ट्रंप का नया प्लान: ‘दोस्त’ और ‘कमजोर सहयोगी’ देशों की बनेगी लिस्ट, क्या बदल जाएगी US की नीति?

वॉशिंगटन। डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपनी सख्त विदेश नीति को लेकर चर्चा में हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ऐसे देशों की सूची तैयार कर रहा है जिन्होंने हालिया तनाव के दौरान उसका साथ नहीं दिया। साथ ही, उन देशों की अलग लिस्ट भी बनाई जा रही है जो वॉशिंगटन के साथ मजबूती से खड़े रहे। क्या है पूरा मामला? रिपोर्ट के अनुसार, नाटो सदस्य देशों के योगदान का आकलन किया जा रहा है। इस आधार पर उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की योजना है। हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं है कि किन देशों को “अच्छे” और किन्हें “कमजोर” सहयोगी माना जाएगा। NATO प्रमुख की अहम यात्रा इस बीच NATO प्रमुख मार्क रुट्टे की वॉशिंगटन यात्रा प्रस्तावित है। बताया जा रहा है कि इस दौरे से पहले ही अमेरिकी अधिकारी एक रणनीति तैयार कर रहे हैं, जिसमें हर देश की भूमिका और योगदान का पूरा ब्योरा शामिल होगा। पहले भी दिया गया था संकेत रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दिसंबर में ही इशारा दिया था कि: इज़रायल दक्षिण कोरिया पोलैंड जर्मनी बाल्टिक देश जैसे सहयोगियों को प्राथमिकता दी जाएगी। वहीं, जो देश अपेक्षा पर खरे नहीं उतरेंगे, उन्हें “परिणाम भुगतने” पड़ सकते हैं। कौन हो सकता है ‘फेवरेट’? सूत्रों के अनुसार: रोमानिया और पोलैंड अमेरिका की “अच्छी सूची” में हो सकते हैं पोलैंड नाटो में रक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में है और वहां 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं रोमानिया ने अपने मिहैल कोगलनीसिएनु एयर बेस का विस्तार कर अमेरिका को सैन्य उपयोग की अनुमति दी है क्या हो सकता है असर? इस योजना के तहत अमेरिका: “कमजोर सहयोगियों” से अपनी सेना या सैन्य अभ्यास कम कर सकता है हथियारों की सप्लाई घटा सकता है “मजबूत सहयोगियों” को ज्यादा सैन्य और रणनीतिक फायदे दे सकता है अगर यह योजना लागू होती है, तो यह वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है। अमेरिका की “रिवार्ड और पनिशमेंट” नीति नाटो के भीतर संतुलन को प्रभावित कर सकती है और सहयोगी देशों के बीच नई प्रतिस्पर्धा भी पैदा कर सकती है।
बुलंदशहर से शुरू हुआ सफर और करोड़ों दिलों पर किया राज; महज 30 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गईं मशहूर अदाकारा।

नई दिल्ली ।क्षेत्रीय मनोरंजन जगत से एक बेहद दुखद और विचलित कर देने वाली खबर सामने आई है। अपनी बेहतरीन अदाकारी और नृत्य कौशल से करोड़ों दर्शकों के दिलों में जगह बनाने वाली मशहूर अभिनेत्री दिव्यांका सिरोही अब हमारे बीच नहीं रहीं। महज 30 वर्ष की अल्पायु में हृदय गति रुकने के कारण उनका आकस्मिक निधन हो गया है। इस खबर ने न केवल उनके परिवार को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि उन तमाम प्रशंसकों को भी गहरे सदमे में डाल दिया है जो उन्हें भविष्य के एक बड़े सितारे के रूप में देख रहे थे। अभिनेत्री के निधन की जानकारी मिलते ही सोशल मीडिया पर शोक संवेदनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। दिव्यांका की मृत्यु के बाद उनका एक पुराना संदेश तेजी से चर्चा में आ गया है, जिसे पढ़कर हर किसी का दिल भर आ रहा है। कुछ समय पहले साझा किए गए इस संदेश में दिव्यांका ने ईश्वर के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट की थी। मरून रंग की पगड़ी पहने हुए अपनी एक तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा था कि महादेव उन्हें अपने साथ ले चलें। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि उनकी यह आध्यात्मिक पुकार इतनी जल्दी और इस रूप में सच हो जाएगी। आज उनके चाहने वाले उसी संदेश को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं। प्रशंसकों का कहना है कि एक प्रतिभावान कलाकार का इस तरह जाना पूरी इंडस्ट्री के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में जन्मी दिव्यांका का जीवन सपनों को हकीकत में बदलने की एक कहानी रहा है। उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा में एमबीए की डिग्री भी हासिल की थी। शिक्षित और जागरूक होने के बावजूद उनका रुझान हमेशा से अभिनय की ओर रहा। बचपन से ही कला के प्रति समर्पित दिव्यांका ने अपने करियर की शुरुआत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए की थी, जहाँ उनकी प्रतिभा को दर्शकों का भरपूर समर्थन मिला। इसी लोकप्रियता ने उनके लिए संगीत और अभिनय की दुनिया के दरवाजे खोल दिए, जिसके बाद उन्होंने दर्जनों प्रसिद्ध प्रोजेक्ट्स में अपनी छाप छोड़ी। दिव्यांका ने अपने करियर के दौरान 50 से अधिक संगीत वीडियो में काम किया और कई स्थापित कलाकारों के साथ अपनी कला का प्रदर्शन किया। उनकी कड़ी मेहनत का ही परिणाम था कि डिजिटल जगत में उनके चाहने वालों की संख्या करोड़ों में पहुँच गई थी। जानकारी के अनुसार, अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें तुरंत चिकित्सा सहायता के लिए ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इतनी कम उम्र में इस तरह के हादसे ने स्वास्थ्य के प्रति भी लोगों को चिंता में डाल दिया है। एक सक्रिय और ऊर्जावान कलाकार का इस तरह चले जाना सभी को खटक रहा है। दिव्यांका सिरोही की अंतिम विदाई की प्रक्रिया उनके निवास स्थान के पास संपन्न होगी, जहाँ कला जगत के कई लोग और उनके प्रशंसक उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुँचेंगे। एक हंसमुख और सकारात्मक व्यक्तित्व के रूप में पहचानी जाने वाली दिव्यांका की कमी हमेशा महसूस की जाएगी। उन्होंने हमेशा अपनी कला के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करने का लक्ष्य रखा था। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अदाकारी और उनकी यादें उनके करोड़ों चाहने वालों के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगी। क्षेत्रीय सिनेमा ने निश्चित रूप से एक बहुत ही होनहार और समर्पित कलाकार को खो दिया है।
संसद में विवाद के बाद जनरल नरवणे की नई किताब लॉन्च, फिर सेना पर फोकस

नई दिल्ली। जनरल एम.एम. नरवणे एक बार फिर अपनी नई किताब को लेकर चर्चा में हैं। संसद में उनकी पिछली किताब को लेकर हुए विवाद के बाद अब उन्होंने नई नॉन-फिक्शन पुस्तक ‘The Curious and the Classified: Unearthing Military Myths and Mysteries’ लॉन्च की है, जिसका फोकस भी सेना से जुड़े विषयों पर ही है। क्या है नई किताब में खास? प्रकाशक रूपा पब्लिकेशंस के मुताबिक, इस किताब में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़े कई रोचक किस्से, रहस्य और परंपराओं को सामने लाया गया है। यह किताब सैन्य इतिहास और उससे जुड़े मिथकों की गहराई से पड़ताल करती है, साथ ही सैनिकों की जिज्ञासा और साहस की कहानियों को उजागर करती है। शशि थरूर से क्या है कनेक्शन? इस किताब की प्रेरणा का एक दिलचस्प पहलू भी सामने आया है। जनरल नरवणे ने बताया कि उन्हें यह किताब लिखने का विचार शशि थरूर की किताब ‘A Wonderland of Words’ पढ़ने के बाद आया। उन्होंने प्रस्तावना में भी इसका जिक्र किया है कि कैसे थरूर की लेखनी ने उन्हें नई किताब लिखने के लिए प्रेरित किया। पहले भी हो चुका है विवाद इससे पहले जनरल नरवणे की संस्मरण आधारित किताब ‘Four Stars of Destiny’ को लेकर संसद में बड़ा विवाद हुआ था। राहुल गांधी ने संसद में इस अप्रकाशित किताब के कुछ हिस्सों का जिक्र किया था इसके बाद स्पीकर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने स्पष्ट किया था कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है और उसके अधिकार उनके पास हैं क्यों चर्चा में है नई किताब? नई किताब भले ही संस्मरण नहीं है, लेकिन सैन्य विषयों पर आधारित होने के कारण यह फिर से चर्चा में है। खासकर उस विवाद के बाद, जिसमें सेना से जुड़े मुद्दे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गए थे। जनरल नरवणे की नई किताब सैन्य दुनिया के अनछुए पहलुओं को सामने लाने की कोशिश करती है। साथ ही, थरूर से मिला प्रेरणा का कनेक्शन इसे और दिलचस्प बनाता है। अब देखना होगा कि यह किताब पाठकों के बीच कितना प्रभाव छोड़ती है।
सबूतों की कमी पर सख्ती: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा -बिना ठोस आधार नहीं चलेगा केस, असीमानंद के बयान पर उठे सवाल

नई दिल्ली । 2006 मालेगांव ब्लास्ट से जुड़े बहुचर्चित मामले में एक बड़ा मोड़ सामने आया है। Bombay High Court ने बुधवार को इस केस में चल रही स्पेशल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी। कोर्ट के इस फैसले से महू के लोकेश शर्मा, देपालपुर के राजेंद्र चौधरी समेत धनसिंह और मनोहर नरवरिया को राहत मिली है। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि बिना ठोस और पुख्ता सबूतों के किसी भी मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। कमजोर साक्ष्यों पर उठे सवालसुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से पेश वकील कौशिक म्हात्रे ने कोर्ट में दलील दी कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस बयान के आधार पर केस दर्ज किया गया, वह खुद विवादों में रहा है। यह बयान स्वामी असीमानंद का था, जिसे बाद में उन्होंने दबाव में दिया गया बताते हुए वापस ले लिया था। कोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से लेते हुए माना कि ऐसे आधार पर आरोप तय करना न्यायसंगत नहीं है। NIA की चार्जशीट पर भी सवालइस मामले की जांच National Investigation Agency (NIA) द्वारा की गई थी। एजेंसी ने लोकेश शर्मा, राजेंद्र चौधरी और अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि चार्जशीट में पेश किए गए साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि ट्रायल को जारी रखा जाए। 6 साल जेल में रहे आरोपीबचाव पक्ष ने यह भी बताया कि दोनों मुख्य आरोपी 2013 में गिरफ्तार हुए थे और करीब 6 साल तक जेल में रहे। 2019 में उन्हें जमानत मिली थी। उस समय भी कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि बिना ट्रायल इतने लंबे समय तक किसी को जेल में रखना उचित नहीं है। अब एक बार फिर कोर्ट ने आरोपियों को राहत देते हुए ट्रायल पर रोक लगा दी है। क्या था पूरा मामला?8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में सिलसिलेवार चार बम धमाके हुए थे। ये धमाके बेहद संवेदनशील स्थानों हमीदिया मस्जिद और कब्रिस्तान के पास शुक्रवार की नमाज के तुरंत बाद हुए थे। इस दर्दनाक घटना में 31 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। जांच में कई मोड़शुरुआत में मामले की जांच एटीएस ने की और 9 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया, जिन्हें 2016 में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। बाद में जांच Central Bureau of Investigation (CBI) और फिर NIA को सौंप दी गई। जांच एजेंसियों ने बाद में इस मामले में अलग दिशा में जांच करते हुए दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया। आगे क्या?सितंबर 2025 में स्पेशल कोर्ट ने चारों आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अब हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद केस की दिशा बदलती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि जांच एजेंसियां नए सिरे से सबूत पेश कर पाती हैं या मामला यहीं ठहर जाता है।
DNA टेस्ट में पिता नहीं निकले तो नहीं देना होगा गुजारा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

अहमदाबाद। सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि डीएनए जांच से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे बच्चे के पालन-पोषण के लिए गुजारा देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता—even अगर बच्चे का जन्म विवाह के दौरान ही क्यों न हुआ हो। क्या है मामला? यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सुनाया। अदालत महिला की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। कोर्ट ने क्या कहा? सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि: डीएनए टेस्ट से यदि पितृत्व खारिज हो जाता है, तो गुजारा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता वैज्ञानिक साक्ष्य (DNA) को कानूनी अनुमान से अधिक महत्व मिलेगा संबंधित व्यक्ति ने खुद टेस्ट के लिए सहमति दी थी और रिपोर्ट पर कोई आपत्ति नहीं उठाई पुराने फैसलों का भी जिक्र अदालत ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण मामलों का हवाला दिया, जैसे: अपर्णा अजिंक्य फिरोदिया बनाम अजिंक्य अरुण फिरोदिया इवान रतिनम बनाम मिलान जोसेफ नंदलाल बडवाइक बनाम लता बडवाइक इन मामलों में कोर्ट ने पहले भी कहा था कि डीएनए टेस्ट का आदेश बहुत सावधानी से दिया जाना चाहिए। हालांकि, मौजूदा केस में टेस्ट पहले ही हो चुका था और उसकी रिपोर्ट को चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए इसे निर्णायक माना गया। कानून बनाम विज्ञान अदालत ने माना कि जब वैज्ञानिक प्रमाण और कानूनी अनुमान (जैसे विवाह के दौरान जन्मे बच्चे का पिता पति माना जाना) के बीच टकराव हो, तो विज्ञान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। महिला को क्या राहत मिली? हालांकि महिला की अपील खारिज कर दी गई, लेकिन कोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि बच्चे की स्थिति का आकलन किया जाए और जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध कराई जाए। पूरा मामला समझिए दंपति की शादी 2016 में हुई विवाद के बाद महिला ने बच्चे के लिए गुजारा भत्ता मांगा पति ने डीएनए टेस्ट की मांग की रिपोर्ट में वह बच्चे का जैविक पिता नहीं निकला ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने गुजारा देने से इनकार किया सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पारिवारिक कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। इससे साफ संदेश गया है कि पितृत्व से जुड़े मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।
प्रशासनिक लापरवाही पर CAT की टिप्पणी, देरी से प्रभावित पुलिस अधिकारियों को मिली राहत

जबलपुर । जबलपुर में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण CAT ने एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह मामला उन पुलिस अधिकारियों से जुड़ा है जिन्होंने वर्षों की सेवा के बावजूद भारतीय पुलिस सेवा में अपने चयन के अवसर से वंचित होने का आरोप लगाया है। आवेदक जितेन्द्र सिंह सत्येंद्र सिंह तोमर और मुकेश कुमार वैश्य ने अधिकरण के समक्ष याचिका दायर कर यह मांग की थी कि 56 वर्ष की आयु सीमा पार करने के बावजूद उनके अभ्यर्थित्व पर विचार किया जाए। याचिका में स्पष्ट रूप से बताया गया कि सरकार द्वारा हर पांच वर्ष में किया जाने वाला अनिवार्य कैडर रिव्यू समय पर नहीं किया गया। वर्ष 2018 में प्रस्तावित यह प्रक्रिया 2022 में पूरी हुई जिससे चार वर्षों की देरी हुई। इस देरी का सीधा असर उन अधिकारियों पर पड़ा जो उस दौरान आयु सीमा पार कर गए और चयन प्रक्रिया में शामिल होने के पात्र नहीं रह गए। आवेदकों का कहना है कि यदि कैडर रिव्यू समय पर हो जाता तो वे नियमों के तहत भारतीय पुलिस सेवा में चयन के लिए पात्र होते। इन अधिकारियों ने यह भी बताया कि वे 26 से 27 वर्षों की लंबी सेवा दे चुके हैं और अनुभव के आधार पर पूरी तरह योग्य हैं। इसके बावजूद उन्हें अब तक चयन का अवसर नहीं मिल सका। उनके अनुसार यह स्थिति न केवल उनके अधिकारों का हनन है बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की खामियों को भी उजागर करती है। मामले में आवेदकों की ओर से अधिवक्ता पंकज दुबे और अक्षय खंडेलवाल ने जोरदार पैरवी की। उन्होंने अधिकरण के समक्ष यह दलील रखी कि कैडर रिव्यू में हुई देरी पूरी तरह से सरकारी तंत्र की विफलता है और इसका खामियाजा आवेदकों को नहीं भुगतना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण योग्य अधिकारियों को अवसर से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है। दलीलों को सुनने के बाद CAT ने प्रथम दृष्टया मामला आवेदकों के पक्ष में बनता हुआ पाया और उन्हें अंतरिम राहत प्रदान की। अधिकरण ने आदेश दिया कि फिलहाल यथास्थिति बनाए रखी जाए और इस संबंध में केंद्र एवं राज्य सरकार से जवाब मांगा जाए। यह आदेश आवेदकों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि इससे उनके मामले को आगे सुनवाई में मजबूती मिलेगी। यह फैसला केवल तीन अधिकारियों तक सीमित नहीं है बल्कि यह उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है जहां प्रशासनिक देरी के कारण कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित होते हैं। CAT का यह रुख यह दर्शाता है कि न्यायिक संस्थाएं अब ऐसी लापरवाहियों को गंभीरता से ले रही हैं और प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। अब सभी की नजरें केंद्र और राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और भविष्य में ऐसी देरी को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।
‘वैदिक स्कूल या यातना गृह?’ 11 साल के छात्र की मौत ने खड़े किए सवाल, शरीर पर 45 चोटों के निशान

कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहां 11 वर्षीय छात्र दिव्यांश की संदिग्ध हालात में मौत ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है। परिवार ने इसे सीधा हत्या का मामला बताते हुए स्कूल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। 7 दिन पहले छोड़ा था स्कूल, अब मिला शव परिजनों के मुताबिक, दिव्यांश को महज एक सप्ताह पहले लखनऊ के आलमनगर स्थित रामानुज भागवत वेद विद्यापीठ गुरुकुल में पढ़ाई के लिए छोड़ा गया था। लेकिन कुछ ही दिनों बाद स्कूल संचालक बच्चे का शव कार से उसके घर लेकर पहुंचा, जिससे पूरे परिवार में कोहराम मच गया। शरीर पर 40-45 चोटों के निशान परिवार का आरोप है कि बच्चे के हाथ-पैर बांधे गए थे और बेरहमी से पिटाई की गई। शरीर पर 40 से 45 चोटों के निशान मिले सिगरेट से दागने के भी आरोप गंभीर शारीरिक यातना की आशंका इन हालातों ने “वैदिक शिक्षा” के नाम पर चल रहे संस्थान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हत्या और साक्ष्य मिटाने का केस पिता नरेंद्र द्विवेदी की शिकायत पर पुलिस ने स्कूल संचालक कन्हैया लाल मिश्रा और चालक के खिलाफ हत्या और साक्ष्य मिटाने की धाराओं में एफआईआर दर्ज की है। सवालों के घेरे में गुरुकुल व्यवस्था यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि शिक्षा संस्थानों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर बड़ी चिंता भी खड़ी करती है। जिस स्थान को शिक्षा और संस्कार का केंद्र माना जाता है, वहां इस तरह की क्रूरता ने सिस्टम पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। आगे क्या? अब सबकी नजर पुलिस जांच पर टिकी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फोरेंसिक जांच से ही स्पष्ट हो पाएगा कि दिव्यांश की मौत किन परिस्थितियों में हुई और दोषियों को कब तक सजा मिलती है। कानपुर की यह घटना समाज के लिए एक चेतावनी है—बच्चों की सुरक्षा को लेकर लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ एक परिवार नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की असफलता मानी जाएगी।
रचनात्मक मतभेदों और भारी नुकसान के बीच कैसे बिखर गए बॉलीवुड के कई बड़े सपने?

नई दिल्ली । किसी भी फिल्म की सफलता उसके पर्दे के पीछे की टीम और कलाकारों के बीच के मजबूत तालमेल पर निर्भर करती है। निर्देशक का दृष्टिकोण और अभिनेता का समर्पण जब एक दिशा में काम करते हैं, तभी एक कालजयी रचना का जन्म होता है। हालांकि, फिल्म जगत का इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ सेट पर दो दिग्गजों के बीच विचारों का टकराव इस कदर बढ़ा कि उसका खामियाजा पूरी फिल्म को भुगतना पड़ा। रचनात्मक मतभेद हों या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई, इन विवादों के कारण न केवल फिल्म निर्माण की लागत कई गुना बढ़ गई, बल्कि कई बार तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी फिल्में कभी दर्शकों तक पहुँच ही नहीं पाईं। इस कड़ी में एक सबसे बड़ा उदाहरण तब सामने आया जब एक मशहूर फिल्म स्टार और एक दिग्गज निर्देशक के बीच एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को लेकर अनबन हो गई। वर्षों बाद साथ आने का यह मौका प्रशंसकों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था, लेकिन स्क्रिप्ट और रचनात्मक स्वतंत्रता को लेकर दोनों के बीच असहमति इतनी गहरी हो गई कि अंततः फिल्म को बंद करने का फैसला लेना पड़ा। इस फैसले ने न केवल आर्थिक रूप से फिल्म निर्माण टीम को बड़ा झटका दिया, बल्कि उस समय की सबसे बड़ी फिल्म होने का दावा करने वाला यह प्रोजेक्ट इतिहास के पन्नों में दबकर रह गया। इसी प्रकार, एक ऐतिहासिक फिल्म के निर्माण के दौरान भी निर्देशक और मुख्य अभिनेत्री के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर भारी विवाद हुआ। आरोप लगे कि कलाकार द्वारा फिल्म के संपादन और निर्देशन में जरूरत से ज्यादा दखल दिया जा रहा है, जिसके कारण निर्देशक को बीच रास्ते में ही फिल्म का साथ छोड़ना पड़ा। फिल्मों के निर्माण में केवल वैचारिक मतभेद ही नहीं, बल्कि व्यावसायिक मांगे भी बड़ी रुकावट बनती रही हैं। एक चर्चित मामले में, एक अग्रणी अभिनेत्री और एक प्रभावशाली निर्देशक के बीच पारिश्रमिक और काम करने की शर्तों को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि अभिनेत्री ने ऐन वक्त पर फिल्म से दूरी बना ली। किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के बीच में मुख्य कलाकार का हटना पूरी फिल्म की समय सीमा और बजट को बिगाड़ देता है। नए कलाकार की तलाश और फिर से शूटिंग करने की प्रक्रिया में निर्माताओं को भारी चपत लगती है। इसी तरह का एक और वाकया तब देखने को मिला जब एक उभरते हुए अभिनेता और एक बड़े प्रोडक्शन हाउस के बीच किसी मतभेद के चलते अभिनेता को फिल्म से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। हालांकि बाद में उनके बीच समझौते की बात भी सामने आई, लेकिन उस दौरान हुई देरी और विवाद ने फिल्म की प्रतिष्ठा को काफी नुकसान पहुँचाया। सिनेमाई दुनिया में कई बार एक फिल्म की सफलता का श्रेय लेने की होड़ भी आपसी रिश्तों में दरार डाल देती है। एक संवेदनशील फिल्म के निर्माण के दौरान निर्देशक और लेखक के बीच छिड़ी जंग ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं। यहाँ फिल्म के विजन को लेकर हुई तकरार इतनी बढ़ी कि दोनों ने भविष्य में फिर कभी साथ काम न करने की कसम खा ली। इसी तरह, एक अन्य मामले में एक अभिनेता ने फिल्म की कहानी से नाखुश होकर प्रोजेक्ट बीच में ही छोड़ दिया, जिसके बाद निर्देशक और अभिनेता के बीच के रिश्ते इस कदर बिगड़े कि निर्देशक ने सार्वजनिक रूप से कभी साथ काम न करने का फैसला ले लिया। ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि जब पेशेवर दुनिया में अहंकार और मतभेद हावी होते हैं, तो कला की बलि चढ़ना तय हो जाता है।
तेज रफ्तार बस का कहर, बाइक सवार की दर्दनाक मौत, के बाद ग्रामीणों ने किया चक्का जाम

इंदौर । इंदौर जिले के महू क्षेत्र में स्थित किशनगंज थाना इलाके के भैंसलाए गांव में एक दर्दनाक सड़क हादसे ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। तेज रफ्तार से दौड़ रही एक फैक्ट्री बस ने बाइक सवार युवक को इतनी जोरदार टक्कर मारी कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई। हादसे की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि टक्कर के बाद युवक को संभलने का मौका तक नहीं मिला और घटनास्थल पर ही उसकी सांसें थम गईं। देखते ही देखते मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो गई और माहौल गम और गुस्से में बदल गया। यह घटना केवल एक हादसा नहीं बल्कि लंबे समय से चली आ रही लापरवाही का नतीजा मानी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव की सड़क से तेज रफ्तार में गुजरने वाले वाहनों को लेकर कई बार प्रशासन को चेताया गया था। विशेष रूप से फैक्ट्री की बसों की रफ्तार पर लगाम लगाने और गांव में स्पीड ब्रेकर बनाने की मांग बार बार उठाई गई थी लेकिन हर बार इसे नजरअंदाज कर दिया गया। इस अनदेखी ने आखिरकार एक युवक की जान ले ली और अब ग्रामीणों का धैर्य टूट गया। हादसे के बाद गुस्साए ग्रामीण बड़ी संख्या में सड़क पर उतर आए और उन्होंने चक्का जाम कर दिया। लोगों ने जोरदार नारेबाजी करते हुए प्रशासन के खिलाफ अपना आक्रोश जाहिर किया। उनका साफ कहना था कि यदि समय रहते स्पीड ब्रेकर बनाए गए होते तो शायद यह हादसा टल सकता था। प्रदर्शन के चलते इलाके में यातायात पूरी तरह ठप हो गया और सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि फैक्ट्री की बसें अक्सर लापरवाही से और तेज रफ्तार में गांव के भीतर से गुजरती हैं जिससे हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है। इसके बावजूद न तो कोई गति नियंत्रण के उपाय किए गए और न ही सुरक्षा के अन्य इंतजाम किए गए। लोगों का कहना है कि प्रशासन केवल घटनाओं के बाद सक्रिय होता है जबकि पहले से चेतावनी देने के बावजूद कोई कदम नहीं उठाया जाता। घटना की सूचना मिलते ही किशनगंज थाना पुलिस मौके पर पहुंची और हालात को काबू में करने की कोशिश की। पुलिस ने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया और यातायात बहाल कराने की दिशा में कदम उठाए। साथ ही मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेजा गया और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी गई है। यह हादसा एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी घटना का इंतजार करता है या फिर समय रहते जरूरी कदम उठाए जाएंगे। एक जान जाने के बाद अब गांव के लोग ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं ताकि भविष्य में ऐसी दर्दनाक घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।
कांग्रेस IT सेल वर्कर्स को लेकर विवाद: Bhopal में परिजनों ने लगाया अपहरण का आरोप, जांच की मांग

नई दिल्ली । राजधानी Bhopal में राजस्थान साइबर पुलिस की कार्रवाई ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस आईटी सेल से जुड़े तीन कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेने के बाद परिजनों ने गंभीर आरोप लगाते हुए इसे ‘अपहरण’ तक करार दिया है। मामला अब कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तर पर गरमा गया है, जबकि पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। परिजनों का आरोप: बिना सूचना ले गए, कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाईशिकायतकर्ता मोहम्मद आमिर ने आरोप लगाया कि उनके भांजे बिलाल खान समेत तीन युवकों निखिल और इनाम को कुछ लोग खुद को राजस्थान पुलिस बताकर अपने साथ ले गए। परिवार का कहना है कि उन्हें यह कहकर गुमराह किया गया कि तीनों को कोर्ट में पेश किया जाएगा, लेकिन न तो उन्हें किसी स्थानीय अदालत में पेश किया गया और न ही मेडिकल कराया गया। परिजनों का आरोप है कि बिना आधिकारिक जानकारी के इस तरह ले जाना कानून के खिलाफ है। वायरल पत्र से जुड़ा है पूरा विवादयह पूरा मामला राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री Vasundhara Raje के नाम से वायरल हुए एक कथित पत्र से जुड़ा बताया जा रहा है। सोशल मीडिया पर प्रसारित इस पत्र के तार भोपाल स्थित कांग्रेस आईटी सेल से जुड़े होने की आशंका जताई गई थी। इसी सिलसिले में राजस्थान साइबर पुलिस की टीम जांच के लिए भोपाल पहुंची थी। राजनीतिक बयानबाजी भी तेजकांग्रेस नेता PC Sharma ने इस मामले को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जब परिवार ने शिकायत दर्ज करा दी है, तो संबंधित एजेंसियों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना सूचना, बिना मेडिकल और बिना कोर्ट पेशी के कार्रवाई पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है। परिवार की मांग है कि तीनों युवकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जाए। टाइमलाइन से बढ़ी शंकाघटना की टाइमलाइन भी कई सवाल खड़े करती है। 19 अप्रैल: तीनों कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर रोका गया। 21 अप्रैल दोपहर: परिजनों को जानकारी मिली कि उन्हें कलेक्टर कार्यालय के पास रखा गया है। उसी दिन दोपहर 3 बजे: एक कार से उन्हें कहीं ले जाया गया, परिजनों को जमानत की बात कहकर भेज दिया गया। शाम तक कोई जानकारी नहीं मिलने पर परिजनों ने थाना कोहेफिजा में शिकायत दर्ज कराई। इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता पर संदेह और गहरा कर दिया है। हाईकोर्ट सख्त, 27 अप्रैल को पेश करने के आदेशमामले ने जब कानूनी मोड़ लिया तो Madhya Pradesh High Court की जबलपुर बेंच ने हस्तक्षेप किया। अदालत ने राजस्थान पुलिस को 27 अप्रैल को तीनों कार्यकर्ताओं को पेश करने का निर्देश दिया है। साथ ही मध्य प्रदेश और राजस्थान पुलिस से पूरी कार्रवाई का विवरण मांगा गया है। कोर्ट ने 20-21 अप्रैल के सीसीटीवी फुटेज भी प्रस्तुत करने को कहा है। गिरफ्तारी प्रक्रिया पर उठे बड़े सवालयाचिका में गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताते हुए न्याय की मांग की गई है। सवाल यह है कि यदि कार्रवाई नियमों के तहत हुई, तो परिजनों को अंधेरे में क्यों रखा गया? यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन गया है। सच्चाई सामने आना जरूरीभोपाल में हुई इस घटना ने पुलिस की कार्यशैली, कानूनी प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। अब सबकी नजर 27 अप्रैल पर टिकी है, जब अदालत में सच्चाई सामने आएगी और यह तय होगा कि कार्रवाई कानून के दायरे में थी या नहीं।