कद छोटा लेकिन हौसला आसमान से ऊंचा राजपाल यादव ने संघर्ष और सम्मान पर कही बड़ी बात

नई दिल्ली । फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाने वाले मशहूर अभिनेता राजपाल यादव इन दिनों एक बार फिर सुर्खियों में हैं उनकी हालिया रिलीज फिल्म भूत बंगला में उनकी दमदार कॉमिक टाइमिंग को दर्शकों का खूब प्यार मिल रहा है लंबे समय बाद उन्हें बड़े पर्दे पर देखकर उनके फैंस भी खासे उत्साहित नजर आ रहे हैं फिल्म में अक्षय कुमार के साथ उनकी जोड़ी एक बार फिर दर्शकों को हंसाने में कामयाब रही है और यही वजह है कि राजपाल यादव की वापसी को काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है लेकिन इस बीच उन्होंने अपने निजी जीवन और करियर से जुड़े कुछ ऐसे पहलुओं पर खुलकर बात की है जो उनके संघर्ष और सोच को गहराई से उजागर करते हैं हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में राजपाल यादव ने अपनी हाइट को लेकर खुलकर बात की उन्होंने बताया कि वह बचपन से ही पांच फीट दो इंच के हैं और उन्होंने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया उनके अनुसार उनकी मां का आशीर्वाद ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा है उन्होंने भावुक अंदाज में कहा कि उनकी मां हमेशा उन्हें आसमान जितना ऊंचा बनने का आशीर्वाद देती थीं और वही सोच उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रही राजपाल यादव ने यह भी बताया कि समाज में लोगों का नजरिया अक्सर व्यक्तित्व के आधार पर बदल जाता है उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति लोगों को हंसाता है सहज रहता है और विनम्र होता है उसे कई बार हल्के में लिया जाता है जबकि गंभीर और एटीट्यूड वाले लोगों को ज्यादा सम्मान दिया जाता है यह सोच कहीं न कहीं उन्हें अंदर तक प्रभावित करती है लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी खुद को कमतर नहीं समझा उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें कभी अपनी हाइट या अपनी पहचान को लेकर कोई कॉम्प्लेक्स नहीं हुआ लोग उन्हें कॉमेडियन कहते हैं या अच्छा इंसान बताते हैं तो वह इसे प्रसाद की तरह स्वीकार करते हैं उनके लिए यह सम्मान की बात है कि वह लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला पाते हैं उनकी यह सोच न केवल उनके व्यक्तित्व को दर्शाती है बल्कि यह भी बताती है कि सफलता केवल बाहरी रूप या कद से नहीं बल्कि आत्मविश्वास और मेहनत से हासिल होती है राजपाल यादव का यह बयान उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है जो किसी न किसी वजह से खुद को कम आंकते हैं विवादों और मुश्किल दौर के बाद एक बार फिर से दर्शकों के दिलों में जगह बनाना आसान नहीं होता लेकिन राजपाल यादव ने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर यह साबित कर दिया है कि सच्ची लगन और सकारात्मक सोच के साथ किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है उनका सफर यह बताता है कि असली ऊंचाई इंसान के कद में नहीं बल्कि उसके हौसले और सोच में होती है
मुद्दा : जन भागीदारी से होगा हमारी विरासत का संरक्षण

-प्रदीप कुमार वर्मामिस्र की राजधानी काहिरा के पास गीज़ा पठार पर नील नदी के पश्चिमी तट पर स्थित गीजा के पिरामिड। रोम का ऐतिहासिक एम्फीथिएटर। चट्टानों को काटकर बनाया गया जॉर्डन का पेट्रा शहर। और विश्व के सात अजूबों में शामिल भारत का ताजमहल। यह सभी विश्व विरासत की एक बानगी भर हैं। देश और दुनिया में ऐसी सैकड़ो अमूल्य धरोहर हैं, जो विश्व विरासत के रूप में हमारे सामने हैं। यह विरासतें दुनिया भर की मानव सभ्यता की सांझी संस्कृति हैं। विरासत को बचाने का अर्थ इसी सांझी संस्कृति और विरासत को बचाने से है। इसी विश्व विरासत को बचाने इस संबंध में लोगों को जागरूक करने तथा संरक्षण के प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए 18 अप्रैल को विश्व विरासत दिवस मनाया जाता है। विश्व विरासत दिवस लोगों को दुनिया भर के विभिन्न सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत स्थलों के बारे में जानने और उनके संरक्षण के मूल्य को पहचानने का अवसर प्रदान करता है। विश्व विरासत दिवस मनाने के अतीत पर गौर करें तो पता चलता है कि 18 अप्रैल 1982 को ट्यूनीशिया में इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड साइट्स द्वारा इस संबंध में एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद वर्ष 1983 में,यूनेस्को की 22वीं महासभा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और हर साल इसे मनाने की आधिकारिक मान्यता भी दी। विश्व विरासत दिवस मनाने का उद्देश्य समूची मानव सभ्यता से जुड़े ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों के संरक्षण के संबंध में जनमानस को जागरूक करना है। और उनकी रक्षा करना। यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि हमारी विरासत अनमोल है और इसे भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जाना चाहिए। ऐसी विरासत को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा दिया जाता है, जो सांस्कृतिक या प्राकृतिक रूप से मानवता के लिए अनमोल होते हैं। वर्तमान में भारत में विश्व धरोहर स्थल का संरक्षण भारत सरकार द्वारा किया जाता है। लेकिन इस कार्य की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई। वर्ष 1861 में भारत में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की गई। कनिंघम के नेतृत्व में भारत में सारे ही प्राचीन स्थलों की खोज एवं संरक्षण का काम किया गया। प्राचीन हड़प्पा सभ्यता के शहर मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की खोज भी उसी समय हुई। भारत में अब तक 40 से अधिक स्थलों को विश्व विरासत का दर्जा देते हुए उन्हें सूची में शामिल किया गया है। इनमें विश्व प्रसिद्द अजंता एवं एलोरा की गुफाएं,आगरा का किला, दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल,सूर्य मंदिर,महाबलीपुरम स्मारक, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, विदेशी प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग कहा जाने वाला भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान,मानस वन्यजीव अभयारण्य,गोवा के चर्च और कॉन्वेंट, नागर शैली के प्रतीकवाद और कामुक आकृतियों और मूर्तियों के लिए प्रख्यात खजुराहो के स्मारक,हम्पी के स्मारक तथा फतेहपुर सीकरी के चार मुख्य स्मारक जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा,पंच महल, दीवाने-खास और दीवान-आम शामिल हैं। इसके साथ ही ग्रेट लिविंग चोल मंदिर,पट्टदकल स्मारक,सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान,नंदा देवी और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान,बुद्ध के स्मारक,हुमायूं का मकबरा, दिल्ली की कुतुब मीनार, अलाई दरवाजा, अलाई मीनार, कुब्बत-उल-इस्लाम मस्जिद, इल्तुमिश का मकबरा और लौह स्तंभ शामिल हैं। इसके साथ ही दार्जिलिंग, कालका शिमला और नीलगिरि की पर्वतीय रेलवे,महाबोधि मंदिर,भीमबेटका,छत्रपति शिवाजी टर्मिनस,चंपानेर पावागढ़ पुरातत्व उद्यान, दिल्ली का लाल किला, जयपुर का जंतर मंतर,राजस्थान के चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर किला, गागरोन किला, आमेर किला और जैसलमेर जैसे प्राचीन किले शामिल हैं। गुजरात के अहमदाबाद में रानी की वाव भी विश्व विरासत धरोहर में शामिल है। आज दुनिया भर में पर्यावरण का विनाश, युद्धों और गृहयुद्धों के कारण बड़े पैमाने पर प्राचीन विरासतों का विनाश हो रहा है। अफ़ग़ानिस्तान प्राचीन बौद्ध सभ्यता का बड़ा केन्द्र रहा है । लेकिन जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी शासक सत्ता में आए तो उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के बामियान प्रान्त में पहाड़ काटकर बनी गौतमबुद्ध की क़रीब एक हजार साल पुरानी मूर्ति को नष्ट कर दिया। इराक़ के बगदाद का राष्ट्रीय संग्रहालय मेसोपोटामिया सभ्यता की कलाकृतियों के संग्रह का सबसे बड़ा संग्रहालय था। लेकिन खाड़ी युद्ध में इराक़ की पराजय के बाद जब अमेरिकी सेनाएं बगदाद में घुसीं तो उन्होंने भारी पैमाने पर इस संग्रहालय में लूट-पाट की। दुनिया भर में विरासतों के हालात अत्यंत चिंताजनक हैं। यूनेस्को द्वारा भारत और समूचे विश्व में विरासत संरक्षण का दायित्व लेने के बावज़ूद इस दिशा में जागरूकता की कमी है। यह धरोहर हमारे समृद्ध अतीत का प्रमाण हैं, लेकिन नागरिक के रूप में हम इसके महत्व को बहुत कम समझते हैं। हमारे इतिहास, संस्कृति और पहचान को बनाये रखने के लिये धरोहरों का महत्वपूर्ण स्थान है। इनका संरक्षण न केवल यूनेस्को या किसी अन्य सरकार का काम है, बल्कि विश्व के हर एक नागरिक को इनके संरक्षण में अपनी सतत एवं समर्पित भागीदारी निभानी चाहिए।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ऐतिहासिक स्तर पर 700 अरब डॉलर के पार पहुंचा..

नई दिल्ली:देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार मजबूती की दिशा में आगे बढ़ रहा है और ताजा आंकड़ों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि को सामने रखा है। हालिया अवधि में विदेशी मुद्रा भंडार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है और यह अब 700 अरब डॉलर के स्तर को पार कर चुका है। यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में उतार चढ़ाव और अनिश्चितताओं का माहौल बना हुआ है। इस बढ़ोतरी ने देश की वित्तीय स्थिरता और आर्थिक मजबूती को और अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार एक सप्ताह के दौरान विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 3.82 अरब डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई है। इस बढ़ोतरी के बाद कुल भंडार 700 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया है। इससे पहले भी भंडार में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे थे लेकिन अब इसमें स्थिरता के साथ सकारात्मक वृद्धि का रुझान सामने आया है। यह स्थिति देश की आर्थिक नीतियों और बाहरी वित्तीय परिस्थितियों के बीच बेहतर संतुलन को दर्शाती है। इस वृद्धि में विदेशी मुद्रा संपत्तियों का सबसे बड़ा योगदान रहा है। ये संपत्तियां कुल भंडार का प्रमुख हिस्सा होती हैं और इनमें विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के उतार चढ़ाव का सीधा प्रभाव पड़ता है। यूरो पाउंड और येन जैसी प्रमुख मुद्राओं में बदलाव के बावजूद इन संपत्तियों में मजबूती देखने को मिली है जिससे कुल विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा मिला है और इसमें वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही सोने के भंडार में भी वृद्धि दर्ज की गई है जिसने कुल विदेशी मुद्रा भंडार को अतिरिक्त मजबूती प्रदान की है। सोना एक सुरक्षित संपत्ति के रूप में माना जाता है और इसके मूल्य में बदलाव का प्रभाव सीधे देश के कुल भंडार पर पड़ता है। इसके अलावा विशेष आहरण अधिकार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिति में सुधार ने भी इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा और वैश्विक भरोसे का प्रमुख संकेतक होता है। यह न केवल देश को बाहरी आर्थिक झटकों से बचाने में मदद करता है बल्कि मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने की क्षमता भी प्रदान करता है। मजबूत भंडार अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के विश्वास को बढ़ाता है जिससे आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने की संभावना भी बढ़ जाती है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में जब कई अर्थव्यवस्थाएं दबाव और अस्थिरता का सामना कर रही हैं तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार मजबूत स्थिति में बना हुआ है। यह संकेत देता है कि देश की वित्तीय प्रणाली स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ रही है और आर्थिक प्रबंधन अपेक्षाकृत संतुलित तरीके से कार्य कर रहा है। बढ़ता हुआ भंडार भविष्य में किसी भी बाहरी आर्थिक दबाव से निपटने की क्षमता को और अधिक मजबूत बनाता है और देश की आर्थिक स्थिति को वैश्विक स्तर पर अधिक सुदृढ़ पहचान प्रदान करता है।
मटका किंग सीजन 2 में और भी गहराई के साथ नजर आएगा विनीत कुमार सिंह का किरदार..

नई दिल्ली: वेब सीरीज मटका किंग को लेकर दर्शकों के बीच उत्साह लगातार बढ़ता जा रहा है और अब इसके दूसरे सीजन से जुड़ी चर्चाओं ने माहौल को और भी रोमांचक बना दिया है। सीरीज में अहम भूमिका निभा रहे अभिनेता विनीत कुमार सिंह ने अपने किरदार को लेकर ऐसे संकेत दिए हैं जिससे दर्शकों की उम्मीदें और अधिक बढ़ गई हैं। उन्होंने बताया कि दूसरे सीजन में उनका किरदार दारब अहमद वडकर कहानी में और भी गहराई और प्रभाव के साथ नजर आएगा। विनीत कुमार सिंह के अनुसार मटका किंग उनके करियर के लिए एक बेहद खास प्रोजेक्ट है। उन्होंने बताया कि इस सीरीज की शूटिंग वर्ष 2025 में पूरी की गई थी और पहले सीजन में उनका किरदार सीमित उपस्थिति के साथ नजर आता है। हालांकि दूसरे सीजन में उनकी भूमिका का विस्तार कहानी को नई दिशा देगा और दर्शकों को किरदार की नई परतें देखने को मिलेंगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि फिलहाल वे अधिक जानकारी साझा नहीं करना चाहते क्योंकि कहानी से जुड़े कई अहम मोड़ अभी सामने आना बाकी हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट उनके लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा है और इसके जरिए उन्हें ऐसे रचनात्मक माहौल में काम करने का अवसर मिला जहां किरदारों को विस्तार से गढ़ा गया है। उनके अनुसार दूसरे सीजन में कहानी और भी जटिल और रोचक रूप में सामने आएगी, जिससे दर्शकों की रुचि बनी रहेगी। मुख्य अभिनेता विजय वर्मा ने भी शूटिंग के दौरान अपने अनुभव साझा किए हैं। उन्होंने बताया कि सेट पर पुराने समय की कई विंटेज कारों का इस्तेमाल किया गया था, जिसने उस दौर के माहौल को जीवंत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। इन कारों की बनावट और इतिहास ने उन्हें काफी प्रभावित किया और शूटिंग का अनुभव और भी वास्तविक बना दिया। मटका किंग की कहानी मटका सट्टेबाजी की दुनिया की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसमें उस समय की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को भी दर्शाया गया है। पहले सीजन में कहानी की नींव रखी गई थी, जबकि दूसरे सीजन में किरदारों के बीच संबंध और घटनाओं की परतें और अधिक गहराई से सामने आने की उम्मीद है। इस सीरीज ने अपने विषय और प्रस्तुति के कारण पहले ही दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया है और अब दूसरे सीजन को लेकर उत्सुकता लगातार बढ़ती जा रही है।
चुनौतियों के चक्रव्यूह के बीच खड़ा बिहार का नया ‘सम्राट’

-योगेश कुमार गोयलबिहार की राजनीति में सत्ता का शिखर छूना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है उस शिखर पर टिके रहकर अपनी सर्वमान्यता सिद्ध करना। सम्राट चौधरी का बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में उदय राज्य के सियासी इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात माना जा रहा है। यह केवल एक व्यक्ति का मुख्यमंत्री बनना नहीं है बल्कि भारतीय जनता पार्टी का बिहार में उस ‘बड़े भाई’ की भूमिका को आधिकारिक रूप से स्वीकार करना है, जिसका इंतजार पार्टी कार्यकर्ता दशकों से कर रहे थे। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने की जिम्मेदारी अब सम्राट चौधरी के कंधों पर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह नीतीश कुमार की उस लंबी और गहरी छाया से बाहर निकल पाएंगे, जिसने पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति को परिभाषित किया है? यही वह कसौटी है, जिस पर अब सम्राट चौधरी को परखा जाएगा। सम्राट चौधरी का राजनीतिक उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह उनके पिता शकुनी चौधरी की विरासत, और उनके स्वयं के आक्रामक संघर्ष, दशकों की राजनीतिक यात्रा, रणनीतिक धैर्य और समयानुकूल निर्णयों का परिणाम है। 16 नवंबर 1968 को मुंगेर के लखनपुर में जन्मे सम्राट ने बहुत कम उम्र में ही सत्ता का स्वाद चख लिया था। 1999 में राबड़ी देवी सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बनने से लेकर आज मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर वैचारिक बदलावों और रणनीतिक फैसलों से भरा रहा है। राजद और जदयू जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ काम करने के बाद 2017 में भाजपा का दामन थामना उनके करियर का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भाजपा ने उनमें एक ऐसे पिछड़ा नेतृत्व (ओबीसी) को देखा, जो न केवल संगठन में जान फूंक सकता था बल्कि राजद के ‘माई’ (एमवाई) समीकरण के सामने एनडीए के ‘लव-कुश’ समीकरण को मजबूती दे सकता था। विशेषकर कुशवाहा समुदाय से आने के कारण सम्राट चौधरी भाजपा के लिए सामाजिक संतुलन का सबसे सटीक मोहरा साबित हुए। भाजपा ने उन्हें न केवल स्वीकार किया बल्कि प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद देकर उनकी नेतृत्व क्षमता पर भरोसा भी जताया। यही भरोसा आज उन्हें मुख्यमंत्री पद तक ले आया है। मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी की नियुक्ति के साथ ही बिहार की राजनीति में एक दुर्लभ संयोग भी जुड़ा है। जननायक कर्पूरी ठाकुर के बाद वह दूसरे ऐसे नेता बने हैं, जिन्होंने पहले उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली और बाद में मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे। यह उपलब्धि उनके कद को तो बढ़ाती है लेकिन इसके साथ आने वाली अपेक्षाएं उनके लिए हिमालयी चुनौतियों जैसी हैं। नीतीश कुमार केवल एक राजनेता नहीं थे बल्कि वह बिहार के लिए एक ‘इंस्टीट्यूशन’ बन चुके थे। उनके 20 वर्षों के शासनकाल ने राज्य में सुशासन की एक ऐसी परिभाषा गढ़ी, जिसमें महिला सुरक्षा, सड़कें, बिजली और शराबबंदी जैसे मुद्दे हर घर से जुड़े थे। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वे स्वयं को नीतीश कुमार के विकल्प के रूप में पेश करते हैं या एक ऐसी नई पहचान गढ़ते हैं, जो नीतीश के ‘विकास’ और भाजपा की ‘वैचारिक प्रखरता’ का संगम हो। अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि नीतीश कुमार जैसा सर्वमान्य नेता बनना सम्राट चौधरी के लिए रातों-रात संभव नहीं होगा। नीतीश कुमार की स्वीकार्यता समाज के हर वर्ग, चाहे वह महादलित हो, अति पिछड़ा हो या आधी आबादी (महिलाएं) हो, में गहराई तक थी। सम्राट चौधरी के पास फिलहाल एक मजबूत सांगठनिक ढांचा और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का आशीर्वाद है लेकिन उन्हें अपनी ‘आक्रामक छवि’ को अब ‘प्रशासकीय संयम’ में बदलना होगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद अब उनके हर फैसले की तुलना नीतीश कुमार के मानकों से की जाएगी। क्या वह उसी सहजता से महादलितों और अति पिछड़ों के हितों की रक्षा कर पाएंगे? क्या वह शराबबंदी जैसी पेचीदा नीतियों को लेकर जनता के बीच अपना स्पष्ट नजरिया रख पाएंगे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर उनके कार्यकाल के शुरुआती सौ दिन ही तय करेंगे। चुनौतियां केवल बाहर ही नहीं, गठबंधन के भीतर भी हैं। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद जदयू के भविष्य और निशांत कुमार के सक्रिय राजनीति में प्रवेश ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है। जदयू के भीतर इस बदलाव को लेकर एक दबी हुई छटपटाहट है। सम्राट चौधरी को यह सुनिश्चित करना होगा कि गठबंधन के सहयोगी दल खुद को उपेक्षित महसूस न करें। साथ ही, उन्हें भाजपा के भीतर भी उन वरिष्ठ नेताओं को विश्वास में लेना होगा, जो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पीछे रह गए। सम्राट चौधरी पर उनके पुराने विवादों, जैसे कम उम्र में मंत्री पद से हटाए जाने की घटना और उनके शैक्षणिक पहलुओं को लेकर विपक्ष हमलावर रहेगा। एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पेशेवर छवि और शुचिता पर उठने वाले सवालों का सामना उन्हें अपनी कार्यशैली से ही करना होगा। बिहार में 2025 का जनादेश एक तरह से ‘फेयरवेल मैंडेट’ जैसा रहा है, जहां जनता बदलाव की मानसिक तैयारी कर चुकी थी। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी ताकत उनका ओबीसी समुदाय से होना और भाजपा आलाकमान का पूर्ण समर्थन है लेकिन उनकी राह का सबसे बड़ा कांटा ‘नीतीश कुमार का औरा’ है। भाजपा ने अब तक बिहार में नीतीश कुमार के साये में राजनीति की है, अब उसे अपनी स्वतंत्र इमारत खड़ी करनी है, जिसकी नींव सम्राट चौधरी को रखनी है। यह सफर कांटों भरा है क्योंकि उन्हें न केवल विकास की रफ्तार बनाए रखनी है बल्कि बिहार की उस जटिल सामाजिक संरचना को भी साधे रखना है, जहां जाति की राजनीति कभी खत्म नहीं होती। सम्राट चौधरी की कहानी एक ऐसे संघर्षशील नेता की है, जिसने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनकी असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। क्या वे बिहार को ‘बीमारू’ छवि से पूर्णतः मुक्त कर ‘विकसित बिहार’ के संकल्प को सिद्ध कर पाएंगे? यह भविष्य के गर्भ में है मगर फिलहाल बिहार की सत्ता का यह नया ‘सम्राट’ चुनौतियों के चक्रव्यूह के बीच खड़ा है। सम्राट चौधरी के पास अवसर भी है और चुनौती भी, अब यह उनके नेतृत्व पर निर्भर करेगा कि वे इस
केंद्र सरकार ने कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए 2 प्रतिशत डीए बढ़ोतरी को दी मंजूरी..

नई दिल्ली:केंद्र सरकार ने देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स को राहत देते हुए महंगाई भत्ते और महंगाई राहत में 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद अब डीए 58 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया है। लंबे समय से इंतजार कर रहे कर्मचारियों के लिए यह निर्णय आर्थिक राहत लेकर आया है और उनकी मासिक आय में सीधा असर डालेगा। सरकारी निर्णय के अनुसार यह बढ़ोतरी 1 जनवरी 2026 से प्रभावी मानी जाएगी। इसका मतलब है कि कर्मचारियों को इस तारीख से बढ़ा हुआ महंगाई भत्ता मिलेगा और इसके साथ ही उन्हें पिछले महीनों का एरियर भी दिया जाएगा। जनवरी, फरवरी और मार्च के बकाया भुगतान का लाभ सीधे उनके वेतन के साथ जोड़ा जाएगा, जिससे एकमुश्त अतिरिक्त राशि उनके खाते में पहुंचेगी। महंगाई भत्ता सरकारी वेतन संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, जिसे बढ़ती कीमतों के प्रभाव को संतुलित करने के लिए समय समय पर संशोधित किया जाता है। इसका निर्धारण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर किया जाता है, जो बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में होने वाले बदलाव को दर्शाता है। इसी आधार पर सरकार समय समय पर इसमें संशोधन करती है ताकि कर्मचारियों की क्रय शक्ति प्रभावित न हो। इस बार डीए बढ़ोतरी को लेकर कर्मचारियों को सामान्य से अधिक समय तक इंतजार करना पड़ा। आमतौर पर यह संशोधन समय पर कर दिया जाता है, लेकिन इस बार प्रक्रिया में देरी देखने को मिली। इसके बावजूद अब मंजूरी मिलने के बाद कर्मचारियों और पेंशनर्स के बीच संतोष और राहत का माहौल है। हालांकि कर्मचारी संगठनों की ओर से इस बार 3 से 4 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन सरकार ने 2 प्रतिशत वृद्धि को मंजूरी दी है। इसके बावजूद डीए का 60 प्रतिशत स्तर पार करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह वेतन संरचना में एक बड़ा संकेत देता है और भविष्य में सैलरी स्ट्रक्चर पर इसका प्रभाव देखने को मिलेगा। इस बढ़ोतरी का सीधा असर कर्मचारियों और पेंशनर्स की मासिक आय पर पड़ेगा। एरियर मिलने से उन्हें एक साथ अतिरिक्त राशि प्राप्त होगी, जिससे घरेलू बजट को मजबूती मिलेगी। महंगाई के मौजूदा दौर में यह निर्णय उनके खर्चों को संतुलित करने में मदद करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बढ़ोतरी से बाजार में खपत बढ़ सकती है, क्योंकि लोगों के पास खर्च करने योग्य आय में इजाफा होता है। इसका अप्रत्यक्ष असर अर्थव्यवस्था की गतिविधियों पर भी देखने को मिल सकता है।
इंदौर में स्विफ्ट कार बनी आग का गोला समय रहते बाहर निकला परिवार टला बड़ा हादसा

इंदौर । मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में एक बड़ा हादसा होते होते टल गया जब रेडिसन चौराहा के पास बॉम्बे हॉस्पिटल रोड पर एक चलती मारुति स्विफ्ट कार में अचानक भीषण आग लग गई। इस घटना के दौरान कार में एक पूरा परिवार सवार था जिसमें पति पत्नी, उनकी बुजुर्ग मां और लगभग तीन साल की बच्ची शामिल थी। जानकारी के अनुसार जैसे ही कार आगे बढ़ रही थी तभी अचानक उसमें से धुआं निकलने लगा और कुछ ही पलों में आग की लपटें दिखाई देने लगीं। स्थिति को भांपते हुए चालक ने तुरंत सूझबूझ दिखाई और कार को सड़क किनारे रोक दिया। बिना देर किए पूरे परिवार ने समय रहते वाहन से बाहर निकलकर अपनी जान बचाई। घटना के दौरान सड़क से गुजर रहे राहगीरों ने भी तत्परता दिखाई। मौके पर मौजूद एक पानी के टैंकर चालक ने तुरंत स्थिति को समझते हुए आग बुझाने का प्रयास किया और पानी डालकर आग पर काफी हद तक काबू पाया। उनकी इस तेजी और सूझबूझ की वजह से आग और ज्यादा फैलने से रोक ली गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आग इतनी तेजी से फैली कि कुछ ही मिनटों में कार का अगला हिस्सा पूरी तरह चपेट में आ गया। अगर परिवार समय रहते बाहर नहीं निकलता तो बड़ा नुकसान हो सकता था। घटना की सूचना मिलते ही विजयनगर थाना पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति का जायजा लिया। एसीपी पराग सैनी ने बताया कि प्रारंभिक जांच में आग लगने की वजह शॉर्ट सर्किट मानी जा रही है हालांकि वास्तविक कारणों की पुष्टि के लिए जांच जारी है। इस घटना में राहत की बात यह रही कि किसी भी प्रकार की जनहानि नहीं हुई और पूरा परिवार सुरक्षित बच गया। स्थानीय लोगों और राहगीरों की तत्परता से एक बड़ा हादसा टल गया। पुलिस अब मामले की विस्तृत जांच कर रही है ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि तकनीकी खराबी के अलावा कोई अन्य कारण तो जिम्मेदार नहीं था।
एआई और ऑटोमेशन को कार्यबल कटौती का प्रमुख कारण बताया जा रहा..

नई दिल्ली: वैश्विक तकनीकी उद्योग एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है जहां कार्यबल में बड़े पैमाने पर कटौती की आशंका ने कर्मचारियों के बीच चिंता बढ़ा दी है। दुनिया की प्रमुख तकनीकी कंपनियों में से एक द्वारा अपने संगठनात्मक ढांचे में पुनर्गठन की तैयारी की जा रही है जिसके तहत कुल कर्मचारियों की संख्या में लगभग दस प्रतिशत तक की कमी किए जाने की संभावना जताई जा रही है। इस प्रस्तावित कदम से हजारों कर्मचारियों की नौकरी पर सीधा असर पड़ सकता है और पूरे उद्योग में अस्थिरता का माहौल बनता नजर आ रहा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यह छंटनी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से लागू की जा सकती है और इसका पहला चरण आगामी महीनों में शुरू होने की संभावना है। अनुमान है कि इस शुरुआती दौर में करीब आठ हजार कर्मचारी प्रभावित हो सकते हैं। वहीं यदि यह प्रक्रिया आगे विस्तारित होती है तो कुल कटौती का आंकड़ा बीस प्रतिशत तक पहुंच सकता है जिससे लगभग सोलह हजार से अधिक पदों पर प्रभाव पड़ने की आशंका है। हालांकि इस पूरे मामले पर अभी तक कंपनी की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है जिससे स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इस संभावित बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन तकनीक के तेजी से बढ़ते उपयोग को माना जा रहा है। तकनीकी कंपनियां अब अपने कार्यों को अधिक कुशल और स्वचालित बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं जिससे पारंपरिक भूमिकाओं की आवश्यकता में कमी देखने को मिल रही है। पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी हुई भर्ती के बाद अब कंपनियां अपने खर्चों को नियंत्रित करने और संचालन को अधिक प्रभावी बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। यह बदलाव न केवल एक कंपनी तक सीमित है बल्कि पूरे तकनीकी उद्योग में एक व्यापक परिवर्तन का संकेत माना जा रहा है। वर्तमान समय में वैश्विक तकनीकी क्षेत्र पहले से ही आर्थिक दबाव और बदलती बाजार परिस्थितियों का सामना कर रहा है। कोविड के बाद के दौर में जहां कंपनियों ने बड़े स्तर पर भर्ती की थी वहीं अब उसी विस्तार को संतुलित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इस वजह से कई कंपनियां अपने कार्यबल में कटौती कर रही हैं और संगठनात्मक संरचना को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं। इससे रोजगार के अवसरों पर सीधा असर पड़ रहा है और तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों के लिए अनिश्चितता का माहौल बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में तकनीकी उद्योग में केवल उन्हीं कौशलों की मांग बढ़ेगी जो नई तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा विश्लेषण और स्वचालित प्रणालियों के साथ तालमेल बिठा सकें। इस बदलाव ने कार्य संस्कृति और रोजगार की प्रकृति दोनों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। कई बड़ी कंपनियां पहले ही अपने कार्यबल में बड़े स्तर पर कटौती कर चुकी हैं और यह प्रवृत्ति अभी भी जारी रहने की संभावना है। वैश्विक स्तर पर हो रहे इस परिवर्तन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तकनीकी उद्योग अब तेजी से एक नए युग की ओर बढ़ रहा है जहां दक्षता और तकनीकी अनुकूलन ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता होगी।
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ को लेकर आरएसएस का समर्थन, दत्तात्रेय होसबोले ने बताया लोकतंत्र को मजबूत करने वाला सुधार

नई दिल्ली:राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के राजनीतिक ढांचे में बड़े सुधारों की जरूरत पर जोर देते हुए ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ प्रस्ताव का समर्थन किया है। संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि यदि देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं तो इससे प्रशासनिक स्थिरता बढ़ेगी और विकास कार्यों की गति तेज होगी। उनके अनुसार बार बार होने वाले चुनाव न केवल संसाधनों पर दबाव डालते हैं बल्कि शासन की निरंतरता को भी प्रभावित करते हैं। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय लोकतंत्र एक विशाल और जटिल व्यवस्था है, जहां लगातार चुनावी प्रक्रिया चलती रहती है। इस स्थिति में कई बार सरकारों का ध्यान विकास कार्यों से हटकर चुनावी तैयारियों पर केंद्रित हो जाता है। यदि चुनाव एक साथ कराए जाएं तो नीतिगत निर्णय अधिक स्थिर और दीर्घकालिक हो सकेंगे, जिससे देश के विकास को नई दिशा मिल सकती है। होसबोले ने यह भी कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं है बल्कि यह नागरिक जिम्मेदारी और जागरूकता पर भी निर्भर करता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक नागरिकों में राजनीतिक चेतना और कर्तव्य की भावना मजबूत नहीं होगी, तब तक किसी भी सुधार का पूर्ण लाभ नहीं मिल पाएगा। उनके अनुसार एक मजबूत लोकतंत्र के लिए समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका बढ़ाना एक सकारात्मक कदम है। उनके अनुसार यह व्यवस्था न केवल लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाएगी बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों की आवाज को भी मजबूत करेगी। इससे नीति निर्माण की प्रक्रिया अधिक संतुलित और प्रभावी हो सकती है। समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि सभी नागरिकों के लिए समान कानून व्यवस्था एक मजबूत राष्ट्र की आधारशिला है। उनका मानना है कि देश में कानून के सामने सभी को समान रूप से देखा जाना चाहिए और किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। इससे सामाजिक एकता और राष्ट्रीय समरसता को मजबूती मिलती है। उन्होंने तुष्टीकरण की राजनीति पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह प्रवृत्ति लंबे समय में समाज की एकता के लिए हानिकारक साबित हो सकती है। उनके अनुसार शासन का आधार समानता और निष्पक्षता होना चाहिए, जिससे सभी नागरिकों में विश्वास और सहभागिता बढ़े। होसबोले ने यह भी कहा कि नागरिक अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी को मजबूत करना समय की जरूरत है। उनका मानना है कि एक विकसित राष्ट्र केवल संस्थाओं से नहीं बनता बल्कि नागरिकों के व्यवहार और उनकी सोच से भी आकार लेता है। अंत में उन्होंने संगठन के सामाजिक कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भरता और नागरिक कर्तव्य जैसे क्षेत्रों में लगातार काम किया जा रहा है। उनके अनुसार यह प्रयास समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और सहयोग की भावना को मजबूत करने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।
किसानों के पैसे पर हाथ साफ, 41 लाख के घोटाले में 4 गिरफ्तार, 35 लाख जमीन में छिपाए मिले

भोपाल । मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सहकारी समिति से जुड़े एक बड़े वित्तीय घोटाले का खुलासा हुआ है, जहां करीब 41 लाख रुपए के गबन के मामले में पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह पूरा मामला ईटखेड़ी थाना क्षेत्र के अंतर्गत प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति रायपुर से जुड़ा है, जहां किसानों से वसूली गई रकम में भारी गड़बड़ी सामने आई। जानकारी के अनुसार 26 और 27 मार्च को किसानों से लगभग 41 लाख 94 हजार रुपए की ऋण वसूली की गई थी। लेकिन इस राशि को बैंक या समिति के खाते में जमा करने के बजाय उसमें हेरफेर कर दिया गया। 2 अप्रैल को जब मामले की शिकायत समिति के प्रशासक रामचरण सिलावट ने दर्ज कराई तो पूरे मामले की जांच शुरू हुई। पुलिस ने शिकायत के बाद विशेष टीम का गठन किया और जांच को आगे बढ़ाते हुए बड़े पैमाने पर सीसीटीवी फुटेज खंगाले। करीब 100 से अधिक कैमरों की रिकॉर्डिंग की जांच के बाद पुलिस को अहम सुराग मिले, जिसके आधार पर चार संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। पूछताछ के दौरान चारों आरोपियों ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया। जांच में चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने जमीन में गाड़ी गई एक लोहे की पेटी से भारी मात्रा में नकदी बरामद की। बताया जा रहा है कि लगभग 35 लाख रुपए इसी तरह जमीन में छिपाकर रखे गए थे। इसके अलावा कुल 33 लाख 46 हजार 430 रुपए की नगद बरामदगी पुलिस ने की है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक इस घोटाले में अभी और लोग भी शामिल हो सकते हैं, जिसकी जांच जारी है। गिरफ्तार आरोपियों से लगातार पूछताछ की जा रही है और नरेश नागर नाम के एक अन्य व्यक्ति को हिरासत में लेकर भी पूछताछ की गई है। इस पूरे मामले ने सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली और वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसानों की मेहनत की कमाई में हुई इस तरह की गड़बड़ी ने स्थानीय स्तर पर भी नाराजगी बढ़ा दी है। पुलिस अब इस बात की भी जांच कर रही है कि गबन की योजना कितने समय से चल रही थी और इसमें किन किन लोगों की भूमिका रही है।