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सहज प्रशंसा और प्रतिक्रियाओं को छिपाने की विवशता पर आधुनिक समाज के लिए एक बड़ा नैतिक सवाल।

नई दिल्ली:आधुनिक दौर में सोशल मीडिया की चमक-धमक जितनी लुभावनी है, इसके अदृश्य खतरे भी उतने ही गहरे हैं। हाल ही में एक मशहूर अंतरराष्ट्रीय मॉडल और एक दिग्गज भारतीय खिलाड़ी के बीच हुए एक संक्षिप्त डिजिटल घटनाक्रम ने इंटरनेट की दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया जब सोशल मीडिया पर खिलाड़ी द्वारा मॉडल की कुछ चुनिंदा तस्वीरों को पसंद करने और फिर तुरंत उस प्रतिक्रिया को वापस लेने की बात सार्वजनिक हुई। तकनीक के इस युग में जहां हर गतिविधि पर करोड़ों नजरें चौबीसों घंटे टिकी रहती हैं, वहां एक छोटी सी चूक या सामान्य मानवीय व्यवहार भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और विश्लेषण का विषय बन जाता है। इस प्रकरण ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अत्यधिक ख्याति किसी व्यक्ति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अनचाही बेड़ियों में जकड़ देती है। इस पूरे घटनाक्रम पर अब संबंधित मॉडल ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए एक अत्यंत परिपक्व और संतुलित वक्तव्य साझा किया है। मॉडल ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें उस खिलाड़ी की स्थिति को देखकर सहानुभूति महसूस होती है, क्योंकि एक वैश्विक पहचान रखने वाले व्यक्ति के लिए अपनी सहज पसंद को साझा करना भी भारी पड़ सकता है। उनके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को एक सामान्य सी प्रतिक्रिया देने के बाद उसे सामाजिक दबाव, छवि खराब होने के डर या किसी अन्य विवशता के कारण वापस लेना पड़ता है, तो यह उस व्यक्ति के भीतर चल रहे निरंतर मानसिक संघर्ष को दर्शाता है। मॉडल ने इसे खिलाड़ी की मजबूरी करार देते हुए कहा कि इतने बड़े कद के व्यक्तित्व को सदैव एक पूर्व निर्धारित और आदर्श छवि के संकीर्ण दायरे में रहना पड़ता है, जो किसी भी इंसान के लिए काफी थकाऊ और तनावपूर्ण हो सकता है। सोशल मीडिया पर प्रशंसकों और आलोचकों के बीच इस मुद्दे को लेकर एक लंबी बहस छिड़ गई है। जहां प्रशंसकों का एक पक्ष इसे मानवीय भूल या अनजाने में हुआ स्पर्श बताकर खिलाड़ी का बचाव कर रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे सार्वजनिक जीवन में बढ़ती असुरक्षा और दोहरे मापदंडों के रूप में देख रहा है। खिलाड़ियो को अक्सर समाज में एक त्रुटिहीन आदर्श के रूप में स्थापित कर दिया जाता है, जिसके कारण उनके निजी जीवन की सूक्ष्म गतिविधियां भी कठोर सामाजिक समीक्षा के घेरे में आ जाती हैं। इस निरंतर दबाव के कारण कई बार ये हस्तियां अपने वास्तविक और स्वाभाविक व्यक्तित्व को छिपाने के लिए विवश होती हैं। डिजिटल पदचिह्नों के इस दौर में किसी भी गतिविधि को पूरी तरह मिटाना असंभव है और यही कारण है कि यह विवाद समाप्त होने के बजाय नित नए आयाम लेता जा रहा है। मनोवैज्ञानिकों का तर्क है कि इस तरह की घटनाएं केवल किसी खिलाड़ी की निजी पसंद का साधारण मामला नहीं हैं, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक परिवेश को प्रतिबिंबित करती हैं जहां हम दूसरों के जीवन में अत्यधिक हस्तक्षेप करने को अपना अधिकार समझने लगे हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए यह अनुभव अत्यंत दमघोंटू हो सकता है कि उसकी हर गतिविधि पर समाज का एक वर्ग निरंतर पहरा दे रहा हो। मॉडल के इस नवीन दृष्टिकोण ने न केवल खिलाड़ी के प्रति जनमानस के नजरिए को सहानुभूतिपूर्ण बनाया है, बल्कि सोशल मीडिया के नैतिक उपयोग पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बहुत ही शालीनता से यह संदेश दिया है कि किसी की सुंदरता या कला की प्रशंसा करना एक सहज और सकारात्मक मानवीय आचरण है, जिसे अनावश्यक विवाद या नकारात्मक संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए।

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव सिनेमाई सितारों की लोकप्रियता और राजनीतिक भविष्य का नया इम्तिहान

नई दिल्ली/चेन्नई। दक्षिण भारत की राजनीति में सिनेमा और सत्ता का अटूट रिश्ता एक बार फिर इतिहास के पन्ने पलटने को तैयार है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के इस दौर में चुनावी मैदान केवल घोषणापत्रों और नारों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह सिल्वर स्क्रीन के नायकों की जमीनी पकड़ का सबसे बड़ा परीक्षण केंद्र बन गया है। दशकों से राज्य की जनता ने अपने पसंदीदा अभिनेताओं को पलकों पर बिठाया है और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया है। वर्तमान चुनाव इस विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में एक नया अध्याय जोड़ रहे हैं जहां फिल्मी चमक दमक और जनसेवा के वादों के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। इस बार के चुनाव में नए राजनीतिक दलों का उदय और बड़े फिल्मी नामों की सीधी भागीदारी ने पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के समीकरणों को चुनौती दी है। चुनावी सरगर्मी के बीच यह स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है कि मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग विशेष रूप से युवा पीढ़ी अपने चहेते सितारों की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। अभिनेताओं ने अपने विशाल प्रशंसक समूहों को राजनीतिक कार्यकर्ताओं में तब्दील कर दिया है जो घर घर जाकर नए भविष्य का सपना बेच रहे हैं। हालांकि राजनीति की यह राह उतनी आसान नहीं है जितनी फिल्मों की पटकथा होती है। स्थापित राजनीतिक दलों ने भी अपनी किलेबंदी मजबूत कर ली है और वे फिल्मी ग्लैमर के मुकाबले अपने संगठनात्मक अनुभव और कल्याणकारी योजनाओं का हवाला दे रहे हैं। ऐसे में मुकाबला केवल व्यक्ति विशेष का न रहकर विचारधारा और कार्यशैली के बीच का संघर्ष बन गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने और प्रशासनिक सुधारों के वादे के साथ फिल्मी सितारे जनता के बीच जा रहे हैं जिससे मुकाबला त्रिकोणीय या उससे भी अधिक जटिल होने की संभावना बढ़ गई है। क्षेत्रीय मुद्दों की बात करें तो कृषि ऋण की माफी शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन और महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता जैसे विषय चर्चा के केंद्र में हैं। फिल्मी सितारों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में इन संवेदनशील मुद्दों को प्राथमिकता दी है जिससे आम जनमानस में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। उनकी रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सिनेमाई करिश्मा आज भी जनता के दिलों पर राज करता है। परंतु मतदान केंद्र तक इस भीड़ को वोटों में तब्दील करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां बुनियादी सुविधाओं की मांग प्रबल है वहां फिल्मी सितारों की साख और उनकी योजनाओं की व्यवहारिकता की कड़ी जांच हो रही है। राज्य की राजनीति में दशकों पुराने द्रविड़ वर्चस्व को चुनौती देना किसी भी नए खिलाड़ी के लिए कठिन कार्य रहा है। लेकिन इस बार के चुनाव में बदलाव की बयार महसूस की जा रही है क्योंकि फिल्मी चेहरों ने सीधे तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की बात कही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं है बल्कि यह राज्य की राजनीतिक संस्कृति के भविष्य को भी तय करेगा। क्या जनता एक बार फिर पर्दे के नायक को अपना वास्तविक नेता चुनेगी या फिर अनुभव और पुरानी निष्ठा जीत का आधार बनेगी यह आने वाले परिणाम ही स्पष्ट करेंगे। फिलहाल पूरे राज्य में चुनावी शोर अपने चरम पर है और हर तरफ केवल इसी बात की चर्चा है कि इस बार बॉक्स ऑफिस की सफलता मतपेटियों में कितनी प्रभावी साबित होगी।

लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण बिल, बहुमत से 54 वोट कम पड़े

नई दिल्ली । सरकार द्वारा पेश किए गए महिला आरक्षण से जुड़े तीनों विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सके। 131वें संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया और यह 54 वोटों से पीछे रह गया। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया, जिसमें सरकार को जरूरी 352 वोटों के मुकाबले सिर्फ 298 वोट ही मिल सके।संख्या बल में कमी से गिरा प्रस्ताव विधेयक के खिलाफ 230 वोट पड़े, जिसके चलते यह आवश्यक बहुमत तक नहीं पहुंच सका और गिर गया। बिल के असफल होने के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों ने मकर द्वार पर विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी ने 18 अप्रैल से देशभर में विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान भी किया है। सरकार ने विपक्ष को ठहराया जिम्मेदार गृह मंत्री अमित शाह ने बिल के गिरने के लिए कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर इस पर प्रतिक्रिया दी और बिल के असफल होने पर जश्न मनाए जाने की आलोचना की। यह विधेयक एक दिन पहले कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था। लंबी बहस के बावजूद नहीं बनी सहमति इस बिल पर संसद में करीब 20 घंटे से अधिक समय तक चर्चा हुई। गुरुवार को सुबह 11 बजे से लेकर देर रात 1 बजे तक बहस चली, जबकि शुक्रवार को भी सुबह से शाम तक चर्चा जारी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतदान से पहले विपक्ष से सहयोग की अपील की थी और सांसदों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने का आग्रह किया था, लेकिन इसका असर नजर नहीं आया। परिसीमन बना मुख्य विवाद का कारण चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने साफ कहा कि वे महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर सहमत नहीं हैं। इसी कारण उन्होंने विधेयक का विरोध किया। संसदीय प्रक्रिया और राजनीतिक टकराव गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के बाद कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक को विचार के लिए पेश किया, लेकिन मतदान में यह आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका। बता दें कि बजट सत्र को लेकर भी सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक सत्र बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, जबकि विपक्ष ने चुनावों के बाद सर्वदलीय बैठक की मांग की थी, जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया।

होर्मुज तनाव के बीच अमेरिका ने बदला रुख, रूसी तेल खरीद पर फिर मिली अस्थायी छूट

नई दिल्‍ली । ईरान के साथ जारी तनाव और वैश्विक तेल कीमतों में उछाल के बीच अमेरिका ने अपने रुख में बदलाव करते हुए बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रूसी तेल की खरीद पर एक बार फिर अस्थायी छूट दे दी है। खास बात यह है कि यह निर्णय उस घोषणा के दो दिन बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि इस राहत को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। एक महीने के लिए मिली नई छूट अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने 17 अप्रैल से लागू नया नोटिफिकेशन जारी किया है। इसके तहत देशों को 16 मई तक रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद की अनुमति दी गई है। यानी लगभग एक महीने तक समुद्र में लोड किए गए रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू नहीं होंगे। इससे पहले दी गई 30 दिन की छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी और संकेत मिल रहे थे कि अब अमेरिका सख्ती अपनाएगा, लेकिन बदलते हालात ने फैसले को भी बदल दिया।क्या वजह रही इस फैसले की? ईरान के साथ टकराव और होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। दुनिया की करीब 20% तेल और गैस सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। इस रूट पर खतरा बढ़ने से तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। ऐसे में अमेरिका के सामने चुनौती थी कि सप्लाई घटने से कीमतें और न बढ़ जाएं, जिसका असर सीधे आम जनता पर पड़ता। इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए यह अस्थायी राहत देने का फैसला किया। रूस के राष्ट्रपति के दूत किरिल दिमित्रिएव के अनुसार, पहले दी गई छूट से लगभग 100 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल बाजार में आ सकता था, जो एक दिन की वैश्विक खपत के बराबर है। नई छूट से भी सप्लाई को सहारा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।सहयोगी देशों की नाराजगी बढ़ी अमेरिका के इस कदम से उसके सहयोगी देशों में असंतोष बढ़ सकता है। यूरोप लगातार रूस पर कड़े प्रतिबंध बनाए रखने के पक्ष में रहा है। यूरोपीय यूनियन की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल रूस पर नरमी दिखाने का समय नहीं है। ऐसे में अमेरिका का यह फैसला पश्चिमी देशों की एकजुट रणनीति को कमजोर कर सकता है और यूक्रेन युद्ध से जुड़ी नीतियों पर सवाल खड़े कर सकता है।तेल बाजार को मिली राहत इस घोषणा के बाद तेल बाजार में कुछ राहत देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 9% गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई, जो पिछले एक महीने का न्यूनतम स्तर है। इस गिरावट की एक वजह यह भी है कि ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि सीजफायर के दौरान होर्मुज स्ट्रेट को व्यावसायिक जहाजों के लिए खोल दिया गया है।

गुजरात में मानवता की मिसाल: ब्रेन-डेड किसान के अंगों से 7 लोगों को नई जिंदगी

अहमदाबाद। गुजरात के अहमदाबाद से एक भावुक और प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जहां एक ब्रेन-डेड किसान के अंगदान ने सात लोगों को नई जिंदगी दे दी। 39 वर्षीय मनुभाई परमार के परिवार ने कठिन समय में बड़ा फैसला लेते हुए अंगदान की सहमति दी और मानवता की मिसाल पेश की। सड़क हादसे के बाद ब्रेन-डेड घोषित खेड़ा जिले के रहने वाले मनुभाई परमार 12 अप्रैल को एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। सिर में गहरी चोट लगने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके और ब्रेन-डेड घोषित कर दिया गया। परिवार ने लिया साहसी फैसला डॉक्टरों की सलाह पर उनकी पत्नी अरखाबेन ने अंगदान का निर्णय लिया। परिवार की इस सहमति के बाद दिल, लिवर, किडनी, आंखें और त्वचा दान की गईं, जिससे जरूरतमंद मरीजों को तुरंत लाभ मिला। कहां-कहां हुए ट्रांसप्लांट? लिवर और किडनी का ट्रांसप्लांट अहमदाबाद सिविल अस्पताल में किया गया दिल को CIMS अस्पताल भेजा गया आंखें एम एंड जे नेत्र अस्पताल को दान की गईं त्वचा सिविल अस्पताल के स्किन बैंक में संरक्षित की गई डॉक्टरों ने की सराहना अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डॉ. राकेश जोशी ने परिवार के इस फैसले को सराहनीय बताते हुए कहा कि मनुभाई भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके अंगों ने सात लोगों को नया जीवन दिया है। अंगदान के बढ़ते मामले अहमदाबाद सिविल अस्पताल के अनुसार, अब तक 234 ब्रेन-डेड मरीजों द्वारा अंगदान किया जा चुका है, जिससे 774 अंग प्राप्त हुए हैं। इनमें सैकड़ों किडनी, लिवर, दिल और फेफड़े शामिल हैं। बढ़ रही जागरूकता गुजरात में पिछले कुछ वर्षों में अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ी है। सरकारी पहल और सामाजिक प्रयासों के चलते लोग इस दिशा में आगे आ रहे हैं। मनुभाई परमार और उनके परिवार का यह निर्णय न केवल सात जिंदगियां बचाने वाला है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि कठिन परिस्थितियों में लिया गया एक साहसी फैसला कई लोगों के जीवन में रोशनी ला सकता है।

एमपी में तेज गर्मी का कहर: पारा 43 डिग्री के पार, खजुराहो सबसे गर्म, आज 16 जिलों में लू का अलर्ट

भोपाल । मध्य प्रदेश में गर्मी ने अब अपने तीखे तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। शुक्रवार को सीजन में पहली बार तापमान 43 डिग्री के पार पहुंच गया। सबसे अधिक तापमान 43.2 डिग्री सेल्सियस छतरपुर के खजुराहो में दर्ज किया गया। इसके अलावा प्रदेश के 9 शहरों में तापमान 42 डिग्री से ऊपर रहा। आज कई जिलों में लू की चेतावनी मौसम विभाग ने शनिवार के लिए 16 जिलों में हीट वेव यानी लू चलने की चेतावनी जारी की है। इनमें अलीराजपुर झाबुआ रतलाम धार रायसेन नर्मदापुरम बैतूल छिंदवाड़ा पांढुर्णा सिवनी मंडला बालाघाट निवाड़ी टीकमगढ़ छतरपुर और पन्ना शामिल हैं। स्कूलों के समय में बदलाव भीषण गर्मी को देखते हुए प्रशासन ने स्कूलों के समय में बदलाव किया है। भोपाल में स्कूल अब सुबह 7:30 बजे से दोपहर 12 बजे तक संचालित होंगे। कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने इस संबंध में आदेश जारी किए हैं। इसके अलावा नर्मदापुरम ग्वालियर बालाघाट मैहर रतलाम छिंदवाड़ा नरसिंहपुर रायसेन डिंडोरी अनूपपुर और उमरिया में भी स्कूल नए समय अनुसार चलेंगे। कई शहरों में तापमान 42 डिग्री के पार शुक्रवार को प्रदेश के कई जिलों में तापमान तेजी से बढ़ा। उमरिया में 42.9 डिग्री टीकमगढ़-नौगांव में 42.8 डिग्री नौगांव में 42.6 डिग्री मंडला में 42.5 डिग्री दमोह गुना और दतिया में 42.2 डिग्री दर्ज किया गया। वहीं सागर और सतना में 41.8 डिग्री छिंदवाड़ा में 41.6 डिग्री नर्मदापुरम और शाजापुर में 41.4 डिग्री जबकि सीधी नरसिंहपुर रीवा और मलाजखंड में 41.2 डिग्री तापमान रिकॉर्ड किया गया।बड़े शहरों का हाल प्रदेश के प्रमुख शहरों में जबलपुर सबसे गर्म रहा जहां तापमान 42 डिग्री तक पहुंचा। भोपाल और ग्वालियर में 41.3 डिग्री इंदौर में 40.6 डिग्री और उज्जैन में 40.5 डिग्री दर्ज किया गया। खजुराहो सहित कई क्षेत्रों में लू के हालात भी बने रहे।लू से बचाव के लिए सलाह मौसम विभाग ने बढ़ती गर्मी को देखते हुए लोगों के लिए एडवायजरी जारी की है। इसमें दिनभर पर्याप्त पानी पीने शरीर को हाइड्रेट रखने और दोपहर के समय तेज धूप से बचने की सलाह दी गई है। साथ ही हल्के और सूती कपड़े पहनने तथा बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखने को कहा गया है।

भारत में बढ़ी चीतों की संख्या…… दक्षिण अफ्रीका से बेंगलुरु पहुंचे 4 नए मेहमान

बेंगलुरु। भारत (India) में चीतों का कुनबा लगातार बढ़ रहा है. दक्षिण अफ्रीका (South Africa) से चार और चीतों को भारत लाया गया है. ये सभी चीते सुरक्षित तरीके से बेंगलुरु पहुंचे चुके हैं और उन्हें कर्नाटक (Karnataka) के बैनरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क (Bannerghatta Biological Park) में रखा जाएगा. यह कदम राज्य में वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देने और लोगों में जैव-विविधता के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से उठाया गया है. अधिकारियों के मुताबिक, चीतों को विशेष निगरानी के बीच लाया गया है. फिलहाल वन विभाग और पशु चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम उनकी सेहत पर लगातार नजर रख रही है. शुरुआती जांच के बाद सभी चीतों को निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत निगरानी में रखा गया है, जिससे नए वातावरण में उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो। कर्नाटक के वन मंत्री ने दिए ये निर्देश कर्नाटक के वन मंत्री ईश्वर खंड्रे ने अधिकारियों को साफ निर्देश दिए हैं कि जलवायु और पर्यावरण में बदलाव के कारण चीतों को किसी प्रकार का तनाव या स्वास्थ्य संबंधी समस्या न हो. उन्होंने कहा कि सभी चीतों को कम से कम 30 दिनों के लिए क्वारंटीन में रखा जाएगा. इस दौरान उन्हें निर्धारित आहार दिया जाएगा और किसी भी संक्रमण या बीमारी की पूरी जांच की जाएगी। वन मंत्री ने यह भी कहा कि चीतों को उनके नए आवास में छोड़ने से पहले सभी आवश्यक मेडिकल परीक्षण पूरे किए जाएंगे. सुरक्षा और देखभाल में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी. कर्नाटक में चीतों को कहा जाता है ‘शिवंगी’ गौरतलब है कि कर्नाटक में कभी चीतों को स्थानीय रूप से ‘शिवंगी’ कहा जाता था. हालांकि यह प्रजाति दशकों पहले राज्य के जंगलों से विलुप्त हो चुकी थी. अब चीतों की वापसी को वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से एक अहम कदम माना जा रहा है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है.

महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!

नई दिल्ली। शतरंज हो या राजनीति, चाल संभलकर खेलनी होती है. अमित शाह (Amit Shah) को भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का ‘चाणक्य’ माना जाता है, वहीं अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन करके दिखा दिया कि वह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. यह बात भी दीगर है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के नैरेटिव के जरिए जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीति में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. अब बारी थी अमित शाह की. सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Women Empowerment Act) से जुड़े तीन बिल पेश किए. मकसद था कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए, लेकिन सारे विपक्षी दलों ने विरोध कर दिया और आखिरकार बिल लोकसभा में गिर गया। लोकसभा में गिरा बिल, अब क्या करेगी सरकार?सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ. मतदान में बिल के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. जब महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया, तो परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया. अब सवाल है कि क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराएगी, हालांकि सरकार ने यह साफ नहीं किया है। महिला आरक्षण बिल के विरोध में सपामहिला आरक्षण बिल पर सपा के मुखिया अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. चाहे सत्ता में रहे हों या बाहर, वे महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग करते रहे, लेकिन कोई भी सरकार आरक्षण में आरक्षण देने को तैयार नहीं थी. 1996 में एच. डी. देवगौड़ा की सरकार में यह बिल पेश किया गया, लेकिन सरकारें आती-जाती रहीं और बिल पास नहीं हुआ. यह बिल इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक पहुंचा, लेकिन बात सदन में मारपीट तक पहुंच गई. वाजपेयी सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसे सदन में फाड़ डाला. बिल पेश करने पर कानून मंत्री थंबी दोरई की कमीज भी फाड़ दी गई थी. फिर यह बिल मनमोहन सिंह की सरकार में आया। उस समय आरजेडी सरकार का हिस्सा थी, तो समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन कर रही थी, लेकिन बिल का विरोध जारी रहा. हालांकि यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में फंस गया। अखिलेश यादव क्यों करते हैं विरोधसपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि बीजेपी ‘नारी’ को नारा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिल के समर्थन में हैं, लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे छिपी साजिश का विरोध करते हैं. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को इस बिल में आरक्षण दिया जाए, जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है. वहीं अखिलेश का आरोप था कि सरकार जाति जनगणना से बचना चाहती है, तो अमित शाह ने जवाब दिया कि इस जनगणना में जाति जनगणना भी होगी. इस पर सपा के धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जनगणना में जाति का कॉलम नहीं है. अमित शाह ने जवाब दिया कि आदमी की जाति होती है, घर की जाति नहीं होती है. अभी घरों की गणना हो रही है, उसके बाद लोगों की गणना होगी, जिसमें जाति भी शामिल रहेगी। आगे कुआं, पीछे खाईदेश बदल रहा है, लोगों की आकांक्षाएं बदल रही हैं. खासकर महिलाएं शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं. इसकी भनक अखिलेश यादव को है. उनके शासनकाल में जो कानून-व्यवस्था का हाल हुआ था, उसका खामियाजा वे करीब 10 साल से भुगत रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में हत्याएं, बलात्कार, दहेज के मामले और एसिड अटैक के मामलों में कमी आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में यूपी में हत्याएं 4889 थीं, जो 2023 में घटकर 3307 हो गईं. 2016 में बलात्कार की घटनाएं 4816 थीं, जो 2023 में घटकर 3556 हो गई हैं. 2016 में दहेज हत्याएं 2473 थीं, जो 2023 में घटकर 2141 हो गई हैं. महिलाओं पर एसिड फेंकने के मामले 57 थे, जो 2023 में 31 हो गए हैं. 2016 में महिलाओं के शील भंग (लज्जा भंग की कोशिश) के मामले 11335 थे, जो 2023 में घटकर 9549 हो गए हैं. एक तरफ अखिलेश के शासनकाल के आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था का इकबाल है कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अपराध घट रहे हैं. इस बात का अहसास अखिलेश को है, लेकिन अगर वे इस बिल का समर्थन करते, तो पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के वोटर नाराज हो सकते थे. वहीं अब बिल का विरोध करने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें “महिला विरोधी” बताकर घेर सकती है. महिलाओं पर मुलायम की बातों की गूंजभले मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लेकिन महिलाओं पर उनके बयान अभी तक प्रदेश की जनता भूली नहीं है. लोकसभा 2014 के दौरान अप्रैल में मुरादाबाद की एक रैली में उन्होंने कहा था, ‘क्या बलात्कार के मामले में फांसी की सजा दी जानी चाहिए? वे लड़के हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं.’ इसी बिल की चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी मुलायम सिंह के पुराने बयान का जिक्र करते हुए सपा के धर्मेंद्र यादव को जवाब दिया. कंगना का कहना था कि मुलायम सिंह ने कहा था कि यह कानून नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा. मुलायम सिंह ने ये भी कहा था कि महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप से सिर्फ बड़े घरों और शहरों की लड़कियों को फायदा मिलेगा. हमारे गांव की गरीब महिलाएं ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं. ये सारी बातें जनता के संज्ञान में हैं. अखिलेश की चुनौतियांअखिलेश यादव को यह भी डर सता रहा है कि परिसीमन से उत्तर प्रदेश की राजनीति का गणित और केमिस्ट्री बदल सकती है. परिसीमन से यूपी में 120 से ज्यादा सीटें हो सकती हैं.

2029 में लागू हो सकता है महिला आरक्षण बिल…. जानें कानूनी विकल्प

नई दिल्ली। संसद में शुक्रवार को 131वां संविधान संशोधन विधेयक (131st Constitutional Amendment Bill) भले ही दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिर गया हो, लेकिन इससे महिला आरक्षण (Women’s reservation.) की मूल योजना खत्म नहीं हुई है। 2023 में पारित मूल कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम-Women’s Empowerment Worship Act) अभी भी प्रभावी है और 2029 में इसके लागू होने की संभावनाएं बरकरार हैं। आपको बता दें कि सरकार ने 131वां संशोधन विधेयक मुख्य रूप से आरक्षण को आसान बनाने के लिए पेश किया था। इसका उद्देश्य 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 816 करना था। इसके विफल होने का मतलब केवल यह है कि फिलहाल सीटों की संख्या बढ़ाने का सरकारी फॉर्मूला रुक गया है, लेकिन महिला कोटा का मुख्य जनादेश अभी भी सुरक्षित है। कैसे लागू होगा 2029 में आरक्षण?मूल कानून (अनुच्छेद 334A) के तहत आरक्षण लागू करने के लिए दो शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं। 2023 में कानून बनने के बाद एक नई जनगणना होनी चाहिए, जो अभी प्रगति पर है। जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाना चाहिए। यदि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया 2029 के आम चुनाव से पहले पूरी हो जाती है, तो आरक्षण को लागू करने में कोई कानूनी बाधा नहीं आएगी। विकल्प क्या हैं?सरकार के पास अब भी दो वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं। सरकार अनुच्छेद 334A में संशोधन कर आरक्षण को ‘परिसीमन’ की शर्त से अलग कर सकती है। इससे मौजूदा 543 सीटों पर ही 33% कोटा लागू किया जा सकेगा। अनुच्छेद 82 का उपयोग करते हुए 2026 के बाद परिसीमन पर लगा संवैधानिक प्रतिबंध हट जाएगा, जिससे सीटों के समायोजन का रास्ता साफ हो सकता है। सरकार के पास अब भी है मौकासंसद में परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े दो अन्य बिल अभी भी लंबित हैं। सरकार ने इन्हें वापस नहीं लिया है, जिसका मतलब है कि इस लोकसभा के कार्यकाल के दौरान किसी भी समय इन्हें दोबारा चर्चा के लिए लाया जा सकता है। इससे परिसीमन आयोग के गठन का विकल्प खुला हुआ है। तकनीकी चुनौतियांभले ही तकनीकी रूप से रास्ता खुला हो, लेकिन राह इतनी आसान नहीं है। लोकसभा की 550 सीटों की वर्तमान सीमा को बढ़ाने के लिए सरकार को फिर से संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाना होगा, जो एक बड़ी चुनौती है। जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्गठन राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है। उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद बढ़ सकता है। यदि सरकार सीटों की संख्या बढ़ाए बिना केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय करती है तो विपक्षी दलों के साथ आम सहमति बनने की उम्मीद ज्यादा है।

चीन के 4 कार्गो विमान गुपचुप तरीके से ईरान पहुंचे…. हथियार भेजने का दावा

तेहरान। मध्य एशिया (Central Asia) में जारी तनाव के बीच एक नई घटना सामने आई है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करते हुए कमेंटेटर मारियो नॉफाल (Commentator Mario Nofal.) ने दावा किया है कि चीन के चार कार्गो विमान (Four Cargo Planes) ईरान (Iran) में गुपचुप तरीके से उतरे हैं। उन्होंने दावा किया कि लैंडिंग से पहले विमानों ने अपने ट्रांसपॉन्डर बंद कर दिए जिससे उनकी जानकारी किसी को हासिल ना हो सके। एक दिन पहले ही शी जिनपिंग (Xi Jinping) ने अमेरिका से वादा किया था कि वह ईरान को हथियारों की कोई सप्लाई नहीं करेंगे। अब इस मामले के जानकारों कहना है कि चारों विमानों का इस तरह से लैंडिंग से पहले ट्रांसपॉन्डर बंद करना कोई तकनीकी खामी नहीं हो सकती है। हालांकि इन विमानों को लेकर ना तो ईरान की तरफ से और ना ही चीन की तरफ से कोई आधिकारिक जानकारी सामने आई है। चीन ने ईरान को किसी तरह के सहयोग देने के आरोपों को खारिज किया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने बुधवार को कहा कि इस तरह की रिपोर्ट एकदम झूठी हैं। चीन ने ईरान को कोई सैटलाइट हेल्प भी नहीं की है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा था कि पड़ोसी देशों में अमेरिका के बेस ध्वस्त करने के लिए चीन उनसकी सहायता कर रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने भी चीन को धमकी दी थी कि वह अगर किसी भी रूप में दखल देता है तो इसके परिणाम बहुत बुरे होंगे। एविएशन एक्सपर्ट का कहना है कि इस तरह से विमानों का ट्रांसपॉन्डर बंद कर लेना सामान्य तो नहीं है। हो सकता है कि किसी ऑपरेशनल या फिर सुरक्षा कारणों से ऐसा किया गया हो। जानकारों का कहना है कि लगातार कई विमानों का एक ही पैटर्न पर लैंड करना संदेह बढ़ाता है। अमेरिका और इजरायल के बीच थोड़ा तनाव इस बात से कम होता नजर आ रहा है कि दोनों ही देशों ने दावा किया है कि कमर्शल जहाजों के लिए होर्मुज को खोल दिया गया है। ट्रंप ने कहा कि होर्मुज सभी जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा। हालांकि ईरान के लिए उनकी नाकेबंदी जारी रहेगी। वाशिंगटन और तेहरान ने 7 अप्रैल को दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की। इस्लामाबाद में हुई बाद की बातचीत बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई। हालांकि शत्रुता की पुनः शुरुआत की कोई घोषणा नहीं की गई, लेकिन अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी शुरू कर दी। अब वार्ता और युद्ध को लेकर एक अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। होर्मुज की खबर आने के बाद वैश्विक बाजार में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है।