परमहंसी गंगा आश्रम के लिए रवाना होने से पहले जबलपुर में पत्रकारों से चर्चा करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि जब किसी कार्य की जिम्मेदारी उन लोगों को सौंप दी जाती है, जिन्हें उस विषय का पर्याप्त ज्ञान और अनुभव नहीं होता, तब इस प्रकार की घटनाएं सामने आती हैं। उनका कहना था कि मंदिरों की देखरेख करने वाले कई अधिकारी और कर्मचारी मंदिरों को धार्मिक आस्था के केंद्र के बजाय पर्यटन स्थल के रूप में देखते हैं, जबकि करोड़ों श्रद्धालु वहां दर्शन, साधना और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति के लिए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्मावलंबियों के अधिकांश मंदिर शासन के अधीन हैं और इनकी देखरेख करने वाले अधिकारियों का लगातार तबादला होता रहता है। ऐसे में उन्हें न तो धार्मिक परंपराओं की गहरी समझ होती है और न ही शास्त्रों, विधि-विधान तथा पाप-पुण्य की अवधारणा का पर्याप्त ज्ञान होता है। यही कारण है कि मंदिरों के संचालन और संरक्षण में अपेक्षित संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती।
अयोध्या में सामने आई कथित चोरी की घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए शंकराचार्य ने कहा कि यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि लोग अपनी मेहनत और विश्वास की कमाई मंदिरों में अर्पित करते हैं, इसलिए उस धन का उपयोग पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। यदि किसी ने इस प्रकार का अपराध किया है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी धार्मिक स्थल पर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि मंदिरों की आय का उपयोग गौशालाओं, पाठशालाओं, यज्ञशालाओं, धर्मशालाओं और औषधालयों जैसे जनकल्याणकारी कार्यों में होना चाहिए। इसके साथ ही मंदिरों के आसपास के क्षेत्रों का भी समुचित विकास किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं।
उन्होंने कहा कि देश की स्वतंत्रता के बाद यह अपेक्षा थी कि भारतीय संस्कृति, शिक्षा पद्धति और परंपराओं को अधिक मजबूती मिलेगी, लेकिन कई क्षेत्रों में यह लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया। शंकराचार्य ने जोर देकर कहा कि धार्मिक स्थलों का संचालन ऐसे लोगों को सौंपा जाना चाहिए जिन्हें धर्म, परंपरा और आध्यात्मिक मूल्यों की समझ हो। उन्होंने सरकारों से भी आग्रह किया कि वे मंदिरों की संपत्तियों और धरोहरों के संरक्षण की जिम्मेदारी निभाएं, लेकिन धार्मिक संस्थानों के धन और संचालन में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचें।