नई दिल्ली। उत्तराखंड के चार धामों में से एक केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अक्षय तृतीया से चारधाम यात्रा की शुरुआत होती है और गंगोत्री-यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के बाद अब 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे। यह पवित्र धाम भगवान शिव को समर्पित एक प्रमुख ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
पांडवों से जुड़ी कथा, लेकिन यह पूरी कहानी नहीं
अक्सर केदारनाथ धाम के इतिहास को महाभारत काल से जोड़कर देखा जाता है, जिसमें पांडवों के तप और शिवजी के बैल रूप में प्रकट होने की कथा प्रचलित है। मान्यता है कि पांडवों ने शिवजी के दर्शन और आशीर्वाद के लिए तप किया था और बाद में भगवान शिव ने केदार घाटी में बैल का रूप धारण कर उन्हें दर्शन दिए थे। इसी आधार पर केदारनाथ धाम का संबंध महाभारत काल से जोड़ा जाता है।
स्कंदपुराण में मिलता है केदारनाथ नाम का वास्तविक स्रोत
हालांकि, केदारनाथ नाम और इसकी उत्पत्ति को लेकर एक विस्तृत वर्णन स्कंदपुराण में मिलता है। इस कथा के अनुसार, एक बार हिरण्याक्ष नामक दैत्य ने तीनों लोकों पर अधिकार कर देवताओं को स्वर्ग से बाहर कर दिया था। पराजित होकर देवराज इंद्र अन्य देवताओं के साथ हिमालय क्षेत्र में पहुंचे और मंदाकिनी नदी के किनारे भगवान शिव की तपस्या करने लगे। इंद्र की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव महिष (भैंसे) के रूप में प्रकट हुए। उसी रूप में उन्होंने इंद्र से पूछा “के दारयामि?” यानी “किसका विनाश करूं?” यही प्रश्न आगे चलकर ‘केदार’ नाम की उत्पत्ति का आधार बना।
देवताओं की विनती और दैत्यों का अंत
इंद्र ने भगवान शिव को उन दैत्यों के नाम बताए जो देवताओं के लिए संकट बने हुए थे हिरण्याक्ष, सुबाहु, वक्त्रकंधर, त्रिशृंग और लोहिताक्ष। भगवान शिव ने भैंसे के रूप में ही इन दैत्यों का संहार किया, जिससे देवताओं को राहत मिली। इसके बाद भगवान शिव ने एक कुंड का निर्माण किया और इंद्र की प्रार्थना पर उसी स्थान पर केदारनाथ रूप में निवास करने का वरदान दिया। कहा जाता है कि इस स्थान पर पूजा और जल अर्पण से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उनके कुल का उद्धार होता है।
मोक्ष और आस्था का केंद्र
मान्यता है कि यहां किया गया पिंडदान और पूजा अत्यंत फलदायी होती है और यह स्थल मोक्ष प्राप्ति का विशेष केंद्र माना जाता है। यही कारण है कि केदारनाथ धाम को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली तीर्थों में स्थान प्राप्त है।