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महाशिवरात्रि 2026: निशीथ काल में करें भगवान भोलेनाथ की आराधना, बन रहे हैं कई दुर्लभ संयोग

नई दिल्ली । फाल्गुन मास में आने वाली महाशिवरात्रि 2026 का हिंदू धर्मावलंबियों को बेसब्री से इंतजार रहता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद के लिए श्रद्धालु तीर्थों घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना शिवलिंग अभिषेक और मंत्र जाप की तैयारियों में व्यस्त रहते हैं। इस वर्ष महाशिवरात्रि को लेकर धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कई दुर्लभ शुभ संयोग बन रहे हैं जिनके कारण यह पर्व और भी अधिक कल्याणकारी माना जा रहा है। धार्मिक परंपरा में शिव साधना के श्रेष्ठतम समय के रूप में निशीथ काल को विशेष स्थान दिया गया है। माना जाता है कि यह आधी रात का वह समय है जब भगवान शिव अपने भक्तों की शरण में विशेष रूप से उपलब्ध रहते हैं। इसलिए इस काल में शिवलिंग पर अभिषेक धूप-दीप फल-फूल अर्पित करना और मंत्रों का जाप विशिष्ट फलदायक माना जाता है। निशीथ काल का समय 15 फरवरी 2026 इस महाशिवरात्रि पर रात लगभग 12:09 बजे से 01:01 बजे तक का निशीथ काल उत्पन्न होगा। इस अवधि को पूजा-अर्चना मंत्रोच्चारण और ध्यान के लिए अत्यंत शुभ समय माना गया है। धार्मिक परंपरा में कहा गया है कि इस समय किया गया शिवलिंग पूजन विशेष लाभ और आशीर्वाद प्रदान करता है। दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस वर्ष महाशिवरात्रि पर कई शुभ राजयोग एक साथ बन रहे हैं जो अत्यंत दुर्लभ और सकारात्मक प्रभाव वाले हैं लक्ष्मी-नारायण राजयोग: बुध और शुक्र के संयोग से बन रहा है जो समृद्धि और वैभव का संकेत देता है। बुधादित्य राजयोग: बुध और सूर्य के मेल से यह योग बन रहा है जो बुद्धि सम्मान और सेल्फ-एक्सप्रेशन को सुदृढ़ करता है। शुक्रादित्य योग: शुक्र और सूर्य के मिलन से यह योग बन रहा है जो सौंदर्य कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। शनि-शश महापुरुष राजयोग कुंभ राशि में शनि की स्थिति से यह विशेष योग बन रहा है जो अनुशासन ज्ञान और स्थिरता का सूचक है। पंचग्रह राजयोग: सूर्य बुध शुक्र शनि और राहु के एक साथ होने से यह योग बन रहा है जो अत्यंत दुर्लभ तथा शक्तिशाली माना जाता है। इन सभी योगों का एक साथ बनना साधारण नहीं है इसलिए ज्योतिषियों के अनुसार यह समय आध्यात्मिक उन्नति सकारात्मक परिवर्तन और जीवन में संतुलन लाने के लिए बेहद अनुकूल है। कहा जाता है कि इस अवधि में किए गए उपाय और पूजा-अर्चना का प्रभाव तीन-गुणा बढ़ जाता है और कई राशियों के लिए यह समय विशेष रूप से फलदायी माना जा रहा है। विशेष सुझाव: इस निशीथ काल में शिवलिंग पर जल दूध गंगाजल तथा बेलपत्र अर्पित करें।  ॐ नमः शिवाय का जाप श्रवण मनन के साथ करें। ध्यान और भक्ति भाव से शिवस्तुति करें ताकि आध्यात्मिक उन्नति का अधिकतम लाभ प्राप्त हो। इस महाशिवरात्रि पर सही मुहूर्त और संयोग का लाभ उठाकर शिव भक्तों को भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद अत्यंत शुभ फलदायी सिद्ध होगा।

विजया एकादशी कब है 2026 : फाल्गुन में पहली एकादशी, शत्रुओं पर विजय और सफलता का उपाय

नई दिल्ली । विजया एकादशी हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह एकादशी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ती है और विशेष रूप से सफलता विजय बाधाओं पर जीत और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए मनाई जाती है। 2026 में विजया एकादशी का धार्मिक महत्व और तारीख सभी भक्तों के लिए निश्चित हो चुकी है जिसे जानकर आप सही विधि और मुहूर्त के अनुसार व्रत रख सकते हैं। विजया एकादशी व्रत की सही तारीख और समय इस वर्ष विजया एकादशी शुक्रवार 13 फरवरी 2026 को है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 फरवरी दोपहर 12:22 बजे से शुरू होकर 13 फरवरी दोपहर 02:25 बजे तक रहेगी। व्रत का पारण द्वादशी को व्रत खोलना 14 फरवरी 2026 शनिवार की सुबह लगभग 07:00 से 09:14 बजे तक किया जाएगा। क्यों है यह एकादशी महत्वपूर्ण? विजया एकादशी का अर्थ ही विजय होता है। पुराणों के अनुसार यह व्रत भगवान विष्णु की विशेष कृपा से जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलाने वाला माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति जीवन में कठिनाइयों शत्रुओं बाधाओं या नकारात्मक परिस्थितियों का सामना कर रहा है तो इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत रखने से सफलता और मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। यही कारण है कि यह एकादशी वैदिक परंपरा में विशेष महत्व रखती है। व्रत कैसे रखें विजया एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर व्यक्ति स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि स्वास्थ्य अनुकूल हो तो केवल जल का सेवन कर व्रत रखा जाए; लेकिन अगर स्वास्थ्य ठीक न हो तो फलाहार भी किया जा सकता है। व्रत के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और भजन-कीर्तन करने से व्रत की सिद्धि और अधिक होती है। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय यह सबसे सरल और प्रभावशाली मंत्र है जिसका जाप श्रद्धा से करने पर भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यता:विजया एकादशी व्रत को श्रीराम ने लंका विजय से पहले किया था इसलिए इसे विजय-दायक व्रत के रूप में अत्यंत फलदायी माना जाता है। भक्तजन इस दिन भगवान विष्णु की पूजा फलाहार व भजन-कीर्तन के साथ व्रत रखते हैं और निरंतर मन में सकारात्मक ऊर्जा और विजय की भावना बनाए रखते हैं।

गुरुवार की शाम में करें ये खास उपाय, मां लक्ष्मी की बरसात होगी आपके घर पर

नई दिल्ली । गुरुवार का दिन धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जाता है और इस दिन किए गए उपायों का प्रभाव भी जल्दी दिखता है। अगर आप चाहते हैं कि घर में सुख-समृद्धि बनी रहे और धन की कमी दूर हो, तो गुरुवार की शाम को प्रदोष काल में कुछ खास उपाय जरूर करें। मान्यता है कि शाम के समय घर में मां लक्ष्मी के आगमन का समय होता है और इस समय दीपक जलाने से वे प्रसन्न होती हैं। इसलिए घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाना शुभ माना जाता है। इस उपाय से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के ईशान कोण उत्तर-पूर्व दिशा को सबसे शुभ माना जाता है। इसलिए गुरुवार की शाम को ईशान कोण में दीपक जलाने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है और धन लाभ के योग बनते हैं। खासकर जब यह दीपक प्रदोष काल में जलाया जाए तो इसके प्रभाव और भी बढ़ जाते हैं। इसके अलावा, शाम के समय घर के आंगन में दीपक जलाना भी शुभ होता है। पुराने समय में लोग आंगन में दीपक जलाकर अंधेरे को दूर करते थे। आज भी अगर आप अपने आंगन में दीपक जलाते हैं, तो इससे घर में सकारात्मकता बनी रहती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी के पौधे में मां लक्ष्मी का वास माना जाता है। इसलिए प्रदोष काल में तुलसी के पास दीपक जलाने से धन संबंधी परेशानियां कम होती हैं और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। इसके साथ ही, घर के मंदिर में मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु के समक्ष दीपक जलाना भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है। ऐसा करने से विष्णु-लक्ष्मी की कृपा से घर में धन लाभ होता है और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है। गुरुवार की शाम को इन उपायों को नियमित रूप से करने से न केवल घर में शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है, बल्कि धन-लाभ के अवसर भी बढ़ते हैं। अगर आप सच्‍चे मन से और श्रद्धा के साथ दीपक जलाएंगे तो माना जाता है कि मां लक्ष्मी आपके घर पर अपनी कृपा बरसाएंगी और घर-परिवार में खुशहाली बनी रहेगी।

Ekadashi 2026 Daan: विजया एकादशी के दिन दान करना क्यों माना जाता है शुभ? जानें किन-किन चीजों का दान करना होता है फलदायी

Ekadashi 2026 Daan:विजया एकादशी का दिन भगवान विष्णु की आराधना और पुण्य कर्मों के लिए बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन तिथि पर व्रत, पूजा और दान करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। खासतौर पर विजया एकादशी पर किया गया दान कई गुना फलदायी माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस दिन किन-किन वस्तुओं का दान करना शुभ माना गया है और इसका क्या आध्यात्मिक महत्व है।  किन-किन वस्तुओं का दान करना माना जाता है शुभ अन्न और चावल का दानइस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खासकर चावल का दान शुभ फलदायी माना गया है। मान्यता है कि अन्न का दान करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती और मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।धार्मिक पुस्तकों का दानविजया एकादशी के अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम या हनुमान चालीसा जैसी पवित्र पुस्तकों का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। इससे ज्ञान की वृद्धि होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह दान व्यक्ति को मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक बल प्रदान करता है। पीले वस्त्र का दानभगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। इसलिए इस दिन पीले वस्त्र दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की परेशानियां धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं। विशेषकर आर्थिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह दान लाभकारी माना गया है। देसी घी का दानविजया एकादशी पर शुद्ध देसी घी का दान भी शुभ माना गया है। धार्मिक दृष्टि से घी पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक है। मान्यता है कि घी का दान करने से मान-सम्मान में वृद्धि होती है और कुंडली में गुरु या शुक्र से संबंधित दोषों में भी राहत मिल सकती है। तिल और गुड़ का दानतिल और गुड़ का दान स्वास्थ्य और मानसिक शांति से जुड़ा माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इससे जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और आरोग्य की प्राप्ति होती है। यह दान विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है, जिन्हें कार्यों में बार-बार रुकावटों का सामना करना पड़ता है।

पारिवारिक अनुशासन और गरुड़ पुराण: पिता के जीवित होने पर पुत्र के इन विशेष कर्तव्यों और वर्जनाओं का क्या है धार्मिक आधार?

नई दिल्ली।हिंदू धर्मग्रंथों की समृद्ध परंपरा में पिता को केवल एक अभिभावक नहींबल्कि परिवार का आधार स्तंभ और आकाश के समान रक्षक माना गया है। शास्त्रों का मत है कि यदि माता हमें इस संसार में लाती है और संस्कारित करती हैतो पिता उस जीवन को दिशासुरक्षा और स्थायित्व प्रदान करते हैं। विशेष रूप से गरुड़ पुराण मेंजो जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों के साथ-साथ लोक-परलोक के कर्तव्यों की व्याख्या करता हैपिता के सम्मान और पारिवारिक मर्यादा को लेकर अत्यंत स्पष्ट और कड़े निर्देश दिए गए हैं। इन नियमों का ध्येय केवल धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं हैअपनिु परिवार के भीतर एक सुदृढ़ अनुशासनसंतुलन और परस्पर आदर की भावना को अक्षुण्ण बनाए रखना है। जब तक पिता जीवित हैंतब तक पुत्र के लिए कुछ विशेष सीमाओं का निर्धारण किया गया हैताकि पीढ़ीगत पदक्रम और सांस्कृतिक परंपराएं सुरक्षित रह सकें। गरुड़ पुराण के अनुसारपिता घर के स्वाभाविक और नैसर्गिक मुखिया होते हैं। शास्त्र यह प्रतिपादित करते हैं कि जब तक पिता का साया सिर पर हैतब तक घर के किसी भी प्रमुख निर्णय या धार्मिक अनुष्ठान की अगुवाई उन्हीं के हाथों में होनी चाहिए। पुत्र का परम कर्तव्य है कि वह एक सहायक की भूमिका निभाए और अपनी ऊर्जा व आधुनिक अनुभव को पिता के मार्गदर्शन के साथ जोड़े। यदि पुत्र स्वयं को सर्वाधिकार संपन्न मानकर नेतृत्व की बागडोर छीनने का प्रयास करता हैतो इससे न केवल परिवार का संतुलन बिगड़ता हैबल्कि नैतिक मूल्यों का भी ह्रास होता है। शास्त्र हमें समझाते हैं कि अधिकार प्राप्त करने से पहले कर्तव्य को समझना ही वास्तविक धर्म है। इसी क्रम मेंपितृकर्म यानी पूर्वजों के प्रति किए जाने वाले तर्पण और पिंडदान को लेकर भी गरुड़ पुराण में एक विशेष व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पहला अधिकार जीवित पिता का है। जब तक पिता स्वयं सक्षम और जीवित हैंतब तक पुत्र को स्वतंत्र रूप से पितृ तर्पण नहीं करना चाहिए। इसके पीछे का मूल भाव यह है कि वंशावली की कड़ियाँ एक निश्चित क्रम में जुड़ी होती हैं और उस क्रम का उल्लंघन करना प्रकृति के नियमों के विपरीत माना गया है। यह परंपरा परिवार की जड़ों को सींचने और वरिष्ठता का सम्मान करने का एक जीवंत प्रतीक है। दान-पुण्य और सामाजिक प्रतिष्ठा के विषय में भी गरुड़ पुराण का मार्गदर्शन अत्यंत व्यावहारिक है। यदि पुत्र अपनी मेहनत की कमाई से कोई दान करता है या पुण्य कर्म करता हैतो उसे पिता का नाम ही प्राथमिकता के साथ आगे रखना चाहिए। यह मात्र एक औपचारिकता नहींबल्कि इस सत्य की स्वीकारोक्ति है कि पुत्र की जो भी पहचान हैउसका मूल स्रोत उसके पिता ही हैं। सार्वजनिक मंचों और निमंत्रण पत्रों पर भी पिता का नाम पहले और पुत्र का नाम बाद में लिखना शिष्टाचार का हिस्सा माना गया है। यह छोटा सा व्यवहारिक नियम इस गहरे सांस्कृतिक अर्थ को स्पष्ट करता है कि परिवार में वरिष्ठता सर्वोपरि है। प्राचीन मान्यताओं में कुछ शारीरिक प्रतीकों को भी वंश की गरिमा से जोड़ा गया था। जैसे कि पुराने समय में मूंछ और केश को कुल की मर्यादा का प्रतीक माना जाता था और पिता के जीवित रहते पुत्र के लिए इनके संबंध में कुछ वर्जनाएं थीं। यद्यपि आधुनिक युग में इन प्रतीकों का स्वरूप बदल गया हैपरंतु उनका सार आज भी प्रासंगिक है कि पिता के स्वाभिमान को कभी ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए। अंततः, गरुड़ पुराण के ये नियम कोई कठोर बंधन नहीं, बल्कि वे सूत्र हैं जो परिवार को बिखरने से बचाते हैं। जब पुत्र मर्यादा की इन सीमाओं का पालन करता है, तो परिवार में प्रेम, विश्वास और स्थिरता का वास होता है, जो किसी भी समृद्ध समाज की पहली शर्त है।

बुधवार के अचूक उपाय: गाय को खिलाएं हरा मूंग-हरी घास, बुध देव की बरसेगी कृपा

नई दिल्ली। सनातन धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवता और ग्रह को समर्पित है। बुधवार का दिन ग्रहों के राजकुमार बुध देव का माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बुध ग्रह वाणी बुद्धि शिक्षा संचार और व्यापार के कारक हैं। जिनकी कुंडली में बुध कमजोर होता है या बुध दोष होता है उन्हें वाणी संबंधी समस्याएं निर्णय क्षमता में कमी और व्यापार में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में बुधवार के दिन कुछ सरल और प्रभावी उपाय कर बुध ग्रह को मजबूत किया जा सकता है। मंत्र जाप करें बुधवार को ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करना शुभ माना गया है। नियमित जाप से वाणी में मधुरता बुद्धि में तीक्ष्णता और व्यापार में वृद्धि के योग बनते हैं। विद्यार्थियों और संचार क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह उपाय विशेष लाभकारी बताया गया है। गाय को हरा चारा खिलाएं बुधवार के दिन गाय को हरा चारा विशेषकर हरी मूंग हरा धनिया या हरी घास खिलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे बुध ग्रह शांत होता है और आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। बुध दोष से पीड़ित लोगों को यह उपाय अवश्य करना चाहिए। हरे रंग का उपयोग करें हरा रंग बुध ग्रह का प्रिय रंग है। बुधवार को हरे रंग के वस्त्र पहनना या हरे रंग का रूमाल अपने पास रखना शुभ फलदायी होता है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और बुध का दुष्प्रभाव कम होता है। गणेश जी की पूजा करें बुध ग्रह की शांति के लिए भगवान गणेश की आराधना करना विशेष लाभ देता है। बुधवार को गणेश जी को दूर्वा अर्पित करें और ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जाप करें। इससे बुध दोष दूर होता है और कार्यों में सफलता मिलती है। कच्चे सूत में 7 गांठें बांधें परीक्षा या इंटरव्यू में सफलता के लिए बुधवार को कच्चे सूत में सात गांठें लगाकर जय गणेश काटो क्लेश मंत्र का जाप करें और धागे को गणेश जी को अर्पित करें। इससे बाधाएं दूर होने की मान्यता है। तुलसी को जल अर्पित करें बुधवार की सुबह तुलसी के पौधे को जल अर्पित करते हुए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। इससे बुध ग्रह के दोष शांत होते हैं। तांबे का दान और हरी वस्तुओं का दान धन लाभ की इच्छा रखने वाले व्यक्ति बुधवार से लगातार सात दिन तक गणेश पूजा कर तांबे का दान करें। साथ ही छोटे बच्चों को हरे फल हरे वस्त्र कॉपी-किताब या पेंसिल दान करना भी शुभ माना गया है। इन उपायों को श्रद्धा और नियमितता से करने पर बुध ग्रह की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में बुद्धि वाणी तथा व्यापार से जुड़े क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलते हैं।

महाकाल का महापर्व 15 फरवरी को 44 घंटे तक नॉनस्टॉप दर्शन और दोपहर 12 बजे अद्भुत भस्म आरती का दिव्य आयोजन

उज्जैन का विश्वप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर मंदिर एक बार फिर महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर भक्ति और आस्था के महासागर में डूबने जा रहा है। इस बार महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी 2026 रविवार को मनाया जाएगा और इसे लेकर मंदिर प्रशासन ने विशेष व्यवस्थाएं की हैं। श्रद्धालुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए महाकाल मंदिर के पट लगातार 44 घंटे तक खुले रहेंगे ताकि देश और विदेश से आने वाले लाखों भक्त बिना किसी बाधा के बाबा महाकाल के दर्शन कर सकें। 6 फरवरी से ही महाकालेश्वर मंदिर में शिव नवरात्रि के साथ भगवान शिव के विवाहोत्सव की शुरुआत हो चुकी है। यह आयोजन 16 फरवरी 2026 तक चलेगा। पूरे मंदिर परिसर को भव्य और आकर्षक सजावट से सजाया जा रहा है। फूलों की विशेष साज सज्जा के साथ महादेव का दिव्य श्रृंगार किया जाएगा। मंदिर प्रशासन द्वारा सुरक्षा व्यवस्था से लेकर श्रद्धालुओं की सुविधा तक हर पहलू पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। महाशिवरात्रि के दिन 15 फरवरी को सुबह 6 बजे से दर्शन प्रारंभ होंगे और 16 फरवरी की सुबह तक बिना किसी विश्राम के जारी रहेंगे। इन 44 घंटों के दौरान मंदिर नॉनस्टॉप खुला रहेगा। श्रद्धालु दिन और रात किसी भी समय बाबा महाकाल के दर्शन कर सकेंगे। यह व्यवस्था विशेष रूप से उन भक्तों के लिए की गई है जो दूर दराज से उज्जैन पहुंचते हैं और महाशिवरात्रि पर महाकाल के साक्षात दर्शन की अभिलाषा रखते हैं। महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की आराधना का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। इस दिन चारों प्रहर महादेव की पूजा की जाती है। भक्त व्रत रखते हैं और रात्रि जागरण कर शिव नाम का स्मरण करते हैं। उज्जैन नगरी इस अवसर पर पूरी तरह शिवमय हो जाती है। हर ओर हर हर महादेव के जयघोष गूंजते हैं और वातावरण भक्तिरस से सराबोर हो जाता है। इस पर्व का सबसे विशेष और आकर्षक आयोजन 16 फरवरी को दोपहर 12 बजे होने वाली भस्म आरती होगी। महाकालेश्वर मंदिर में दोपहर की भस्म आरती साल में केवल एक बार महाशिवरात्रि पर ही आयोजित की जाती है। यह अद्भुत और दुर्लभ दृश्य देखने के लिए हर वर्ष लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं। भस्म आरती से पहले भगवान महाकाल को फलों फूलों और सप्तधान्य से निर्मित भव्य सेहरा बांधा जाता है। यह श्रृंगार अपने आप में अद्वितीय होता है और श्रद्धालुओं के लिए दिव्य अनुभूति का क्षण बन जाता है। महाशिवरात्रि और शिव नवरात्रि का यह भव्य समापन 16 फरवरी को भस्म आरती के साथ होगा। उज्जैन का यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत खास है। महाकाल की नगरी में इस दौरान उमड़ने वाली आस्था यह दर्शाती है कि भगवान शिव के प्रति श्रद्धा आज भी उतनी ही प्रगाढ़ है जितनी सदियों पहले थी। महाकाल के दरबार में इस महापर्व पर शामिल होना हर शिवभक्त के लिए सौभाग्य की बात मानी जाती है और इस वर्ष 44 घंटे के निरंतर दर्शन ने इस उत्सव को और भी ऐतिहासिक बना दिया है।

आज का पंचांग 11 फरवरी 2026 फाल्गुन माह की कृष्ण नवमी पर करें गणपति पूजन मिलेगा बुद्धि समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद

नई दिल्ली। 11 फरवरी 2026 का दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आज फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि है और साथ ही बुधवार का पावन संयोग भी बन रहा है। हिंदू धर्म में बुधवार का दिन मुख्य रूप से भगवान गणेश को समर्पित होता है। गणपति बप्पा को विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त आज के दिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा अर्चना करता है उसके जीवन के समस्त विघ्न बाधाएं दूर होती हैं और उसे बुद्धि विवेक सफलता तथा समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। विशेष रूप से जिन लोगों की कुंडली में बुध दोष होता है उनके लिए यह दिन अत्यंत फलदायी माना जाता है। आज के दिन गणेश जी को दूर्वा अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके साथ ही मोदक और शमी के पत्ते चढ़ाने से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं। पूजा के समय ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जाप करने से मानसिक शांति मिलती है और कार्यों में सफलता के मार्ग प्रशस्त होते हैं। यदि कोई नया कार्य आरंभ करना चाहते हैं तो आज का दिन उपयुक्त साबित हो सकता है बशर्ते शुभ मुहूर्त का ध्यान रखा जाए। आज का अमृत काल प्रातः 03:50 से 05:38 तक रहेगा। यह समय अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्म मुहूर्त 05:28 से 06:16 तक है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ध्यान जप और पूजा करने से आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है और मन में सकारात्मकता का संचार होता है। अशुभ समय की बात करें तो राहुकाल दोपहर 12:41 से 2:04 तक रहेगा। इस अवधि में किसी भी नए कार्य की शुरुआत करने से बचना चाहिए। यम गण्ड प्रातः 8:29 से 9:53 तक रहेगा जबकि कुलिक काल 11:17 से 12:41 तक है। दुर्मुहूर्त 12:18 से 01:03 तक रहेगा और वर्ज्यम् सायं 05:07 से 06:54 तक है। इन समयों में शुभ कार्यों से परहेज करना ही उचित माना जाता है। सूर्योदय प्रातः 7:05 पर होगा और सूर्यास्त सायं 6:16 पर। चंद्रोदय 11 फरवरी को प्रातः 2:07 पर हुआ है जबकि चंद्रास्त दोपहर 12:48 पर होगा। ग्रह नक्षत्रों की यह स्थिति साधना और आराधना के लिए अनुकूल मानी जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आज के दिन सादगी और श्रद्धा के साथ गणेश पूजन करने से जीवन में स्थिरता आती है और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है। विद्यार्थी वर्ग के लिए यह दिन विशेष लाभकारी हो सकता है। व्यापार और करियर से जुड़े लोगों को भी आज भगवान गणेश का आशीर्वाद लेने से सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। इस प्रकार 11 फरवरी 2026 का यह दिन आस्था विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है। यदि शुभ मुहूर्त का ध्यान रखते हुए भगवान गणेश की आराधना की जाए तो जीवन में सुख शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

Maha Shivratri पर इस बार बन रहे कई दुर्लभ संयोग… जानिए पूजा-जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त और विधि

नई दिल्ली। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) हिंदू धर्म का एक अत्यंत पावन पर्व (Holy Festival) है, जिसका भक्त पूरे साल इंतजार करते हैं. साल 2026 में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri 2026) 15 फरवरी, रविवार को मनाई जाएगी. इस बार तिथि को लेकर कुछ लोगों के मन में भ्रम था कि व्रत 15 को रखा जाए या 16 फरवरी को, लेकिन शास्त्रों के अनुसार 15 फरवरी को ही पर्व मनाना उचित रहेगा. फाल्गुन मास (Phalguna Month) के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि इस बार 15 फरवरी शाम 5 बजकर 5 मिनट बजे से शुरू होकर 16 फरवरी शाम 5 बजकर 35 मिनट तक रहेगी. चूंकि, निशीथकाल (मध्य रात्रि) में चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी की रात को ही रहेगी, इसलिए इसी दिन महाशिवरात्रि मनाना शास्त्रसम्मत है. महाशिवरात्रि पर पूजा का सही समय क्या है?अगर आप मंदिर में जलाभिषेक करने जा रहे हैं तो दिन में किसी भी समय जा सकते हैं. लेकिन यदि रुद्राभिषेक करना चाहते हैं तो रात्रि का समय सबसे उत्तम माना गया है।प्रथम पहर: शाम 7 बजे से 9 बजे तकद्वितीय पहर: रात 10 बजे से 12 बजे तकतृतीय पहर: रात 1 बजे से 3 बजे तकचतुर्थ पहर: सुबह 4 बजे से 6 बजे तकयदि चारों पहर संभव न हो, तो कम से कम एक पहर में रुद्राभिषेक अवश्य करें. महाशिवरात्रि 2026 शुभ संयोग (Maha Shivratri 2026 Shubh Sanyog)महाशिवरात्रि इस बार बहुत ही विशेष मानी जा रही है. दरअसल इस दिन शिव योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, प्रीति योग, आयुष्मान योग, सौभाग्य योग, शोभन योग, साध्य योग, शुक्ल योग, ध्रुव योग, व्यतिपात और वरियान योग का भी प्रभाव बना रहेगा. महाशिवरात्रि 2026 जलाभिषेक शुभ मुहूर्त (Maha Shivratri 2026 Jalabhishek Muhurat)इस बार महाशिवरात्रि पर भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए दिनभर कई शुभ मुहूर्त मिलेंग, जिनमें भक्त पूजा-अर्चना कर सकते हैं. पहला मुहूर्त सुबह 8 बजकर 24 मिनट से शुरू होकर 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा. इसके बाद दूसरा मुहूर्त सुबह 9 बजकर 48 मिनट से 11 बजकर 11 मिनट तक का रहेगा. तीसरा मुहूर्त अमृत सर्वोत्तम मुहूर्त रहेगा, जो सुबह 11 बजकर 11 मिनट से 12 बजकर 35 मिनट तक का रहेगा, जिसमें जल चढ़ाना अत्यंत फलदायी रहेगा. जो श्रद्धालु शाम को पूजा करना चाहते हैं, वे 6 बजकर 11 मिनट से 7 बजकर 47 मिनट के बीच अभिषेक कर सकते हैं. इन सभी मुहूर्तों में श्रद्धा और सच्चे मन से शिवलिंग पर जल अर्पित करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है. रुद्राभिषेक में क्या चढ़ाएं?भगवान शिव को जल, गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, बेलपत्र, शमी पत्र, भस्म, चंदन और मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं. कई लोग पार्थिव शिवलिंग बनाकर भी अभिषेक करते हैं. शिवलिंग पर जल चढ़ाने का विशेष महत्व है. मान्यता है कि जल हमारे भावों को धारण करता है. जब हम सच्चे मन से जल अर्पित करते हैं, तो हमारे मन की सकारात्मक ऊर्जा भी ईश्वर तक पहुंचती है और नकारात्मकता धीरे-धीरे कम होने लगती है. महाशिवरात्रि पर जरूर करें ये उपायअगर जीवन में आर्थिक परेशानी है, आय कम है या मेहनत के अनुसार फल नहीं मिल रहा, तो महाशिवरात्रि के दिन व्रत रखें. सुबह स्नान के बाद शिव मंदिर जाकर गंगाजल से अभिषेक करें. ”ऊं नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हुए 11 बेलपत्र चढ़ाएं. दिन भर श्रद्धा से व्रत रखें. शाम को रुद्राभिषेक कराएं और कम से कम 11 माला ”ऊं नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें. नियमित रूप से मंत्र जाप जारी रखने से धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति में सुधार देखने को मिल सकता है. तनाव और डिप्रेशन दूर करने का उपायअगर मन में तनाव, नकारात्मकता या बेचैनी रहती है, तो महाशिवरात्रि पर गंगाजल और कच्चे दूध से अभिषेक करें. 11 बेलपत्र अर्पित करें और प्रतिदिन 108 बार ”ऊं नमः शिवाय” का जाप शुरू करें. नियमित मंत्र जाप से मन को शांति मिलती है और सकारात्मक सोच विकसित होती है.

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि कब शुरू होगी, घटस्थापना मुहूर्त और 9 दिन का कैलेंडर

नई दिल्‍ली । चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म का सबसे पवित्र पर्व है, जिसमें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस साल चैत्र नवरात्रि 19 मार्च 2026 गुरुवार से शुरू होकर 27 मार्च 2026 शुक्रवार को रामनवमी के साथ समाप्त होगी। चैत्र नवरात्रि 2026 की शुरुआत और समापन प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा: 19 मार्च 2026 सुबह 6:52 बजे से समाप्ति: 27 मार्च 2026 रामनवमी नवरात्रि की अवधि: 9 दिन घटस्थापना मुहूर्त 2026 इस साल घटस्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त हैं: सुबह 6:52 बजे से 7:43 बजे तक दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक पहले दिन बनने वाले शुभ योग 19 मार्च 2026 सर्वार्थ सिद्धि योग: 20 मार्च सुबह 04:05 से 06:25 शुक्ल योग: प्रातःकाल से रात 01:17 तक ब्रह्म योग: शुक्ल योग के बाद इन योगों के कारण कलश स्थापना और पूजा का फल बढ़ जाता है। राहुकाल 19 मार्च 2026राहुकाल: दोपहर 2:00 बजे से 3:30 बजे तकइस समय कोई शुभ कार्य या पूजा न करें। घटस्थापना राहुकाल से पहले या बाद में करें। चैत्र नवरात्रि 2026 – 9 दिन का कैलेंडर दिन तारीख वार तिथि पूजा दिन 1 19 मार्च गुरुवार प्रतिपदा घटस्थापना, शैलपुत्री पूजादिन 2 20 मार्च शुक्रवार द्वितीया ब्रह्मचारिणी पूजादिन 3 21 मार्च शनिवार तृतीया चंद्रघंटा पूजादिन 4 22 मार्च रविवार चतुर्थी कूष्मांडा पूजादिन 5 23 मार्च सोमवार पंचमी स्कंदमाता पूजादिन 6 24 मार्च मंगलवार षष्ठी कात्यायनी पूजादिन 7 25 मार्च बुधवार सप्तमी कालरात्रि पूजा, महासप्तमीदिन 8 26 मार्च गुरुवार अष्टमी महागौरी पूजा, दुर्गा अष्टमीदिन 9 27 मार्च शुक्रवार नवमी नवरात्रि पारण, रामनवमी