uae exit opec: नई दिल्ली । नई दिल्ली में वैश्विक तेल बाजार को लेकर एक बड़ी हलचल देखने को मिल रही है जब संयुक्त अरब अमीरात ने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक से खुद को अलग करने का ऐलान कर दिया है 1 मई से यूएई इस संगठन का हिस्सा नहीं रहेगा इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और कूटनीतिक समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है
ओपेक दरअसल दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों का एक अंतर सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना 14 सितंबर 1960 को बगदाद में की गई थी इसका उद्देश्य वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनाए रखना और सदस्य देशों के बीच उत्पादन तथा कीमतों को संतुलित रखना है शुरुआत में इसमें पांच देश शामिल थे जिनमें ईरान इराक कुवैत सऊदी अरब और वेनेजुएला शामिल थे समय के साथ यह संगठन विस्तार पाकर करीब 12 देशों तक पहुंच गया
ओपेक की खासियत यह है कि इसके सदस्य देश मिलकर तय करते हैं कि बाजार में कितना तेल उत्पादन होगा ताकि कीमतें संतुलित रहें अगर उत्पादन ज्यादा होता है तो कीमतें गिरती हैं और कम उत्पादन से कीमतें बढ़ जाती हैं ऐसे में ओपेक वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच माना जाता है
यूएई के इस फैसले के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और खासकर ईरान के साथ टकराव के बाद खाड़ी देशों के बीच रणनीतिक मतभेद सामने आए हैं इसके अलावा यूएई लंबे समय से अपने तेल उत्पादन को बढ़ाना चाहता है जबकि ओपेक के अंदर खासकर सऊदी अरब उत्पादन को सीमित रखने की नीति पर जोर देता रहा है
यूएई ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश रहा है लेकिन कोटा सिस्टम के कारण वह अपनी पूरी क्षमता के अनुसार उत्पादन नहीं कर पा रहा था ऐसे में संगठन से बाहर होने के बाद अब उसे अपनी रणनीति के अनुसार उत्पादन और निर्यात बढ़ाने की स्वतंत्रता मिल जाएगी
इस फैसले का असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ना तय माना जा रहा है विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यूएई उत्पादन बढ़ाता है तो बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों में गिरावट आ सकती है इसका सीधा फायदा भारत जैसे देशों को मिल सकता है जो बड़ी मात्रा में तेल आयात करते हैं सस्ती कीमतों पर तेल मिलने से महंगाई पर भी नियंत्रण संभव है
हालांकि इस कदम से ओपेक की एकजुटता और खासकर सऊदी अरब की नेतृत्व भूमिका कमजोर हो सकती है साथ ही बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है ओपेक के अलावा ओपेक प्लस नाम का एक व्यापक समूह भी है जिसमें रूस सहित कई अन्य देश शामिल हैं जो मिलकर तेल उत्पादन पर प्रभाव डालते हैं ऐसे में यूएई का यह कदम आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा संतुलन को किस दिशा में ले जाएगा यह देखना अहम होगा