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अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर बढ़ी वैश्विक नजरें, ट्रंप ने आज हस्ताक्षर का जताया भरोसा, तेहरान ने कहा- अंतिम सहमति में लग सकते हैं कुछ और दिन

नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है और दोनों देशों के बीच प्रस्तावित शांति समझौता अब अंतिम चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है। हालांकि समझौते को लेकर दोनों पक्षों के सार्वजनिक बयानों में समयसीमा को लेकर अंतर देखने को मिला है। अमेरिका ने जहां रविवार को समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना जताई है, वहीं ईरान ने संकेत दिया है कि दस्तावेज को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में अभी कुछ और समय लग सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि समझौते पर हस्ताक्षर होते ही क्षेत्रीय समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी जहाजों के लिए पूरी तरह खोल दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान वार्ता का स्वरूप पूर्व की सरकारों के दौरान हुई बातचीत से अलग है और दोनों देशों के बीच इस बार अधिक व्यावहारिक तथा संतुलित समझ विकसित हुई है।

दूसरी ओर, ईरान ने समझौते की दिशा में हुई प्रगति को स्वीकार किया है, लेकिन तत्काल हस्ताक्षर की संभावना को लेकर सतर्क रुख अपनाया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन समझौता रविवार को ही अंतिम रूप ले लेगा, यह कहना जल्दबाजी होगी। उनके अनुसार आने वाले दिनों में समझौता ज्ञापन को अंतिम रूप दिए जाने की पूरी संभावना है।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी समझौते के स्वरूप और प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित दस्तावेज लगभग डेढ़ से दो पृष्ठों का है, जिसमें 14 प्रमुख बिंदुओं को शामिल किया गया है। इस दस्तावेज पर पिछले दो महीनों से अधिक समय से दोनों देशों के बीच गहन वार्ताएं चल रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समझौते के प्रत्येक प्रावधान की समीक्षा ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और सैन्य नेतृत्व द्वारा की गई है।

प्रस्तावित समझौते के पहले चरण में क्षेत्रीय संघर्षों को समाप्त करने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके तहत लेबनान सहित विभिन्न मोर्चों पर चल रहे संघर्षों के औपचारिक अंत की रूपरेखा तय की गई है। साथ ही दोनों पक्षों द्वारा भविष्य में किसी नए सैन्य टकराव की शुरुआत नहीं करने की प्रतिबद्धता भी शामिल है। इसके अतिरिक्त ईरानी बंदरगाहों पर लागू अमेरिकी नौसैनिक प्रतिबंधों को हटाने तथा ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करने के लिए एक ढांचा तैयार करने का प्रस्ताव रखा गया है।

समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन को लेकर भी विशेष व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। इसके तहत 60 दिनों की एक संक्रमणकालीन अवधि निर्धारित की जा सकती है, जिसके दौरान समुद्री यातायात और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं को स्थिर किया जाएगा। यह कदम वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दूसरे चरण में अगले 60 दिनों तक व्यापक वार्ताओं का दौर जारी रखने की योजना बनाई गई है। इन चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन और अन्य रणनीतिक मुद्दों पर स्थायी समाधान तलाशना होगा। साथ ही दोनों देशों के बीच लंबे समय से लंबित राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी प्रश्नों पर भी चर्चा की जाएगी।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो इससे न केवल पश्चिम एशिया में तनाव कम होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दोनों पक्ष अंतिम सहमति तक कब पहुंचते हैं और औपचारिक हस्ताक्षर की प्रक्रिया कब पूरी होती है।

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