विवाद की शुरुआत अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत काम करने वाली सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज की ओर से जारी अंतरिम नियमों के बाद हुई। राज्यों का कहना है कि प्रशासन ने पिछले वर्ष बने कानून की सीमा से आगे बढ़कर नए प्रावधान लागू किए हैं और कानून की ऐसी व्याख्या की है जिससे लाभार्थियों पर अतिरिक्त शर्तें लागू हो रही हैं।
नए नियमों के अनुसार एक जनवरी से 19 से 64 वर्ष की आयु के वे लोग जो मेडिकेड विस्तार योजना के तहत आते हैं उन्हें हर महीने कम से कम 80 घंटे काम करना होगा या सामुदायिक सेवा करनी होगी अथवा आधे समय तक पढ़ाई करना अनिवार्य होगा। हालांकि गंभीर रूप से बीमार लोगों नशा मुक्ति कार्यक्रम में शामिल व्यक्तियों और कुछ अन्य श्रेणियों को छूट देने का प्रावधान रखा गया है।
सबसे बड़ा विवाद गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की नई परिभाषा को लेकर है। पहले कानून में विकलांगता गंभीर बीमारी या नशे की लत से जूझ रहे लोगों को छूट देने की व्यवस्था थी लेकिन नए नियमों में कहा गया है कि बीमारी इतनी गंभीर होनी चाहिए जिससे व्यक्ति की काम करने पढ़ाई करने या सामुदायिक सेवा करने की क्षमता काफी हद तक प्रभावित हो। तभी उसे छूट मिल सकेगी।
मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का कहना है कि इस नई शर्त के कारण कैंसर मरीज दिव्यांग मानसिक रोगी और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज और लंबी कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। इससे कई ऐसे लोग भी स्वास्थ्य बीमा से वंचित हो सकते हैं जो वास्तव में इसके हकदार हैं।
राज्यों ने यह भी आरोप लगाया है कि लंबे समय तक चर्चा के बाद अचानक नियम बदल दिए गए जिससे प्रशासनिक स्तर पर नई व्यवस्था लागू करना मुश्किल हो गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि गंभीर बीमारी का प्रमाण किस प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया जाएगा।
दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य सरकारी योजनाओं के दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि लाभ वास्तव में पात्र और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। हालांकि मुकदमा दायर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग और सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने नए नियमों पर चिंता जताते हुए कहा कि कैंसर दिव्यांगता मानसिक बीमारी या नशे की लत से उबर रहे लोगों को इलाज पाने के लिए अनावश्यक कागजी कार्रवाई में नहीं उलझाया जाना चाहिए। उनके अनुसार इन बदलावों से हजारों जरूरतमंद लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।