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अवैध खनन मामला: जब्त होने थे वाहन, लेकिन भिंड-मुरैना-श्योपुर में जुर्माना लेकर छोड़े गए

चंबल । चंबल क्षेत्र में अवैध रेत खनन और परिवहन के खिलाफ चल रही कार्रवाई एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। परिवहन विभाग के उच्च स्तर से मिले पत्र के बाद यह खुलासा हुआ है कि मुरैना, भिंड और श्योपुर जिलों में नियमों के उल्लंघन के बावजूद बड़ी संख्या में वाहनों को जब्त करने के बजाय केवल जुर्माना वसूलकर छोड़ दिया गया।

परिवहन विभाग के सचिव मनीष सिंह द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही को गंभीर माना जाएगा। पत्र में संबंधित जिलों के अधिकारियों से कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड मांगा गया है और यह पूछा गया है कि जब नियमों के तहत वाहन राजसात किए जाने चाहिए थे, तो उन्हें क्यों छोड़ा गया।

जानकारी के अनुसार, श्योपुर जिले में पिछले छह दिनों में 11 वाहन बिना नंबर प्लेट के पकड़े गए, जिनमें से केवल एक जेसीबी को जब्त किया गया, जबकि बाकी 10 वाहनों को जुर्माना लेकर छोड़ दिया गया। इसी तरह मुरैना में भी 12 ट्रैक्टरों और अन्य 54 वाहनों पर जुर्माना लगाकर उन्हें छोड़ दिया गया, जबकि केवल दो ट्रैक्टरों को जब्त किया गया।

भिंड जिले की स्थिति भी इसी तरह चिंताजनक बताई जा रही है, जहां 28 से अधिक बिना नंबर प्लेट वाले वाहन पकड़े गए। इनमें अधिकांश ट्रकों पर केवल 500 रुपये का जुर्माना लगाकर उन्हें छोड़ दिया गया।

इस पूरे मामले ने प्रशासनिक कार्रवाई की गंभीरता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्र में यह भी कहा गया है कि जिन अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी करते हुए केवल जुर्माना वसूला, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।

परिवहन सचिव ने अपने निर्देश में यह भी स्पष्ट किया है कि अवैध खनन गतिविधियों में लगे सभी फर्जी, बिना नंबर प्लेट और नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों को तुरंत जब्त किया जाए और मोटर वाहन अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत राजसात की कार्रवाई की जाए।

गौरतलब है कि चंबल क्षेत्र में अवैध रेत खनन लंबे समय से एक गंभीर समस्या बना हुआ है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्ती दिखाई है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कार्रवाई की प्रभावशीलता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

अब इस ताजा खुलासे के बाद यह मामला और अधिक गंभीर हो गया है, क्योंकि यह न केवल नियमों के पालन पर बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर भी सीधा सवाल खड़ा करता है।

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