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अमेरिका-चीन टकराव तेज: ईरानी तेल पर 5 चीनी कंपनियों पर बैन, बीजिंग का पलटवार कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंध मानने से रोका

नई दिल्ली। वैश्विक भू-राजनीति में अमेरिका और चीन के बीच तनाव एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान के तेल कारोबार से जुड़े आरोपों के तहत अमेरिका द्वारा पांच चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद बीजिंग ने कड़ा रुख अपनाते हुए अपनी कंपनियों को इन प्रतिबंधों का पालन न करने का निर्देश दिया है। इसे दोनों महाशक्तियों के बीच बढ़ते टकराव का बड़ा संकेत माना जा रहा है। अमेरिका के इस कदम के जवाब में चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने पहली बार अपने ‘ब्लॉकिंग स्टैच्यूट’ का इस्तेमाल किया है। यह एक ऐसा कानूनी प्रावधान है, जिसके जरिए चीन विदेशी प्रतिबंधों को अपने देश में लागू होने से रोकता है। इस आदेश के तहत चीनी कंपनियों को साफ कहा गया है कि वे अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज करें और अपने व्यापारिक हितों को जारी रखें। दरअसल, अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के तहत Office of Foreign Assets Control (OFAC) ने जिन कंपनियों पर कार्रवाई की है, उन्हें “स्पेशली डिज़िग्नेटेड नेशनल्स” (SDN) सूची में शामिल किया गया है। इस सूची में आने के बाद इन कंपनियों की अमेरिकी संपत्तियां फ्रीज की जा सकती हैं और वैश्विक वित्तीय लेन-देन पर भी असर पड़ता है। जिन प्रमुख कंपनियों को इस विवाद के केंद्र में माना जा रहा है, उनमें हेंगली पेट्रोकेमिकल (डालियान), शेडोंग लुकिंग, जिनचेंग पेट्रोकेमिकल, हेबेई शिनहाई और शेंगशिंग केमिकल शामिल हैं। अमेरिका का आरोप है कि ये कंपनियां ईरान से कच्चा तेल खरीदकर उसके ऊर्जा क्षेत्र को आर्थिक समर्थन दे रही हैं। चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अमेरिकी कदम को ‘एकतरफा प्रतिबंध’ बताया है। वाणिज्य मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और वैश्विक व्यवस्था के खिलाफ है। चीन का यह भी कहना है कि संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना लगाए गए प्रतिबंध वैध नहीं माने जा सकते। इस पूरे विवाद में शेडोंग प्रांत की तथाकथित ‘टीपॉट रिफाइनरियां’ भी चर्चा में हैं। ये छोटी लेकिन प्रभावशाली स्वतंत्र रिफाइनरियां हैं, जो वैश्विक तेल बाजार में अहम भूमिका निभाती हैं। अमेरिका का मानना है कि ये इकाइयां ईरानी तेल के आयात और प्रोसेसिंग में बड़ी भूमिका निभा रही हैं, जिससे प्रतिबंधों का असर कमजोर पड़ रहा है। गौरतलब है कि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लंबे समय से लागू हैं और इनका उद्देश्य उसके तेल निर्यात को सीमित करना है। लेकिन चीन जैसे बड़े खरीदार देशों की भूमिका इस रणनीति को चुनौती देती रही है। ऐसे में यह ताजा टकराव सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन द्वारा ‘ब्लॉकिंग स्टैच्यूट’ का इस्तेमाल यह संकेत देता है कि वह अब अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के बजाय कानूनी और रणनीतिक तरीके से जवाब देने को तैयार है। आने वाले समय में यह विवाद वैश्विक बाजारों और तेल कीमतों पर भी असर डाल सकता है।

मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच अमेरिका की दुविधा: क्या चीन पर से हट रहा है फोकस?

नई दिल्ली । अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर वाशिंगटन में एक नई बहस तेज हो गई है जहां सांसदों ने मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच चीन पर से ध्यान हटने की आशंका जताई है पेंटागन के बजट से जुड़ी एक अहम सुनवाई के दौरान कई सांसदों ने चिंता व्यक्त की कि मौजूदा हालात अमेरिका की इंडो पैसिफिक रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के अध्यक्ष माइक डी रॉजर्स ने कहा कि अमेरिका इस समय अभूतपूर्व वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है जिसमें चीन सबसे बड़ा दीर्घकालिक खतरा बनकर उभर रहा है उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन अब केवल अपनी सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि वह प्रशांत महासागर के गहरे हिस्सों तक अपनी सैन्य ताकत का विस्तार कर रहा है इसके लिए वह नौसैनिक जहाजों मिसाइल सिस्टम और अंतरिक्ष क्षमताओं में तेजी से निवेश कर रहा है सुनवाई के दौरान सांसदों ने इस बात पर भी जोर दिया कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका की बढ़ती सैन्य तैनाती विशेष रूप से कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स की मौजूदगी से संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है इसका सीधा असर इंडो पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की प्रतिक्रिया क्षमता पर पड़ सकता है जहां चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक चुनौती माना जाता है कई सांसदों ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका का ध्यान इस महत्वपूर्ण क्षेत्र से हटता है तो चीन को अपनी स्थिति और मजबूत करने का मौका मिल सकता है उन्होंने कहा कि यह केवल सैन्य नहीं बल्कि भू राजनीतिक संतुलन का भी मामला है जहां थोड़ी सी ढील भी दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष डैन केन ने इन चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सैन्य तैनाती हमेशा रणनीतिक संतुलन का हिस्सा होती है उन्होंने बताया कि हर निर्णय में जोखिम और विकल्पों का आकलन किया जाता है और उसी के आधार पर प्राथमिकताएं तय की जाती हैं उनका कहना था कि अमेरिका को एक साथ कई क्षेत्रों में अपनी प्रतिबद्धताओं को संतुलित करना पड़ता है वहीं रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने सरकार की रणनीति का बचाव करते हुए कहा कि अमेरिकी सेना दुनिया भर में एक साथ कई खतरों से निपटने में सक्षम है उन्होंने भरोसा जताया कि मौजूदा रणनीति तत्काल चुनौतियों से निपटने के साथ साथ दीर्घकालिक सुरक्षा को भी सुनिश्चित करती है हालांकि आलोचकों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में लंबे समय तक सैन्य संलिप्तता अमेरिका की क्षमताओं पर दबाव डाल सकती है और इससे विरोधी देशों को गलत संदेश जा सकता है उन्होंने यह भी कहा कि यदि इंडो पैसिफिक क्षेत्र से ध्यान हटता है तो चीन को अपनी सैन्य और आर्थिक पकड़ मजबूत करने का अतिरिक्त अवसर मिल सकता है गौरतलब है कि इंडो पैसिफिक क्षेत्र अमेरिका की विदेश और रक्षा नीति का केंद्र बना हुआ है जहां वह अपने सहयोगी देशों के साथ साझेदारी को मजबूत करने में जुटा है ऐसे में यह बहस इस बात को दर्शाती है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है