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‘इनकंप्लीट रजिस्ट्रेशन’ वॉटरमार्क हटाने के लिए VC से हुई रजिस्ट्री, Indore में सामने आई बड़ी गड़बड़ी

नई दिल्ली। इंदौर में Sampada 2.0 के जरिए रजिस्टर्ड एक सेल डीड में कथित गड़बड़ी सामने आने के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है। मामला सिर्फ एक दस्तावेज तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पूरे रजिस्ट्रेशन सिस्टम की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि पहले से पूर्ण रजिस्टर्ड दस्तावेज को ‘इनकंप्लीट’ दिखाकर दोबारा रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से गुजारा गया, जो नियमों के विपरीत हो सकता है।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के मुताबिक, 12 दिसंबर 2025 को एक सेल डीड का पंजीयन संपदा 2.0 के माध्यम से विधिवत किया गया था। इस दस्तावेज में खरीदार इंदौर निवासी महिला और विक्रेता दुबई में रहने वाले पक्षकार थे। रजिस्ट्रेशन के दौरान सभी जरूरी औपचारिकताएं स्टाम्प ड्यूटी, फीस भुगतान, पहचान सत्यापन और दस्तावेज परीक्षण पूरी कर ली गई थीं। इसके बाद दस्तावेज को वैध रूप से रजिस्टर्ड मानते हुए रजिस्ट्रेशन नंबर और इंडेक्स भी जारी कर दिया गया।
लेकिन जब इसकी प्रमाणित कॉपी निकाली गई, तो हर पेज पर “INCOMPLETE REGISTRATION” का वॉटरमार्क दर्ज मिला। यहीं से विवाद शुरू हुआ और शिकायत विभाग तक पहुंची।
विभाग की सलाह और दूसरी रजिस्ट्री
शिकायत के बाद संबंधित अधिकारियों ने वॉटरमार्क हटाने में असमर्थता जताते हुए दोबारा रजिस्ट्रेशन कराने का सुझाव दिया। चूंकि विक्रेता दुबई में थे, इसलिए यह प्रक्रिया आसान नहीं थी। इसके बावजूद मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचा और आरोप है कि संपदा सिस्टम के जरिए दस्तावेज को दोबारा प्रोसेस में डालकर नया स्लॉट बुक किया गया। इस बार खरीदार ने स्थानीय स्तर पर उपस्थिति दर्ज कराई, जबकि विक्रेता ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रक्रिया पूरी की। बताया जा रहा है कि पहले से पूरी हो चुकी सभी औपचारिकताएं दोबारा कराई गईं सिर्फ वॉटरमार्क हटाने के उद्देश्य से।
तारीखों के अंतर ने बढ़ाए संदेह
सबसे बड़ा सवाल दस्तावेज की तारीखों को लेकर उठ रहा है। रजिस्ट्री पर मूल तारीख 12 दिसंबर 2025 अंकित है, जबकि प्रक्रिया 26 फरवरी 2026 की बताई जा रही है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि पहले से पूर्ण दस्तावेज को दोबारा प्रक्रिया में कैसे शामिल किया गया।
कानूनी जानकारों के अनुसार, Registration Act 1908 के तहत किसी भी रजिस्टर्ड दस्तावेज को बिना अदालत के आदेश के निरस्त या संशोधित नहीं किया जा सकता। ऐसे में यह मामला नियमों के उल्लंघन की आशंका को जन्म देता है।
शासन तक पहुंचा मामला
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों मुख्य सचिव, वाणिज्यिक कर विभाग और रजिस्ट्रार कार्यालय को नोटिस भेजा गया है। नोटिस में मांग की गई है कि भविष्य में रजिस्टर्ड दस्तावेज सीधे उच्च स्तर से जारी किए जाएं, ताकि जवाबदेही तय हो सके और किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की संभावना कम हो।
विभाग का पक्ष: तकनीकी गड़बड़ी
वहीं, विभाग की ओर से इसे तकनीकी समस्या बताया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि सॉफ्टवेयर अपग्रेडेशन के दौरान दस्तावेज की स्थिति ‘इनकंप्लीट’ दिखने लगी थी। बाद में दोनों पक्षों की सहमति से नियमानुसार दोबारा प्रक्रिया पूरी कराई गई। उनका दावा है कि पूरी कार्यवाही विधिसम्मत रही और इसमें किसी तरह की अनियमितता नहीं हुई।
सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
हालांकि, इस पूरे मामले ने डिजिटल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि तकनीकी कारणों से एक वैध दस्तावेज ‘अपूर्ण’ दिख सकता है, तो इससे आम नागरिकों की संपत्ति संबंधी सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों की निष्पक्ष जांच और सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है।

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