगामी मार्च में धीरे-धीरे यह योग शक्तिशाली होगा, जिसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं। ऐसे योग संयोग का निर्माण 1962 ईस्वी में एवं 1971 ई में बना था जब देश ,दुनिया को संकट का सामना करना पड़ा था। 23 फरवरी को मंगल के राशि परिवर्तन से यह पंचग्रही योग और भी शक्तिशाली हो जाएगा । पंडित गौतम के अनुसार यह योग भारत सहित दुनिया के लिए अशुभ है इसके प्रभाव से युद्ध आदि के प्रभाव में बढ़ोतरी होगी, टकराव की स्थिति के साथ प्राकृतिक प्रकोप भूकंप आदि के योग भी निर्मित हो रहे हैं । भारत की प्रभाव राशि कुंभ पर बनने वाला यह पंचर्ग्रही योग भारत को भी प्रभावित कर सकता है। अतः सावधानी की आवश्यकता है। कुंभ राशि शनि प्रधान राशि है। यह न्याय के देवता शनि के आधिपत्य में आती है। अन्याय से संबंधित युद्ध आदि धर्म युद्ध की ओर संकेत करती है। ग्रह स्थिति के अनुसार इस योग के प्रभाव से 12 राशियों में प्रभाव पड़ेगा। मंगलवारी अमावस्या के दिन परिधि योग एवं पंचक की स्थिति भी प्रारंभ हो रही है यह भी। अशुभ कारक है। ज्योतिष संहिता शास्त्र में पंचग्रही योग को अशुभ माना गया है। पंचग्रही योग में 12 राशियों पर प्रभाव इस प्रकार से होंगे- मेष- स्थानांतरण, शरीर कष्ट, तनाव वृष- रोग, प्रॉपर्टी से लाभ, पुत्र सुख मिथुन -शुभप्रसंग, यात्रा, परेशानी, कष्ट कर्क- पुत्र सुख, भूमि लाभ, यात्रा, सिंह- शुभ समाचार, धन लाभ, मतभेदकन्या- व्यर्थ की चिंता, सहयोग तुला- भूमि लाभ, प्रतिष्ठा में वृद्धि वृश्चिक- स्वास्थ्य चिंता, धोखा धनु- मेहमान से मतभेद बढ़ेगामकर -चिंता निवारण वृद्धि कुंभ- लाभ, श्रम अधिक, तनाव मीन -सफलता, धन लाभ, विवाद
उज्जैन में महाशिवरात्रि पर भगवान महाकाल की विशेष भस्मारती: रजत मुकुट और रुद्राक्ष माला से हुआ भव्य श्रृंगार

उज्जैन । महाशिवरात्रि पर्व के अवसर पर उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार दोपहर भगवान महाकाल की विशेष भस्मारती संपन्न हुई। साल में केवल एक बार होने वाली यह भस्म आरती दोपहर 12 बजे शुरू होकर दोपहर 2 बजे तक चली। इससे पहले सुबह से ही चार प्रहर पूजन, अभिषेक और मंत्रोच्चार के साथ भगवान का विशेष श्रृंगार किया गया। रविवार रात 10:30 बजे से प्रारंभ हुए चार प्रहर पूजन में 11 ब्राह्मणों ने एकादश-एकादशनी रुद्रपाठ और वैदिक मंत्रों के साथ भगवान महाकाल का अभिषेक किया। पंचामृत, गंगाजल, गुलाब जल, भांग और केसर मिश्रित दूध से पूजा के बाद भगवान को नवीन वस्त्र और सप्तधान्य अर्पित किए गए। इसके बाद मोगरा और गुलाब के सुगंधित पुष्पों से तैयार 3 क्विंटल का भव्य सेहरा बांधा गया और रजत शेषनाग मुकुट, रजत मुंडमाला, रुद्राक्ष माला सहित अन्य आभूषणों से अलंकरण किया गया। सेहरा आरती के बाद भस्म आरती के लिए भगवान का सेहरा उतारा गया और आभूषण, वस्त्र हटाकर भस्म अर्पित किया गया। इस भस्मारती में प्रशासनिक अधिकारी और भारी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। दोपहर 2:30 बजे भोग आरती संपन्न हुई, जिसके बाद नि:शुल्क अन्नक्षेत्र में ब्राह्मणों का भोजन कराते हुए दक्षिणा प्रदान की गई। भस्मारती के बाद संध्या पूजन, संध्या आरती और शयन आरती के साथ भगवान के पट बंद किए गए। महाशिवरात्रि पर्व का समापन 18 फरवरी को पंचमुखारविंद दर्शन के साथ होगा, जिसमें भगवान के पांच स्वरूपों का दर्शन किया जाएगा। महाशिवरात्रि पर मंदिर में श्रद्धालुओं का भारी सैलाब रहा। रविवार तक करीब 4 लाख भक्त भगवान महाकाल के दर्शन कर चुके हैं। शहर के होटल, लॉज और होम-स्टे पहले ही फुल हो चुके हैं, जिससे महाकालेश्वर मंदिर क्षेत्र में भक्तों की भारी भीड़ देखी गई।
महाकाल उज्जैन की तर्ज पर थांवला में मना महाशिवरात्रि महोत्सव, शिव बारात में शामिल हुए 'भूत-प्रेत'

नई दिल्ली। महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक माना जाता है। इस पावन दिन पर शिव भक्त व्रत रखते हैं, और विधि-विधान से भोलेनाथ की आराधना करते हैं। मान्यता है कि महाशिवरात्रि की रात भगवान शिव अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं और सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। इसी कड़ी में राजस्थान के अजमेर जिले में महाशिवरात्रि का पर्व पूरे धूमधाम के साथ मनाया गया। थांवला का महाशिवरात्रि महोत्सव आस्था, संस्कृति और उत्सव का शानदार उदाहरण बना। इसमें लोग भगवान शिव की भक्ति के साथ-साथ लोक परंपराओं की रंगत में भी डूबे नजर आए। तीर्थराज पुष्कर के समीपवर्ती ग्राम थांवला में थानेश्वर महादेव सेवा समिति की ओर से महाशिवरात्रि महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। इस आयोजन को उज्जैन के महाकाल मंदिर की परंपराओं की तर्ज पर किया गया। महोत्सव के दौरान मेहंदी, हल्दी, शिव बारात, महाआरती, शृंगार दर्शन और भजन संध्या जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस आयोजन का सबसे आकर्षक दृश्य भूत-प्रेतों की अनोखी शिव बारात रही, जिसने श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस मौके पर थानेश्वर महादेव सेवा समिति के सदस्य पंडित मांगीलाल शर्मा ने बताया कि शिव बारात में पुणे से आए ढोल-ताशे वालों ने अपनी शानदार प्रस्तुति दी। करीब 101 ढोलों की गूंज और ताशा-डमरुओं की आवाज ने पूरे गांव के लोगों का मन मोह लिया। मराठी परिधान में सजे युवक और युवतियों ने जब एक साथ ढोल-ताशा बजाए, तो उनकी आवाज करीब एक किलोमीटर दूर तक सुनाई दी। इससे माहौल पूरी तरह उत्सव में बदल गया। शिव बारात में आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। श्रद्धालुओं का ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। महोत्सव के तहत कार्यक्रमों का आयोजन जारी रहेगा। इस कड़ी में भव्य महाआरती और भजन संध्या का आयोजन किया जाएगा। इस सांस्कृतिक संध्या में आध्यात्मिक और संगीत जगत की नामचीन हस्तियां अपनी प्रस्तुतियां देंगी।
अद्भुत जटोली धाम: दक्षिण-द्रविड़ शैली का वह चमत्कार, जहाँ स्फटिक शिवलिंग के दर्शन मात्र से बदल जाती है किस्मत!

नई दिल्ली । हिमाचल प्रदेश की देवभूमि अपनी दिव्यता और अलौकिक शक्ति के लिए विश्वविख्यात है, लेकिन सोलन जिले में स्थित जटोली शिव मंदिरकी आभा कुछ अलग ही है। इसे न केवल उत्तर भारत, बल्कि एशिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिरहोने का गौरव प्राप्त है। लगभग 122 फुट ऊँचे इस मंदिर की भव्यता ऐसी है कि बादलों के बीच घिरा इसका शिखर किसी अलौकिक लोक का आभास कराता है। मान्यता है कि पौराणिक काल में स्वयं भगवान शिव ने यहाँ प्रवास किया था और उनके चरण पड़ने से यह भूमि आज भी आध्यात्मिक ऊर्जा से लबरेज है। इस मंदिर का निर्माण किसी चमत्कार से कम नहीं है। दक्षिण-द्रविड़ शैलीमें निर्मित इस मंदिर का कार्य वर्ष 1974 में शुरू हुआ था और इसे पूर्ण होने में लगभग 39 सालका लंबा समय लगा। मंदिर की वास्तुकला में तीन पिरामिड नुमा संरचनाएं हैं, जो इसकी भव्यता में चार चाँद लगाती हैं। मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित स्फटिक मणि का शिवलिंगश्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। कहा जाता है कि इस पवित्र शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही भक्त के जीवन के सारे कष्ट मिट जाते हैं और उसे नई दिशा प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर जटोली मंदिर का सौंदर्य और भी निखर जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, आज ही के दिन महादेव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। वहीं, एक अन्य कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है, जिसमें सृष्टि को बचाने के लिए शिवजी ने हलाहल विषका पान किया था। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं ने जिस रात जागरण और भक्ति की, वही परंपरा आज महाशिवरात्रिके रूप में मनाई जाती है। जटोली में इस रात का जागरण विशेष फलदायी माना जाता है, क्योंकि यहाँ की शांत वादियाँ और शुद्ध वातावरण भक्त को सीधे शिव तत्व से जोड़ देते हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल आस्था के वशीभूत होकर ही नहीं आते, बल्कि मंदिर की बेमिसाल नक्काशी और शांत प्राकृतिक परिवेश उन्हें मंत्रमुग्ध कर देता है। जटोली मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भक्तों की श्रद्धा और शिल्पकारों के अथक परिश्रम का प्रतीक है। महाशिवरात्रि पर यहाँ हजारों की संख्या में पहुँचने वाले श्रद्धालु जलाभिषेक कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यदि आप भी महादेव के अनन्य भक्त हैं, तो बादलों की गोद में बसे इस दिव्य शिवालय के दर्शन आपके जीवन का एक अविस्मरणीय अनुभव साबित हो सकते हैं।
भगवान भोले शंकर की भक्ति में डूबा मुरैना, शिवालयों पर उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब

मुरैना। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिये भगवान शिव की आराधना हेतु जिले के एतिहासिक, पुरातात्विक एवं बड़े धार्मिक शिवालयों पर श्रद्धालुओं का जनसैलाव आज सुबह से ही उमड़ रहा है। जिले के ईश्वरा महादेव, अलोपी शंकर, महाकाल मंदिर, बनखण्डेश्वर मंदिर, कोल्हुआ मंदिर, जयेश्वर महादेव मंदिर सहित सभी मंदिरों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना आरंभ हो गया। मुरैना के मुक्तिधाम में स्थित महाकाल मंदिर पर भक्तगण विभिन्न प्रकार से अभिषेक कर रहे है। भगवान शिव का अभिषेक करने के साथ ही श्रद्धालु पूजा अर्चना कर रहे हैं। युवा श्रद्धालु जहां बेहतर जीवन साथी की मनोकामना को पूर्ण करने के लिये पूजा अर्चना करते दिखाई दे रहे हैं वहीं आम श्रद्धालु सुखी जीवन तथा अपने संतान के शांती सुरक्षा के जीवन की कामना कर रहे हैं। शहर के महाकाल मंदिर, बनखण्डेश्वर मंदिर, रामजानकी मंदिर, मारकण्डेश्वर मंदिर, बिहारी जी मंदिर, गुफा मंदिर, पशुपतिनाथ मंदिर, ककनमठ, बटेश्वरा, कुतवार, घिरोना मंदिर सहित सभी शिव मंदिरों पर दोपहर बाद तक श्रद्धालुओं का सैलाव देखा जा रहा है। मंदिरों पर व्यवस्थापकों ने पूजा अर्चना के साथ-साथ श्रद्धालुओं को भगवान शिव का सहज दर्शन व पूजा हो सके इसकी पूर्ण व्यवस्थायें कीं गईं हैं। भगवान शिव की पूजा में लीन महिला व पुरुष श्रद्धालुओं का कहना है कि आज के दिन भगवान शिव की पूजा अर्चना कर अपने जीवन मेंं सुख, शांती, समृद्धि की कामना किये जाने पर पूर्ण हो जाती है। फोटो – 00002पहाडग़ढ़ के जंगल में ईश्वरा महादेव के साथ-साथ आमझिर व बरई कोट पर पहुंचे श्रद्धालुपहाडग़ढ़ के घनघोर जंगल में स्थित ईश्वरा महादेव सहित आमझिर व बरई कोट पर श्रद्धालुओं का सैलाव आज सुबह के प्रथम प्रहर से ही आरंभ हो गया। शिवलिंग पर निरंतर चल रही जलधारा से निर्मित कुण्ड में श्रद्धालुओं द्वारा स्नान कर भगवान शिव का अभिषेक व पूजा अर्चना की जा रही है। ईश्वरा महादेव के विषय में किवदंती है कि रावण के भाई विभीषण ने की थी यहां पर तपस्या उनके ही द्वारा स्थापित किया गया था। यह स्थान जिले के आदिवासी विकासखण्ड पहाडग़ढ़ मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर घनघोर जंगल में पहाड़ी के नीचे स्थापित है। इस शिवलिंग का महात्म इस वजह से भी प्रमुख माना जाता है कि जंगल में तीन पत्ती से लेकर 21 पत्ती तक के बेलपत्र पाये जाते हैं। यहां रोरी का भी पेड़ पाया जाता है। ईश्वरा महादेव से कुछ ही दूरी पर आमझिर नामक स्थान पर महादेव पार्वती के पास से जल प्रवाह होकर जल अभिषेक होता रहता है। इसी तरह बरई कोट शिवलिंग पर भी निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है। घनघोंर जंगल में होने के बावजूद भी इन स्थानों पर श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति के लिये पहुंचकर पूजा अर्चना कर रहे हैं।
शिव-शक्ति का पर्व है महाशिवरात्रि… मां पार्वती को भी मनपसंद भोग लगाने मिलता है दोगुना फल

नई दिल्ली। आज महाशिवरात्रि (Mahashivratri 2026) का उत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है. इस पावन अवसर पर भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ महादेव की पूजा करते हैं. लेकिन महाशिवरात्रि केवल शिव की साधना (Shiva’s Meditation) का ही नहीं बल्कि शिव और शक्ति (Shiva and Shakti) दोनों से जुड़ा महापर्व है. इस पावन दिन पर भक्त अक्सर महादेव को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और धतूरा चढ़ाते हैं लेकिन मान्यता है कि अगर भोग में माता पार्वती की पसंद का भी ध्यान रखा जाए तो पूजा का फल दोगुना हो जाता है। जब हम शिव और शक्ति दोनों को उनकी प्रिय वस्तुओं का भोग लगाते हैं तो घर में सुख, शांति और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आइए जानते हैं कि इस बार महाशिवरात्रि की अपनी भोग की थाली को कैसे खास बनाएं कि हमारे ऊपर महादेव और मां गौरी दोनों की असीम कृपा बरसे। महाशिवरात्रि पर लगाएं ये भोगभगवान शिव को भोलेनाथ इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि वो बहुत ही सरल चीजों से प्रसन्न हो जाते हैं. इसलिए शिवरात्रि पर भांग, धतूरा और बेर जैसी चीजें चढ़ाई जाती हैं जो हर किसी को आसानी से मिल जाती हैं. लेकिन इसके अलावा भी कुछ ऐसे पकवान हैं जिन्हें शिव और पार्वती को चढ़ाने की मान्यता है. 1. पंचामृत: भगवान शिव को पंचामृत का भोग और अभिषेक अत्यंत प्रिय है. यह दूध, दही, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण से बनता है. इसे आत्मा की शुद्धि का प्रतीक माना जाता है.इसे घर पर कैसे बनाएंपंचामृत बनाने के लिए एक बर्तन में ताजा दही, दूध, थोड़ा सा शहद, थोड़ी चीनी और थोड़े से गंगाजल को मिलाकर अच्छी तरह फेंट लें. इसमें स्वाद और शुद्धता के लिए बारीक कटे मखाने, सूखे मेवे और तुलसी के पत्ते डालें. सभी सामग्रियों को एक साथ मिलाने के बाद आपका पवित्र पंचामृत भोग के लिए तैयार है. 2. मावा की बर्फी: शिव पूजा में भांग और धतूरे का विशेष महत्व है. भांग को दूध में मिलाकर या इसके लड्डू बनाकर भोग लगाया जाता है. यह भगवान शिव की वैराग्य प्रवृत्ति का प्रतीक माना जाता है.इसे घर पर कैसे बनाएंमावे यानी खोया की बर्फी बनाने के लिए कड़ाही में खोया और चीनी डालकर धीमी आंच पर तब तक पकाएं जब तक वो गाढ़ा होकर कड़ाही न छोड़ने लगे. इसमें इलायची पाउडर और थोड़े कटे हुए ड्राई फ्रूट्स मिलाएं. फिर मिश्रण को घी लगी प्लेट में एक समान फैला दें. हल्का ठंडा होने पर मनचाहे आकार में काट लें. 3. बेलपत्र और मौसमी फल: माता पार्वती और शिव जी को बेर और केले जैसे कई फलों का भोग लगाया जाता है. लेकिन बेर को शिवरात्रि का मुख्य फल माना जाता है. बेर के बिना शिव पूजा अधूरी मानी जाती है. 4. ठंडाई: शिवरात्रि पर महादेव को केसर, बादाम और पिस्ता मिश्रित ठंडाई का भोग लगाना शुभ होता है. यह मन को शांति प्रदान करने वाला सात्विक भोग है.इसे घर पर कैसे बनाएंसबसे पहले बादाम, काजू, पिस्ता, सौंफ, खसखस और काली मिर्च को कुछ घंटों के लिए भिगोकर उनका बारीक पेस्ट तैयार कर लें. अब इस पेस्ट को ठंडे दूध में अच्छी तरह मिलाएं और इसमें स्वादानुसार चीनी, केसर के धागे और गुलाब की पंखुड़ियां डाल दें. अंत में मिश्रण को छान लें या बिना छाने ही बर्फ के टुकड़े डालकर इसे ठंडा ही शिव जी को भोग लगाएं. 5. मखाना खीर: माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए सूखे मेवों से भरपूर मखाने की खीर का भोग लगाया जाता है. यह भोग शक्ति और भक्ति का संगम माना जाता है. मखाने की खीर व्रत में खाई जाती है और इसका भोग शिव को भी लगाया जाता है.इसे घर पर कैसे बनाएंसबसे पहले मखानों को घी में हल्का कुरकुरा होने तक भून लें और फिर उन्हें दरदरा पीस लें या छोटे टुकड़ों में काट लें. अब दूध को आधा होने तक उबालें और फिर उसमें मखाने, चीनी और इलायची पाउडर डालकर गाढ़ा होने तक धीमी आंच पर पकाएं. आखिर में अपनी पसंद के बारीक कटे हुए मेवे और केसर डाल दें.
कुंभ राशि में सूर्य गोचर 2026 से बदलेगा भाग्यचक्र: 15 मार्च तक मेष, मिथुन, सिंह और तुला के लिए करियर, निवेश और रिश्तों में प्रगति के संकेत

नई दिल्ली। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 13 फरवरी 2026 को सूर्य ने कुंभ राशि में प्रवेश किया है और इसका प्रभाव 15 मार्च 2026 तक रहने की संभावना व्यक्त की जा रही है। द्रिक पंचांग के अनुसार यह परिवर्तन प्रातः लगभग 4 बजकर 14 मिनट पर हुआ। इससे पहले सूर्य मकर राशि में स्थित था। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, प्रतिष्ठा, प्रशासनिक शक्ति और पारिवारिक संतुलन का कारक ग्रह माना जाता है। इसी कारण सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश विशेष महत्व रखता है। पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं के आधार पर यह गोचर मेष, मिथुन, सिंह और तुला राशि के जातकों के लिए अनुकूल परिणाम देने वाला माना जा रहा है। मेष राशि के लिए सूर्य का यह परिवर्तन लाभ भाव में सक्रियता ला सकता है। नौकरीपेशा लोगों को पदोन्नति या वेतन वृद्धि के संकेत मिल सकते हैं जबकि व्यवसाय से जुड़े जातकों को नए संपर्कों और नेटवर्किंग से आर्थिक अवसर प्राप्त होने की संभावना जताई जा रही है। सामाजिक प्रतिष्ठा में भी वृद्धि के संकेत बताए जा रहे हैं। मिथुन राशि के लिए यह अवधि लंबित कार्यों को गति देने वाली मानी जा रही है। पारिवारिक और सामाजिक संबंधों में सुधार के संकेत हैं। जो योजनाएं लंबे समय से रुकी हुई थीं उन्हें आगे बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। उच्च शिक्षा या विदेश से जुड़े कार्यों में भी सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही है। सिंह राशि के जातकों के लिए सूर्य का यह गोचर साझेदारी और वैवाहिक जीवन के क्षेत्र में संतुलन ला सकता है। व्यवसायिक सहयोग मजबूत हो सकता है और सामूहिक निर्णयों में स्पष्टता बढ़ने की संभावना है। कार्यक्षेत्र में नेतृत्व क्षमता उभर सकती है जिससे सम्मान और प्रभाव में वृद्धि हो सकती है। तुला राशि के लिए यह समय निवेश और व्यक्तिगत संतुलन से जुड़ा माना गया है। वित्तीय निर्णय सोच समझकर लेने पर लाभ के संकेत मिल सकते हैं। भावनात्मक मामलों में स्पष्टता आने और संबंधों में सामंजस्य बढ़ने की संभावना है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी यह उपयुक्त समय माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रहों का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत कुंडली, दशा और अंतर्दशा पर निर्भर करता है। इसलिए किसी भी महत्वपूर्ण आर्थिक या पेशेवर निर्णय से पहले व्यक्तिगत ज्योतिषीय परामर्श को उपयोगी माना जाता है। सूर्य का यह गोचर सकारात्मक ऊर्जा और आत्मबल को जागृत करने वाला समय माना जा रहा है जो प्रयास और संतुलन के साथ बेहतर परिणाम दे सकता है।
महाशिवरात्रि पर बना दुर्लभ संयोग: 15 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग में करें रुद्राभिषेक, पूरी होगी हर मनोकामना!

नई दिल्ली। देवों के देव महादेव की आराधना का सबसे बड़ा पर्व ‘महाशिवरात्रि’ इस वर्ष 15 फरवरी 2026 को बेहद खास संयोगों के बीच मनाया जाएगा। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर आने वाला यह पर्व इस बार ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ और ‘श्रवण नक्षत्र’ के दुर्लभ मेल के साथ आ रहा है, जो आध्यात्मिक साधना और मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जा रहा है।तिथि और निशीथ काल का महत्वपंचांग गणना के अनुसार, चतुर्दशी तिथि का आरंभ 15 फरवरी की शाम 5 बजकर 5 मिनट पर होगा और इसका समापन 16 फरवरी को शाम 5 बजकर 35 मिनट पर होगा। शास्त्रों के अनुसार, महाशिवरात्रि का व्रत उस दिन किया जाता है जिस दिन रात्रि के ‘निशीथ काल’ (मध्यरात्रि) में चतुर्दशी तिथि व्याप्त हो। इस आधार पर 15 फरवरी को ही मुख्य पर्व और उपवास रखा जाएगा।ज्योतिषीय संयोग: सर्वार्थ सिद्धि और श्रवण नक्षत्रइस वर्ष महाशिवरात्रि पर ज्योतिषीय गणनाएं विशेष फलदायी हैं। 15 फरवरी की रात 7 बजकर 48 मिनट तक उत्तराषाढ़ा नक्षत्र रहेगा, जिसके उपरांत ‘श्रवण नक्षत्र’ प्रारंभ होगा। श्रवण नक्षत्र को शिव उपासना के लिए शास्त्रों में ‘सिद्ध नक्षत्र’ माना गया है। इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग का होना इस दिन किए गए दान, तप और अभिषेक के फल को अनंत गुना बढ़ा देता है। पूजन विधि और अभिषेक का विधानधार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का उत्सव है। इस दिन श्रद्धालु प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजन की मुख्य विधि में शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) से अभिषेक करना अनिवार्य माना गया है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और आक के पुष्प अर्पित किए जाते हैं। विवाहित महिलाएं माता पार्वती को श्रृंगार की सामग्री अर्पित कर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। चार प्रहर की पूजा और रात्रि जागरणमहाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। बहुत से श्रद्धालु रात भर जागकर चार प्रहर की पूजा संपन्न करते हैं। माना जाता है कि इस रात शिव तत्व पृथ्वी के अत्यंत निकट होता है, इसलिए की गई साधना सीधे महादेव तक पहुँचती है। देश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और शिवालयों में सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए अभी से तैयारियां तेज कर दी गई हैं। प्रशासन को उम्मीद है कि इस विशेष योग के कारण मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में अधिक हो सकती है।
शुक्र का नक्षत्र परिवर्तन, 22 फरवरी को पूर्वभाद्रपद में करेंगे प्रवेश, इन राशियों को मिलेगा खास लाभ

नई दिल्ली। फरवरी के अंतिम सप्ताह में एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय बदलाव होने जा रहा है। द्रिक पंचांग के अनुसार, 22 फरवरी को शुक्र ग्रह राहु के नक्षत्र शतभिषा से निकलकर पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश करेंगे। वैदिक ज्योतिष में शुक्र को सुख, प्रेम, सुंदरता, कला, वैभव और भौतिक सुख-सुविधाओं का कारक माना गया है। जब भी शुक्र नक्षत्र परिवर्तन करता है, इसका असर हमारे संबंधों, आर्थिक स्थिति और जीवन की समग्र स्थिति पर महसूस किया जाता है। पूर्वभाद्रपद नक्षत्र को ज्योतिष में विचारशीलता और आध्यात्मिक झुकाव से जोड़ा जाता है। शुक्र का इस नक्षत्र में प्रवेश कई लोगों के लिए सोच में बदलाव, नए अवसर और संबंधों में सुधार लेकर आ सकता है। किन राशियों को मिलेगा विशेष लाभमेष राशिमेष राशि वालों के लिए यह नक्षत्र परिवर्तन सामाजिक दायरे को बढ़ाने वाला है। नए लोगों से संपर्क और नेटवर्किंग से लाभ मिलेगा। आर्थिक मामलों में धीरे-धीरे सुधार होगा और प्रेम संबंधों में सकारात्मक संवाद से रिश्ते मजबूत होंगे। मिथुन राशिमिथुन राशि के जातकों के लिए यह समय करियर और प्रतिष्ठा में उन्नति का संकेत देता है। काम की सराहना होगी और वरिष्ठों का सहयोग मिलेगा। खासकर जो लोग क्रिएटिव क्षेत्रों से जुड़े हैं, उन्हें विशेष लाभ मिलेगा। सिंह राशिसिंह राशि वालों के लिए साझेदारी और दांपत्य जीवन में मधुरता आएगी। अटके हुए कार्य आगे बढ़ सकते हैं और आर्थिक योजनाओं में समझदारी से किया गया निवेश भविष्य में लाभकारी साबित होगा। तुला राशितुला राशि के स्वामी शुक्र का यह परिवर्तन राहत और नए अवसर दोनों लाएगा। कार्यक्षेत्र में नए प्रोजेक्ट मिल सकते हैं। स्वास्थ्य में सुधार और मानसिक संतुलन बना रहेगा। मकर राशिमकर राशि के जातकों के लिए धन और संसाधनों से जुड़े मामलों में लाभ के संकेत हैं। परिवार में सुखद माहौल रहेगा और नई योजनाओं पर काम शुरू करने के लिए समय अनुकूल रहेगा।
Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर राहुकाल और भद्रा का साया! जानें जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त

नई दिल्ली। Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि हर साल फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है. भगवान शिव को समर्पित यह त्योहार इस बार 15 फरवरी को मनाया जाएगा. इस दिन भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए लोग शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं. उसकी विधिवत पूजा करते हैं. हालांकि इस बार महाशिवरात्रि के दिन भद्रा का साया भी रहेगा. भद्रा शाम के समय रहेगी. और इसी वक्त राहु काल भी लगेगा. इस अशुभ काल में पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान वर्जित माने गए हैं. महाशिवरात्रि पर भद्रा काल का समयहिंदू पंचांग के अनुसार, 15 फरवरी को महाशिवरात्रि के दिन भद्रा काल शाम 05 बजकर 04 मिनट से लेकर 16 फरवरी की सुबह 05 बजकर 23 मिनट तक रहेगा. यानी भद्रा की अवधि करीब 12 घंटे 19 मिनट रहेगी. हालांकि भद्रा का वास पाताल लोक में होगा, इसलिए इसका पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं होगा. शास्त्रों के अनुसार, जब भद्रा पाताल लोक में रहती है तो पृथ्वी पर धार्मिक कार्यो में कोई रोक-टोक नहीं होती है. महाशिवरात्रि पर राहु काल का समयमहाशिवारात्रि पर राहु काल भी रहने वाला है. इस दिन शाम 04 बजकर 47 मिनट से लेकर शाम 06 बजकर 11 मिनट तक राहु काल रहेगा, जिसमें पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान से बचना चाहिए. महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक का मुहूर्तइस साल महाशिवरात्रि पर शिवलिंग के जलाभिषेक के लिए कई शुभ मुहूर्त रहने वाले हैं. पहला शुभ मुहूर्त सुबह 08:24 बजे से लेकर सुबह 09:48 बजे तक रहेगा. इसके बाद दूसरा शुभ समय 09:48 बजे से लेकर सुबह 11:11 बजे तक रहेगा. फिर करीब सवा 11 बजे से लेकर दोपहर 12:35 बजे तक जलाभिषेक का सबसे उत्तम मुहूर्त रहने वाला है. शाम को 06:11 बजे से लेकर शाम 07:47 बजे के बीच भी आप शिवलिंग का जलाभिषेक कर सकते हैं. कैसे करें शिवलिंग का जलाभिषेक?शिवलिंग का जलाभिषेक स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जाता है. इसमें शिवलिंग पर पहले जल या गंगाजल चढ़ाया जाता है, फिर दूध, दही, घी और शहद अर्पित किए जाते हैं. इसके बाद बेलपत्र, भांग और फूल चढ़ाकर मंत्र जाप किया जाता है. मान्यता है कि विधिपूर्वक जलाभिषेक करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.