प्रो. मनोज कुमार
कुछ बात तो है उनमें, कोइ यूँ ही नरेन्द्र मोदी नहीं कहलाता. वैसे भी भारतीय राजनीति में अलग-अलग समय में अलग-अलग मानक गढ़े जाते हैं और वह ऐतिहासिक हो जाता है. एक और राजनीतिक मानक गढ़ा है प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने. लगातार 12 वर्ष प्रधानमंत्री बने रहने का उनका यह नया कीर्तिमान है. आप चाहें जितना विरोध कर लें, आप चाहें जितनी आलोचना कर लें लेकिन कुछ बात तो उनमें है कि कई बार विरोधी भी कायल हो जाते हैं. 12 वर्ष पूर्व उनका अभिनंदन, स्वागत और उम्मीदों का साल था.
भारतीय राजनीति में 12 वर्ष का समय बहुत होता है और जब चौतरफा हमले हो रहे हैं तब सत्ता में बने रहना सच में अर्थपूर्ण है. विरोध विरोधियों से हो तो सामान्य सी बात है लेकिन विरोध खुद के घर से हो तो यह चुनौती बन जाता है. विरोधियों के कुछ जायज हमले हैं तो कुछ नाजायज. कुछ हमले तो व्यक्तिगत हो रहे हैं, जिसे सही नहीं कहा जा सकता है. नीति-नियमों के आधार पर तार्किक विरोध का हर मंच पर स्वागत होता है लेकिन पूर्वाग्रहों से भरे विरोध कोई मायने नहीं रखता है. खैर, वैश्विक संकट का असर भारत में दिखने लगा.
यह भी सच है कि 12 वर्ष पहले युवाओं को जो उम्मीदों के पंख लगे थे, वह टूटकर बिखरने लगे. उम्मीद टूटी लेकिन नाउम्मीद नहीं हुए और वे अपने एक ‘वोट’ से अपने नायक मोदी को मजबूत करते रहे, यह भी एक बड़ा सच है. स्मरण कीजिए कि लोकपाल की माँग को लेकर यही नौजवान सडक़ पर उतरे तो कांग्रेस की सरकार पलट दी तो क्या यह नाराजगी मोदी को चुनौती नहीं दे सकती है? जरूर दे सकती है लेकिन तब जब युवा नाउम्मीद हो जाए. इन 12 वर्षों में ऐसे चाहे-अनचाहे बात-बयान हुआ और उनकी इमेज को सोशल मीडिया के जरिए तोडऩे की कोशिश की गई. अतिरेक में विरोधियों के साथ भी ऐसा ही हुआ और इसका दुष्परिणाम यह निकला कि सत्ता और प्रतिपक्ष में जो समन्वय होना चाहिए था, उसमें दरार पड़ गई. प्रतिपक्ष की प्रकृत्ति प्रतिरोध की रही है लेकिन विरोधी व्यवहार कई नीतिगत मुश्किलें उत्पन्न करता है और ऐसा हुआ भी.
समय एक सा नहीं रहता है और यह सबके साथ होता है, मोदी कोइ अपवाद नहीं लेकिन 12 वर्षों तक मोदी करिश्मा अपवाद है. इस अपवाद का सबसे बड़ा गुण है एक कुशल जनसंचार के रूप में स्वयं को स्थापित करना. ‘मन की बात’ के माध्यम से वे देश के करोड़ों लोगों तक पहुँच गए. माटी से खादी तक चर्चा कर हुनरमंद लोगोंं को उनके घेरे से बाहर लाकर मुख्यधारा से जोडक़र एक नया मुकाम दिया. प्रधानमंत्री मोदी तारीफ करें तो उनके हुनर को पंख लग जाना स्वाभाविक है. ‘मन की बात’ की हर ऐपिसोड में समाज के अंतिम छोर पर बैठे हुनरमंद को तलाश कर ले आते हैं. वे जनता की नब्ज भी जानते हैं और समझते हैं. और ऐसे में वे कभी खेल के मैदान में उतर जाते हैं तो कभी गाँव की चौपाल में खाट में बैठकर अपनापन का भाव जताते हैं.