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शाहपुर कंडी बांध लगभग तैयार, रावी का पानी अब भारत की जमीन करेगा हरी-भरी, पाकिस्तान तरसेगा


नई दिल्‍ली। दशकों से बहते पानी की सियासत अब बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर की सीमा पर बन रहे शाहपुर कंडी बांध का काम अंतिम चरण में है। इस परियोजना के शुरू होते ही रावी नदी का वह पानी, जो अब तक पाकिस्तान जाता था, अब जम्मू-कश्मीर और पंजाब की सूखी जमीन को सींचने में इस्तेमाल होगा। जम्मू-कश्मीर के मंत्री जावेद अहमद राणा ने बताया कि बांध का काम 31 मार्च तक पूरा होने की उम्मीद है। यह विशेष रूप से कठुआ और सांबा जिलों के लिए जीवनरेखा साबित होगा।

सिंचाई और आर्थिक लाभ
बांध से जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों की 32,173 हेक्टेयर से अधिक भूमि और पंजाब की लगभग 5,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी। केंद्र सरकार ने इसके लिए 485.38 करोड़ रुपये की सहायता राशि मंजूर की है। बांध केवल पानी संचयन ही नहीं करेगा, बल्कि बिजली उत्पादन और कृषि विकास को भी नई दिशा देगा।

सिंधु जल संधि और भारत की नई नीति
1960 की सिंधु जल संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलज जैसी पूर्वी नदियों पर भारत का पूर्ण अधिकार है। तकनीकी बाधाओं और बांध न होने के कारण अब तक रावी का काफी पानी पाकिस्तान चला जाता था।

जम्मू-कश्मीर के विधायक डॉ. रामेश्वर सिंह ने कहा कि बांध के काम पूरा होने के बाद, पानी अब पाकिस्तान नहीं जाएगा और कठुआ क्षेत्र की विशाल भूमि को हरा-भरा करेगा।

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के प्रति कड़ा रुख अपनाया और डेटा शेयर करना बंद कर दिया है। अब भारत पश्चिमी नदियों के पानी के अधिकतम उपयोग की संभावनाएं तलाश रहा है।

दशकों का इंतजार
2001: परियोजना को पहली बार मंजूरी मिली, लेकिन अंतर्राज्यीय विवादों के कारण काम रुका।

2018: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल से पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बीच समझौता हुआ।

वर्तमान: परियोजना मिशन मोड में है ताकि पाकिस्तान को जाने वाला पानी रोका जा सके।

अधिकारियों का मानना है कि यह कदम न केवल कृषि के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत के रणनीतिक दबाव का भी हिस्सा है। पाकिस्तान पहले से ही जल संकट से जूझ रहा है। भारत द्वारा अपने हिस्से का पूरा पानी इस्तेमाल करने से पाकिस्तान के निचले इलाकों में पानी की भारी कमी होने की संभावना है।

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