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मानसून की हर बूंद बने भविष्य की पूंजी जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने का यही सही समय

-मनोज कुमार

मध्य प्रदेश में जल गंगा संवर्धन अभियान का समापन हो चुका है लेकिन असली जिम्मेदारी अब शुरू होती है। सरकार ने नदियों तालाबों कुओं और बावड़ियों के संरक्षण तथा पुनर्जीवन का बड़ा अभियान चलाकर जल स्रोतों को नई पहचान देने का प्रयास किया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि समाज भी इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए हर बूंद पानी बचाने की जिम्मेदारी निभाए क्योंकि आने वाले वर्षों में जल संकट और गंभीर हो सकता है।

इस वर्ष मानसून की धीमी रफ्तार ने एक बार फिर यह एहसास कराया है कि पानी का महत्व केवल बारिश के मौसम तक सीमित नहीं है बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा विषय बन चुका है। खेतों से लेकर शहरों तक हर कोई अच्छी बारिश का इंतजार कर रहा है लेकिन बदलते मौसम और बढ़ते तापमान ने चिंता भी बढ़ा दी है। लगातार बढ़ते शहरीकरण अंधाधुंध विकास और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ने जल संकट को और गहरा बना दिया है।

जल गंगा संवर्धन अभियान का उद्देश्य केवल जल स्रोतों की सफाई या पुनर्जीवन तक सीमित नहीं था बल्कि लोगों में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करना भी था। सरकार ने अपने स्तर पर कई प्रयास किए लेकिन इस अभियान की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब समाज स्वयं जल संरक्षण को अपनी दैनिक आदत बना ले।

जल प्रकृति का सबसे अनमोल उपहार है और पृथ्वी पर जीवन का आधार भी। मानव पशु पक्षी वनस्पति और समस्त जीव जगत का अस्तित्व जल पर निर्भर करता है। भारतीय संस्कृति में भी जल को जीवन और समृद्धि का प्रतीक माना गया है लेकिन आज भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और कई नदियां तालाब तथा झीलें सूखने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में पीने के पानी का गंभीर संकट सामने आ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्षा जल संचयन जल संरक्षण का सबसे प्रभावी उपाय है। घरों विद्यालयों कार्यालयों और सार्वजनिक भवनों में वर्षा का पानी संग्रहित कर भूजल स्तर को बेहतर बनाया जा सकता है। इसी तरह अधिक से अधिक वृक्षारोपण भी जरूरी है क्योंकि पेड़ वर्षा को आकर्षित करने मिट्टी के कटाव को रोकने और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वर्षाकाल में लगाए गए पौधे तेजी से विकसित होकर पर्यावरण और जल संरक्षण दोनों में योगदान देते हैं।

कृषि क्षेत्र में भी जल संरक्षण की दिशा में बदलाव आवश्यक है। ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई पद्धतियां कम पानी में अधिक उत्पादन का रास्ता खोलती हैं। किसानों को कम पानी वाली फसलों और वैज्ञानिक खेती के लिए प्रोत्साहित करना समय की जरूरत है क्योंकि कृषि क्षेत्र में सबसे अधिक जल का उपयोग होता है।

जल संरक्षण केवल बड़े प्रोजेक्ट का विषय नहीं बल्कि हमारी रोजमर्रा की आदतों से भी जुड़ा है। अनावश्यक रूप से नल खुला न छोड़ना रिसाव को तुरंत ठीक कराना जरूरत के अनुसार ही पानी का उपयोग करना और पानी की बर्बादी रोकना छोटे कदम जरूर हैं लेकिन इनका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। यदि हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझे तो प्रतिदिन लाखों लीटर पानी बचाया जा सकता है।

जल संरक्षण केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन बनना चाहिए। जब हर परिवार अपने बच्चों को पानी बचाने की सीख देगा और हर नागरिक इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाएगा तभी जल गंगा संवर्धन अभियान का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित जल भविष्य तैयार किया जा सकेगा।

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