HIGHLIGHTS:
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हाईकोर्ट ने पटवारी की रिट अपील खारिज की
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10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया
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2016 में विभागीय जांच के बाद हुई थी बर्खास्तगी
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2022 में आपराधिक मामले में मिला था संदेह का लाभ
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कोर्ट ने कहा—दोनों प्रक्रियाएं अलग-अलग हैं
MP HIGH COURT: ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि आपराधिक मामले में बरी होने मात्र से किसी कर्मचारी को विभागीय कार्रवाई से राहत नहीं मिलती। कोर्ट ने शिवपुरी जिले के एक बर्खास्त पटवारी विश्राम सिंह कुशवाह की रिट अपील खारिज करते हुए उस पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
कोर्ट ने कहा कि बार-बार एक ही मुद्दे पर याचिकाएं दायर करना न्यायालय के समय का दुरुपयोग है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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2016 में हुई थी बर्खास्तगी
याचिकाकर्ता विश्राम सिंह कुशवाह को वर्ष 2016 में राजस्व अभिलेखों में गलत प्रविष्टि करने और दस्तावेजों से छेड़छाड़ के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। विभागीय जांच के बाद एसडीओ शिवपुरी ने यह कार्रवाई की थी।
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2022 में मिला था संदेह का लाभ
इसी मामले में दर्ज आपराधिक केस में वर्ष 2022 में ट्रायल कोर्ट ने पटवारी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इसके आधार पर उसने नौकरी में पुनः बहाली के लिए याचिका दायर की थी।
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कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
खंडपीठ ने कहा कि विभागीय कार्रवाई और आपराधिक मुकदमे की प्रकृति अलग-अलग होती है। यदि किसी आरोपी को संदेह का लाभ मिलता है, तो यह जरूरी नहीं कि विभागीय दंड स्वतः समाप्त हो जाए।
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बार-बार याचिका पर सख्ती
कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता पहले भी समान राहत के लिए याचिका दायर कर चुका था। इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए कोर्ट ने नाराजगी जताई और आर्थिक दंड लगाया।