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नूर खान एयरबेस पर ईरानी C-130 विमान विवाद: सैटेलाइट तस्वीरों ने पाकिस्तान की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली। पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें ईरानी C-130 विमान की मौजूदगी और सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर लगाए गए दावों ने नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स और सैटेलाइट इमेजरी के बाद पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठे हैं, जबकि इस्लामाबाद ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक सीबीएस न्यूज ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया था कि अमेरिका-ईरान तनाव और संघर्ष विराम के बाद कुछ ईरानी विमान पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर देखे गए। इनमें C-130 जैसे सैन्य परिवहन विमान का भी जिक्र किया गया, जिन्हें खुफिया और लॉजिस्टिक ऑपरेशन में इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, इन दावों की किसी स्वतंत्र एजेंसी ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। इसी बीच कुछ सैटेलाइट इमेजरी रिपोर्ट्स में एयरबेस पर एक C-130 जैसे विमान की तस्वीर सामने आने का दावा किया गया, जिसके बाद मामला और संवेदनशील हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार केवल तस्वीरों के आधार पर किसी विमान की राष्ट्रीयता या उद्देश्य तय करना संभव नहीं होता, इसलिए यह दावा अभी भी विवादित है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन सभी रिपोर्टों को “भ्रामक और तथ्यों से परे” बताते हुए कहा है कि नूर खान एयरबेस पर किसी भी विदेशी सैन्य विमान को छिपाकर रखने का कोई सवाल ही नहीं उठता। पाकिस्तान का कहना है कि जिन विमानों का उल्लेख किया जा रहा है, वे केवल कूटनीतिक और अस्थायी यात्राओं से जुड़े थे। इस पूरे विवाद के बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ गई है और पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं, हालांकि अभी तक कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है जो इन आरोपों की पुष्टि करता हो।

होर्मुज तनाव के बीच बड़ा भू-राजनीतिक टकराव: सऊदी ने अमेरिका को एयरस्पेस देने से किया इनकार, ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ पर लगा ब्रेक

नई दिल्ली। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और उसके खाड़ी सहयोगियों के रिश्तों में खटास की खबर सामने आई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब ने अमेरिका को अपने एयरस्पेस और सैन्य एयरबेस इस्तेमाल करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद अमेरिका को अपना “प्रोजेक्ट फ्रीडम” अभियान अचानक रोकना पड़ा। 4 मई को शुरू हुआ था अमेरिकी ऑपरेशनअमेरिका ने 4 मई को होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही सुरक्षित करने के लिए “प्रोजेक्ट फ्रीडम” लॉन्च किया था। लेकिन महज एक दिन के भीतर ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे रोकने का आदेश दे दिया।ट्रम्प ने दावा किया था कि पाकिस्तान के अनुरोध पर यह ऑपरेशन रोका गया, लेकिन अब सामने आई रिपोर्ट्स में सऊदी अरब की नाराजगी को बड़ा कारण बताया जा रहा है। सऊदी के इनकार से बिगड़ा समीकरणएक न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी नेतृत्व ने इस मिशन में शामिल अमेरिकी विमानों को अपने एयरस्पेस और सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की मंजूरी नहीं दी। इससे पूरा ऑपरेशन प्रभावित हुआ। सूत्रों का कहना है कि ट्रम्प द्वारा बिना पूर्ण कूटनीतिक तैयारी के सोशल मीडिया पर इस मिशन की घोषणा करने से खाड़ी देशों में असहजता पैदा हो गई। इसके बाद सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बातचीत भी हुई, लेकिन कोई सहमति नहीं बन पाई। सीमित सफलता के बाद ऑपरेशन बंदरिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका इस अभियान के तहत सिर्फ दो दिनों में तीन जहाजों को ही सुरक्षित पार करा सका, जिसके बाद ऑपरेशन रोकना पड़ा। ईरान-अमेरिका वार्ता और तनावइसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशें भी जारी हैं। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि दोनों देशों के बीच 14 सूत्रीय समझौते पर बातचीत आगे बढ़ी है, हालांकि अभी कोई अंतिम सहमति नहीं बनी है। अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में होर्मुज मार्ग खोलने का प्रस्ताव भी रखा है, जिसका ईरान ने विरोध किया है। क्षेत्रीय राजनीति में नई हलचलचीन और ईरान के बीच बीजिंग में उच्च स्तरीय बैठक हुई चीन ने युद्ध रोकने की अपील करते हुए ईरान को समर्थन का भरोसा दिया अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश में जुटे हैं ट्रम्प का दावा और सख्त रुखराष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिकी कार्रवाई से ईरान की सैन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो और बड़े हमले किए जा सकते हैं। होर्मुज में हमला, स्थिति और तनावपूर्णफ्रांसीसी शिपिंग कंपनी CMA CGM ने बताया कि उनके एक कार्गो जहाज पर मिसाइल या ड्रोन हमला हुआ, जिसमें कई क्रू सदस्य घायल हुए हैं। इससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है।होर्मुज स्ट्रेट में चल रहा यह विवाद अब सिर्फ सैन्य या कूटनीतिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि अमेरिका, सऊदी अरब, ईरान और चीन जैसे बड़े खिलाड़ियों के बीच रणनीतिक टकराव में बदलता जा रहा है। 

ईरान का ‘हार्ट अटैक’ हथियार! हूट टॉरपीडो से अमेरिका को चेतावनी, कितना खतरनाक है ये सीक्रेट वेपन?

नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते टकराव के बीच ईरान ने अपने एक कथित “खौफनाक हथियार” का संकेत देकर वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों का ध्यान खींच लिया है। ईरानी नौसेना के कमांडर Shahram Irani ने दावा किया है कि जल्द ही दुश्मन सेनाओं के खिलाफ ऐसा हथियार इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे उनके नेताओं तक को “हार्ट अटैक” जैसा डर महसूस हो सकता है। इस बयान के बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि ईरान आखिर किस हथियार की बात कर रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह इशारा संभवतः ईरान के ‘हूट’ (Hoot) सुपर-कैविटेटिंग टॉरपीडो की ओर हो सकता है एक ऐसा अंडरवाटर हथियार जो अपनी रफ्तार और मारक क्षमता के लिए जाना जाता है। ‘हूट’ टॉरपीडो को लेकर कहा जाता है कि यह पारंपरिक टॉरपीडो से कई गुना तेज है। जहां सामान्य टॉरपीडो 60 से 100 किमी/घंटा की गति से चलते हैं, वहीं ईरान दावा करता है कि उसका हूट 300 किमी/घंटा से ज्यादा की रफ्तार पकड़ सकता है। इसकी खासियत है “सुपर-कैविटेशन” तकनीक, जिसमें टॉरपीडो अपने चारों ओर गैस का बुलबुला बनाता है, जिससे पानी का प्रतिरोध बेहद कम हो जाता है और यह तेज रफ्तार से लक्ष्य की ओर बढ़ता है। यह तकनीक सबसे पहले Russia ने अपने VA-111 Shkval टॉरपीडो में विकसित की थी। ईरान ने 2006 में हूट का परीक्षण किया था, लेकिन इसके बाद से इसकी क्षमताओं को लेकर ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। यही कारण है कि इसे “सीक्रेट वेपन” के तौर पर पेश किया जाता है। हालांकि, इस हथियार की ताकत जितनी चर्चा में है, उसकी सीमाएं भी उतनी ही अहम हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी तेज गति के कारण इसे नियंत्रित करना मुश्किल होता है। गैस के बुलबुले और शोर के कारण यह आसानी से सोनार सिस्टम में भी पकड़ा जा सकता है। यानी यह हथियार बेहद तेज जरूर है, लेकिन पूरी तरह अचूक नहीं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह अमेरिकी युद्धपोतों या एयरक्राफ्ट कैरियर को नुकसान पहुंचा सकता है? United States के एयरक्राफ्ट कैरियर अत्याधुनिक सुरक्षा कवच, मल्टी-लेयर डिफेंस और हाई टेक रडार सिस्टम से लैस होते हैं। ऐसे में किसी एक टॉरपीडो से उन्हें डुबाना बेहद मुश्किल माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान इस हथियार का इस्तेमाल करता भी है, तो उसका सबसे संभावित क्षेत्र Strait of Hormuz हो सकता है एक संकरा समुद्री मार्ग जहां जहाजों की आवाजाही सीमित रहती है। हालांकि, अमेरिकी नौसेना आमतौर पर इस क्षेत्र से सुरक्षित दूरी बनाए रखती है। ईरान का “हार्ट अटैक हथियार” फिलहाल ज्यादा एक मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक संदेश नजर आता है, न कि तुरंत तबाही मचाने वाला गेम-चेंजर।फिर भी, मिडिल ईस्ट में बढ़ती बयानबाजी और सैन्य तैयारियों के बीच यह साफ है कि आने वाले समय में समुद्री युद्ध तकनीक और भी खतरनाक और जटिल हो सकती है।

होर्मुज में हाई अलर्ट: भारत का LNG जहाज दरवाजे पर, अमेरिका–ईरान तनातनी से वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर खतरा

नई दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसे दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन कहा जाता है, एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। इसी बीच भारत से रवाना LNG जहाज Umm Al Ashtan इस संवेदनशील समुद्री मार्ग के करीब पहुंच चुका है। यह जहाज गुजरात के दाहेज पोर्ट से निकला है और यूएई के Das Island की ओर बढ़ रहा है, जहां से इसे तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) लोड करनी है। हालात इसलिए ज्यादा गंभीर हैं क्योंकि यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की आपूर्ति होती है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे वैश्विक बाजारों और ऊर्जा कीमतों को प्रभावित कर सकता है। ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने अमेरिका पर निशाना साधते हुए कहा है कि संभावित नौसैनिक नाकेबंदी दरअसल सैन्य दबाव बढ़ाने की रणनीति है। उन्होंने साफ किया कि ईरान अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा और किसी भी आक्रामक कदम का जवाब देने के लिए तैयार है। दूसरी ओर, Donald Trump ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए दावा किया है कि हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने ईरान की रक्षा क्षमता को काफी कमजोर कर दिया है। ट्रंप के अनुसार, ईरान की नौसेना और वायुसेना को भारी नुकसान पहुंचा है और उसका मिसाइल उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान अब बातचीत के लिए तैयार दिख रहा है। इस तनावपूर्ण माहौल में Umm Al Ashtan का होर्मुज के पास पहुंचना एक अहम संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दर्शाता है कि यूएई के दास द्वीप से LNG उत्पादन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। यह द्वीप हर साल लगभग 6 मिलियन टन LNG उत्पादन करने की क्षमता रखता है, जो वैश्विक आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं कही जा सकती। Qatar जैसे बड़े LNG निर्यातक देशों के जहाज अभी भी सावधानी बरत रहे हैं। कई कार्गो शिप्स या तो इस क्षेत्र में रुके हुए हैं या वैकल्पिक रास्तों की तलाश कर रहे हैं। इसी बीच कुछ राहत भरी खबरें भी सामने आई हैं। हाल के दिनों में चीन और जापान जाने वाले कुछ जहाज इस मार्ग से सफलतापूर्वक गुजर चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन जोखिम बरकरार है।होर्मुज में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव शुरू हो चुका है और अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो यह महंगाई और सप्लाई चेन पर बड़ा असर डाल सकता है। भारत का LNG जहाज ऐसे समय इस हाई-रिस्क जोन में प्रवेश करने जा रहा है, जब मिडिल ईस्ट बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है।

हाइपरसोनिक वार की तैयारी? ईरान पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ विकल्प पर अमेरिका, मिडिल ईस्ट में बढ़ी टेंशन

नई दिल्ली। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (United States Central Command) ने व्हाइट हाउस में हुई एक अहम बैठक में राष्ट्रपति Donald Trump को ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई के विकल्पों की जानकारी दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कमांडर Brad Cooper ने एक “छोटा लेकिन बेहद शक्तिशाली हमला” करने की रणनीति प्रस्तुत की, जिसमें ईरान की बची हुई सैन्य क्षमता, नेतृत्व और महत्वपूर्ण ढांचों को निशाना बनाया जा सकता है। इस प्रस्ताव में अत्याधुनिक हथियारों के इस्तेमाल पर भी विचार किया जा रहा है, जिनमें ‘डार्क ईगल’ हाइपरसोनिक मिसाइल शामिल है। यह मिसाइल करीब 3,200 किलोमीटर तक सटीक हमला करने में सक्षम मानी जाती है और ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चरों को टारगेट कर सकती है। इसके साथ ही अमेरिकी वायुसेना ने B-1B Lancer जैसे भारी बमवर्षक विमानों की तैनाती भी बढ़ा दी है, जो बड़ी मात्रा में हथियार और उन्नत मिसाइल सिस्टम ले जाने में सक्षम हैं। बढ़ते तनाव के संकेत:बीते 24 घंटों में घटनाक्रम तेजी से बदला है। ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सख्त संदेश देते हुए कहा कि “तूफान आगे बढ़ रहा है, इसे कोई नहीं रोक पाएगा।” दूसरी ओर, ईरान की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई है। Mojtaba Khamenei ने चेतावनी दी कि अगर हमला हुआ तो जवाबी कार्रवाई की जाएगी और हमलावरों को “समंदर में डुबो दिया जाएगा।” इसी तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया। कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, जो पिछले चार वर्षों में सबसे ऊंचा स्तर है, हालांकि बाद में इसमें कुछ गिरावट आई। जमीनी हालात और क्षेत्रीय असर:दूसरी ओर, लेबनान में भी हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं। दक्षिणी इलाकों में हुए हमलों में कई लोगों की मौत और दर्जनों के घायल होने की खबर है। यह घटनाएं ऐसे समय में सामने आई हैं जब संघर्ष विराम लागू होने के बावजूद Hezbollah और इजरायल के बीच तनाव बना हुआ है। ट्रम्प का बदला हुआ सुर:हालांकि, इन सभी तैयारियों के बीच ट्रम्प ने यह भी कहा है कि वे दोबारा हमले शुरू करने के पक्ष में नहीं हैं और फिलहाल सीजफायर तोड़ने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि ईरान समझौते के लिए तैयार नजर आ रहा है।एक तरफ सैन्य तैयारियां और दूसरी ओर कूटनीतिक बयान—इन दोनों के बीच मिडिल ईस्ट की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है।

अमेरिका ईरान तनाव के बीच ट्रंप का बड़ा दावा समझौते की उम्मीद लेकिन सैन्य विकल्प तैयार

नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump का ताजा बयान वैश्विक राजनीति में हलचल पैदा कर रहा है। उन्होंने दावा किया है कि अमेरिका ईरान के साथ गहरी और गंभीर बातचीत में जुटा हुआ है लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो सैन्य कार्रवाई का रास्ता भी खुला रखा गया है। इस दोहरे रुख ने संकेत दिया है कि आने वाले दिन मध्य पूर्व के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं। इजरायली मीडिया से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार ईरान के साथ संघर्ष विराम की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है और इसके लिए कई चैनलों के जरिए संपर्क बनाए हुए हैं। उन्होंने बताया कि इस कूटनीतिक पहल की अगुवाई उनके करीबी सहयोगी स्टीव विटकॉफ और Jared Kushner कर रहे हैं जो अलग अलग देशों के माध्यम से बातचीत को आगे बढ़ा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार बातचीत दो स्तरों पर चल रही है। एक तरफ पाकिस्तान मिस्र और तुर्की जैसे देश मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और दोनों पक्षों के बीच अप्रत्यक्ष संवाद कायम कर रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिकी प्रतिनिधि सीधे ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi के संपर्क में हैं। इन प्रयासों का मकसद किसी ऐसे समझौते तक पहुंचना है जिससे तनाव कम हो सके और टकराव टाला जा सके। हालांकि अब तक की बातचीत से कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है लेकिन ट्रंप ने उम्मीद जताई है कि तय समय सीमा से पहले समझौता हो सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि मंगलवार तक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इसी के साथ उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर ईरान ने अमेरिका की शर्तें नहीं मानी तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ट्रंप का बयान खास तौर पर उस समय आया है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके बंद होने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ट्रंप ने ईरान से इसे तुरंत खोलने की मांग दोहराई है। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर ईरान तय समय सीमा तक इस मुद्दे पर सहमति नहीं देता तो अमेरिका उसके पावर प्लांट्स को निशाना बना सकता है। यह बयान इस बात का संकेत है कि अमेरिका केवल कूटनीतिक दबाव तक सीमित नहीं रहना चाहता बल्कि जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई के लिए भी तैयार है। कुल मिलाकर स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है जहां एक ओर बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश हो रही है वहीं दूसरी ओर युद्ध जैसे हालात बनने का खतरा भी बना हुआ है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों देश बातचीत के जरिए समाधान निकाल पाएंगे या फिर यह तनाव किसी बड़े टकराव में बदल जाएगा।

ट्रंप ने ईरानी तेल और खार्ग द्वीप पर कब्जे की दी धमकी, यूरेनियम ऑपरेशन के दिए संकेत

नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर फिर से गंभीर बयान दिया है। खार्ग द्वीप को लेकर उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका वहां कब्जा कर सकता है और ईरान का तेल हासिल करना उनकी प्राथमिकता में शामिल है। फाइनेंशियल टाइम्स के साथ इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, “सच कहूं तो, मेरी सबसे पसंदीदा चीज़ ईरान का तेल लेना है।” कूटनीति और बातचीतट्रंप के बयान ऐसे समय में आए हैं जब इस क्षेत्र में तनाव बढ़ा हुआ है और ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत भी जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बताया कि ईरान के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बातचीत दोनों चल रही हैं, जिसमें पाकिस्तानी दूतों के माध्यम से संवाद भी शामिल है। ट्रंप ने कहा कि ये वार्ताएं अपेक्षाकृत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही हैं। यूरेनियम ऑपरेशन की योजनाअमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप ईरान से लगभग 1,000 पाउंड यूरेनियम निकालने के लिए एक सैन्य अभियान पर विचार कर रहे हैं। यह एक जटिल और जोखिम भरा मिशन होगा, जिसमें अमेरिकी सेना को देश के अंदर कई दिन या उससे अधिक समय तक रहना पड़ सकता है।अधिकारियों ने यह भी बताया कि ट्रंप ने अभी तक इस अभियान के आदेश पर अंतिम निर्णय नहीं लिया है, लेकिन आम तौर पर वे इसे सकारात्मक रूप से देख रहे हैं ताकि ईरान को परमाणु हथियार निर्माण से रोका जा सके। होर्मुज स्ट्रेट में तेल टैंकरट्रंप ने कहा कि ईरान ने पाकिस्तान के झंडे वाले तेल टैंकरों की संख्या बढ़ाकर 20 कर दी है और इन्हें होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति दी जाएगी। इस व्यवस्था को ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाक़ेर ग़ालिबफ़ ने मंजूरी दी है। ट्रंप ने कहा, “कल सुबह से हमें होर्मुज़ स्ट्रेट के रास्ते तेल से भरे 20 बड़े जहाज़ मिलेंगे।” खार्ग द्वीप पर सैन्य तैयारीट्रंप ने कहा कि ईरान की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है और अमेरिका इसे आसानी से अपने कब्ज़े में ले सकता है। पेंटागन ने पहले ही 10,000 प्रशिक्षित सैनिकों की तैनाती का आदेश दे दिया है। शुक्रवार को लगभग 3,500 सैनिक इस क्षेत्र में पहुंचे और 2,200 अन्य मरीन रास्ते में हैं। 82वीं एयरबोर्न डिवीज़न के हजारों सैनिक भी तैनात किए जा रहे हैं। सैन्य विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि खार्ग द्वीप पर कोई भी हमला बेहद जोखिम भरा होगा। इससे अमेरिकी सैनिकों के हताहत होने का खतरा बढ़ सकता है और संघर्ष लंबा खिंच सकता है। साथ ही, यह दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक को भी खतरे में डाल सकता है।

ईरान ने बढ़ाई तैयारी, 10 लाख से ज्यादा लड़ाके जुटाए अमेरिका से संभावित संघर्ष के लिए

नई दिल्ली। ईरान-इजरायल युद्ध के बीच जहां एक तरफ अमेरिका ईरान में अपनी सेना उतारने की तैयारी में है, वहीं अब ईरान भी अमेरिकी का इस कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए अपनी तैयारियों को आखिरी रूप देता दिख रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने अमेरिका को करारा जवाब देने के लिए अपने 10 लाख फाइटर्स को तैयार करके रखा है. इस समय अमेरिकी नौसेना के दो मरीन एसॉल्ट जहाज USS ट्रिपोली और USS बॉक्सर पूरी गति से ईरान की ओर बढ़ रहे हैं. अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों सैनिक इस समय ईरान की ओर जा रहे हैं. अमेरिका के पहले से ही खाड़ी क्षेत्र में लगभग 50,000 सैनिक तैनात हैं. सवाल है कि अगर ट्रंप ने सेना उतारने का आदेश दे दिया तो अमेरिकी सेना कैसे इस ऑपरेशन को अंजाम दे सकती है. खबरों के मुताबिक, पूरे ईरान में भर्ती केंद्रों पर युवा वॉलंटियर बड़ी संख्या में उमड़ रहे हैं. ऐसा माना जा रहा है कि भर्ती केंद्रों पर युवाओं की ये भीड़ अमेरिका के साथ संभावित ज़मीनी युद्ध में शामिल होने को लेकर है. कहा जा रहा है कि ईरान 10 लाख से ज़्यादा ज़मीनी लड़ाकों को जुटा रहा है. तेहरान की तस्नीम न्यूज़ एजेंसी ने एक सैन्य सूत्र के हवाले से बताया कि इन बलों को संगठित कर लिया गया है और वे युद्ध के लिए तैयार हैं. यह स्थिति बासिज, इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) और सेना द्वारा संचालित केंद्रों पर नागरिकों की भारी भीड़ उमड़ने के बाद सामने आई है. एजेंसी का कहना है कि ईरानी ज़मीनी लड़ाकों में ईरानी धरती पर अमेरिकियों के लिए “ऐतिहासिक नरक” बनाने का ज़बरदस्त उत्साह उमड़ पड़ा है. ये घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आए हैं जब अमेरिकी सैन्य गतिविधियां जारी हैं; संभावना है कि 82वीं एयरबोर्न डिवीज़न के चुनिंदा सैनिक कुछ ही दिनों में मध्य-पूर्व पहुंच जाएंगे, जहां वे पहले से मौजूद हज़ारों मरीन सैनिकों के साथ शामिल हो जाएंगे. डोनाल्ड ट्रंप के इस दावे के बावजूद कि बातचीत चल रही है, तेहरान ने वाशिंगटन के किसी भी कूटनीतिक प्रस्ताव को सार्वजनिक रूप से ठुकरा दिया है और चेतावनी दी है कि यदि अमेरिकी सैनिक ईरानी धरती पर उतरे, तो इसका गंभीर परिणाम होंगे. खास बात ये है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले संकेत दिया था कि ईरान ने सद्भावना के तौर पर एक “रहस्यमयी तोहफ़ा” भेजा था, हालांकि उस समय उन्होंने इसके बारे में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी थी. उन्होंने इसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण और भारी कीमत वाला तोहफ़ा बताया था.ट्रंप ने कहा था कि आपको यह दिखाने के लिए कि हम असली हैं, ठोस हैं और हम सचमुच मौजूद हैं, हम आपको तेल से भरी आठ नावें देंगे, आठ नावें, तेल से भरी आठ बड़ी नावें. मुझे लगता है कि वे सही थे, और वे सचमुच असली थे; और मुझे लगता है कि उन पर पाकिस्तान का झंडा लगा हुआ था.आखिर में, वे 10 नावें निकलीं.

ईरान का दावा या सच्चाई? अमेरिका ने F-15 को मार गिराने की खबर को बताया फर.

नई दिल्ली:ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच एक नया विवाद सामने आया जब ईरानी मीडिया ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा ने एक अमेरिकी F-15 लड़ाकू विमान को मार गिराया है, यह रिपोर्ट सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई, लेकिन अमेरिका ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे झूठ और अफवाह करार दिया अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्पष्ट किया कि ईरान की ओर से फैलाए जा रहे दावे पूरी तरह निराधार हैं, उन्होंने कहा कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के दौरान अमेरिकी सेना ने हजारों उड़ानें भरी हैं और इस दौरान किसी भी अमेरिकी F-15 विमान को नुकसान नहीं पहुंचा है, यह बयान ईरान के दावे के सीधे जवाब के रूप में आया ईरानी मीडिया में छपी रिपोर्ट में कहा गया था कि दक्षिणी तट के पास एक संदिग्ध या अनधिकृत विमान को ईरानी एयर डिफेंस ने निशाना बनाया, और दावा किया गया कि यह विमान अमेरिकी F-15 था, हालांकि इस दावे को किसी स्वतंत्र स्रोत या अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है अमेरिका ने अपने बयान में न केवल इस दावे को खारिज किया बल्कि यह भी संकेत दिया कि ईरान की ओर से इस तरह की जानकारी फैलाना एक प्रोपेगेंडा का हिस्सा हो सकता है, सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे दावे अक्सर रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने के लिए किए जाते हैं, खासकर तब जब क्षेत्र में तनाव चरम पर हो वहीं, F-15 जैसे फाइटर जेट दुनिया के सबसे उन्नत और शक्तिशाली लड़ाकू विमानों में से एक माने जाते हैं, जिन्हें अमेरिका की वायु शक्ति का अहम हिस्सा माना जाता है, ऐसे में किसी भी विमान को गिराने का दावा बहुत गंभीर माना जाता है और इसकी पुष्टि बिना ठोस सबूत के नहीं की जा सकती इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित किया कि पश्चिम एशिया में स्थिति कितनी संवेदनशील बनी हुई है और छोटी सी खबर भी बड़े अंतरराष्ट्रीय विवाद का रूप ले सकती है, फिलहाल अमेरिका ने अपने आधिकारिक बयान के जरिए स्थिति को स्पष्ट कर दिया है और ईरान के दावे को पूरी तरह गलत बताया है  यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि सूचना युद्ध और वास्तविक सैन्य कार्रवाई के बीच अंतर समझना कितना जरूरी है, और जब तक आधिकारिक और स्वतंत्र पुष्टि न हो, तब तक ऐसे दावों को सावधानी से ही देखा जाना चाहिए

मिडिल ईस्ट में हवाई संघर्ष तेज, ईरान ने अमेरिका के 16 फाइटर और 10 रीपर ड्रोन किए नष्ट

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब भीषण हवाई युद्ध का रूप ले चुका है। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिकी वायुसेना को दुश्मन हमलों के साथ-साथ तकनीकी खराबी और आपसी तालमेल की कमी के कारण भी भारी नुकसान झेलना पड़ा है। ब्लूमबर्ग और सीएनएन की रिपोर्ट्स में बताया गया है कि युद्ध की शुरुआत से अब तक अमेरिका के कम से कम 16 सैन्य विमान नष्ट हो चुके हैं, जिनमें महंगे ड्रोन और रिफ्यूलिंग टैंकर शामिल हैं। इस दौरान 10 MQ-9 रीपर ड्रोन भी तबाह हो चुके हैं। इनमें से 9 को ईरानी एयर डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया, जबकि एक ड्रोन जॉर्डन के एयरफील्ड पर मिसाइल हमले की चपेट में आया और दो तकनीकी कारणों से नष्ट हुए। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ये मानव रहित ड्रोन जानबूझकर उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में भेजे जाते हैं ताकि नुकसान न्यूनतम रहे। रिपोर्ट में तकनीकी खराबी और गलतियों के कारण हुए नुकसान पर भी ध्यान दिया गया है। एक ऑपरेशन के दौरान KC-135 रिफ्यूलिंग टैंकर के दुर्घटनाग्रस्त होने से चालक दल के सभी 6 सदस्यों की मौत हुई। वहीं, कुवैत में अपनी ही सेना की गलत पहचान के चलते तीन अमेरिकी F-15 फाइटर मार गिराए गए। इसी बीच सऊदी अरब के बेस पर ईरानी मिसाइल हमले में पांच KC-135 विमान क्षतिग्रस्त हुए। आम तौर पर अमेरिकी वायुसेना युद्ध में एयर सुपीरियरिटी हासिल कर लेती है, लेकिन ईरान के खिलाफ यह चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। अधिकारियों ने माना है कि अमेरिका केवल स्थानीय स्तर पर हवाई हमलों में दक्ष है, पूरे ईरानी आकाश पर उनका कब्जा नहीं है। हाल ही में एक F-35 फाइटर जेट को ईरानी गोलाबारी के बाद इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी; पायलट सुरक्षित बच गए। ईरान ने अपने ‘साउथ पार्स’ गैस फील्ड पर हुए हमलों का बदला लेने के लिए कतर और सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले तेज कर दिए हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक मार्गों को सुरक्षित करना अमेरिका के लिए चुनौती बना हुआ है, क्योंकि ईरान का सक्रिय एयर डिफेंस सिस्टम लगातार खतरा पैदा कर रहा है।