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क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून

नई दिल्ली। भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को मंजूरी देते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह फैसला Harish Rana vs Union of India मामले में आया, जिसमें 32 वर्षीय हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अपील स्वीकार कर ली गई। Supreme Court of India की जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में हैं। बेटे की लगातार बिगड़ती हालत को देखते हुए उनके माता-पिता ने अदालत से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। इस फैसले के बाद इच्छामृत्यु को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। आइए जानते हैं कि इच्छामृत्यु क्या है और दुनिया में इसका इतिहास क्या रहा है। क्या होती है इच्छामृत्यु इच्छामृत्यु (Euthanasia) का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना, जो असाध्य या लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और असहनीय दर्द झेल रहा हो। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है। इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है। 1. सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) इसमें मरीज की मृत्यु लाने के लिए डॉक्टर या कोई व्यक्ति सक्रिय कदम उठाता है, जैसे घातक दवा या इंजेक्शन देना। उदाहरण के तौर पर मरीज को ऐसा इंजेक्शन देना जिससे वह गहरी नींद में चला जाए और उसकी दर्दरहित मृत्यु हो जाए। 2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) इसमें मरीज को जिंदा रखने वाले इलाज या जीवन रक्षक उपकरण हटा लिए जाते हैं। डॉक्टर सीधे मौत नहीं देते, बल्कि उपचार बंद कर देते हैं, जिससे मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त होता है। प्राचीन काल में इच्छामृत्यु इच्छामृत्यु का विचार बहुत पुराना है। लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व के महाकाव्य Iliad में घायल योद्धाओं के दर्द से मुक्ति के लिए दया मृत्यु का उल्लेख मिलता है। भारतीय परंपरा में भी तपस्वियों द्वारा प्रायोपवेश (आमरण अनशन के माध्यम से प्राण त्यागना) की परंपरा रही है, जिसका उल्लेख Mahabharata में मिलता है। प्राचीन यूनान में दार्शनिक Plato ने अपनी पुस्तक Republic में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था। हालांकि करीब 400 ईसा पूर्व में ली जाने वाली Hippocratic Oath ने सक्रिय इच्छामृत्यु का विरोध किया और कहा कि डॉक्टर किसी मरीज को घातक दवा नहीं देंगे। मध्यकाल में धार्मिक प्रतिबंध ईसाई धर्म के प्रसार के बाद इच्छामृत्यु को पाप और हत्या के समान माना गया। धार्मिक विचारक Augustine of Hippo और Thomas Aquinas ने इसे ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया। इस्लाम और यहूदी धर्म में भी सक्रिय इच्छामृत्यु को प्रतिबंधित किया गया, हालांकि कुछ परिस्थितियों में जीवन रक्षक उपचार रोकने की अनुमति दी गई। 19वीं और 20वीं सदी में बहस 19वीं सदी में आधुनिक चिकित्सा के विकास के साथ इच्छामृत्यु पर फिर से बहस शुरू हुई। 1870 में डॉक्टर Samuel D. Williams ने अंतिम अवस्था के मरीजों को क्लोरोफॉर्म देने का सुझाव दिया था। 20वीं सदी में नाजी जर्मनी के कुख्यात Aktion T4 program के कारण इच्छामृत्यु की अवधारणा विवादित हो गई। 1939-1945 के बीच नाजी शासन ने इस कार्यक्रम के नाम पर हजारों लोगों की हत्या कर दी थी। आज किन देशों में मान्य है इच्छामृत्यु समय के साथ कई देशों ने सख्त नियमों के तहत इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को कानूनी मान्यता दी है। Netherlands (2001) और Belgium (2002) ने सक्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनाया। Canada ने 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) कार्यक्रम शुरू किया। Switzerland में 1942 से सहायता प्राप्त आत्महत्या कानूनी है। United States के कुछ राज्यों में “Death with Dignity” कानून लागू है, जिसकी शुरुआत Oregon में 1997 में हुई। Spain, Austria, Australia, New Zealand, Colombia और Ecuador में भी विभिन्न रूपों में इसे अनुमति मिली है। किन देशों में सख्त प्रतिबंध कई इस्लामिक देशों में शरिया कानून के तहत इच्छामृत्यु के किसी भी रूप पर प्रतिबंध है। वहीं France और United Kingdom जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है, बल्कि मरीजों को दर्द से राहत देने के लिए पालीएटिव केयर और सिडेशन पर जोर दिया जाता है। भारत में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इच्छामृत्यु के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक बहस को नई दिशा देता है। हालांकि यह केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु तक सीमित है, लेकिन इससे भविष्य में चिकित्सा नैतिकता और मरीज के अधिकारों पर व्यापक चर्चा की संभावना बढ़ गई है।

Warning: महामंदी की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 7 दिन और चला ईरान युद्ध तो हालात होंगे भयावह!

तेहरान। स्कॉटलैंड की संस्था (Scottish Organization) वुड मैकेंजी (Wood Mackenzie) ने मध्य-पूर्व जंग से उपजे संकट को लेकर नई चेतावनी दी है। इसमें दावा किया कि अगर ईरान-इजराइल युद्ध (Iran-Israel War) अगले सात दिन तक और चलता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था 1929 की महा मंदी ‘ग्रेट डिप्रेशन’ के दौर में प्रवेश कर सकती है। इसमें यह भी कहा कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में गतिरोध बने रहने से दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसके परिणाम 1970 के दशक के तेल संकट से भी बड़े होने की संभावना है। क्या है महामंदीयह 1929 में अमेरिका से शुरू हुई आधुनिक इतिहास की सबसे भयंकर वैश्विक आर्थिक गिरावट थी, जो 1939-40 तक चली। अक्तूबर, 1929 के वॉल स्ट्रीट शेयर बाजार के पतन से शुरू होकर बैंकों के ठप होने, उत्पादन में भारी कमी और रिकॉर्ड तोड़ बेरोजगारी के साथ पूरी दुनिया में फैल गई। सिर्फ अमेरिका में ही 1933 तक 1.5 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए थे। इसके पीछे 1929 का स्टॉक मार्केट क्रैश, बैंकों का विफल होना, गलत मौद्रिक नीतियां और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कमी जैसे अनेक मिश्रित कारण थे। यह एक दशक तक चलने वाला (1929-1939) आर्थिक संकट था। आर्थिक मंदी द्वितीय विश्व युद्ध (1939) के शुरू होने के साथ समाप्त हुई, जिसने उत्पादन को बढ़ावा दिया और रोजगार के अवसर पैदा किए। इस आधार पर आशंकावुड मैकेंजी के मुख्य अर्थशास्त्री पीटर मार्टिन के अनुसार, कच्चे तेल के दाम 90 डॉलर प्रति बैरल के पास हैं। हॉर्मुज से गुजरने वाले 1.2 से 1.4 करोड़ बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति रुकने से कीमतें 125-150 डॉलर प्रति बैरेल तक जा सकती हैं। तेल 200 डॉलर प्रति बैरल को पार करता है तो यह 1970 के दशक जैसा झटका होगा। मध्य-पूर्व में जारी युद्ध शनिवार को आठवें दिन में प्रवेश कर गया। 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमला कर दिया। पिछले एक हफ्ते से जारी लड़ाई में कुल 16 देश प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित हैं, जिससे लाखों लोगों के जीवन और आजीविका को खतरा पैदा हो गया है। हिंसा मध्य एशिया से लेकर यूरोप के छोर तक फैलती जा रही है। अगर ये जंग बढ़ती है तो हालात और भयावह होंगे। रिपोर्ट में गैस संकट को लेकर भी चिंता जताई गई है। दुनिया का 20 फीसदी एलएनजी हॉर्मुज से गुजरता है। इसकी रुकावट 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान हुई गैस कटौती से कहीं अधिक गंभीर होगी। इससे यूरोप और एशिया में गैस की कीमतें 130 फीसदी तक बढ़ सकती हैं। वुड मैकेंजी का अनुमान है कि तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर रहने से वैश्विक जीडीपी विकास दर 2 फीसदी से नीचे गिर जाएगी। मुख्य अर्थशास्त्री पीटर मार्टिन ने कहा कि यह आधिकारिक तौर पर मंदी और फिर डिप्रेशन जैसे हालात को बढ़ावा देगा। उनके मुताबिक, बेरोजगारी और मुद्रास्फीति के कारण 1930 जैसी लंबी मंदी पैदा हो सकती है। ईरान युद्ध के बड़े अपडेट्स>>ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी के अनुसार, एक सप्ताह पहले बमबारी शुरू होने के बाद से अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान में 1,230 लोग मारे गए हैं, जबकि पांच हजार से अधिक घायल हैं।>>लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने हमलों में 217 की मौत और 798 के घायल हुए, जबकि एक लाख विस्थापित हुए।>>इजरायल में 12 नागरिकों की मौत, 1,600 से अधिक घायल हैं>>अमेरिका के 6 सैन्य कर्मियों की मौत की पुष्टि हुई और 20 घायल हैं।>>कुवैत में चार, यूएई तीन, बहरीन दो और ओमान में एक मौत हुई>>युद्ध के पहले 5 दिनों में वैश्विक शेयर बाजारों से लगभग 3.2 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 265 लाख करोड़ रुपये) का नुकसान होने का अनुमान है। इसमें डॉव जोन्स और एशियाई बाजारों में 2 मार्च को गिरावट दर्ज की गई।>>हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहने से वैश्विक मुद्रास्फीति में 1 फीसदी तक की वृद्धि का अनुमान है।>>ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें शनिवार को 92 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई। संघर्ष लंबा चलने पर 100-130 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है, जिससे पूरी दुनिया में माल ढुलाई 20 फीसदी महंगी हो जाएगी।>>हॉर्मुज के रास्ते 20 फीसदी तेल और एलएनजी की सप्लाई रुकने से चीन, भारत, जापान जैसे देशों की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है।>>पिछले एक हफ्ते में दुनियाभर में 21,300 से अधिक उड़ानें रद्द की गई>>दुनिया भर के हवाई अड्डों पर 6 लाख से अधिक यात्री फंसे हुए।>>एयर इंडिया, इंडिगो, एमिरेट्स और कतर एयरवेज ने अपनी सेवाओं को निलंबित कर दिया है या रूट बदल दिए, जिससे प्रति उड़ान लागत 60,000 डॉलर तक बढ़ गई>>भारत से यूरोप जाने वाली उड़ानों को अब लंबा चक्कर काटकर जाना पड़ रहा है, जिससे कीमतें बढ़ गई हैं।

दुनिया का सबसे सुरक्षित स्थान में UAE के तीन शहर

नई दिल्‍ली। मध्य पूर्व में पिछले कुछ दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ गया है। इस संघर्ष का प्रभाव संयुक्त अरब अमीरात के शानदार शहरों अबू धाबी और दुबई तक भी पहुंच रहा है, जिन्हें आमतौर पर सुरक्षित ठिकाने और वैश्विक संघर्षों से अलग-थलग माना जाता रहा है। मध्य पूर्व में पिछले कुछ दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ गया है। इस संघर्ष का प्रभाव संयुक्त अरब अमीरात के शानदार शहरों अबू धाबी और दुबई तक भी पहुंच रहा है, जिन्हें आमतौर पर सुरक्षित ठिकाने और वैश्विक संघर्षों से अलग-थलग माना जाता रहा है। दरअसल, अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियानों में ईरान के कई महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया गया है। इसके जवाब में ईरान ने भी खाड़ी देशों और अमेरिकी सेना के ठिकानों सहित पूरे क्षेत्र में जवाबी मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। दुबई तक मिसाइल और ड्रोन हमलों की पहुंच के साथ ही वैश्विक संघर्षों से दुनिया के कई स्थानों के अछूते न रहने की चिंताएं बढ़ गई हैं। ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच जारी तनाव के बीच, यहां दुनिया के 10 सबसे सुरक्षित शहरों की सूची दी गई है। यह सूची Numbeo द्वारा तैयार की गई है (Safety Index 2026 के आधार पर)। दुनिया के 10 सबसे सुरक्षित शहर किंगदाओ (किंगडाओ), शेडोंग, चीन अबू धाबी, संयुक्त अरब अमीरात दोहा, कतर शारजाह, संयुक्त अरब अमीरात दुबई, संयुक्त अरब अमीरात ताइपे, ताइवान मनामा, बहरीन मस्कट, ओमान द हेग (डेन हाग), नीदरलैंड्स आइंडहोवन, नीदरलैंड्स गौरतल है कि Numbeo का डेटा वेबसाइट पर आने वाले आगंतुकों द्वारा दिए गए सर्वेक्षणों के आधार पर तैयार किया जाता है, जो स्थापित वैज्ञानिक और सरकारी सर्वेक्षणों की तरह संरचित होते हैं। वहीं, संयुक्त अरब अमीरात खुद दुनिया के 10 सबसे सुरक्षित देशों की सूची में शामिल नहीं है। इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (IEP) द्वारा जारी ग्लोबल पीस इंडेक्स (2025) के अनुसार, दुनिया के 10 सबसे शांतिपूर्ण (सुरक्षित) देश निम्नलिखित हैं… दुनिया के 10 सबसे सुरक्षित देश आइसलैंड: ग्लोबल पीस इंडेक्स में सबसे ऊपर, स्कोर 1.10 (लगभग) आयरलैंड: स्कोर 1.26 न्यूजीलैंड: स्कोर 1.28 ऑस्ट्रिया: स्कोर 1.29 स्विट्जरलैंड: स्कोर 1.29 सिंगापुर: स्कोर 1.36 पुर्तगाल: स्कोर 1.37 डेनमार्क: स्कोर 1.39 स्लोवेनिया: स्कोर 1.409 (लगभग) फिनलैंड: स्कोर 1.42 (लगभग) बता दें कि यह वैश्विक शांति सूचकांक 23 मात्रात्मक और गुणात्मक संकेतकों पर आधारित है, जिन्हें 1-5 के पैमाने पर भारित किया जाता है। स्कोर जितना कम, देश उतना ही अधिक शांतिपूर्ण और सुरक्षित माना जाता है। यह सूचकांक विश्व की 99.7 प्रतिशत आबादी को कवर करता है और उच्च सम्मानित स्रोतों से डेटा लेकर तैयार किया जाता है।

West Asia की जंग से दुनिया दो खेमों में विभाजित…. ट्रंप के सैन्य अभियान की घोषणा से गहरी हुई चिंता की लकीरें

वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया (West Asia) में भड़की भीषण जंग ने पूरी दुनिया को दो स्पष्ट कूटनीतिक ध्रुवों में विभाजित कर दिया है। शनिवार सुबह जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान (Iran) के मिसाइल उद्योग (Missile Industry) व उसकी नौसेना को नेस्तनाबूद करने के लिए बड़े सैन्य अभियान की घोषणा की, तो वैश्विक राजनीति की लकीरें और गहरी हो गईं। ईरान में हुए मिसाइल हमलों के बाद वाशिंगटन (Washington) ने इसे ईरानी शासन से खतरों को खत्म करने का मिशन बताया है। इस्त्राइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू (Israeli PM Benjamin Netanyahu) ने भी इसे अस्तित्व की रक्षा के लिए उठाया गया कदम बताया। उन्होंने कहा कि इससे ईरानी जनता को अपना भाग्य खुद चुनने का अवसर मिलेगा। संघर्ष शुरू होने के बाद भारत के कश्मीर से लेकर जर्मनी व ब्रिटेन तक कहीं इसके विरोध तो कहीं पक्ष में प्रदर्शन हुए हैं। ईरान के हमले की कई इस्लामी देशों ने भी आलोचना की है और अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त हमले का समर्थन किया है। यूक्रेन, कतर, यूएई, बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब आदि देशों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। यूएई ने ईरान के हमले को कायराना हरकत करार देते हुए जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखने की बात कही है, जबकि सऊदी अरब ने इसके गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। यूक्रेन ने भी इस तनाव के लिए सीधे तौर पर ईरान के आंतरिक दमन और हालिया महीनों में प्रदर्शनकारियों पर हुई हिंसा को जिम्मेदार ठहराया है। शांति की अपील वाले देशयूरोपीय संघ, जर्मनी, फ्रांस व ब्रिटेन ने ईरान से अंधाधुंध सैन्य कार्रवाई रोकने व वार्ता दोबारा शुरू करने की अपील की। फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और ब्रिटेन के पीएम कीर स्टारमर ने संयुक्त बयान में कहा, हम पश्चिम एशियाई देशों पर ईरानी हमलों की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। बेल्जियम ने कहा, ईरानी जनता अपनी सरकार के फैसलों की कीमत न चुकाए। रूस-चीन ईरान के पक्ष मेंकई ताकतवर देश ईरान के समर्थन में भी उतरे हैं। इनमें रूस, चीन, ओमान, तुर्किये व नॉर्वे शामिल हैं। रूस ने अमेरिका पर तीखा हमला करते हुए कहा कि वाशिंगटन ने ईरान के साथ चल रही परमाणु वार्ता का इस्तेमाल केवल अपने सैन्य हमलों को छिपाने के लिए किया। रूस की सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने कहा, शांतिदूत (ट्रंप) ने एक बार फिर अपना चेहरा दिखाया है। चीन ने भी सैन्य कार्रवाई तत्काल रोकने व ईरान की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की मांग की है। ब्राजील की सरकार ने ईरान में हमलों की कड़ी निंदा की और क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता जताई। विदेश मंत्रालय ने शनिवार को कहा कि ये हमले ऐसे समय में हुए, जब बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी, जिसे शांति का एकमात्र व्यवहारिक रास्ता बताया गया। ब्राजील ने स्पष्ट किया कि विवादों के समाधान के लिए संवाद ही वैध और टिकाऊ माध्यम है। ईरान आतंक का प्रमुख स्रोत : कार्नीकनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने पश्चिम एशिया पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि ईरान पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और आतंक का मुख्य स्रोत है। उसे किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल करने या विकसित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। मुंबई में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कार्नी ने कहा, ईरान का मानवाधिकार रिकॉर्ड दुनिया में सबसे खराब रिकॉर्डों में से एक है। कार्नी ने कहा, कनाडा और उसके अंतरराष्ट्रीय साझेदार लगातार ईरानी शासन से उसके परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने की अपील करते रहे हैं। उन्होंने कन्नानास्किस में हुए जी7 शिखर सम्मेलन और संयुक्त राष्ट्र की ओर से प्रतिबंधों की पुनः बहाली का भी उल्लेख किया। कार्नी ने मुंबई में नवाचार प्रदर्शनी में हिस्सा लिया और विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं से मुलाकात की। कार्नी ने शनिवार को मुंबई में भारत-कनाडा टैलेंट एंड इनोवेशन स्ट्रैटेजी की शुरुआत की।

दुनिया का सबसे सस्ता पेट्रोल बेचने वाला देश… यहां 1 कप चाय से भी बेहद कम कीमत..

नई दिल्ली। दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल (Cheapest Petrol) बेचने वाले देशों की लिस्ट में बड़े चौंकाने वाले तथ्य हैं। इन देशों में पेट्रोल की कीमत भारतीय नजरिए से न सिर्फ बहुत कम है, बल्कि कई में तो पेट्रोल की कीमत (Petrol-Price) भारत में बिकने वाले एक कप चाय (One Cup Tea) से भी सस्ती है। लीबिया (Libya) दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल बेचने वाला देश है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत मात्र 2.15 रुपये है। यानी कए कप चाय की कीमत में करीब 5 लीटर पेट्रोल यहां मिल रहा है। भारत के अधिकतर शहरों में एक कप चाय की कीमत 10 से 15 रुपये के बीच है। इस लिस्ट में ईरान दूसरे स्थान पर है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत केवल 2.59 रुपये है। जबकि, सबसे महंगा तेल हांगकांग में 340.53 रुपये लीटर है। यह जानकारी ग्लोबलपेट्रोलप्राइसेज डॉट कॉम के 9 फरवरी 2026 के आंकड़ों पर आधारित है। दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल बेचने वाले टॉप-10 देशदेश और पेट्रोल की अनुमानित कीमत (₹)1. लीबिया ₹2.152. ईरान ₹2.593. वेनेजुएला ₹3.174. अंगोला ₹29.635. कुवैत ₹30.986. अल्जीरिया ₹32.897. तुर्कमेनिस्तान ₹38.788. मिस्र ₹40.659. कजाकिस्तान ₹45.0610. कतर ₹46.02स्रोत: globalpetrolprices.com आज पेट्रोल-डीजल के रेट में कोई बदलाव नहींअगर भारत की बात करें तो आज ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम जारी कर दी हैं। पेट्रोल-डीजल के रेट में कोई बदलवा नहीं हुआ है। देश में सबसे सस्ता पेट्रोल आज भी पोर्ट ब्लेयर में ₹82.46 प्रति लीटर और डीजल ₹78.05 प्रति लीटर है। बता दें मार्च 2024 में पेट्रोल-डीजल के दाम ₹2 प्रति लीटर घटाए गए थे। इसके बाद अब तक कोई बदलाव नहीं हुआ है। भारत में सबसे सस्ता पेट्रोल बेचने वाले शहरपोर्ट ब्लेयर, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह: ₹82.46 प्रति लीटरईटानगर, अरुणाचल प्रदेश: ₹90.87 प्रति लीटरसिलवासा, दादरा और नगर हवेली: ₹92.37 प्रति लीटरदमन, दमन और दीव: ₹92.55 प्रति लीटरहरिद्वार, उत्तराखंड: ₹92.78 प्रति लीटररुद्रपुर, उत्तराखंड: ₹92.94 प्रति लीटरउना, हिमाचल प्रदेश: ₹93.27 प्रति लीटरदेहरादून, उत्तराखंड: ₹93.35 प्रति लीटरनैनीताल, उत्तराखंड: ₹93.41 प्रति लीटरस्रोत: इंडियन ऑयल भारत में सबसे सस्ता डीजल बेचने वाले शहरपोर्ट ब्लेयर, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह: ₹78.05 प्रति लीटरइटानगर, अरुणाचल प्रदेश: ₹80.38 प्रति लीटरजम्मू, जम्मू और कश्मीर: ₹81.32 प्रति लीटरसंबा, जम्मू और कश्मीर: ₹81.58 प्रति लीटरकठुआ, जम्मू और कश्मीर: ₹81.97 प्रति लीटरउधमपुर, जम्मू और कश्मीर: ₹82.15 प्रति लीटरचंडीगढ़: ₹82.44 प्रति लीटरराजौरी, जम्मू और कश्मीर: ₹82.64 प्रति लीटरस्रोत: इंडियन ऑयल