राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी के देवरी घड़ियाल केंद्र सहित पूरे क्षेत्र में इस अनोखी जैव विविधता को संरक्षित करने के लिए वन विभाग लगातार काम कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार चंबल के रेड क्राउन रूफ्ड टर्टल और थ्री स्ट्रिप रूफ्ड टर्टल जैसी प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं, जिन्हें बचाने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है।
हर साल फरवरी से अप्रैल के बीच मादा कछुए चंबल के शांत और रेतीले घाटों पर पहुंचती हैं। वे रात के समय अपने पिछले पंजों से लगभग एक फीट गहरा गड्ढा खोदती हैं और उसमें 8 से 40 तक अंडे देकर वापस नदी में लौट जाती हैं। इन अंडों को सियार, कुत्तों और अन्य शिकारी जीवों से बचाने के लिए वन विभाग ने श्योपुर, मुरैना और भिंड जिलों के घाटों पर अस्थायी हैचरियां (सुरक्षित मैटरनिटी होम) तैयार की हैं।
वनकर्मी नियमित रूप से सुबह-शाम रेत पर कछुओं के पैरों के निशान खोजते हैं। जैसे ही किसी घोंसले का पता चलता है, वहां से अंडों को बेहद सावधानीपूर्वक निकालकर सुरक्षित हैचरी में स्थानांतरित कर दिया जाता है। अब तक करीब 395 घोंसलों को सुरक्षित किया जा चुका है, जिनसे 7344 से अधिक नन्हे कछुए सफलतापूर्वक बाहर निकलकर चंबल नदी की धारा में अपनी यात्रा शुरू कर चुके हैं।
इन नन्हे कछुओं की देखभाल भी किसी नवजात शिशु की तरह की जाती है। भिंड के बरही कछुआ केंद्र में लगभग 200 कछुओं को दो साल तक सुरक्षित वातावरण में पाला जाता है, जहां उन्हें गाजर, पत्तागोभी और हरी सब्जियां खिलाई जाती हैं। पूरी तरह विकसित होने के बाद इन्हें वापस प्राकृतिक नदियों में छोड़ा जाता है, ताकि पारिस्थितिकी संतुलन बना रहे।
हालांकि, इस पूरी प्राकृतिक प्रक्रिया पर रेत खनन और मानव गतिविधियों का खतरा लगातार बना हुआ है। जहां मशीनों का शोर या खनन गतिविधियां होती हैं, वहां कछुए अक्सर घोंसला बनाए बिना ही लौट जाते हैं, जिससे उनके प्रजनन पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे में चंबल सेंचुरी का यह संरक्षण अभियान न केवल कछुओं के अस्तित्व के लिए जरूरी है, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है।