एक की लाश मिली, दो ने की आत्महत्या? परिवार ने जांच पर उठाए गंभीर आरोप

ग्वालियर । मध्य प्रदेश के ग्वालियर से एक बेहद हृदयविदारक मामला सामने आया है, जहां एक ही परिवार ने 8 महीनों के भीतर अपने तीन जवान बेटों को खो दिया। एक की संदिग्ध हालात में मौत हुई, जबकि दो बेटों ने अलग-अलग समय पर फांसी लगाकर जान दे दी। इस घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। पहली घटना: छोटे बेटे की संदिग्ध मौतपरिवार के सबसे छोटे बेटे धर्मेंद्र (25) 29 जुलाई 2025 को फोन पर बात करते हुए घर से निकले थे, लेकिन वापस नहीं लौटे। 1 अगस्त को लक्ष्मीगंज क्षेत्र में उनका शव मिला। परिवार के मुताबिक, उनके शरीर पर किसी तरह के चोट के निशान नहीं थे और घटना स्थल पर कोई स्पष्ट वजह भी सामने नहीं आई। आरोप है कि पुलिस ने इस मामले में न तो ठीक से जांच की और न ही सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए। दूसरी घटना: बड़े बेटे ने लगाई फांसीकरीब 7 महीने बाद 19 मार्च 2026 को बड़े बेटे अमर सिंह (38) ने रायरू स्थित घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना के वक्त उनकी पत्नी और बच्चा घर पर नहीं थे। परिवार का कहना है कि आत्महत्या के पीछे का कारण अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। तीसरी घटना: मंझले बेटे ने भी दी जानत्रासदी यहीं नहीं रुकी। 12 अप्रैल 2026 को मंझले बेटे नीरज धानुक (27) ने भी घर में फांसी लगा ली। बताया जा रहा है कि वह बाजार से लौटकर खाना खाकर कमरे में गया और कुछ देर बाद छत पर फंदे से लटका मिला। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। पिता का आरोप: पुलिस ने नहीं की सही जांचपीड़ित पिता मोहन धानुक ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि पहले बेटे धर्मेंद्र की मौत की न तो सही जांच हुई, न सीसीटीवी देखे गए और न ही पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दी गई। उनका आरोप है कि अगर समय रहते सच्चाई सामने आती, तो शायद आगे की घटनाओं को रोका जा सकता था। आर्थिक संकट और मानसिक आघाततीनों बेटों की मौत के बाद परिवार पूरी तरह टूट चुका है। घर में अब बुजुर्ग माता-पिता और एक बेटा ही बचा है। परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर हो गई है, क्योंकि कमाने वाले सदस्य नहीं रहे। पिता ने सरकार से आर्थिक सहायता और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। पुलिस का बयानपड़ाव थाना पुलिस का कहना है कि दोनों आत्महत्या के मामलों में मर्ग कायम कर जांच की जा रही है। जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
अभिनेता प्रशांत तमांग के निधन और गलवान संघर्ष से जुड़े संदर्भों को हटाने के कारण फिल्म के 40 प्रतिशत हिस्से की दोबारा शूटिंग की गई है।

नई दिल्ली : बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान की बहुप्रतीक्षित फिल्म मातृभूमि इन दिनों फिल्म गलियारों में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। फिल्म की रिलीज को लेकर दर्शकों में भारी उत्साह था, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इसके प्रदर्शन पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं। जानकारी के अनुसार फिल्म की रिलीज डेट को आगे बढ़ा दिया गया है और इसके पीछे कई गंभीर कारण बताए जा रहे हैं। मूल रूप से अप्रैल के महीने में रिलीज होने वाली यह फिल्म अब तकनीकी और रचनात्मक बदलावों के दौर से गुजर रही है, जिसके चलते निर्माता फिलहाल किसी नई तारीख की घोषणा करने की स्थिति में नहीं हैं। महत्वपूर्ण कलाकार का निधन और प्रोडक्शन की चुनौतियांफिल्म की देरी का एक सबसे बड़ा और दुखद कारण फिल्म के मुख्य खलनायक की भूमिका निभा रहे अभिनेता और गायक प्रशांत तमांग का असामयिक निधन बताया जा रहा है। प्रशांत ने फिल्म के एक बड़े हिस्से की शूटिंग पूरी कर ली थी, लेकिन क्लाइमेक्स और कुछ महत्वपूर्ण एक्शन दृश्यों की शूटिंग अभी बाकी थी। उनके जाने से फिल्म की कहानी में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है जिसे भरना निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। प्रोडक्शन टीम अब इस उलझन में है कि उन दृश्यों को किसी अन्य कलाकार के साथ दोबारा फिल्माया जाए या फिर आधुनिक तकनीक और एआई की मदद से उन्हें पूरा किया जाए। इस पूरी प्रक्रिया में न केवल अतिरिक्त समय लग रहा है, बल्कि बजट पर भी भारी दबाव पड़ रहा है। कहानी में बदलाव और रक्षा मंत्रालय के सुझावप्रशांत तमांग के निधन के अलावा फिल्म की विषयवस्तु में किए जा रहे बदलाव भी इसकी देरी का एक मुख्य कारण हैं। शुरुआत में यह फिल्म 2020 के गलवान घाटी संघर्ष पर आधारित थी और इसका शीर्षक बैटल ऑफ गलवान रखा गया था। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों और संवेदनशीलता को देखते हुए संबंधित अधिकारियों ने फिल्म से चीन और गलवान के सीधे संदर्भों को हटाने का सुझाव दिया था। इसके बाद निर्माताओं ने न केवल फिल्म का नाम बदलकर मातृभूमि किया, बल्कि इसकी कहानी को भी युद्ध के बजाय मानवीय संवेदनाओं और शांति की ओर मोड़ दिया। फिल्म के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से को दोबारा फिल्माया गया है ताकि इसे एक काल्पनिक और भावनात्मक ड्रामा के रूप में पेश किया जा सके। सेंसर बोर्ड और आधिकारिक मंजूरी का इंतजारफिल्म में किए गए इन व्यापक बदलावों के कारण इसे अभी तक केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पास भी नहीं भेजा गया है। रक्षा मंत्रालय और अन्य संबंधित विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया अभी जारी है। जब तक फिल्म को आधिकारिक तौर पर हरी झंडी नहीं मिल जाती, तब तक इसका सिनेमाघरों तक पहुंचना नामुमकिन है। सलमान खान और निर्देशक अपूर्व लाखिया फिल्म की गुणवत्ता और संवेदनशीलता के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते, इसलिए वे हर पहलू पर बारीकी से काम कर रहे हैं। इस प्रशासनिक देरी ने वितरकों और प्रशंसकों की चिंता को और बढ़ा दिया है। बड़े पर्दे पर रिलीज की प्रतिबद्धतातमाम अड़चनों के बावजूद सलमान खान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मातृभूमि को सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज नहीं किया जाएगा। वह इस फिल्म को बड़े पर्दे के अनुभव के लिए ही उपयुक्त मानते हैं और सिनेमाघरों में ही इसे रिलीज करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। फिल्म में चित्रांगदा सिंह भी एक अहम भूमिका में नजर आएंगी। ताजा रिपोर्टों की मानें तो अब इस फिल्म को अगस्त के महीने या स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर रिलीज करने की योजना बनाई जा रही है। तब तक निर्माताओं को उम्मीद है कि वे सभी तकनीकी और विनियामक बाधाओं को पार कर लेंगे और दर्शकों को एक बेहतरीन सिनेमाई अनुभव प्रदान करेंगे।
छुट्टियां मनाने आए बच्चों पर कहर, गेहूं बचाने की दवा बनी जानलेवा

उज्जैन । मध्य प्रदेश के उज्जैन से एक बेहद दुखद घटना सामने आई है, जहां छुट्टियां मनाने नानी के घर आए बच्चों पर जहरीली गैस कहर बनकर टूटी। गेहूं को सुरक्षित रखने के लिए डाली गई कीटनाशक दवा की गैस से दो मासूमों की मौत हो गई, जबकि तीन अन्य बच्चों की हालत गंभीर बनी हुई है। नानी के घर खुशियां बदली मातम मेंहादसा इंदौर रोड स्थित त्रिवेणी हिल्स क्षेत्र में लालचंद प्रजापत के घर हुआ। जानकारी के मुताबिक, उनकी बेटियां अपने बच्चों के साथ गर्मी की छुट्टियां बिताने मायके आई थीं। सोमवार रात सभी लोग एक ही कमरे में सोए, जहां करीब चार क्विंटल गेहूं भी रखा था। गेहूं को कीड़ों से बचाने के लिए उसमें कीटनाशक दवा डाली गई थी, जिससे रातभर जहरीली गैस बनती रही। सुबह बिगड़ी तबीयत, दो मासूमों ने तोड़ा दममंगलवार सुबह करीब 9 बजे बच्चों की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। डेढ़ माह की त्रिशा के मुंह से झाग निकलने लगा, जिसके बाद सभी को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। इलाज के दौरान त्रिशा ने दम तोड़ दिया, जबकि बुधवार सुबह 4 साल की अनिका उर्फ अन्नू की भी मौत हो गई। वहीं, जेनिशा की हालत गंभीर होने पर उसे इंदौर रेफर किया गया है, जबकि रेहान और येशु का इलाज उज्जैन में जारी है। सल्फास से बनी जहरीली गैस बनी मौत की वजहडॉक्टरों के अनुसार, गेहूं में डालने वाली सल्फास (कीटनाशक) से जहरीली गैस निकलती है। यदि कमरा बंद हो और वेंटिलेशन न हो, तो यह गैस जानलेवा साबित हो सकती है। छोटे बच्चों में इसका असर और तेजी से होता है, जिससे दम घुटने और मौत का खतरा बढ़ जाता है। जांच में जुटी पुलिस और FSL टीममामले की सूचना मिलते ही पुलिस और फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के असली कारणों की पुष्टि हो सकेगी। नानी ने खुद को ठहराया जिम्मेदारइस हादसे के बाद बच्चों की नानी गहरे सदमे में हैं। उन्होंने रोते हुए बताया कि हर साल की तरह इस बार भी गेहूं में दवा डाली थी, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह इतना घातक साबित होगा। जरूरी सावधानीविशेषज्ञों का कहना है कि कीटनाशक दवाओं का उपयोग करते समय कमरे को पूरी तरह हवादार रखना चाहिए और जहां दवा रखी हो, वहां सोना बेहद खतरनाक हो सकता है।
अमावस्या के दिन लाल वस्तुओं, गुड़ और अनाज का दान करने से ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव समाप्त होकर मान-सम्मान में वृद्धि होती है।

नई दिल्ली :आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से वर्ष 2026 की चैत्र अमावस्या अत्यंत महत्वपूर्ण होने जा रही है। इस विशिष्ट तिथि पर ग्रहों के राजा सूर्य और मन के कारक चंद्रमा एक साथ मेष राशि में विराजमान होकर एक दुर्लभ युति का निर्माण कर रहे हैं। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य और चंद्रमा के इस मिलन को अत्यंत प्रभावशाली माना गया है, विशेषकर जब यह मेष जैसी ऊर्जावान राशि में घटित हो रहा हो। इस खगोलीय घटना के प्रभाव से न केवल चराचर जगत में ऊर्जा का संचार होगा, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में पितृ दोष से मुक्ति और संचित पापों के शमन के लिए भी यह समय सर्वोत्तम माना जा रहा है। ग्रहों का महामिलन और आध्यात्मिक महत्वशास्त्रों के अनुसार अमावस्या की तिथि पितरों को समर्पित होती है और मेष राशि में इस युति के होने से दान का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान के पश्चात अपनी सामर्थ्य अनुसार दान करने की प्राचीन परंपरा रही है। मेष राशि अग्नि तत्व की राशि है और इसके स्वामी मंगल हैं, इसलिए इस दौरान लाल रंग की वस्तुओं, जैसे मसूर की दाल, तांबा या लाल वस्त्रों का दान विशेष रूप से फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन निष्काम भाव से जरूरतमंदों की सहायता करता है, उसके जीवन से मानसिक अशांति और कार्यक्षेत्र में आ रही बाधाएं स्वतः ही समाप्त होने लगती हैं। दान की महिमा और सुख-समृद्धि के उपायइस विशिष्ट योग के दौरान गुड़ और गेहूं का दान करने से कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है, जिससे समाज में मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। वहीं चंद्रमा की शांति के लिए दूध, चावल या चांदी का दान करना उत्तम रहता है, जो मानसिक स्थिरता और पारिवारिक सुख-शांति में वृद्धि करता है। विद्वानों का मत है कि अमावस्या पर किया गया तर्पण और दान न केवल पूर्वजों को तृप्त करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सौभाग्य के द्वार खोलता है। विशेष रूप से इस वर्ष मेष राशि की युति आत्म-साक्षात्कार और नई शुरुआत के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर रही है। नकारात्मकता का नाश और पुण्य की प्राप्तिधार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या की शाम को पीपल के वृक्ष के नीचे दीप प्रज्वलित करना और विशेष उपासना करना कष्टों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। चूंकि मेष राशि चक्र की प्रथम राशि है, इसलिए इस युति के दौरान किया गया संकल्प और दान पूरे वर्ष के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है। इस समय काल में सात्विकता बनाए रखना और वाणी पर संयम रखना अनिवार्य बताया गया है। दान की प्रक्रिया में स्वच्छता और श्रद्धा का होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि बिना भाव के किया गया दान पूर्ण फल प्रदान नहीं करता है। जीव सेवा से संवरेगा भविष्यअमावस्या के इस पावन अवसर पर चींटियों को आटा डालना और पक्षियों को दाना खिलाना भी विशेष पुण्यकारी माना गया है। प्रकृति और जीव-जंतुओं की सेवा का यह मार्ग व्यक्ति को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक ले जाता है। कुल मिलाकर यह समय आत्म-शुद्धि और परोपकार के माध्यम से अपने भाग्य को संवारने का एक अनमोल अवसर है। जो लोग लंबे समय से आर्थिक तंगी या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनके लिए मेष राशि की यह सूर्य-चंद्र युति और अमावस्या का विधान एक नई आशा की किरण लेकर आया है।
पाकिस्तान में तय समय पर ‘ब्लैकआउट’: रोज 2–2.5 घंटे कटेगी बिजली, जानें वजह और असर

इस्लामाबाद। गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहे पाकिस्तान ने अब देशभर में रोजाना 2 से 2.5 घंटे के “निर्धारित ब्लैकआउट” का फैसला किया है। सरकार का कहना है कि यह कदम पारंपरिक लोडशेडिंग नहीं, बल्कि बढ़ती बिजली लागत और पीक डिमांड को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया है। कब होगी बिजली कटौती? सरकार के मुताबिक, शाम 5 बजे से रात 1 बजे के बीच—यानी पीक आवर्स में—बिजली की मांग अचानक बढ़ जाती है। इसी दौरान अलग-अलग इलाकों में तय समय के हिसाब से 2–2.5 घंटे की कटौती की जाएगी। वितरण कंपनियों को पहले से सूचना देने के निर्देश दिए गए हैं ताकि उपभोक्ताओं को अचानक परेशानी न हो। क्यों आया यह फैसला? ऊर्जा संकट के पीछे कई बड़े कारण बताए जा रहे हैं: जलविद्युत उत्पादन में कमी महंगे जीवाश्म ईंधन का दबाव ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ी वैश्विक ऊर्जा कीमतें गैस आपूर्ति में भारी कमी गैस संकट इतना गहरा है कि बिजली संयंत्रों को पर्याप्त ईंधन नहीं मिल पा रहा। कतर से LNG आयात पर अस्थायी रोक ने स्थिति और बिगाड़ दी है। सबसे ज्यादा असर पंजाब में पंजाब प्रांत में हालात सबसे खराब बताए जा रहे हैं। मुल्तान इलेक्ट्रिक पावर कंपनी (MEPCO) के इलाकों में 16 घंटे तक कटौती की शिकायत मुजफ्फरगढ़, खानेवाल जैसे जिलों में लंबी और अनियमित बिजली गुल लाहौर और फैसलाबाद जैसे शहरों में भी 3–4 घंटे कटौती ग्रामीण इलाकों में स्थिति और ज्यादा खराब बनी हुई है। उद्योग और कृषि पर असर रिपोर्ट्स के अनुसार, उर्वरक उद्योग को गैस आपूर्ति बंद कर दी गई है, जिससे कृषि क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है। सरकार का कहना है कि मई में गैस आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है, जिससे कुछ राहत मिल सकती है। आर्थिक संकट से जुड़ा मामला पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक दबाव में है, और बढ़ती ईंधन कीमतों ने बिजली उत्पादन को और महंगा बना दिया है। ऐसे में यह “टारगेटेड ब्लैकआउट” सरकार के लिए लागत नियंत्रित करने का एक अस्थायी उपाय माना जा रहा है। बिजली संकट से निपटने के लिए उठाया गया यह कदम आम लोगों और उद्योगों दोनों के लिए चुनौती लेकर आया है। अब नजर इस बात पर है कि गैस आपूर्ति सुधरने और अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य होने के बाद हालात कितनी जल्दी बेहतर होते हैं।
जमीन मुक्त कराने के नाम पर खेल, एक महीने में दो बार भेजी गई नकली NOC

इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में जमीन से जुड़े कामकाज को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया है। इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) में फर्जी एनओसी (No Objection Certificate) का संगठित रैकेट सक्रिय होने का खुलासा हुआ है, जिसमें प्राधिकरण के अंदरूनी लोगों की संलिप्तता की आशंका जताई जा रही है। एक महीने में दो बार भेजी गई फर्जी NOCमामला योजना 97 पार्ट-4 बिजलपुर की करीब 20 हजार वर्गफुट जमीन से जुड़ा है। जमीन मालिक ने ले-आउट मंजूरी के लिए टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TNCP) में आवेदन किया था। जांच के दौरान TNCP अधिकारियों को संदेह हुआ क्योंकि IDA से जारी NOC और उसके प्रारूप में साइन मेल नहीं खा रहे थे। जब पुष्टि के लिए IDA से संपर्क किया गया, तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ-ऐसी कोई NOC वहां से जारी ही नहीं हुई थी। हैरानी की बात यह है कि करीब डेढ़ महीने के भीतर दो बार फर्जी NOC भेजी गई। अफसरों के साइन भी निकले नकलीभू-अर्जन अधिकारी सुदीप मीणा ने साफ कहा कि उनके नाम से फर्जी साइन कर NOC बनाई गई। इससे पहले कंट्री प्लानिंग विभाग के अधिकारी के भी सिग्नेचर फर्जी पाए गए। इससे साफ है कि रैकेट काफी सुनियोजित तरीके से काम कर रहा था और दस्तावेजों को असली जैसा दिखाने के लिए अधिकारियों के हस्ताक्षर तक कॉपी किए जा रहे थे। IDA कर्मचारी पर शक, मोबाइल बंद कर गायबइस पूरे मामले में IDA के विधि विभाग के बाबू शुभम श्रीवास्तव पर संदेह गहराया है। खुलासे के बाद से वह बिना सूचना के गायब है, उसका मोबाइल भी बंद है और घर से भी लापता बताया जा रहा है। इससे जांच और गंभीर हो गई है। करोड़ों के घोटाले की आशंकासूत्रों के मुताबिक, यह रैकेट पिछले करीब एक साल से सक्रिय था और जमीन की कीमत के हिसाब से NOC जारी करने के रेट तय किए जाते थे। आशंका है कि इस तरह कई मामलों में शासन को करोड़ों रुपए के राजस्व का नुकसान पहुंचाया गया है। अब प्राधिकरण पुरानी NOC फाइलों की भी जांच कराने की तैयारी में है, जिससे इस घोटाले का दायरा और बढ़ सकता है। अब पूरी प्रक्रिया होगी ऑनलाइनमामले की गंभीरता को देखते हुए IDA के सीईओ परीक्षित झाड़े ने NOC प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन करने का फैसला लिया है, ताकि भविष्य में इस तरह की फर्जीवाड़े की गुंजाइश खत्म हो सके। फिलहाल विभागीय जांच जारी है और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की बात कही जा रही है।
IAEA चीफ की चेतावनी: ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ‘भ्रम’ में न रहे अमेरिका, सख्त निगरानी जरूरी

वाशिंगटन। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के महानिदेशक मारियानो राफेल ग्रॉसी ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और वैश्विक समुदाय को साफ चेतावनी दी है। उनका कहना है कि यदि किसी संभावित अमेरिका-ईरान समझौते में कड़ी और व्यापक जांच व्यवस्था शामिल नहीं की गई, तो ऐसा समझौता केवल “भ्रम” साबित होगा। सियोल में मीडिया से बातचीत के दौरान ग्रॉसी ने कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम बेहद व्यापक और महत्वाकांक्षी है, इसलिए IAEA निरीक्षकों को पूर्ण पहुंच देना अनिवार्य होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि बिना ठोस और विस्तृत सत्यापन तंत्र के कोई भी समझौता टिकाऊ नहीं हो सकता। परमाणु ठिकानों तक सीमित पहुंच पर चिंता IAEA की एक पूर्व गोपनीय रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया संघर्ष के दौरान जिन परमाणु ठिकानों पर इजराइल और अमेरिका ने हमले किए थे, वहां तक एजेंसी को अब तक पूरी पहुंच नहीं मिल सकी है। ऐसे में यह पुष्टि करना मुश्किल है कि ईरान ने संवर्धन गतिविधियां रोकी हैं या नहीं, और उसके यूरेनियम भंडार की वास्तविक स्थिति क्या है। IAEA के अनुसार, ईरान के पास 60% तक संवर्धित लगभग 440.9 किलोग्राम यूरेनियम मौजूद है। ग्रॉसी ने चेताया कि यदि इसे हथियार बनाने की दिशा में उपयोग किया गया, तो यह मात्रा करीब 10 परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त हो सकती है। हालांकि, ईरान लगातार अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताता रहा है। उत्तर कोरिया पर भी बढ़ती चिंता ग्रॉसी ने उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने संकेत दिया कि वहां परमाणु गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं और योंगब्योन जैसे प्रमुख केंद्रों का विस्तार किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का भी मानना है कि 2019 में अमेरिका के साथ वार्ता विफल होने के बाद उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु ढांचे को और मजबूत किया है। अमेरिका-ईरान वार्ता पर असर संभव यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान के साथ वार्ता का दूसरा दौर जल्द हो सकता है। व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना अमेरिका की प्राथमिकता है। हालांकि, हाल ही में पाकिस्तान में हुई दोनों देशों के बीच पहली वार्ता बेनतीजा रही। अमेरिकी पक्ष ने ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को मुख्य विवाद बताया, जबकि एक ईरानी अधिकारी ने इस दावे को खारिज किया। IAEA की सख्त शर्तें यह साफ संकेत देती हैं कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बिना ठोस निगरानी के कोई भी समझौता टिक नहीं पाएगा। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान वार्ता पर वैश्विक नजरें टिकी रहेंगी।
33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई

नई दिल्ली। तीन दशक पहले नौकरी से बर्खास्त किए गए भारतीय वायुसेना (IAF) के एक पूर्व अधिकारी को आखिरकार न्याय मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 की बर्खास्तगी को अवैध और अनुचित ठहराते हुए न सिर्फ उसे रद्द किया, बल्कि अधिकारी को सम्मानजनक विदाई देने का ऐतिहासिक आदेश भी दिया है। अदालत ने कहा कि किसी भी सैनिक के लिए उसका सम्मान सबसे बड़ी पूंजी होता है, और उसे बहाल करना न्याय का अहम हिस्सा है। कोर्ट का बड़ा फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने पूर्व स्क्वाड्रन लीडर आर. सूद की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि वायुसेना की कार्रवाई कानूनी रूप से कमजोर और त्रुटिपूर्ण थी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि: वायुसेना प्रमुख द्वारा तय तारीख पर उन्हें औपचारिक विदाई दी जाए विदाई उसी सम्मान के साथ हो, जिसके वे नियमित सेवानिवृत्ति पर हकदार होते क्या था मामला? यह पूरा विवाद 1987 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक नागरिक ड्राइवर को रेगिस्तान में छोड़ दिया गया था, जहां बाद में उसके अवशेष मिले। इसी मामले में कार्रवाई करते हुए 22 सितंबर 1993 को वायुसेना अधिनियम की धारा 19 के तहत आर. सूद को सेवा से हटा दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला? पहले ही मिल चुकी थी क्लीन चिट एक आपराधिक अदालत ने सबूतों के अभाव में आर. सूद को पहले ही बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुकदमा चलाने लायक सबूत ही नहीं थे, तो विभागीय कार्रवाई का आधार भी कमजोर हो जाता है। सजा में भेदभाव पर सख्त टिप्पणी कोर्ट ने पाया कि इस मामले में वरिष्ठ अधिकारी को मामूली सजा दी गई, जबकि आदेश का पालन करने वाले आर. सूद को बर्खास्त कर दिया गया—जो स्पष्ट रूप से असमानता है। वरिष्ठ के आदेश का पालन बना सजा का कारण अदालत ने कहा कि किसी अधीनस्थ अधिकारी को सिर्फ इसलिए कठोर सजा नहीं दी जा सकती कि उसने अपने वरिष्ठ के आदेशों का पालन किया। सम्मान की वापसी को प्राथमिकता चूंकि आर. सूद अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुके हैं, उन्हें सेवा में बहाल करना संभव नहीं है। लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें सभी लाभ ऐसे दिए जाएं मानो वे कभी बर्खास्त ही नहीं हुए थे। सबसे अहम बात—अदालत ने आर्थिक मुआवजे से ज्यादा “सम्मान की बहाली” को प्राथमिकता दी। यह फैसला बताता है कि एक सैनिक के लिए उसकी प्रतिष्ठा ही सबसे बड़ी पहचान होती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 33 साल बाद फिर से स्थापित कर दिया।
स्वीमिंग के दौरान अचानक गिरे बिजनेसमैन, साइलेंट हार्ट अटैक से मौत की आशंका

भोपाल । मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहां एक वरिष्ठ कारोबारी की स्वीमिंग करते समय संदिग्ध हालात में मौत हो गई। शुरुआती जांच में इसे ‘साइलेंट हार्ट अटैक’ से जोड़कर देखा जा रहा है, हालांकि अंतिम पुष्टि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद ही होगी। स्वीमिंग के दौरान अचानक बिगड़ी तबीयतयह घटना टीटी नगर क्षेत्र स्थित तरुण पुष्कर की है। जानकारी के मुताबिक, शाहपुरा की अमतलाश कॉलोनी निवासी 63 वर्षीय संजय त्यागी रोज की तरह बुधवार शाम भी स्वीमिंग के लिए पहुंचे थे। शाम करीब 6 बजे जब वह पूल में तैर रहे थे, तभी अचानक बेसुध होकर पानी में गिर पड़े। पूल में पानी की गहराई महज 4 फीट थी, जिससे डूबने की संभावना कम मानी जा रही है। CPR देने के बावजूद नहीं बच पाई जानघटना के तुरंत बाद वहां मौजूद ट्रेनर और अन्य लोगों ने उन्हें बाहर निकाला और CPR देकर सांसें वापस लाने की कोशिश की, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। साइलेंट हार्ट अटैक की आशंकापुलिस के अनुसार, प्रारंभिक तौर पर मामला साइलेंट हार्ट अटैक का लग रहा है। इस तरह के अटैक में अक्सर व्यक्ति को पहले कोई गंभीर लक्षण महसूस नहीं होते और अचानक स्थिति बिगड़ जाती है। फिलहाल शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है और शॉर्ट पीएम रिपोर्ट के बाद ही मौत के सही कारणों का खुलासा हो सकेगा। जांच जारी, रिपोर्ट का इंतजारपुलिस मामले की जांच कर रही है और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। यदि हार्ट अटैक की पुष्टि होती है, तो यह एक और उदाहरण होगा कि फिटनेस एक्टिविटी के दौरान भी स्वास्थ्य संबंधी जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नीरव मोदी का नया दांव: यूरोपियन कोर्ट पहुंचा मामला, ‘रूल 39’ से लटक सकता है प्रत्यर्पण

मुंबई। पंजाब नेशनल बैंक घोटाले के मुख्य आरोपी और भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने भारत प्रत्यर्पण टालने के लिए अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आखिरी कानूनी चाल चल दी है। उसने फ्रांस के स्ट्रासबर्ग स्थित यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय (ECtHR) में ‘रूल 39’ के तहत याचिका दायर कर अपने प्रत्यर्पण पर अस्थायी रोक लगाने की मांग की है। ब्रिटेन में खत्म हो चुके सभी रास्ते इससे पहले लंदन उच्च न्यायालय ने 25 मार्च को नीरव मोदी की अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने अपने प्रत्यर्पण केस को दोबारा खोलने की मांग की थी। इस फैसले के बाद ब्रिटेन में उसके पास कोई कानूनी विकल्प नहीं बचा था, जिसके चलते उसने यूरोपियन कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। नियमों के मुताबिक, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) तय समयसीमा के भीतर उसे भारत ला सकती थी, लेकिन ‘रूल 39’ की अर्जी लंबित रहने तक प्रत्यर्पण पर रोक लग गई है। क्या है ‘रूल 39’? समझिए आसान भाषा में ‘रूल 39’ यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय का एक आपातकालीन प्रावधान है, जिसके तहत अदालत किसी व्यक्ति को “अपरिवर्तनीय नुकसान” से बचाने के लिए अंतरिम आदेश जारी कर सकती है। कोई खुली सुनवाई नहीं होती: पूरा मामला लिखित दलीलों के आधार पर तय होता है 48 घंटे में फैसला संभव: आमतौर पर जज जल्द निर्णय देते हैं अस्थायी राहत मिलती है: अंतिम फैसला नहीं, सिर्फ रोक लगाने का अंतरिम उपाय प्रत्यर्पण पर रोक: जब तक अर्जी पर फैसला नहीं, तब तक संबंधित देश व्यक्ति को नहीं भेजता विशेषज्ञों के मुताबिक, याचिकाकर्ता को यह साबित करना होता है कि उसे तुरंत और गंभीर नुकसान का खतरा है, और उसने अपने देश में सभी कानूनी विकल्प इस्तेमाल कर लिए हैं। लंबी खिंच सकती है कानूनी प्रक्रिया ‘रूल 39’ के तहत मिली राहत स्थायी नहीं होती, लेकिन इससे मामला वर्षों तक खिंच सकता है। जानकारों का मानना है कि पूरी प्रक्रिया 3 से 5 साल तक चल सकती है। क्या होगा आगे? फिलहाल क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस (CPS) ने भी पुष्टि की है कि नीरव मोदी के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया तय थी, लेकिन अब यूरोपीय अदालत में दाखिल अर्जी के चलते इस पर अस्थायी ब्रेक लग गया है। कुल मिलाकर, नीरव मोदी ने एक ऐसा कानूनी रास्ता चुना है जो भले ही अंतिम तौर पर उसे राहत दिलाए या न दिलाए, लेकिन भारत लाए जाने की प्रक्रिया को फिलहाल टालने में जरूर असरदार साबित हो सकता है।