ईरान युद्ध से भड़के तेल के दाम… जानें दुनिया में कहां मिल रहा सबसे सस्ता पेट्रोल-डीजल?

नई दिल्ली। ईरान युद्ध (Iran war) से दुनिया भर में तेल के दाम (Oil prices) में उछाल देखने को मिल है। इस बीच पूरी दुनिया में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत कहीं 2.25 रुपये है तो कहीं 394.95 रुपये। यानी पेट्रोल की कीमत कही भारत से 44 गुना सस्ता है तो कहीं करीब चार गुना महंगा। आइए जानें दुनिया में सबसे सस्ता और महंगा पेट्रोल और डीजल (Petrol Diesel Prices) कहां मिलता है? सबसे महंगा पेट्रोल बेचने वाले देशसबसे पहले बात दुनिया में सबसे महंगे पेट्रोल बेचने वाले टॉप-10 देशों की। इस लिस्ट में सबसे ऊपर हांगकांग का नाम है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत करीब 400 रुपये है। इसके बाद मलावी का नाम आता है। यहां पेट्रोल का रेट 364.27 रुपये प्रति लीटर है। इजरायल में पेट्रोल जहां, 269.19 रुपये लीटर है वहीं, डेनमार्क में 265.74 रुपये। नीदरलैंड में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 260.15 रुपये है। ग्रीस में 231.57 और अल्बानिया में 231.49 रुपये लीटर है। स्विट्जरलैंड में पेट्रोल की कीमत 231.12 और सिंगापुर में 230.02 रुपये लीटर है। दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल बेचने वाले टॉप-10 देशदुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल लीबिया में है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 2.25 रुपये है। इसके बाद ईरान का नंबर है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 3.32 रुपये है। इसके बाद अंगोला में 31.08, कुवैत में 32.41, अल्जीरिया में 33.75 और तुर्कमेनिस्तान में 40.78 रुपये लीटर है। आठवें नंबर इजिप्ट है। यहां पेट्रोल की कीमत 42.78 रुपये है। नौवें पर कतर है, जहां पेट्रोल की कीमत 54.62 रुपये लीटर है। 10वें नंबर पर सऊदी अरब है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 59.62 रुपये है। किस देश में सबसे सस्ता डीजलसबसे सस्ता डीजल वेनेजुएला में मिलता है। यहां 1 लीटर डीजल की कीमत महज 39 पैसे है। इसके बाद ईरान में 54 पैसे और लीबिया में 2.25 रुपये लीटर। अल्जीरिया में एक लीटर डीजल की कीमत 22.26 रुपये है। तुर्कमेनिस्तान में डीजल 27.19 रुपये प्रति लीटर है तो कुवैत में 35.50 रुपये। इजिप्ट में डीजल का रेट 36.36 रुपये लीटर है तो अंगोला में 41.44 रुपये लीटर। सऊदी अरब में एक लीटर डीजल की कीमत 45.37 रुपये और कतर में 53.32 रुपये। हांगकांग में 446 रुपये लीटर है डीजलदुनिया में सबसे महंगा डीजल हांगकांग में 446 रुपये लीटर है। एक लीटर डीजल की कीमत मलावी में 365, सिंगापुर में 310.49, डेनमार्क में 273.16, स्विट्जरलैंड में 262.09, नीदरलैंड में 257 रुपये लीटर है। इजरायल में जहां एक लीटर डीजल 255.60 रुपये है तो फिनलैंड में 255.59 रुपये।
दुनिया में भारत का जलवा: विदेशों से आया रिकॉर्ड पैसा, रेमिटेंस में फिर नंबर-1

नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर भारतीयों की मेहनत और कौशल का असर एक बार फिर दिखा है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशों में काम कर रहे भारतीयों ने अपने देश को रिकॉर्ड स्तर पर पैसा भेजकर नया इतिहास रच दिया है। इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन की ‘वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, साल 2024 में भारत को करीब 137 बिलियन डॉलर (लगभग 11.4 लाख करोड़ रुपये) का रेमिटेंस मिला। यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है और भारत लगातार एक दशक से इस सूची में शीर्ष पर बना हुआ है। 00 बिलियन डॉलर पार करने वाला इकलौता देश रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया का पहला और इकलौता देश बन गया है जिसने रेमिटेंस में 100 बिलियन डॉलर का आंकड़ा पार किया है। इससे साफ है कि वैश्विक स्तर पर भारतीयों की आर्थिक भागीदारी लगातार मजबूत हो रही है। दूसरे देशों से काफी आगे भारत रेमिटेंस के मामले में भारत के बाद मेक्सिको दूसरे, फिलीपींस तीसरे और फ्रांस चौथे स्थान पर हैं। हालांकि इनमें से कोई भी देश अभी तक 100 बिलियन डॉलर के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया है। लगातार बढ़ता ग्राफ अगर पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2010 में भारत को करीब 53.48 बिलियन डॉलर, 2015 में 68.91 बिलियन डॉलर और 2020 में 83.15 बिलियन डॉलर का रेमिटेंस मिला था। पिछले चार वर्षों में इसमें तेज उछाल दर्ज किया गया है। किन देशों से आता है ज्यादा पैसा? रेमिटेंस भेजने वाले देशों में अमेरिका सबसे आगे है, जहां से 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा का आउटफ्लो दर्ज किया गया। इसके अलावा सऊदी अरब, स्विट्जरलैंड और जर्मनी भी प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। छात्रों की भी मजबूत मौजूदगी आर्थिक योगदान के साथ-साथ भारतीय छात्र भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, विदेशों में पढ़ाई करने वाले छात्रों में चीन पहले और भारत दूसरे स्थान पर है। 2022 तक 6.20 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में उच्च शिक्षा ले रहे थे। रेमिटेंस के क्षेत्र में भारत की यह उपलब्धि न सिर्फ अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि दुनियाभर में भारतीयों की भूमिका कितनी अहम हो चुकी है। लगातार बढ़ता यह आंकड़ा आने वाले समय में भारत की आर्थिक ताकत को और मजबूत कर सकता है।
गंभीर जलवायु संकट की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 20290 तक भीषण गर्मी और सूखे की चपेट में होंगे 260 करोड़ लोग

नई दिल्ली। दुनिया (World) तेजी से एक ऐसे जलवायु संकट (Climate Crisis) की ओर बढ़ रही है, जहां भीषण गर्मी और सूखा (Extreme heat and Drought)मिलकर अभूतपूर्व खतरा पैदा कर रहे हैं। जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक नई स्टडी के अनुसार अगर मौजूदा जलवायु नीतियों में ठोस बदलाव नहीं हुआ, तो सदी के अंत तक वैश्विक आबादी का करीब 28 फीसदी यानी लगभग 260 करोड़ लोग इस दोहरे संकट की चपेट में होंगे। अध्ययन के अनुसार इसका असर आज की तुलना में करीब पांच गुना तक बढ़ सकता है। अध्ययन के अनुसार 2001 से 2020 के बीच हर साल औसतन चार बार ऐसे हालात बने, जब भीषण गर्मी और सूखा एक साथ पड़े। यह आंकड़ा औद्योगिक काल 1850 से 1900 की तुलना में दोगुना है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2090 तक ऐसी घटनाएं साल में करीब 10 बार तक हो सकती हैं और हर घटना करीब दो हफ्ते तक असर डाल सकती है। इसे कहते हैं कंपाउंड एक्सट्रीमजब कई चरम मौसम घटनाएं एक साथ मिलकर प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती हैं तब इसे वैज्ञानिक भाषा में कंपाउंड एक्सट्रीम कहा जाता है। इससे फसलें तेजी से सूखती हैं, जल स्रोत सिकुड़ते हैं और जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ खाद्य कीमतों में उछाल और लू से मौतों का जोखिम भी बढ़ता है। यह स्थिति वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी सीधा दबाव डाल सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो खुले में काम करते हैं। सही नीतियों से कम हो सकता है खतराअगर देश पेरिस समझौते के तहत अपने जलवायु वादों को प्रभावी ढंग से लागू करें तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि आने वाले दशकों में अरबों लोगों के जीवन को सुरक्षित या असुरक्षित बना सकते हैं। अध्ययन का आधार और वैज्ञानिक निष्कर्षअध्ययन के अनुसार 8 जलवायु मॉडलों पर आधारित 152 सिमुलेशन का विश्लेषण किया गया, जिसमें जनसंख्या वृद्धि और ग्लोबल वार्मिंग के विभिन्न परिदृश्यों को शामिल किया गया। ये परिदृश्य इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज,संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संबंधी वैज्ञानिक संस्था (आईपीसीसी) की छठी आकलन रिपोर्ट पर आधारित हैं। इसके लिए 1961 से 1990 की अवधि को आधार बनाया गया।
फारस की खाड़ी से वापस लौटा दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत….

वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच जारी तनाव के बीच नया घटनाक्रम सामने आया है। दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत (World’s largest Aircraft Carrier) USS जेराल्ड आर. फोर्ड (USS Gerald R. Ford) अब फारस की खाड़ी से वापस लौट रहा है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब दोनों देशों के बीच बातचीत ठप पड़ गई है और किसी ठोस समझौते की संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है। यह युद्धपोत पिछले 10 महीनों से अधिक समय से समुद्र में तैनात था और इस दौरान उसने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभाई। इस विमानवाहक पोत की वापसी को अमेरिका की सैन्य रणनीति में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इसे पूरी तरह से पीछे हटना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि क्षेत्र में अभी भी अन्य अमेरिकी युद्धपोत मौजूद हैं। फोर्ड की वापसी से यह तो साफ है कि अमेरिका अब लंबे समय तक भारी सैन्य तैनाती बनाए रखने के बजाय दूसरी नीति पर काम कर रहा है। अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत में गतिरोधजानकारों का मानना है कि यह कदम सैनिकों को राहत देने और जहाज की मरम्मत जैसी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भी लिया गया होगा। मालूम हो कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। दोनों पक्ष कई अहम मुद्दों पर सहमत नहीं हो पाए हैं, जिसमें सुरक्षा, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय नियंत्रण जैसे विषय शामिल हैं। बातचीत के ठप पड़ने से तनाव और बढ़ गया है और क्षेत्र में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर स्थिति और संवेदनशील हो गई है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति करता है। फिलहाल, विमानवाहक पोत की वापसी एक बड़े भू-राजनीतिक संकेत के रूप में देखी जा रही है। यह न केवल अमेरिका की रणनीति में बदलाव को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कूटनीतिक समाधान अभी दूर है। अगर बातचीत जल्द शुरू नहीं होती तो स्थिति और गंभीर हो सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
अपनी सेना में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में भारत दुनिया में 5वें स्थान पर….

नई दिल्ली। साल 2025 में दुनिया भर में अपनी सेनाओं पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों (Countries Spend Most Military) की सूची में भारत (India) पांचवें स्थान पर रहा है। भारत से आगे केवल चार देश हैं। वहीं पाकिस्तान (Pakistan) इस मामले में भारत के आसपास भी नहीं ठहरता है। पिछले साल दुनिया भर में हुए कुल सैन्य खर्च में भारत की हिस्सेदारी 3.2% रही है। आइए इस खबर को विस्तार से समझते हैं। भारत का रक्षा खर्च और ‘ऑपरेशन सिंदूर’स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) द्वारा सोमवार को जारी की गई एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका (USA), चीन, रूस और जर्मनी इस लिस्ट में सबसे आगे यानी टॉप 4 देश हैं। इसके बाद भारत नंबर 5 पर है। 2025 में भारत का सैन्य खर्च 92.1 अरब डॉलर रहा, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 8.9% अधिक है। बढ़ोतरी का कारण: इस वृद्धि का एक बड़ा कारण पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ था। इस सैन्य अभियान के दौरान सेना को युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रखने हेतु सशस्त्र बलों ने आपातकालीन आधार पर हथियारों और साजो-सामान की कई महत्वपूर्ण खरीदारियां कीं। पड़ोसी देशों (चीन और पाकिस्तान) की क्या स्थिति है?सिपरी के आंकड़े बताते हैं कि भारत के पड़ोसियों ने भी अपनी सेना पर खर्च बढ़ाया है। चीन: दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश चीन है। उसने अपने रक्षा बजट में 7.4% की वृद्धि की है, जिससे उसका कुल खर्च 336 अरब डॉलर हो गया है। पाकिस्तान: आर्थिक चुनौतियों के बावजूद पाकिस्तान के सैन्य खर्च में 11% की वृद्धि देखी गई है। 11.9 अरब डॉलर के खर्च के साथ पाकिस्तान इस सूची के 40 देशों में 31वें स्थान पर है। वैश्विक परिदृश्य: दुनिया भर में रक्षा खर्च रिकॉर्ड स्तर परशीर्ष तीन देश: अमेरिका, चीन और रूस मिलकर वैश्विक सैन्य खर्च का 51% हिस्सा कवर करते हैं। इन तीनों देशों ने कुल मिलाकर 1,480 अरब डॉलर खर्च किए। साल 2025 में पूरी दुनिया का सैन्य खर्च बढ़कर 2,887 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यूरोप में भारी वृद्धिवैश्विक स्तर पर खर्च बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यूरोप रहा, जहां सैन्य खर्च में 14% की वृद्धि (कुल 864 अरब डॉलर) हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध के चौथे साल में प्रवेश करने और यूरोपीय नाटो देशों द्वारा खुद को फिर से हथियारों से लैस करने की कोशिशों के कारण शीत युद्ध के बाद से मध्य और पश्चिमी यूरोप में यह सबसे तेज वार्षिक वृद्धि है। हथियारों के आयात में भारत अभी भी आगेमार्च में प्रकाशित सिपरी की एक अन्य रिपोर्ट “ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स” के अनुसार- 2016-20 और 2021-25 की अवधि के बीच भारत के हथियारों के आयात में 4% की गिरावट आई है। गिरावट के बावजूद, भारत अभी भी सैन्य हार्डवेयर का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातक (Importer) बना हुआ है, जिसकी वैश्विक हथियारों के आयात में 8.2% हिस्सेदारी है। इसका मुख्य कारण चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर चल रहा तनाव है। रूस पर निर्भरता कम कर रहा है भारतपिछले एक दशक में भारत ने अपने हथियारों की खरीद नीति में बड़ा बदलाव किया है। भारत अब रूस के बजाय पश्चिमी देशों (खासकर फ्रांस, इजरायल और अमेरिका) की ओर रुख कर रहा है। 2011-15 के दौरान भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 70% थी, जो 2016-20 में घटकर 51% और 2021-25 में 40% रह गई है। इसके बावजूद, वर्तमान में भारत को सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति करने वाले शीर्ष तीन देश रूस, फ्रांस और इजरायल ही हैं। भविष्य की तैयारियां: रक्षा बजट 2026-27‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पृष्ठभूमि और मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए, भारत सरकार ने 1 फरवरी को पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए भारी-भरकम राशि आवंटित की है: रक्षा बजट में 15% से अधिक की बढ़ोतरी की गई है। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए कुल 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।इसमें से ₹2.19 लाख करोड़ का ‘पूंजीगत परिव्यय’ रखा गया है। इस फंड का इस्तेमाल सीधे तौर पर सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए किया जाएगा, जिसमें नए लड़ाकू विमान, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, युद्धपोत, पनडुब्बियां, आर्टिलरी गन, स्मार्ट हथियार, मिसाइलें, रॉकेट और कई तरह के मानव रहित (ड्रोन) सिस्टम खरीदना शामिल है।
ऊफ ये गर्मी ! दुनिया के सबसे गर्म 100 शहरों में 92 भारत के…. दिल्ली में पारा 44 डिग्री के पार

नई दिल्ली। गर्मी (Heat) शुरुआत में ही रिकॉर्ड तोड़ रही है। वैश्विक तापमान आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों (World 100 Hottest cities) में 92 भारत (India) के हैं। इसके अलावा 6 शहर थाईलैंड और दो शहर नेपाल के हैं। अप्रैल की शुरुआत में ही दिल्ली (Delhi), मुंबई, चेन्नई और बंगलूरू जैसे शहरों में पारा 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। दिल्ली में तापमान 44.5 डिग्री दर्ज किया गया। आने वाले दिनों में इसमें और वृदि्ध की आशंका जताई जा रही है। देश में शनिवार को सर्वाधिक तापमान 47.4 डिग्री सेल्सियस यूपी के बांदा का रहा। इसके बाद प्रयागराज में 45.5 डिग्री, वाराणसी में 45 डिग्री, झांसी में 44.8 डिग्री रहा। गाजियाबाद में अधिकतम तापमान 43 डिग्री रहा। कई इलाकों में तापमान सामान्य से 5 डिग्री या उससे ऊपर है, जिससे हीट स्ट्रेस की स्थिति बन रही है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में लू चलने (Scorching Heatwave) की संभावना है। उत्तर भारत में रातें भी गर्म रह सकती हैं। यह स्थिति हीट डोम जैसे हालात की ओर इशारा करती है, जिसमें गर्म हवा एक क्षेत्र में फंस जाती है और तापमान लगातार बढ़ता रहता है। गाजियाबाद 43 डिग्री में तपा, सबसे गर्म शहरों में यूपी के 37100 सबसे गर्म शहरों में यूपी के 37 शहर हैं। प. बंगाल के 18, पंजाब के सात, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के छह-छह, बिहार और ओडिशा के पांच-पांच, महाराष्ट्र के चार, उत्तराखंड और आंध्र प्रदेश के दो-दो शहर शामिल हैं। ज्यादातर शहरों में तापमान तापमान 42 से 45 डिग्री दर्ज किया गया। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हीटस्ट्रोक यूनिट बनीदिल्ली में शनिवार को पारा 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिसके चलते राममनोहर लोहिया हॉस्पिटल में हीटस्ट्रोक यूनिट बनाई गई है। इसमें कूलिंग टब, 200 किलो बर्फ बनाने की मशीनें और पोर्टेबल आइस पैक भी रखे गए हैं। दोपहर में काम नहीं कर सकेंगे मजदूरउत्तर प्रदेश : आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद और मैनपुरी में दोपहर 12 से 4 बजे तक मजदूरों के काम पर रोक।ओडिशा : सोमवार से सभी सरकारी स्कूल बंद रहेंगे।केरल : लोगों से दिन में 11 से 3 बजे के बीच बाहर न निकलने की सलाह। सेल्फ लॉकडाउन अपनाने के लिए कहा।कर्नाटक : सभी अस्पतालों में हीट स्ट्रोक यूनिट बनाने का आदेश। ये सभी यूनिट 31 जुलाई तक चालू रखी जाएंगी।मध्य प्रदेश : नर्मदापुरम जिले में स्कूलों की छुट्टी कर दी गई है। धूप से बचने, पर्याप्त पानी पीने हल्के कपड़े पहनने की सलाहमौसम विभाग ने दोपहर में धूप से बचने, पर्याप्त पानी पीने, हल्के कपड़े पहनने और बच्चों, बुजुर्गों व बीमार लोगों का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी है। सावधानी बरतने से हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है। कश्मीर में बारिश और रोहतांग में बर्फबारीश्रीनगर समेत कश्मीर घाटी के मैदानी इलाकों में शनिवार को रुक-रुक कर हुई बारिश से गर्मी से राहत मिली है, जबकि जोजिला दर्रे पर हल्की बर्फबारी भी हुई। वहीं, हिमाचल में रोहतांग दर्रा, कुंजम दर्रा सहित ऊंची चोटियों पर बर्फबारी हुई।
होर्मुज को लेकर अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता ईरान… ट्रंप ने दी चेतावनी

वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) पर दोबारा प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने ईरान (Iran) को चेतावनी दी है कि होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को लेकर ईरान अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता। बता दें, शुक्रवार को लेबनान (Lebanon.) में हुए सीजफायर का स्वागत करते हुए ईरान (Iran) ने होर्मुज पर लगे प्रतिंबध को हटा दिया था। हालांकि, जब ट्रंप होर्मुज के पास लगे अमेरिकी ब्लाकेड को हटाने से इनकार कर दिया, तो शनिवार को ईरान ने फिर से होर्मुज के दरवाजे बंद कर दिए। होर्मुज पर बदलते हालात पर ट्रंप ने शनिवार को ओवेल ऑफिस में मीडिया से बात की। उन्होंने कहा, “हम उनसे बात कर रहे हैं। वे स्ट्रेट को फिर से बंद करना चाहते हैं। जैसा कि वे वर्षों से करते आ रहे हैं और वे हमें ब्लैकमेल नहीं कर सकते।” इससे पहले ईरानी सेना की कमांड ने एक होर्मुज पर अमेरिकी कमांड को वादाखिलाफी बताया। ईरान की तरफ से कहा गया कि ईरानी बंदरगाहों के खिलाफ लगाए गए अमेरिकी ब्लाकेड को न हटाकर अमेरिका ने अपना वादा तोड़ा है। बयान में आगे कहा गया, “जब तक अमेरिका ईरान आने वाले सभी जहाजों के लिए आवाजाही की स्वतंत्रता बहाल नहीं करता, होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सख्त नियंत्रण में रहेगी।” शनिवार सुबह होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति को अपने देश और दुनिया के सामने रखते हुए ईरानी सरकारी टीवी ने बताया कि होर्मुज पर वापस नियंत्रण हासिल कर लिया गया है। ईरान की तरफ से होर्मुज पर नियंत्रण हासिल करने के प्रयास में ही दो भारतीय तेल टैंकरों के ऊपर गोलीबारी की खबर सामने आई है। इस घटना को लेकर सरकार ने ईरानी राजदूत को भी समन किया है। बता दें, 28 फरवरी को अमेरिकी और इजरायली हमले के बाद शुरू हुए पश्चिम एशिया संकट ने पूरे विश्व को ऊर्जा संकट में धकेल दिया है। हमले के कुछ दिन बाद ही ईरान ने होर्मुज के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया, जिसकी वजह से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं। पांच हफ्तों की लड़ाई के बाद अमेरिका और ईरान ने सीजफायर की घोषणा कर दी, लेकिन इजरायल ने लेबनान पर हमला करना जारी रखा। इसकी वजह से ईरान ने होर्मुज को खोलने से इनकार कर दिया। अमेरिकी और ईरान के बीच हुई वार्ता के बाद इजरायल ने भी लेबनान के साथ सीजफायर का ऐलान कर दिया। इसके बाद ईरान ने शुक्रवार को सीजफायर की अवधि तक होर्मुज के रास्ते व्यापारिक जहाजों के लिए खोल दिए। लेकिन फिर ट्रंप के बायन के बाद व्यवस्था बिगड़ गई।
clinically dead women : 10 मिनट ‘क्लीनिकली डेड’ रही महिला का दावा, 2030 की दुनिया देखकर लौटी; अनुभव ने चौंकाया

clinically dead women : नई दिल्ली। मेक्सिको की एक महिला ने दावा किया है कि 10 मिनट तक ‘क्लीनिकली डेड’ रहने के दौरान वह भविष्य यानी साल 2030 में पहुंच गई थीं। होश में आने के बाद उन्होंने जो अनुभव साझा किया, उसने लोगों के साथ-साथ वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया।रिपोर्ट के मुताबिक, 24 वर्षीय मेडिकल स्टूडेंट रूबी रोल्गु को पिछले साल अप्रैल में फेफड़ों में खून के थक्के जमने की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनकी हालत बिगड़ने पर उन्हें दिल का दौरा पड़ा और डॉक्टरों ने उन्हें लगभग 10 मिनट तक ‘क्लीनिकली डेड’ बताया। परिवार को भी उनकी स्थिति बेहद गंभीर होने की जानकारी दी गई थी। 2030 की दुनिया देखने का दावा होश में आने के बाद रूबी ने बताया कि उन 10 मिनटों में उन्होंने खुद को साल 2030 की दुनिया में पाया। उनके अनुसार, भविष्य की दुनिया आज की तुलना में अधिक शांत और व्यवस्थित थी। उन्होंने दावा किया कि तकनीक और ऑटोमेशन के कारण लोगों का जीवन आसान हो गया था और वे परिवार व समाज के साथ ज्यादा समय बिताते दिखे। रूबी ने यह भी कहा कि उन्होंने खुद को और अपने परिवार को उम्रदराज होते देखा, मानो वह आने वाले वर्षों को दिन-प्रतिदिन जी रही हों। उनके मुताबिक भविष्य में तकनीक और मानवीय संवेदनाओं का संतुलन बेहतर दिखाई दिया। ‘वापस आना किसी नरक जैसा लगा’ रूबी के अनुसार, यह अनुभव इतना सुखद था कि जब उनकी आंखें अस्पताल में खुलीं तो उन्हें वास्तविक दुनिया में लौटना कठिन लगा। उन्होंने बताया कि उन्हें रोशनी से भरी सुरंग दिखाई दी और फिर अचानक वह अपने अस्पताल के बेड पर थीं। होश में आने पर जब उन्होंने अपने भाई को देखा तो वह उन्हें अपनी ‘भविष्य की यादों’ के मुकाबले काफी छोटा लगा। रूबी ने कहा कि भविष्य की शांति के बाद वर्तमान की भागदौड़ भरी दुनिया में लौटना उन्हें किसी “नरक” जैसा महसूस हुआ। हालांकि वैज्ञानिक ऐसे दावों को अक्सर मस्तिष्क की जटिल गतिविधियों और ‘नियर-डेथ एक्सपीरियंस’ से जोड़कर देखते हैं, फिर भी यह घटना चर्चा का विषय बनी हुई है।
Strait of Hormuz : हम इकलौते देश, जिसने अपने नाविक खोये…. होर्मुज खुलवाने के लिए जुटे दुनियाभर के देश, भारत की दो टूक

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया (West Asia.) में तनाव की वजह से लंबे समय बंद होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने को लेकर गुरुवार को अहम बैठक हुई। ब्रिटेन की अगुवाई में हुई इस बैठक में भारत (India) समेत कई देशों को न्योता दिया गया था। भारत की ओर से विदेश सचिव विक्रम मिसरी (Foreign Secretary Vikram Misri) वर्चुअल मीटिंग में शामिल हुए। इस दौरान, भारत ने दो टूक कहा कि हम इकलौते देश हैं, जिसने अपने नाविक खोए हैं। भारत ने इस बैठक में होर्मुज को खोलने की वकालत की। मिसरी गुरुवार को ब्रिटिश विदेश मंत्री यवेट कूपर की अध्यक्षता में हुई बैठक में वर्चुअली शामिल हुए। इस बैठक में फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। अमेरिका को इस बैठक में शामिल नहीं होना था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में बताया, “ब्रिटेन ने होर्मुज पर बातचीत के लिए कई देशों को आमंत्रित किया था, जिसमें भारत भी शामिल है।” उन्होंने दोहराया कि भारत अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप, मुक्त और खुले समुद्री सुरक्षा का समर्थन करता है। जायसवाल ने कहा, “हम होर्मुज से सुरक्षित और मुक्त आवागमन सुनिश्चित करने की मांग को प्राथमिकता के तौर पर लगातार उठाते रहे हैं।” ब्रिटेन की अगुवाई में हुई इस बैठक के नतीजों के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। यह बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस टीवी संबोधन के कुछ ही घंटों बाद हुई थी, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ अपने युद्ध के संदर्भ में कहा था कि इस रणनीतिक जलमार्ग की सुरक्षा करना अन्य देशों की जिम्मेदारी है। DATIYA COUNCILLOR MURDERED : मर्डर के बाद ‘MISSION COMPLETE’ — आरोपियों ने की पोस्ट, परिजनों ने किया हाईवे जाम ! इस मामले से जुड़े लोगों ने बताया कि ब्रिटेन द्वारा बुलाई गई बैठक से तुरंत कोई बड़ी सफलता मिलने की उम्मीद कम ही है। उन्होंने कहा कि इस स्ट्रेट से भारत के जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ता पक्का करना अभी भी एक पेचीदा मामला बना हुआ है, और यह पक्का करने के लिए कि जहाज बारूदी सुरंगों वाले इस जलमार्ग से सुरक्षित रूप से गुजर सकें, ईरान की तरफ से करीबी तालमेल की जरूरत है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने अपनी साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में कहा, “जहां तक भारत की बात है, आप अच्छी तरह जानते हैं कि हम स्वतंत्र और खुले कमर्शियल शिपिंग के पक्ष में हैं, और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार समुद्री सुरक्षा के पक्ष में हैं।” उन्होंने कहा, “हम प्राथमिकता के तौर पर होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित और स्वतंत्र आवागमन सुनिश्चित करने की लगातार अपील कर रहे हैं।” ईरान द्वारा होर्मुज को लगभग बंद कर देने के बाद वैश्विक तेल और गैस की कीमतें बढ़ गई हैं। यह स्ट्रेट फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच एक संकरा शिपिंग मार्ग है, जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) का परिवहन होता है। पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का एक प्रमुख स्रोत रहा है।
ईरान युद्ध के बीच एक और समुद्री रास्ता हो सकता है बंद…. हूतियों की एंट्री ने बढ़ाई दुनिया की टेंशन

तेहरान। ईरान और अमेरिका-इजरायल (Iran and America-Israel) के बीच जारी युद्ध में अब तक हूती विद्रोही (Houthi Rebels) शामिल नहीं हुए थे लेकिन शनिवार को पहली बार हूतियों ने भी मिसाइल दागकर साफ कर दिया है कि वे भी युद्ध में कूद पड़े हैं। हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) ने बयान देकर कहा कि उन्होंने इजरायल के संवेदनशील सैन्य इलाकों में हमला किया है। वहीं इजरायल ने कहा कि यमन की ओर से आई मिसाइलों को हवा में ही मार गिराया गया। बता दें कि चार सप्ताह से चल रहे युद्ध की वजह से दुनियाभर में तेल का संकट खड़ा हो गया है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आवागमन को सीमित कर दिया है। बाब-अल-मंडेब पर भी खतराइजरायल ईरान के अलावा दक्षिण लेबनान में भी लगातार बमबारी कर रहा है। यहां वह ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के ठिकानों को तबाह करने में लगा है। हूतियों के युद्ध में कूदने से ना केवल इसके गंभीर होने का खतरा बना है बल्कि एक और जलडमरूमध्य का रास्ता बंद होने का भी खतरा मंडरा रहा है। यह है बाब अल मंडेब जलडमरूमध्य। यह लाल सागर के मुहाने पर स्थित है और यहां से होकर बड़ी संख्या में जहाज गुजरते हैं। कौन हैं हूती विद्रोहीयमन के शिया मुस्लिम जैदियों का का सशस्त्र राजनीतिक समूह हूती के नाम से जाना जाता है। हूती विद्रोहियों को हिजबुल्लाह और हमास की तरह ही ईरान का समर्थन प्राप्त है। 1990 में बदरद्दीन अल हूती ने इसकी स्थापना की थी। इसने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। इसका स्लोगन ही था, ‘अल्लाह महान है, अमेरिका मुर्दाबाद, इजरायल मुर्दाबाद।’ हूती खुद को अंसार यानी अल्लाह का साथी कहते हैं। हूती 2004 से 2010 तक सालेह की सेना से छह युद्ध लड़े। 2011 में अरब की क्रांति की वजह से सालेह को सत्ता छोड़नी पड़ गई और अब्दरब्बू मंसूर हादी क राष्ट्रपति बनाया गया। यह सरकार भी ज्यादा दिन नहीं टिकी और 2014 में हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लया। इसके बाद शियाओं का समूह मजबूत होने लगा। यह सऊदी अरब और यूएई के लिए सीधा खतरा बन गया। आज भी हूती विद्रोहियों का यमन के बड़े हिस्से पर कब्जा है।इसमें राजधानी सना और लाल सागर का तटी इलाका शामिल है। बाब अल मंडेब पर क्यों है खतरालाल सागर के उस इलाके पर हूतियों का ही कब्जा है जहां बाब अल मंडेब स्ट्रेट है। हूतियों के पास हथियारों की भी कमी नहीं है। उनके पास क्रूज मिसाइल, एंटी शिप मिसाइल, समुद्री ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हैं। बीते दो सालों में हूतियों ने 100 से ज्यादा व्यापारिक जहाजों पर हमला किया है और इनमें से कई को समंदर में ही डुबो दिया है। लाल सागर के दूसरी ओर स्वेज नहर है जो कि भूमध्य सागर को जोड़ती है। इन दोनों रास्तों से ही यूरोप और उत्तरी अमेरिका को प्राकृतिक गैस और खाड़ी के तेल की सप्लाई होती है। 2013 में स्वेज नहर के रास्ते दुनिया के कुल व्यापारा का 12 से 15 फीसदी व्यापार हुआ था। ईरान के साथ कितना मजबूत रिश्तासऊदी अरब और यूएई का कहना है कि ईरान हूती विद्रिहियों को हथियार मुहैया करवाता है। सऊदी अरब और ईरान में जो संघर्ष है उसके बीच यमन एक अलग ही मोर्चा बना हुआ है। हूती क्यों हैं ज्यादा खतरनाकहूती ब्रिगेडियर याह्या सरी ने कहा कि शनिवार को उन्होंने इजरायल के सैन्य ठिकानों पर मिसाइल अटैक किया है। इसका सीधा मतलब है कि युद्ध का स्तर अब और गंभीर हो गया है। शिया ताकतें अमेरिका और इजरायल के खिलाफ इकट्ठी हो रही हैं। ऐसे में युद्ध लंबा खिंचने और बढ़ने का खतरा बना हुआ है। गाजा में हमास आज भी ऐक्टिव है और लेबनान से हिजबुल्लाह इजरायल पर हमले कर रहा है। इजरायल तीन मोर्चों से घिरा हुआ है। ईरान ने आगे सनसनीखेज दावा करते हुए कहा कि उसने दुबई में उन दो विशिष्ट स्थानों को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाया है जहां अमेरिकी सैनिक तैनात थे। बयान के अनुसार, एक स्थान पर 400 से अधिक और दूसरे पर 100 से ज्यादा अमेरिकी कर्मी मौजूद थे। ईरानी प्रवक्ता ने डोनल्ड ट्रंप को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि यह क्षेत्र ‘अमेरिकी सैनिकों के लिए कब्रगाह’ साबित होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि अमेरिकी सेना के पास ईरान पर हमला करने और अपना सैन्य अभियान पूरा करने के लिए अभी 3,554 लक्ष्य बाकी हैं। मियामी में एक निवेश सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने नाटो सहयोगियों पर भी जमकर भड़ास निकाली। उन्होंने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने में सहायता न देने के लिए सहयोगियों को ‘कागजी शेर’ करार दिया और कहा कि अमेरिका नाटो की सुरक्षा पर सालाना सैकड़ों अरब डॉलर खर्च कर रहा है, लेकिन जरूरत के समय वे गायब हैं। तनाव को देखते हुए अमेरिका ने अपनी नौसैनिक शक्ति का प्रदर्शन तेज कर दिया है। विमानवाहक पोत यूएसएस जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश को अब केंद्रीय कमान (सेंटकॉम) के कार्यक्षेत्र में तैनात किया जा रहा है। वर्तमान में इस क्षेत्र में पहले से ही यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड और यूएसएस अब्राहम लिंकन के नेतृत्व में दो स्ट्राइक समूह सक्रिय हैं। इसके अलावा गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक यूएसएस रॉस, यूएसएस डोनाल्ड कुक और यूएसएस मेसन को भी युद्धक संचालन में सहयोग के लिए रवाना कर दिया गया है। इस बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने साफ कर दिया है कि यदि ईरान के आर्थिक केंद्रों या बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया, तो इसका जवाब बेहद कड़ा होगा। उन्होंने क्षेत्रीय देशों से पुरजोर अपील की है कि वे अपनी धरती का उपयोग ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए न होने दें।