आस्था या खतरा नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध से बढ़ा प्रदूषण जलीय जीवन पर संकट

भोपाल । मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध प्रवाहित करने की घटना अब गंभीर पर्यावरणीय चिंता का विषय बन गई है। धार्मिक आस्था के तहत किए गए इस आयोजन के बाद विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इसका असर केवल तत्काल नहीं बल्कि लंबे समय तक देखने को मिलेगा। विशेष रूप से इसका दूसरा चरण जिसे सेकेंड फेज कहा जा रहा है वह और भी खतरनाक साबित हो सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञ सुभाष सी पांडे के अनुसार इतनी बड़ी मात्रा में दूध नदी में जाने से पानी का संतुलन तेजी से बिगड़ जाता है। शुरुआत में सबसे बड़ा असर घुलित ऑक्सीजन के स्तर पर पड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में पानी में ऑक्सीजन का स्तर 6 से 8 mg प्रति लीटर होता है लेकिन दूध के मिश्रण के बाद यह घटकर 1 से 3 mg प्रति लीटर तक पहुंच सकता है। इससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए जीवन संकट खड़ा हो जाता है और उनकी मौत शुरू हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी मात्रा में दूध को वैज्ञानिक दृष्टि से डेयरी वेस्ट माना जाता है जो सामान्य सीवेज से भी अधिक खतरनाक होता है। दूध में मौजूद कार्बनिक तत्व पानी में घुलकर तेजी से बैक्टीरिया की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं जिससे प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी का स्तर सामान्य 3 mg प्रति लीटर से बढ़कर 1000 से 1300 mg प्रति लीटर तक पहुंच सकता है जो बेहद खतरनाक स्थिति है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू सेकेंड फेज में सामने आता है। पहले चरण में जहां ऑक्सीजन की कमी से जलीय जीव मरते हैं वहीं दूसरे चरण में उनके सड़ने से पानी में बैक्टीरिया और फंगस की मात्रा तेजी से बढ़ती है। यह एक चेन रिएक्शन की तरह काम करता है जिसमें पानी की गुणवत्ता लगातार गिरती जाती है और प्रदूषण लंबे समय तक बना रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर महीनों तक देखा जा सकता है। इसका प्रभाव केवल एक स्थान तक सीमित नहीं रहता बल्कि जहां दूध प्रवाहित किया गया वहां से कई किलोमीटर डाउनस्ट्रीम तक पानी पीने योग्य नहीं रहता। इससे आसपास के गांवों और लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। नर्मदा का पानी सामान्यतः क्षारीय प्रकृति का होता है लेकिन दूध के अम्लीय गुण इसके संतुलन को बिगाड़ सकते हैं जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि नदियों के प्रदूषण का मुख्य कारण मानव गतिविधियां ही हैं चाहे वे धार्मिक हों या सामाजिक। पूजा सामग्री फल फूल और अन्य वस्तुओं का विसर्जन भी नदी की सेहत को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है। कानूनी रूप से भी इस तरह की गतिविधियों पर रोक है। जल निवारण एवं प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1974, राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010 और जैविक विविधता अधिनियम 2002 के तहत जल संसाधनों को व्यवस्थित करना दंडनीय है लेकिन जमीनी स्तर पर सख्ती की कमी के कारण ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं बल्कि जागरूकता और जिम्मेदारी से संभव है। आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है ताकि धार्मिक परंपराएं भी निभें और प्रकृति को नुकसान भी न पहुंचे। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में नर्मदा जैसी महत्वपूर्ण नदी की स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।
कितनी पढ़ाई की डॉ. अंबेडकर ने? जानिए उनके जीवन के ऐतिहासिक योगदान

नई दिल्ली। Dr. BR Ambedkar भारतीय इतिहास के सबसे शिक्षित और प्रभावशाली नेताओं में से एक माने जाते हैं। उन्होंने न सिर्फ उच्च शिक्षा हासिल की, बल्कि अपने ज्ञान और संघर्ष से देश के सामाजिक और संवैधानिक ढांचे को मजबूत किया। डॉ. अंबेडकर ने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी पढ़ाई की। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया और इसके बाद अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में मास्टर्स और पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसके अलावा उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से भी डॉक्टरेट और कानून की पढ़ाई (Barrister-at-Law) पूरी की। उस दौर में इतनी उच्च शिक्षा हासिल करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। डॉ. अंबेडकर जयंती के मौके पर पीएम मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।Dr. BR Ambedkar ने कितनी पढ़ाई की और क्यों माने जाते हैं सबसे शिक्षित नेताडॉ. अंबेडकर ने कुल मिलाकर कई उच्च डिग्रियां हासिल की थीं, जिनमें अर्थशास्त्र, कानून और राजनीति जैसे विषय शामिल थे। वे पहले भारतीयों में से थे जिन्होंने विदेश जाकर इतनी ऊंची शिक्षा प्राप्त की। उनकी पढ़ाई सिर्फ डिग्री तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने समाज को समझने और सुधारने के लिए अपने ज्ञान का इस्तेमाल किया। शिक्षा को वे सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा हथियार मानते थे और उन्होंने दलितों व पिछड़े वर्गों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। संविधान निर्माण से लेकर सामाजिक सुधार तक योगदानडॉ. अंबेडकर का सबसे बड़ा योगदान भारतीय संविधान के निर्माण में रहा। उन्हें संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन बनाया गया था और उन्होंने देश को एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा दिया। इसके अलावा उन्होंने दलितों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया। उन्होंने छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और समाज में समानता की नींव रखी। उन्होंने श्रम कानूनों, महिलाओं के अधिकार और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम किए। रिजर्वेशन नीति और सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करने में उनका योगदान बेहद अहम रहा। कुल मिलाकर, डॉ. भीमराव अंबेडकर न सिर्फ एक महान विद्वान थे, बल्कि ऐसे समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने अपने ज्ञान और संघर्ष से भारत को नई दिशा दी।
बजट सेगमेंट में धमाका: Realme का नया 5G फोन शानदार फीचर्स के साथ लॉन्च

नई दिल्ली। Realme आज भारतीय बाजार में अपना नया बजट 5G स्मार्टफोन Realme Narzo 100 Lite 5G लॉन्च करने जा रहा है। यह फोन खासतौर पर उन यूजर्स के लिए लाया जा रहा है जो कम कीमत में बड़ी बैटरी और स्मूद परफॉर्मेंस चाहते हैं। 7000mAh बैटरी बनेगी सबसे बड़ी ताकतइस स्मार्टफोन की सबसे बड़ी खासियत इसकी 7000mAh की बड़ी बैटरी है, जो लंबे समय तक इस्तेमाल का भरोसा देती है। कंपनी इसमें बायपास चार्जिंग फीचर भी दे रही है, जिससे गेमिंग के दौरान फोन ज्यादा गर्म नहीं होगा। 144Hz डिस्प्ले के साथ स्मूद एक्सपीरियंसफोन में 6.8 इंच की बड़ी डिस्प्ले दी गई है, जो 144Hz रिफ्रेश रेट और 180Hz टच सैंपलिंग रेट सपोर्ट करती है। इसके अलावा 900 निट्स की पीक ब्राइटनेस से धूप में भी स्क्रीन साफ दिखाई देगी। दमदार प्रोसेसर और कूलिंग सिस्टमRealme Narzo 100 Lite 5G में मीडियाटेक डाइमेंसिटी 6300 प्रोसेसर दिया गया है, जो मल्टीटास्किंग और गेमिंग के लिए बेहतर परफॉर्मेंस देगा। साथ ही इसमें एयरफ्लो वेपर चैंबर कूलिंग सिस्टम भी मिलेगा, जिससे फोन ओवरहीट नहीं होगा। कैमरा और AI फीचर्सफोन में 13 मेगापिक्सल का AI रियर कैमरा दिया गया है। इसके अलावा स्मार्ट टच 2.0 और कई AI फीचर्स भी इस डिवाइस में मिलेंगे, जो यूजर एक्सपीरियंस को बेहतर बनाएंगे। यह स्मार्टफोन IP64 रेटिंग के साथ आएगा, जिससे यह धूल और पानी से कुछ हद तक सुरक्षित रहेगा। फोन एंड्रॉयड 16 पर आधारित Realme UI 7.0 पर काम करेगा। कीमत और मुकाबलारिपोर्ट्स के अनुसार, इस फोन की कीमत ₹10,000 से ₹12,000 के बीच रखी जा सकती है। इस रेंज में यह फोन Redmi 15C 5G, POCO M7 5G और Samsung Galaxy F70e को कड़ी टक्कर दे सकता है। Realme Narzo 100 Lite 5G बड़ी बैटरी, हाई रिफ्रेश रेट डिस्प्ले और 5G सपोर्ट के साथ बजट सेगमेंट में एक मजबूत विकल्प बन सकता है। अब यूजर्स को इसके लॉन्च के बाद कीमत और परफॉर्मेंस का इंतजार है।
हमारे जनप्रतिनिधि और संविधान: जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व

डॉ राकेश कुमार आर्य. देश की संसद अर्थात शीर्ष सभा के सभासद कैसे हों ? – इस पर अपना मत व्यक्त करते हुए ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि ” सभा में चारों वेद, कारण अकारण का ज्ञाता न्यायशास्त्र, निरुक्त, धर्मशास्त्र आदि के वेत्ता विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ सभासद् हों। देश विषयक प्रमुख निर्णय लेने वाली सभा में दस विद्वानों से न्यून न होने चाहियें। स्वामी दयानंद जी महाराज ने यहां पर स्पष्ट किया है की सभा में चारों वेदों के ज्ञाता उपस्थित होने चाहिए। प्रश्न है कि स्वामी जी ने सबसे पहले चारों वेदों के ज्ञाता को ही शीर्ष सभा का सभासद होने के लिए योग्य क्यों माना ? इसका उत्तर केवल एक है कि वेद सृष्टि का आदि संविधान है। ईश्वर प्रदत्त सबसे पहला संविधान है। यह संविधान हमें चार अरब 32 करोड़ के सृष्टि काल के लिए मिला है। यद्यपि ईश्वर का यह ज्ञान सृष्टि दर सृष्टि यथावत चलता रहता है। वेद नाम के इस संविधान की व्यवस्थाओं का अर्थात विधिक व्यवस्थाओं का मर्मज्ञ होता है, वही धर्मज्ञ होता है। उससे अपेक्षा की जा सकती है कि वह संसार के लिए उपयोगी चिंतन करेगा और ऐसा कोई भी कार्य नहीं करेगा जिससे किसी का अहित होता हो। वह अपने विवेक का संतुलन बनाकर काम करेगा। विवेक का संतुलन बनाकर ही नीतियों का निर्धारण करेगा और विवेक का संतुलन बनाकर ही उन नीतियों को लागू करेगा। ऐसे व्यक्ति से कभी भी किसी भी प्रकार के उत्पात, उन्माद या उग्रवाद की अपेक्षा नहीं की जा सकती। तीन सभासद मिलकर व्यवस्था करेंस्वामी दयानंद जी की यह भी मान्यता रही है कि ” जिस सभा में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद के जानने वाले तीन सभासद् होके व्यवस्था करें उस सभा की की हुई व्यवस्था का भी कोई उल्लंघन न करे। यदि एक अकेला सब वेदों को जानने वाला द्विजों में उत्तम संन्यासी जिस धर्म, कर्तव्य, सिद्धान्त व नीति की व्यवस्था करे, वही श्रेष्ठ धर्म व न्याय है क्योंकि अज्ञानियों के सहस्रों लाखों करोड़ों लोग मिल के जो कुछ व्यवस्था करें उस को कभी न मानना चाहिये।” स्वामी दयानंद जी महाराज ने कहा कि सभाओं में विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ सभासद् हों’ जब ऐसे लोगों को प्रजा के बीच से निकालकर संसद तक भेजा जाएगा या संसद में स्थान दिया जाएगा तो वह विद्वानों की सभा होगी। न्यायकारी सभासदों से सुभूषित होगी। ऐसे लोग भूसुर कहलाते हैं। भूसुर ही संसार में व्यवस्था बना सकते हैं।इसलिए भूसुरों को संसद में स्थान मिले, सम्मान मिले – यही ऋषि दयानंद जी का मंतव्य रहा। भूसुरों को जब आप संसद में भेजेंगे तो वे वहां रहकर न्यायपूर्ण नीतियों का विधान करेंगे। महर्षि दयानन्द जी महाराज की स्पष्ट मान्यता रही कि यदि आप किसी एक व्यक्ति विशेष के हाथों में सारे अधिकार सौंप देंगे तो न्याय, नीति और धर्म तीनों ही मर जाएंगे। स्वामी जी का स्पष्ट कहना था कि ” एक व्यक्ति वा राजा को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देना चाहिए किन्तु राजा जो सभापति, तदधीन सभा, सभाधीन राजा, राजा और सभा प्रजा के आधीन और प्रजा राजसभा के आधीन रहें।”हमारे ऋषि पूर्वज इस प्रकार के मानवीय स्वभाव की तानाशाही से पूर्व में ही परिचित रहे हैं। यही कारण रहा कि उन्होंने ” शक्ति पृथक्करण ” के सिद्धांत को अपनाया। महर्षि मनु की मनुस्मृति इस संबंध में हमारा सही मार्गदर्शन करती है। न्याय और दया में है सूक्ष्म अंतरमहर्षि दयानन्द जी महाराज कहते हैं :-” ईश्वर दयालु एवं न्यायकारी है। न्याय और दया में नाम मात्र ही भेद है, क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से। दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंद होकर दु:खों को प्राप्त न हो, वही दया कहलाती है। जिसने जैसा जितना बुरा कर्म किया है उसको उतना है दण्ड देना चाहिये , उसी का नाम न्याय है। जो अपराध का दण्ड न दिया जाय तो न्याय का नाश हो जाय। क्योंकि एक अपराधी को छोड़ देने से सहस्त्रों धर्मात्मा पुरुषों को दु:ख देना है। जब एक को छोड़ने से सहस्त्रों मनुष्यों को दु:ख प्राप्त होता हो तो वह दया किस प्रकार हो सकती है ? दया वही है कि अपराधी को कारागार में रखकर पाप करने से बचाना। निरन्तर एवं जघन्य अपराध करने पर मृत्यु दण्ड देकर अन्य सहस्त्रों मनुष्यों पर दया प्रकाशित करना। संसार में तो सच्चा झूठा दोनों सुनने में आते हैं। किन्तु उसका विचार से निश्चय करना अपना अपना काम है। ईश्वर की पूर्ण दया तो यह है कि जिसने जीवों के प्रयोजन सिद्ध होने के अर्थ जगत में सकल पदार्थ उत्पन्न करके दान दे रक्खे हैं। इससे भिन्न दूसरी बड़ी दया कौन सी है ? अब न्याय का फल प्रत्यक्ष दीखता है कि सुख दुख की व्याख्या अधिक और न्यूनता से प्रकाशित कर रही है। इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सबको सुख होने और दुख छूटने की इच्छा और क्रिया करना है वह दया और ब्राह्य चेष्टा अर्थात बंधन छेदनादि यथावत दण्ड देना न्याय कहलाता है। दोनों का एक प्रयोजन यह है कि सब को पाप और दुख से प्रथक कर देना।” न्यायपरक लोकतंत्र और वेद की व्यवस्थास्वामी जी ने वेद मंत्रों के आधार पर इस व्यवस्था को दिया। वेद वास्तविक न्यायपरक लोकतंत्र के समर्थक हैं। वेद की लोकतंत्र की इसी पवित्र भावना का सम्मान करते हुए महर्षि मनु द्वारा मनुस्मृति में राजधर्म का प्रतिपादन किया गया। वह भी इसी मत के थे। वेद की स्पष्ट मान्यता रही है कि किसी भी एक व्यक्ति के हाथों में सत्ता सौंपना मनुष्य की अधिनायकवादी प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना होता है। जैसे ही मनुष्य को यह आभास होता है कि अब वह सबसे ऊपर हो गया है और सभी लोग उसकी बुद्धि का लोहा मान रहे हैं अथवा उसके बाहुबल के समक्ष नतमस्तक हैं, तुरंत वह घमंड से फूल जाता है। ऐसा व्यक्ति सत्ता के मद में चूर होकर जनता के हितों के साथ खिलवाड़ कर सकता है। जैसा कि हमने मुस्लिम शासकों को जनता पर अत्याचार करते हुए देखा भी है। मनुष्य को कभी बेलगाम नहीं होने देना चाहिए। उस पर ऐसी दूसरी बुद्धियों का पहरा रहना चाहिए जो उसकी बुद्धि से कहीं अधिक पवित्र और निर्मल हों। यदि दुर्बुद्धि मनुष्य किसी
डॉ. अंबेडकर जयंती पर बड़ा फैसला: उम्रकैद काट रहे 9 बंदी हुए रिहा

नई दिल्ली। ग्वालियर की सेंट्रल जेल में अंबेडकर जयंती के अवसर पर एक अहम मानवीय निर्णय लिया गया। इस मौके पर आजीवन कारावास की सजा काट रहे 9 बंदियों को रिहा किया गया, जिनमें एक महिला बंदी भी शामिल है। शासन द्वारा यह निर्णय उनके अच्छे आचरण और सुधारात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी को देखते हुए लिया गया। 14 साल से अधिक सजा काट चुके थे सभी बंदीरिहा किए गए सभी बंदी हत्या जैसे गंभीर अपराधों में दोषी पाए गए थे और 14 साल से अधिक समय तक जेल में सजा काट चुके थे। वे एक ही प्रकरण से जुड़े थे और लंबे समय से उनके व्यवहार और सुधार को लगातार परखा जा रहा था। शासन की मंजूरी के बाद पूरी हुई प्रक्रियाजेल प्रशासन ने इन बंदियों के नाम और आचरण से संबंधित रिपोर्ट शासन को भेजी थी। प्रस्ताव पर स्वीकृति मिलने के बाद उनकी रिहाई की औपचारिकताएं पूरी की गईं। जेल अधीक्षक विदित सरवईया के अनुसार, सभी बंदियों का आचरण संतोषजनक रहा, जिसके आधार पर उनकी शेष सजा माफ की गई। परिजनों से मिलकर भावुक हुए बंदीजेल से बाहर आते ही बंदियों ने अपने परिवारजनों से मुलाकात की। लंबे समय बाद मिलन के इस भावुक क्षण में कई बंदी और उनके परिजन भावुक नजर आए और एक-दूसरे को गले लगाकर खुशी जताई। सम्मान के साथ दी गई विदाईरिहाई से पहले जेल प्रशासन द्वारा सभी बंदियों को शॉल और श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया। इस दौरान जेल अधिकारी और सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे, जिन्होंने इस पहल को पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। अब अन्य अवसरों पर भी मिल रही राहतपहले केवल गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर ही इस तरह की सजा माफी दी जाती थी, लेकिन पिछले दो वर्षों से अंबेडकर जयंती और गांधी जयंती जैसे अवसरों पर भी यह प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिससे सुधार की दिशा में बंदियों को प्रोत्साहन मिल रहा है। रिहा हुए बंदियों के नामरिहा किए गए बंदियों में सुरेश उर्फ सज्जन, पंचम जाटव, आशीष शर्मा, जमुना अहिरवार, छोटे और छोटया माली, अजय तोमर, मोहर सिंह, महेंद्र सिंह और लीलाबाई शामिल हैं।
परंपरा और राजनीति का संगम, बैतूल में बैलगाड़ी पर पहुंचे ,भाजपा प्रदेश अध्यक्ष

बैतूल । मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में राजनीतिक गतिविधियों के बीच एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली जब भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल ने ‘गांव बस्ती चलो अभियान’ के तहत ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा किया। इस दौरान उनका अंदाज पारंपरिक और सादगी से भरा रहा जिसने न केवल स्थानीय लोगों का ध्यान खींचा बल्कि पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय भी बन गया। घोड़ाडोंगरी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम चिरापाटला में जब वे पहुंचे तो उन्होंने आधुनिक वाहनों की बजाय बैलगाड़ी का सहारा लिया। बैलगाड़ी पर सवार होकर गांव में प्रवेश करते ही ग्रामीणों में उत्साह का माहौल बन गया। लोगों ने इस पहल को जमीन से जुड़े नेता की पहचान के रूप में देखा और उनका स्वागत भी गर्मजोशी से किया। यह दृश्य केवल एक प्रतीकात्मक कदम नहीं था बल्कि इसके जरिए ग्रामीण जीवन से जुड़ाव और परंपराओं के प्रति सम्मान का संदेश देने की कोशिश भी साफ नजर आई। अक्सर राजनीतिक दौरों में दिखने वाली औपचारिकता से हटकर यह अंदाज लोगों को ज्यादा करीब और वास्तविक लगा। ग्रामीणों ने इसे अपनी संस्कृति और जीवनशैली के प्रति सम्मान के रूप में लिया जिससे जनसंपर्क अभियान को और मजबूती मिली। इस दौरे का उद्देश्य केवल लोगों से मिलना जुलना ही नहीं बल्कि उनकी समस्याओं को समझना और सरकार की योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाना भी था। अभियान के तहत उन्होंने गांव के लोगों से सीधा संवाद किया उनकी समस्याएं सुनी और समाधान के लिए भरोसा दिलाया। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में इस तरह के प्रयास चुनावी रणनीति का भी हिस्सा होते हैं जहां नेता सीधे जनता के बीच जाकर विश्वास बनाने की कोशिश करते हैं। हालांकि आम लोगों के लिए यह पहल इसलिए खास बन जाती है क्योंकि इससे उन्हें यह महसूस होता है कि उनका प्रतिनिधि उनकी जिंदगी और समस्याओं को करीब से समझता है। गांव बस्ती चलो अभियान के माध्यम से पार्टी ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रयास में है और इस तरह के प्रतीकात्मक कदम उस रणनीति को और प्रभावी बना रहे हैं। बैलगाड़ी पर सवार होकर गांव पहुंचना एक ऐसा दृश्य रहा जिसने यह संदेश दिया कि राजनीति केवल मंच और भाषण तक सीमित नहीं है बल्कि जनता के बीच जाकर उनकी भाषा और जीवनशैली को समझना भी उतना ही जरूरी है। बैतूल में इस दौरे ने यह साफ कर दिया कि जमीनी स्तर पर जुड़ाव बनाने के लिए सादगी और प्रतीकात्मकता दोनों ही अहम भूमिका निभाते हैं। आने वाले समय में इस अभियान का असर कितना व्यापक होता है यह देखना दिलचस्प होगा लेकिन फिलहाल यह पहल लोगों के बीच चर्चा और आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
मुकाबले से पहले पिच का मिजाज: चेन्नई में स्पिन का जादू चलेगा या हाई स्कोरिंग मैच?

नई दिल्ली। IPL 2026 में चेन्नई के एमए चिदंबरम स्टेडियम में चेन्नई सुपर किंग्स और कोलकाता नाइट राइडर्स (CSK vs KKR) के बीच मैच खेला जाना है। आइए जानते इस पिच पर बल्लेबाजों या गेंदबाजों-किसे मदद मिलेगी। चेपॉक की पिच: स्पिनर्स का गढ़ या बल्लेबाजों का मौका?चेन्नई के एमए चिदंबरम स्टेडियम की पिच पारंपरिक रूप से धीमी और स्पिन फ्रेंडली मानी जाती है। यहां गेंद रुककर आती है, जिससे बल्लेबाजों को शॉट खेलने में दिक्कत होती है। यही वजह है कि स्पिन गेंदबाज मैच में अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि, IPL 2026 में अब तक यहां खेले गए मैचों में बल्लेबाजों ने भी अच्छे रन बनाए हैं। औसतन पहली पारी का स्कोर करीब 160 रन के आसपास रहता है, जो एक संतुलित मुकाबले की ओर इशारा करता है। इस पिच पर टिककर खेलने वाले बल्लेबाज बड़ी पारी खेल सकते हैं, जबकि जल्दबाजी करने वाले खिलाड़ियों के लिए मुश्किलें बढ़ जाती हैं। CSK vs KKR: टॉस और मौसम का बड़ा रोलचेन्नई की गर्मी और नमी मैच पर बड़ा असर डालती है। खासकर दूसरी पारी में ओस (dew) आने की संभावना रहती है, जिससे गेंदबाजों को गेंद पकड़ने में परेशानी होती है। ऐसे में टॉस जीतने वाली टीम पहले गेंदबाजी करना पसंद कर सकती है, ताकि बाद में बल्लेबाजी करते समय ओस का फायदा मिल सके। दोनों टीमों की स्थिति भी इस मैच को दिलचस्प बनाती है। चेन्नई सुपर किंग्स अपनी पिछली जीत के बाद लय बरकरार रखना चाहेगी, जबकि कोलकाता नाइट राइडर्स पहली जीत की तलाश में उतरेगी। कुल मिलाकर, यह मुकाबला सिर्फ खिलाड़ियों के बीच नहीं बल्कि पिच और रणनीति के बीच भी होगा—जहां स्पिन, धैर्य और सही फैसले जीत तय करेंगे।
श्रद्धालुओं की सुविधा पर जोर: घाट तक पहुंचने के लिए प्लान A और B तैयार

उज्जैन । धार्मिक नगरी उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ महापर्व 2028 को लेकर प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। करोड़ों श्रद्धालुओं के आगमन को ध्यान में रखते हुए पार्किंग और यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाने पर विशेष फोकस किया जा रहा है। मेला अधिकारी और कलेक्टर ने किया स्थलीय निरीक्षणसिंहस्थ मेला अधिकारी आशीष सिंह और कलेक्टर रोशन कुमार सिंह ने इंदौर-देवास मार्ग से आने वाले वाहनों के लिए प्रस्तावित पार्किंग स्थलों का निरीक्षण किया। इस दौरान विभिन्न स्थानों की व्यवस्थाओं का जायजा लिया गया और आवश्यक सुधारों के निर्देश दिए गए। संभागायुक्त का निर्देश: घाट तक आसान हो पहुंचनिरीक्षण के दौरान संभागायुक्त ने स्पष्ट निर्देश दिए कि पार्किंग स्थल से शिप्रा नदी घाट तक श्रद्धालुओं की आवाजाही पूरी तरह सुगम और सुरक्षित होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी स्थिति में श्रद्धालुओं को घाट तक पहुंचने में परेशानी नहीं होनी चाहिए। प्रमुख स्नान पर्वों के लिए वैकल्पिक योजना तैयारप्रशासन ने प्रमुख स्नान तिथियों के दौरान भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए प्लान A और प्लान B तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य यह है कि यदि एक पार्किंग स्थल पर दबाव बढ़े, तो तुरंत वैकल्पिक व्यवस्था लागू की जा सके और यातायात बाधित न हो। कई गांवों में विकसित होंगे पार्किंग स्थलनिरीक्षण के दौरान ग्राम गंगेडी, धरमबड़ला, सिकंदरी, दाऊदखेड़ी, हाटकेश्वर और गोठड़ा क्षेत्रों का दौरा किया गया। इन स्थानों पर बड़े स्तर पर पार्किंग व्यवस्था विकसित करने की योजना है, जिससे बाहरी राज्यों से आने वाले वाहनों को व्यवस्थित रूप से रोका जा सके। कलेक्टर का निर्देश: जल्द बने विस्तृत कार्य योजनाकलेक्टर रोशन कुमार सिंह ने कहा कि सिंहस्थ महापर्व में पार्किंग व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। उन्होंने सभी विभागों को समन्वय बनाकर जल्द से जल्द विस्तृत कार्य योजना तैयार करने के निर्देश दिए, ताकि समय रहते सभी व्यवस्थाएं पूरी की जा सकें। बेहतर यातायात के लिए प्रशासन का फोकसउज्जैन विकास प्राधिकरण, एमपीआईडीसी और यातायात विभाग के अधिकारी भी इस निरीक्षण में शामिल रहे। सभी विभाग मिलकर इस महापर्व को सफल और व्यवस्थित बनाने के लिए कार्य कर रहे हैं, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
उज्जैन में भक्ति का रंग: महाकाल के भस्म आरती में हुआ विशेष श्रृंगार दर्शन

उज्जैन। धार्मिक नगरी उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में मंगलवार तड़के भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल का अद्भुत और दिव्य श्रृंगार किया गया। सुबह करीब 4 बजे मंदिर के पट खुलते ही पंडे-पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विधि-विधान से पूजन-अर्चना प्रारंभ की। जलाभिषेक से पंचामृत तक, परंपराओं का पूर्ण निर्वाहपूजन की शुरुआत गर्भगृह में स्थापित देव प्रतिमाओं के पूजन से हुई, जिसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक किया गया। ‘हरिओम’ मंत्रों के साथ जल अर्पित कर भगवान का ध्यान किया गया और कपूर आरती उतारकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया गया। भांग-चंदन और त्रिपुंड तिलक से राजा स्वरूप श्रृंगारअभिषेक के बाद भगवान महाकाल को भांग, चंदन और त्रिपुंड तिलक अर्पित किया गया। इसके साथ ही आभूषणों से सुसज्जित कर उन्हें राजा स्वरूप में सजाया गया। जटाधारी स्वरूप में सजे भगवान महाकाल की छवि अत्यंत मनमोहक और दिव्य प्रतीत हो रही थी, जिसे देखकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। फूलों की सुगंध और भोग से महका मंदिर परिसरभगवान महाकाल को मोगरा और गुलाब के सुगंधित फूलों से सजाया गया। इसके साथ ही फल और मिष्ठान का भोग अर्पित किया गया। पूरे मंदिर परिसर में भक्ति और आस्था का वातावरण बना रहा, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पावन अवसर के साक्षी बने। महा निर्वाणी अखाड़े द्वारा भस्म अर्पण की परंपराभस्म आरती के दौरान महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान को भस्म अर्पित की गई। मान्यता है कि भस्म अर्पण के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसका धार्मिक महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है। आस्था का अद्वितीय संगम, भक्तों की उमड़ी भीड़भस्म आरती में शामिल होने के लिए देशभर से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। मंगलवार को भी बड़ी संख्या में भक्तों ने इस दिव्य आरती में भाग लिया और बाबा महाकाल का आशीर्वाद प्राप्त किया।
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर: संविधान निर्माता और सामाजिक क्रांति के नायक..

प्रदीप कुमार वर्माभारतीय संविधान के कुशल शिल्पकार, वंचित एवं दलितों के मसीहा, कुशल राजनीतिक एवं प्रखर समाजशास्त्री, एक समर्पित शिक्षक और श्रमजीवी पत्रकार और तत्कालीन भारतीय समाज के एक महान समाज सुधारक। एक जमाना था जब भारतीय समाज जाति एवं कुरीतियों के बंधनों में जकड़ा हुआ था और समाज के दलित और वंचित तबके को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। यही नहीं, इस “तबके” की समाज में भागीदारी न के बराबर थी। और तब बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर ने ऐसे ही पिछड़े समाज में जन्म लिया और तत्कालीन भारतीय समाज को अपने कार्य एवं सिद्धांतों से एक नई दिशा दी। बाबा साहेब द्वारा किए गए संवैधानिक एवं सामाजिक सुधारो की मदद से आज वंचित और दलितों की आवाज न केवल सुनी जाती है,बल्कि इस तबके को समाज की मुख्य धारा में आने का अवसर भी मिला है। आज दलितों के मसीहा कहे जाने वाले उन्ही बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर की जन्म जयंती है। भारतीय संविधान निर्माता के तौर पर देश और दुनिया में चर्चित बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। बाबा साहेब अंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल तथा उनकी माता का नाम भीम बाई था। डा. अंबेडकर जब लगभग दो वर्ष के थे,जब उनके पिता नौकरी से सेवानिवृत्त हो गए थे। जब वह केवल छह वर्ष के थे तब उसकी मां का निधन हो गया था। बाबासाहेब ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में प्राप्त की। अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान वह अस्पृश्यता के अभिशाप से पीड़ित हुए तथा उन्हें अछूत होने का अहसास भी हो गया। डा. अंबेडकर अपनी स्कूली शिक्षा सतारा में ही पूरी की तथा बाद में वह मुंबई चले गए। डा. अंबेडकर ने अपनी स्नातक की पढ़ाई एल्फिंस्टन कॉलेज आज के मुंबई तथा तत्कालीन बॉम्बे से की,जिसके लिए उन्हें बड़ौदा के महामहिम सयाजीराव गायकवाड़ से छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी। इसी क्रम में वर्ष 1913 में डा. अंबेडकर को उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका जाने वाले एक विद्वान के रूप में चुना गया। यह उनके शैक्षिक जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से 1915 और 1916 में एमए और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वह आगे की पढ़ाई करने के लिए लंदन गए। बाद में उन्होंने बार-एट-लॉ और डीएससी की डिग्री भी प्राप्त की। वर्ष 1924 में इंग्लैंड से वापस लौटने के बाद उन्होंने दलित लोगों के कल्याण के लिए एक एसोसिएशन की शुरुआत की, जिसमें सर चिमनलाल सीतलवाड़ अध्यक्ष और डा. अम्बेडकर चेयरमैन थे। एसोसिएशन का तत्काल उद्देश्य शिक्षा का प्रसार करना, आर्थिक स्थितियों में सुधार करना और दलित वर्गों की शिकायतों का प्रतिनिधित्व करना था। उन्होंने नए सुधार को ध्यान में रखते हुए दलित वर्गों की समस्याओं को संबोधित करने के लिए 03 अप्रैल, 1927 को ‘बहिष्कृत भारत’ समाचारपत्र की भी शुरुआत की। इसी दौरान 13 अक्टूबर 1935 को दलित वर्गों का एक प्रांतीय सम्मेलन नासिक जिले में येवला में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में उनकी घोषणा से हिंदुओं को गहरा सदमा लगा। तब उन्होंने कहा, “मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा”। उनके हजारों अनुयायियों ने उनके इस फैसले का समर्थन किया। वर्ष 1936 में उन्होंने बॉम्बे प्रेसीडेंसी महार सम्मेलन को संबोधित किया और हिंदू धर्म का त्याग करने की वकालत की। इसके बाद 15 अगस्त 1936 को उन्होंने दलित वर्गों के हितों की रक्षा करने के लिए “स्वतंत्र लेबर पार्टी” का गठन किया, जिसमें ज्यादातर श्रमिक वर्ग के लोग शामिल थे। वर्ष 1938 में जब कांग्रेस ने अछूतों के नाम में बदलाव करने वाला एक विधेयक प्रस्तुत किया। तब डा. अंबेडकर ने इसकी आलोचना की। उनका दृष्टिकोण था कि महज नाम बदलने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। वर्ष1942 में वह भारत के गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में एक श्रम सदस्य के रूप में नियुक्त हुए। इसके बाद 1946 में उन्हें बंगाल से संविधान सभा के लिए चुना गया। उसी समय उन्होंने अपनी पुस्तक प्रकाशित की, “शूद्र कौन थे”?आजादी के बाद वर्ष 1947 में उन्हें देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में कानून एवं न्याय मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया लेकिन 1951 में उन्होंने कश्मीर मुद्दे, भारत की विदेश नीति और हिंदू कोड बिल के प्रति प्रधानमंत्री नेहरू की नीति पर अपना मतभेद प्रकट करते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। डा. अंबेडकर को उस्मानिया विश्वविद्यालय ने 12 जनवरी 1953 को डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया।आखिरकार 21 वर्षों के बाद, उन्होंने सच साबित कर दिया, जो उन्होंने 1935 में येओला में कहा था कि “मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा”। 14 अक्टूबर 1956 को, उन्होंने नागपुर में एक ऐतिहासिक समारोह में बौद्ध धर्म अपना लिया और 06 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई। भारतीय संविधान के जनक के रूप में संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक समावेशी संविधान तैयार किया जो सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता और समानता की गारंटी देता है। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई और संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत इसे समाप्त किया। उन्होंने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ों के लिए आरक्षण के माध्यम से सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित की। यही नहीं, उन्होंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति, तलाक और गोद लेने का अधिकार दिलाने का प्रयास किया, जिससे महिलाओं को समानता मिले। देश के प्रथम श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने कामकाज को 8 घंटे तक सीमित किया। इसके साथ ही समान काम के लिए समान वेतन, महिला श्रम कल्याण और कर्मचारी राज्य बीमा जैसे सुधार लागू किए। बाबा साहेब ने दलितों को शिक्षित, संगठित और संघर्ष करने का भी संदेश दिया। यही वजह है कि बाबा साहब आज तक वंचित और पिछड़ों से लेकर आमजन की स्मृतियों में जीवंत हैं।