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पश्चिम की गलतफहमी: मोदी को एर्दोगन जैसा मानने की भूल क्यों?



नई दिल्ली(New Delhi)।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय लोकतंत्र को लेकर पश्चिमी देशों में लंबे समय से एक बहस चल रही है, जिसमें कई विश्लेषक भारत की राजनीतिक व्यवस्था की तुलना तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और हंगरी के विक्टर ओर्बन जैसे नेताओं से करते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह तुलना भारत की जटिल राजनीतिक संरचना को समझने में एक बड़ी भूल है।

हाल ही में पीएम मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान एक पत्रकार की टिप्पणी और उसके बाद सोशल मीडिया पर उठा विवाद भी इसी बहस को और तेज करता है। पश्चिमी मीडिया के कुछ वर्गों पर आरोप लगते हैं कि वे भारत और मोदी सरकार को लेकर एक नकारात्मक नैरेटिव गढ़ते हैं, जबकि दूसरी ओर भारत एक विशाल और बहुस्तरीय लोकतंत्र के रूप में काम करता है।

विशेषज्ञ चितिग्य बाजपेयी सहित कई विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिमी देश अक्सर भारत के लोकतंत्र को एक सरल और एकतरफा नजरिए से देखते हैं। जबकि भारत का राजनीतिक ढांचा राज्यों, क्षेत्रीय दलों और सामाजिक विविधता के कारण बेहद जटिल और बहु-स्तरीय है। यह स्थिति तुर्की या हंगरी जैसे देशों से पूरी तरह अलग है, जहां सत्ता संरचना अपेक्षाकृत केंद्रीकृत मानी जाती है।

विश्लेषकों के मुताबिक, भाजपा की चुनावी सफलता के पीछे केवल राजनीतिक रणनीति नहीं बल्कि कई सामाजिक और आर्थिक कारण भी हैं। इसमें विपक्ष की कमजोरी, संगठनात्मक ढांचे में असंतुलन और राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत वैकल्पिक नेतृत्व का अभाव शामिल है। लंबे समय से कांग्रेस जैसे बड़े दल संगठनात्मक संकट से गुजर रहे हैं, जबकि क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने राज्यों तक सीमित हो गए हैं।

इसके साथ ही भाजपा ने “विकास, राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजनाओं” के मिश्रण के जरिए व्यापक जनाधार तैयार किया है, जिसने शहरी, ग्रामीण और गरीब वर्गों तक पार्टी की पहुंच बढ़ाई है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पश्चिमी मीडिया भारत को अक्सर एक एकल राजनीतिक ब्लॉक की तरह देखता है, जबकि वास्तविकता यह है कि देश में राजनीतिक विविधता बेहद व्यापक है। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों के चुनाव परिणाम यह दिखाते हैं कि भारत में राजनीतिक रुझान लगातार बदलते रहते हैं और किसी एक विचारधारा का पूर्ण प्रभुत्व नहीं है।

हालांकि, यह भी स्वीकार किया जाता है कि भारत में मीडिया स्वतंत्रता, संस्थागत संतुलन और लोकतांत्रिक ढांचे को लेकर आंतरिक बहस मौजूद है, लेकिन कुल मिलाकर देश का लोकतांत्रिक सिस्टम अब भी प्रतिस्पर्धी और सक्रिय है।

इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि पश्चिमी देशों द्वारा भारत की तुलना तुर्की या हंगरी जैसे देशों से करना एक अधूरी और सतही समझ को दर्शाता है, जो भारत की जमीनी राजनीतिक वास्तविकता को सही तरह से नहीं पकड़ पाता।

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