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चारधाम यात्रा 2026 का शुभारंभ, अक्षय तृतीया पर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुले, श्रद्धा और सुरक्षा का संगम

नई दिल्ली: उत्तराखंड में बहुप्रतीक्षित चारधाम यात्रा 2026 की शुरुआत अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर विधिवत रूप से हो गई है। इस दिन गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट परंपरागत पूजा अर्चना और धार्मिक विधि विधान के बाद श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। कपाट खुलते ही पूरे क्षेत्र में भक्ति और उत्साह का माहौल बन गया और देश भर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने दर्शन का लाभ लेना शुरू कर दिया। गंगोत्री धाम में कपाट खुलने की प्रक्रिया पारंपरिक रीति रिवाजों के अनुसार संपन्न हुई। मां गंगा की उत्सव डोली अपने शीतकालीन प्रवास स्थल से विधिवत पूजा के बाद धाम की ओर रवाना हुई। यात्रा मार्ग में स्थानीय श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव के साथ डोली का स्वागत किया और पूरे वातावरण में जयकारों की गूंज सुनाई दी। निर्धारित परंपरा के अनुसार डोली रास्ते में विश्राम के बाद अगले दिन गंगोत्री धाम पहुंचेगी, जहां कपाट खुलने की औपचारिक प्रक्रिया पूरी की गई। यमुनोत्री धाम में भी कपाट खुलने के साथ ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। मां यमुना के दर्शन के लिए भक्तों ने लंबी कतारों में प्रतीक्षा की और पूरे क्षेत्र में धार्मिक आस्था का वातावरण देखने को मिला। कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा का औपचारिक आरंभ माना जाता है, जो आने वाले महीनों तक जारी रहती है। इस वर्ष यात्रा को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने के लिए प्रशासन ने विशेष तैयारियां की हैं। गंगोत्री और यमुनोत्री मार्गों पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है और यातायात नियंत्रण के लिए अतिरिक्त बल की तैनाती की गई है। भीड़ प्रबंधन और यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कई स्तरों पर व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। केदारनाथ यात्रा के लिए इस बार आधुनिक तकनीक आधारित निगरानी प्रणाली लागू की गई है। पूरे यात्रा मार्ग पर कैमरों के माध्यम से लगातार निगरानी की जा रही है और नियंत्रण कक्षों से हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। इससे किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई संभव हो सकेगी और यात्रियों की सुरक्षा को बेहतर बनाया जा सकेगा। यात्रा मार्ग को विभिन्न सेक्टरों में विभाजित कर अधिकारियों की तैनाती की गई है ताकि हर क्षेत्र की निगरानी प्रभावी ढंग से हो सके। इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं को भी मजबूत किया गया है और जगह जगह चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं ताकि यात्रियों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। प्रशासन ने ट्रैफिक प्रबंधन और आपदा प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया है। यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार की बाधा को तुरंत दूर करने के लिए टीमों को अलर्ट पर रखा गया है। इसके अलावा रियल टाइम सहायता व्यवस्था भी लागू की गई है जिससे यात्रियों को तुरंत मदद उपलब्ध कराई जा सके। इस बार चारधाम यात्रा में पारंपरिक धार्मिक आस्था के साथ आधुनिक तकनीक का भी समावेश देखने को मिल रहा है। एक ओर जहां सदियों पुरानी धार्मिक परंपराएं पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के लिए आधुनिक व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है।

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में सुरक्षा बलों पर आरोप से बढ़ा सियासी तनाव, निष्पक्षता पर उठे सवाल..

नई दिल्ली :पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच राजनीतिक माहौल एक बार फिर गरमा गया है। तृणमूल कांग्रेस ने केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी का कहना है कि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कुछ जवान कथित रूप से भाजपा के पक्ष में गतिविधियों में शामिल पाए गए हैं, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की ओर से मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कुछ जवान भाजपा उम्मीदवारों के साथ क्षेत्र में देखे गए और कथित रूप से प्रचार सामग्री के वितरण में भी शामिल थे। इसके अलावा यह भी दावा किया गया है कि मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की गई, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर असर पड़ सकता है। पार्टी ने इसे गंभीर अनियमितता बताते हुए कहा है कि चुनावी प्रक्रिया में सुरक्षा बलों की भूमिका पूरी तरह निष्पक्ष और सीमित होती है। उनका कार्य केवल सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना है, न कि किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग लेना। ऐसे में यदि इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रभाव डाल सकती हैं। आरोपों में यह भी कहा गया है कि यह स्थिति चुनावी आचार संहिता और संबंधित नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकती है। पार्टी का तर्क है कि किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि में सुरक्षा बलों की भागीदारी न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि यह मतदाताओं के विश्वास को भी प्रभावित करती है। तृणमूल कांग्रेस ने निर्वाचन आयोग से मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच की जाए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। साथ ही सभी तैनात केंद्रीय बलों को स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं कि वे किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि से पूरी तरह दूर रहें। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के दौरान इस तरह के आरोप माहौल को और अधिक संवेदनशील बना सकते हैं। पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्य में ऐसे विवाद मतदाताओं की धारणा और चुनावी रणनीतियों पर असर डाल सकते हैं। फिलहाल इस पूरे मामले में सभी की नजरें चुनाव आयोग की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। आयोग की प्रतिक्रिया से यह तय होगा कि इस विवाद का राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव किस दिशा में जाएगा।

करोड़ों के नुकसान की परवाह नहीं, शक्तिमान के लिए रणवीर फिट नहीं, मुकेश खन्ना का बड़ा बयान

नई दिल्ली । भारतीय टेलीविजन के सबसे लोकप्रिय सुपरहीरो शो शक्तिमान को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है और इसकी वजह हैं इसके मूल कलाकार मुकेश खन्ना जिनका रुख अब भी पहले की तरह सख्त नजर आ रहा है। लंबे समय से इस शो के रीबूट की खबरें सामने आती रही हैं और इसमें रणवीर सिंह के मुख्य भूमिका निभाने की अटकलें भी जोरों पर थीं लेकिन मुकेश खन्ना ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह रणवीर को शक्तिमान के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। हाल ही में एक बातचीत के दौरान मुकेश खन्ना ने रणवीर सिंह की प्रतिभा की सराहना जरूर की लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि शक्तिमान का किरदार निभाना सिर्फ अभिनय का मामला नहीं है। उन्होंने कहा कि रणवीर एक शानदार अभिनेता हैं जिनमें जबरदस्त ऊर्जा है और वे अलग अलग तरह के किरदार निभा सकते हैं लेकिन शक्तिमान के लिए एक खास व्यक्तित्व और छवि की जरूरत होती है जो हर किसी में नहीं होती। मुकेश खन्ना ने इस दौरान यह भी कहा कि वह इस भूमिका के लिए किसी बड़े स्टार या पहले से स्थापित छवि वाले अभिनेता को नहीं लेना चाहते। उनके मुताबिक शक्तिमान ऐसा किरदार है जिसे एक साफ सुथरी और प्रेरणादायक छवि वाले नए चेहरे की जरूरत है ताकि दर्शक उसे उसी रूप में स्वीकार कर सकें। उन्होंने यहां तक कह दिया कि वह पूरे देश में ऑडिशन लेकर एक नया चेहरा तलाश करेंगे जो इस किरदार के साथ न्याय कर सके। बातचीत के दौरान उन्होंने फिल्म पृथ्वीराज में अक्षय कुमार के लुक पर भी तंज कसते हुए कहा कि ऐतिहासिक और आइकॉनिक किरदार निभाने के लिए सिर्फ कॉस्ट्यूम काफी नहीं होता बल्कि उस किरदार जैसा व्यक्तित्व भी दिखना चाहिए। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब उन्होंने ऐतिहासिक किरदार निभाए थे तो तैयार होने में लंबा समय लगता था और वह पूरी तरह उस किरदार में ढल जाते थे। मुकेश खन्ना ने यह भी माना कि उनके इस सख्त रुख के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है क्योंकि बड़ी प्रोडक्शन कंपनियां इस प्रोजेक्ट में रुचि दिखा रही हैं। सोनी पिक्चर्स इस प्रोजेक्ट को लेकर उत्साहित बताया जा रहा है लेकिन इसके बावजूद मुकेश अपने फैसले पर कायम हैं। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि आदित्य चोपड़ा ने भी पहले शक्तिमान के राइट्स लेने में दिलचस्पी दिखाई थी लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि वह इस किरदार को किसी ऐसे रूप में नहीं देखना चाहते जो इसकी मूल भावना से अलग हो जाए। इस पूरे विवाद के बीच यह साफ है कि शक्तिमान का रीबूट अभी भी अनिश्चितताओं में घिरा हुआ है। जहां एक तरफ दर्शक अपने पसंदीदा सुपरहीरो को नए अवतार में देखने के लिए उत्साहित हैं वहीं दूसरी तरफ मुकेश खन्ना की शर्तें इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ने से रोकती नजर आ रही हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या शक्तिमान को नया चेहरा मिल पाता है या यह परियोजना इसी तरह विवादों में उलझी रहती है।

कोर्स के दौरान शादी पर रोक ,नर्सिंग स्कूल का सख्त; फरमान छात्राओं में मचा हड़कंप

नई दिल्ली । बिहार के गोपालगंज जिले के हथुआ स्थित जीएनएम नर्सिंग स्कूल से एक ऐसा आदेश सामने आया है जिसने शिक्षा व्यवस्था और छात्राओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बहस छेड़ दी है। स्कूल प्रशासन की ओर से जारी इस निर्देश के अनुसार वहां पढ़ने वाली किसी भी छात्रा को कोर्स की अवधि के दौरान शादी करने की अनुमति नहीं होगी। यह अवधि लगभग तीन साल की बताई जा रही है। आदेश में साफ कहा गया है कि अगर इस दौरान किसी छात्रा के विवाह करने की जानकारी मिलती है तो उसका नामांकन तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया जाएगा और इसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित छात्रा की होगी। यह आदेश 16 अप्रैल 2026 को जारी किया गया बताया जा रहा है। आधिकारिक लेटर पर संस्थान की मुहर और प्राचार्या के हस्ताक्षर होने के कारण इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। आदेश में छात्राओं को सीधे तौर पर चेतावनी दी गई है कि वे शैक्षणिक सत्र के दौरान विवाह जैसे किसी भी व्यक्तिगत निर्णय से बचें अन्यथा उन्हें अपनी पढ़ाई से हाथ धोना पड़ सकता है। इस फरमान के सामने आने के बाद छात्राओं के बीच असमंजस और तनाव की स्थिति बन गई है। कई छात्राएं इसे अपनी निजी जिंदगी में हस्तक्षेप मान रही हैं तो कुछ इसे अनुशासन के नाम पर थोपे गए नियम के रूप में देख रही हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या किसी शैक्षणिक संस्थान को इस तरह का अधिकार है कि वह छात्राओं के निजी फैसलों पर रोक लगा सके। स्थानीय स्तर पर भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आ गया है। शिक्षा और महिला अधिकारों से जुड़े लोग इसे असंवैधानिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ बता रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य छात्राओं को सशक्त बनाना होना चाहिए न कि उनके निजी जीवन पर नियंत्रण स्थापित करना। हालांकि इस पूरे मामले में स्कूल प्रशासन की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्राचार्या से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। ऐसे में यह भी साफ नहीं हो पाया है कि यह आदेश किस आधार पर जारी किया गया और इसके पीछे प्रशासन की मंशा क्या है। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज के समय में भी शिक्षा संस्थानों में इस तरह के नियम लागू किए जा सकते हैं। जहां एक ओर देश में महिलाओं को बराबरी और स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है वहीं दूसरी ओर इस तरह के आदेश उन अधिकारों पर सवाल खड़े करते नजर आते हैं। आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है और संभव है कि उच्च स्तर पर इसकी जांच या हस्तक्षेप भी देखने को मिले।

बिहार में नई सरकार का शक्ति परीक्षण, 24 अप्रैल को विधानसभा में सम्राट चौधरी पेश करेंगे विश्वास मत

नई दिल्ली: बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी नई सरकार 24 अप्रैल को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेगी। इसके लिए 18वीं बिहार विधानसभा का दूसरा सत्र इसी दिन से शुरू होगा और पहले ही दिन सरकार विश्वास प्रस्ताव पेश कर सदन का समर्थन हासिल करने की कोशिश करेगी। राज्य में हाल ही में सत्ता संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सम्राट चौधरी को सौंपी गई है। संवैधानिक परंपरा के अनुसार किसी भी नए मुख्यमंत्री को यह साबित करना होता है कि उनके पास विधानसभा में बहुमत का समर्थन मौजूद है। इसी प्रक्रिया के तहत अब सरकार विश्वास मत का सामना करेगी। इस विश्वास मत को लेकर राजनीतिक हलकों में खासा उत्साह और तनाव दोनों देखा जा रहा है। यह वोटिंग मौजूदा सत्ता समीकरणों की वास्तविक स्थिति को सामने लाएगी और यह तय करेगी कि सरकार कितनी मजबूत स्थिति में है। सभी राजनीतिक दलों की नजर इसी प्रक्रिया पर टिकी हुई है क्योंकि इसका असर आने वाले राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी पड़ सकता है। सूत्रों के अनुसार नई सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार अभी अंतिम रूप से तय नहीं हो पाया है। विभागों का अस्थायी बंटवारा कर प्रशासनिक कामकाज जारी रखा गया है। बताया जा रहा है कि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अंतिम निर्णय आने वाले राजनीतिक हालात और अन्य राज्यों के चुनावी परिणामों के बाद लिया जा सकता है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सरकार फिलहाल केंद्रीकृत ढांचे में काम कर रही है। वहीं कुछ वरिष्ठ नेताओं को भी उपमुख्यमंत्री स्तर पर जिम्मेदारियां दी गई हैं ताकि शासन व्यवस्था सुचारु रूप से चल सके। विधानसभा में होने वाला यह विश्वास मत केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सरकार की राजनीतिक ताकत की असली परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। विपक्ष भी इस मौके पर सरकार को घेरने की पूरी रणनीति बना रहा है, जिससे सदन में तीखी बहस की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विश्वास मत न केवल सरकार की स्थिरता तय करेगा, बल्कि बिहार की राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित करेगा। इसके परिणाम आने वाले समय में राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं।

350 साल पुरानी रहस्यमयी हवेली जहां फिर जगा अक्षय और प्रियदर्शन का जादू

नई दिल्ली । बॉलीवुड में हॉरर कॉमेडी का जादू एक बार फिर बड़े पर्दे पर लौट आया है और इस बार भी केंद्र में हैं अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी। उनकी नई फिल्म भूत बंगला रिलीज के साथ ही चर्चा में है लेकिन फिल्म की कहानी से ज्यादा जिस चीज ने दर्शकों का ध्यान खींचा है वह है इसकी रहस्यमयी हवेली जो खुद में एक इतिहास समेटे हुए है। यह वही भव्य और खौफनाक हवेली है जिसे दर्शक पहले भूल भुलैया में देख चुके हैं। उस फिल्म में भी इस लोकेशन ने कहानी को एक अलग ही आयाम दिया था। अब करीब दो दशक बाद उसी जगह पर फिर से शूटिंग करके मेकर्स ने पुरानी यादों को ताजा करने की कोशिश की है। यही वजह है कि दर्शकों के बीच इस फिल्म की तुलना लगातार भूल भुलैया से की जा रही है। जयपुर के पास स्थित यह ऐतिहासिक इमारत दरअसल चोमू पैलेस के नाम से जानी जाती है। करीब 350 साल पुरानी इस हवेली का निर्माण 16वीं शताब्दी में शुरू हुआ था और समय के साथ इसमें कई बदलाव किए गए। कभी यह शाही परिवार का निवास हुआ करता था जहां दरबार और भव्य समारोह आयोजित होते थे। इसकी विशाल गलियां, ऊंची छतें और जटिल वास्तुकला इसे रहस्यमयी और सिनेमाई बनाती हैं। 20वीं शताब्दी में इस हवेली को नया रूप दिया गया और बाद में इसे एक हेरिटेज होटल में बदल दिया गया। आज भी इसकी मूल संरचना और शाही ठाठ बरकरार हैं, जो फिल्म निर्माताओं को खासा आकर्षित करते हैं। यही वजह है कि कई बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग यहां हो चुकी है और हर बार यह लोकेशन कहानी में जान डाल देती है। अक्षय कुमार के लिए यह हवेली सिर्फ एक शूटिंग लोकेशन नहीं बल्कि एक लकी चार्म भी मानी जा रही है। भूल भुलैया की बड़ी सफलता के बाद अब भूत बंगला के जरिए उसी जादू को दोहराने की कोशिश की गई है। फिल्म में हॉरर और कॉमेडी का मिश्रण है जिसमें पुराने कलाकारों की झलक भी देखने को मिलती है। फिल्म की शुरुआती कमाई भी ठीकठाक रही है और रिलीज के दो दिनों में इसने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया है। अब नजरें इसके पहले वीकेंड पर टिकी हैं जहां यह तय होगा कि फिल्म दर्शकों के दिल में कितनी जगह बना पाती है। कुल मिलाकर भूत बंगला सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि एक यादों और इतिहास से जुड़ी यात्रा भी है जहां 350 साल पुरानी हवेली एक बार फिर अपनी रहस्यमयी कहानी के साथ दर्शकों को डराने और मनोरंजन करने के लिए तैयार खड़ी है।

IPL 2026 में KKR की वापसी ,का गणित आठ में आठ जीत ही बनेगी लाइफलाइन

नई दिल्ली । आईपीएल 2026 में कोलकाता नाइट राइडर्स की शुरुआत बेहद खराब रही है और टीम इस समय टूर्नामेंट से बाहर होने के कगार पर खड़ी नजर आ रही है लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। छह मुकाबलों में पांच हार और एक मैच बारिश की वजह से रद्द होने के बाद टीम अंक तालिका में सबसे नीचे पहुंच गई है। हालिया मुकाबले में गुजरात के खिलाफ मिली हार ने स्थिति और भी गंभीर बना दी है जहां 180 रन का स्कोर बनाने के बावजूद टीम जीत हासिल नहीं कर सकी और विपक्षी कप्तान की शानदार पारी ने मैच छीन लिया। इतिहास पर नजर डालें तो यह स्थिति किसी भी टीम के लिए बेहद खतरनाक मानी जाती है। इससे पहले भी कुछ टीमें सीजन के शुरुआती छह मैचों में जीत दर्ज नहीं कर पाईं और अंत में तालिका में सबसे नीचे रहीं। यही वजह है कि कोलकाता के सामने चुनौती बहुत बड़ी है लेकिन गणित अब भी उनके पक्ष में थोड़ा सा दरवाजा खुला रखता है। असल में टीम को अभी आठ और मैच खेलने हैं और यही मुकाबले उनकी किस्मत तय करेंगे। अगर कोलकाता नाइट राइडर्स इन सभी आठ मैचों में जीत हासिल कर लेती है तो उनके कुल 17 अंक हो जाएंगे। आईपीएल के पिछले आंकड़े बताते हैं कि 16 से 18 अंकों के बीच रहने वाली टीमें अक्सर प्लेऑफ में जगह बना लेती हैं। ऐसे में 17 अंक टीम को मजबूत स्थिति में पहुंचा सकते हैं। हालांकि यह रास्ता आसान बिल्कुल नहीं है। लगातार आठ मैच जीतना किसी भी टीम के लिए बड़ी चुनौती होती है खासकर तब जब टीम का मौजूदा फॉर्म कमजोर हो और आत्मविश्वास डगमगाया हुआ हो। बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों विभागों में सुधार की जरूरत साफ दिखाई दे रही है। टीम को अपने संयोजन में बदलाव करना होगा और प्रमुख खिलाड़ियों को जिम्मेदारी निभानी होगी तभी यह असंभव सा दिखने वाला लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। अगर टीम एक भी मैच हार जाती है तो स्थिति और कठिन हो जाएगी क्योंकि उस स्थिति में अधिकतम 15 अंक ही मिल पाएंगे। पिछले सीजन में देखा गया था कि 15 अंक होने के बावजूद एक टीम प्लेऑफ में जगह नहीं बना सकी थी। यानी सिर्फ जीत ही नहीं बल्कि बड़े अंतर से जीत और नेट रन रेट भी निर्णायक भूमिका निभाएगा। आगे का शेड्यूल भी आसान नहीं है जहां उन्हें मजबूत टीमों का सामना करना है। घरेलू मैदान पर कुछ मुकाबले जरूर राहत दे सकते हैं लेकिन बाहर के मैचों में जीत हासिल करना असली परीक्षा होगी। हर मुकाबला अब करो या मरो जैसा बन चुका है और टीम को हर मैच फाइनल की तरह खेलना होगा कुल मिलाकर कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए प्लेऑफ का रास्ता बेहद कठिन जरूर है लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। अगर टीम एकजुट होकर असाधारण प्रदर्शन करती है तो यह सीजन उनके लिए एक ऐतिहासिक वापसी की कहानी भी बन सकता है।

लोकसभा सीट बढ़ाने का विधेयक 54 वोट से गिरा, सरकार आवश्यक बहुमत जुटाने में असफल

नई दिल्ली:लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक संसद में आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका और 54 वोट से गिर गया। इस प्रस्ताव के तहत मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने की योजना थी, लेकिन मतदान के दौरान सरकार को अपेक्षित दो तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। इस असफलता के बाद यह विधेयक आगे नहीं बढ़ सका और राजनीतिक स्तर पर यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। मतदान प्रक्रिया में कुल 528 सांसदों ने भाग लिया, जिनमें 298 ने पक्ष में और 230 ने विरोध में मतदान किया। हालांकि विधेयक को पारित करने के लिए 352 वोटों की आवश्यकता थी, जो सरकार पूरी नहीं कर सकी। लंबे समय तक चली चर्चा के बाद हुए इस मतदान ने संसद में बने राजनीतिक समीकरणों को स्पष्ट कर दिया। यह विधेयक केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका संबंध परिसीमन और महिला आरक्षण की प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ था। प्रस्ताव के अनुसार परिसीमन के बाद लोकसभा में महिला आरक्षण को 33 प्रतिशत तक लागू करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा था। लेकिन इसके गिरने के बाद इस प्रक्रिया में और देरी की संभावना बढ़ गई है। करीब 21 घंटे चली बहस में सरकार और विपक्ष दोनों ने अपने तर्क रखे। सरकार का कहना था कि सीटों में वृद्धि से देश के सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बेहतर होगा और लोकतंत्र अधिक मजबूत बनेगा। वहीं विपक्ष ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है और कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। विपक्ष ने परिसीमन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि बिना व्यापक सामाजिक और जनसंख्या आंकड़ों के बदलाव करना उचित नहीं होगा। उनका तर्क था कि यह निर्णय राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है और इससे कुछ राज्यों को नुकसान हो सकता है। सरकार की ओर से इस सत्र में जुड़े अन्य संबंधित विधेयकों को अलग से मतदान के लिए पेश नहीं किया गया। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि सभी प्रस्ताव एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग मतदान की आवश्यकता नहीं समझी गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि बहुमत होने के बावजूद आवश्यक समर्थन न मिल पाना संसद में सहमति की कमी को दर्शाता है। मतदान से पहले सरकार की ओर से विपक्ष से समर्थन जुटाने की कोशिश भी की गई, लेकिन सहमति नहीं बन सकी। इस घटनाक्रम के बाद अब यह संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस विधेयक में संशोधन कर दोबारा पेश कर सकती है या विपक्ष के साथ व्यापक सहमति बनाने का प्रयास करेगी। फिलहाल इस असफलता के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर अनिश्चितता बनी हुई है।

90 के दशक का काला सच राम गोपाल वर्मा का बड़ा खुलासा क्यों बने थे गुलशन कुमार अंडरवर्ल्ड का निशाना

नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के इतिहास में 1990 का दशक एक ऐसा दौर रहा है जब फिल्म इंडस्ट्री सिर्फ रचनात्मकता और स्टारडम तक सीमित नहीं थी बल्कि उस पर अंडरवर्ल्ड का गहरा साया भी मंडरा रहा था इसी दौर को याद करते हुए फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं उन्होंने बताया कि उस समय मुंबई का अंडरवर्ल्ड केवल पैसा कमाने तक सीमित नहीं था बल्कि वह फिल्म इंडस्ट्री पर अपना नियंत्रण और दबदबा स्थापित करना चाहता था राम गोपाल वर्मा ने लेखक हुसैन ज़ैदी के साथ बातचीत में कहा कि अंडरवर्ल्ड की हर कार्रवाई सोची-समझी रणनीति का हिस्सा होती थी गैंगस्टर बड़े और असरदार नामों को घुमाकर इंडस्ट्री में डर का माहौल बनाती थी ताकि बाकी लोग अपने आप उनके दबाव में आ जाएं उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि शाहरुख खान सलमान खान और राकेश रोशन जैसे बड़े नामों को एडजस्ट करना इसी रणनीति का हिस्सा था। उनके अनुसार अंडरवर्ल्ड का मकसद केवल वसूली नहीं था बल्कि सत्ता और कंट्रोल हासिल करना भी था जब कोई बड़ा सितारा या फिल्ममेकर उनकी बात सहमत से मना करता था तो उसे एक उदाहरण बनाने की कोशिश की जाती थी ताकि बाकी लोग डर जाएं यह डर ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन जाता था। इसी संदर्भ में उन्होंने साल 2000 में राकेश रोशन पर हुए हमले का जिक्र किया यह हमला फिल्म कहो ना… प्यार है की जबरदस्त कामयाबी के तुरंत बाद हुआ था बताया जाता है कि अंडरवर्ल्ड फिल्म की तारीखों और काम पर कंट्रोल चाहता था और जब इसका विरोध किया गया तो 21 जनवरी 2000 को उनके ऑफिस के बाहर प्रवर्तन की घटना सामने आई हालांकि किस्मत से वह इस हमले में बच गए। वहीं 1997 में हुई गुलशन कुमार की हत्या को लेकर भी राम गोपाल वर्मा ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि गुलशन कुमार की बढ़ती लोकप्रियता और प्रभाव उन्हें अंडरवर्ल्ड के निशाने पर ले आया था। उनके अनुसार अबू सलेम जैसे अपराधियों के लिए यह घटना अपनी ताकत और पहचान स्थापित करने का एक जरिया भी रही होगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि गुलशन कुमार ने कथित तौर पर जबरन वसूली की संस्थाओं के आगे झुकने से इनकार कर दिया था और यही उनके खिलाफ साजिश की एक बड़ी वजह बन सकती है उस दौर में जो भी व्यक्ति दबाव के आगे नहीं झुकता था उसे अंजाम देने के लिए तैयार रहना पड़ता था यह पूरी घटना उस समय के बॉलीवुड की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है जब फिल्म इंडस्ट्री को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि अपराध जगत के प्रभाव का भी सामना करना पड़ रहा था राम गोपाल वर्मा के ये खुलेसे न केवल उस दौर की जलनता को सामने लाते हैं बल्कि यह भी बताते हैं कि किस तरह डर और दबाव के जरिए एक पूरी इंडस्ट्री को प्रभावित करने की कोशिश की गई

महिला आरक्षण और परिसीमन विवाद पर प्रियंका गांधी का हमला, सरकार की मंशा पर उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली:लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक माहौल गरम हो गया है। इस मुद्दे पर कांग्रेस की महासचिव और सांसद प्रियंका गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि जिस तरह इस पूरे मामले को आगे बढ़ाया गया, उससे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं और विपक्ष की एकजुटता ने इस रणनीति को विफल कर दिया। प्रियंका गांधी ने कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं था, बल्कि इसके पीछे परिसीमन से जुड़ा एक बड़ा पहलू छिपा हुआ था। उनके अनुसार सरकार ने इस प्रक्रिया को जिस तरह आगे बढ़ाया, उसमें पारदर्शिता की कमी दिखाई दी। उन्होंने आरोप लगाया कि विधेयक पर पर्याप्त चर्चा का समय नहीं दिया गया और अंतिम समय में दस्तावेज साझा किए गए, जिससे विस्तृत विचार विमर्श संभव नहीं हो सका। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव से पहले सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लेना जरूरी होता है। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया, जिससे विपक्ष को अपनी स्थिति स्पष्ट करने में कठिनाई हुई। उनके अनुसार यह तरीका लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। प्रियंका गांधी ने परिसीमन के मुद्दे को इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि बिना व्यापक सामाजिक और जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों को ध्यान में रखे परिसीमन करना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार यह केवल सीटों के पुनर्वितरण का मामला नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संतुलन और प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा हुआ विषय है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर सरकार की योजना एकतरफा प्रतीत होती है। उनके अनुसार यदि इस प्रक्रिया में निष्पक्षता नहीं रखी गई तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर डाल सकता है। उन्होंने कहा कि देश के लोग अब पहले से अधिक जागरूक हैं और हर निर्णय को ध्यान से देख रहे हैं। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर बात करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ाना एक सकारात्मक कदम होगा, लेकिन इसे केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि वास्तविक भागीदारी के रूप में लागू किया जाना चाहिए। उनके अनुसार महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि परिसीमन से पहले जातिगत और सामाजिक आंकड़ों पर आधारित स्पष्ट डेटा होना जरूरी है, ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो। उनके अनुसार लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सभी वर्गों को समान अवसर मिले और किसी भी प्रकार का पक्षपात न हो। इस पूरे बयान के बाद महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। यह मुद्दा अब केवल विधायी प्रक्रिया नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।