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वोटिंग से पहले विवाद गहराया! भवानीपुर सीट पर TMC की सख्त मांग, चुनाव प्रक्रिया पर उठे सवाल

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में भवानीपुर विधानसभा सीट के चुनाव से पहले नया विवाद खड़ा हो गया है। सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इस सीट के रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) को हटाने की मांग की है। पार्टी का आरोप है कि यह अधिकारी भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के काफी करीबी हैं, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।

टीएमसी ने शिकायत पत्र में उठाए गंभीर सवाल
टीएमसी ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल को शिकायत पत्र भेजकर कहा कि भवानीपुर के लिए नियुक्त आरओ की नियुक्ति पर गंभीर आपत्ति है। पार्टी का दावा है कि यह अधिकारी पहले से ही शुभेंदु अधिकारी के करीब हैं। खासकर जब यह अधिकारी नंदीग्राम-2 में ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर थे, तब दोनों की नजदीकी सार्वजनिक तौर पर देखी गई थी।

चुनाव की निष्पक्षता पर खतरा- टीएमसी
टीएमसी का कहना है कि ऐसे संबंध चुनाव प्रक्रिया पर पक्षपात का खतरा बढ़ाते हैं और चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। रिटर्निंग ऑफिसर का काम बेहद संवेदनशील होता है, जैसे नामांकन की जांच, मतदान प्रक्रिया की निगरानी और नतीजों की घोषणा। पार्टी ने अधिकारी की वर्तमान पोस्टिंग पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अधिकारी अब भूमि अभिलेख विभाग में अतिरिक्त निदेशक हैं, जो वरिष्ठ अधिकारियों का पद है, और इसकी नियुक्ति संदिग्ध और पक्षपाती लग रही है।

आचार संहिता और संवैधानिक जिम्मेदारी का हवाला
टीएमसी ने संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून का जिक्र करते हुए कहा कि चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करे। साथ ही पार्टी ने आचार संहिता का भी हवाला दिया, जिसमें प्रशासनिक निष्पक्षता अनिवार्य बताई गई है।
टीएमसी ने संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून का जिक्र करते हुए कहा कि चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करे। साथ ही पार्टी ने आचार संहिता का भी हवाला दिया, जिसमें प्रशासनिक निष्पक्षता अनिवार्य बताई गई है।

पार्टी ने बताया कि 24 मार्च को शिकायत के बाद चुनाव आयोग ने राज्य सरकार से तीन वैकल्पिक अधिकारियों के नाम मांगे थे, जिन्हें राज्य सरकार ने भेज दिया। लेकिन अब तक आरओ को हटाने पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। टीएमसी ने इसे संवैधानिक दृष्टि से गलत और चुनाव के लिए खतरनाक बताया और चुनाव आयोग से तुरंत कार्रवाई की मांग की है, ताकि चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रहे।

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