ट्रंप-ईरान आमने-सामने: ‘गेंद अमेरिका के पाले में’, शांति प्रस्ताव के साथ तेहरान की दो टूक, युद्ध भी मंजूर

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के रिश्ते एक नए मोड़ पर पहुंच गए हैं। तेहरान ने जहां शांति की पहल करते हुए 14 सूत्रीय प्रस्ताव भेजा है, वहीं सख्त लहजे में यह भी साफ कर दिया है कि अब फैसला वॉशिंगटन को करना है कूटनीति या टकराव। पाकिस्तान के जरिए भेजे गए इस प्रस्ताव को लेकर दोनों देशों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है और हालात फिर से टकराव की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने दो टूक कहा कि “गेंद अब अमेरिका के पाले में है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि तेहरान ने शांति का रास्ता खोल दिया है, लेकिन अगर अमेरिका टकराव चाहता है तो ईरान भी हर स्थिति के लिए तैयार है। उनका कहना है कि देश अपने हितों और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा और जरूरत पड़ी तो जवाब भी उसी अंदाज में दिया जाएगा। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव पर संदेह जताते हुए साफ संकेत दिए हैं कि इसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। ट्रंप ने कहा कि वह प्रस्ताव की समीक्षा कर रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि यह अमेरिका के लिए स्वीकार्य होगा। उन्होंने ईरान पर पिछले कई दशकों के व्यवहार को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि तेहरान ने अभी तक “पर्याप्त कीमत” नहीं चुकाई है। दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता बार-बार विफल हो रही है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में बातचीत की कोशिशें भी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी हैं। अमेरिका का रुख साफ है कि वह तब तक युद्ध खत्म नहीं करेगा जब तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ठोस और विश्वसनीय नियंत्रण सुनिश्चित नहीं हो जाता। वहीं ईरान की प्राथमिकता है कि पहले युद्ध पूरी तरह खत्म हो, नाकेबंदी हटे और उसके बाद ही अन्य मुद्दों पर चर्चा हो। ईरान के 14 सूत्रीय प्रस्ताव में कई अहम मांगें शामिल हैं। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य से अमेरिकी नाकेबंदी हटाने, क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की वापसी, जब्त ईरानी संपत्तियों की रिहाई, युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा और भविष्य में हमले न करने की गारंटी जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। इसके अलावा लेबनान समेत सभी मोर्चों पर संघर्ष समाप्त करने और होर्मुज में नया तंत्र लागू करने की बात भी कही गई है। इसी बीच अमेरिका ने शिपिंग कंपनियों को चेतावनी दी है कि यदि वे होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए ईरान को किसी भी रूप में भुगतान करती हैं, तो उन्हें कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इस चेतावनी में नकद के साथ डिजिटल और अनौपचारिक लेन-देन भी शामिल हैं, जिससे क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। कुल मिलाकर, एक तरफ शांति प्रस्ताव है तो दूसरी ओर सख्त बयानबाजी—ऐसे में मिडिल ईस्ट का माहौल अभी भी बेहद संवेदनशील बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि हालात बातचीत की मेज तक पहुंचते हैं या फिर टकराव और गहराता है।
डच राजकुमारियों पर ‘खून की साजिश’ का साया, नाजी कनेक्शन से हिला यूरोप

नई दिल्ली। यूरोप में शाही सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ा अलर्ट सामने आया है। नीदरलैंड की राजकुमारियों को निशाना बनाकर रची गई खौफनाक साजिश ने पूरे महाद्वीप को हिला दिया है। जानकारी के मुताबिक 22 वर्षीय राजकुमारी कैथरीना अमालिया और 20 वर्षीय राजकुमारी एलेक्सिया के खिलाफ हत्या की योजना बनाई जा रही थी, जिसे समय रहते विफल कर दिया गया। पुलिस ने इस मामले में एक संदिग्ध को गिरफ्तार किया है, जिसके तार कट्टरपंथी और नाजी विचारधारा से जुड़े होने की आशंका जताई जा रही है। जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपी को फरवरी में द हेग से पकड़ा गया था। उसके पास से दो कुल्हाड़ियां बरामद हुईं, जिन पर ‘एलेक्सिया’, ‘मोसाद’ और नाजी काल का कुख्यात नारा ‘सीग हेल’ उकेरा गया था। इतना ही नहीं, उसके पास से एक हाथ से लिखा नोट भी मिला, जिसमें दोनों राजकुमारियों के नाम के साथ ‘ब्लडबाथ’ जैसे शब्द लिखे थे। इन सबूतों ने इस साजिश की गंभीरता को और बढ़ा दिया है, हालांकि अब तक हमले के पीछे की ठोस मंशा स्पष्ट नहीं हो सकी है। मामले को लेकर द हेग के अभियोजन कार्यालय ने पुष्टि की है कि आरोपी को अदालत में पेश किया जाएगा और उससे पूछताछ जारी है। यह पहली बार नहीं है जब राजकुमारी अमालिया को निशाना बनाया गया हो। इससे पहले भी ड्रग गिरोहों पर उनके अपहरण की साजिश रचने के आरोप लग चुके हैं। बढ़ते खतरों के चलते उन्हें 2022 में एम्स्टर्डम स्थित छात्रावास छोड़कर द हेग के शाही महल में शिफ्ट होना पड़ा था। सुरक्षा एजेंसियां लगातार उनकी निगरानी बढ़ाती रही हैं। सुरक्षा के इस साए का असर राजकुमारी के निजी जीवन पर भी साफ दिखाई देता है। अमालिया ने खुद माना है कि वह एक सामान्य छात्र जीवन जीने की इच्छा रखती हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से ऐसा संभव नहीं हो पा रहा। उनकी मां रानी मैक्सिमा ने भी स्वीकार किया है कि लगातार मिल रही धमकियों ने उनकी बेटी की आजादी को सीमित कर दिया है। इस ताजा घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यूरोप में बढ़ती कट्टरपंथी गतिविधियां किस हद तक शाही परिवारों और सार्वजनिक हस्तियों के लिए खतरा बन रही हैं। सुरक्षा एजेंसियां अब इस मामले को केवल एक आपराधिक साजिश नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा चुनौती के तौर पर देख रही हैं।
नेपाल में ‘सिस्टम क्लीनअप’: PM बालेंद्र शाह ने एक झटके में 1594 राजनीतिक नियुक्तियां रद्द

नई दिल्ली। नेपाल की राजनीति में एक बड़े फैसले ने हलचल मचा दी है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने एक झटके में देशभर में की गई 1594 राजनीतिक नियुक्तियों को रद्द कर दिया है। कैबिनेट की मंजूरी और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की स्वीकृति के बाद यह फैसला लागू होते ही करीब 150 सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में बैठे पदाधिकारी तत्काल प्रभाव से पदमुक्त हो गए। सरकार ने इस कदम को “सिस्टम सुधार” और पारदर्शिता की दिशा में बड़ा बदलाव बताया है। अध्यादेश के जरिए करीब 110 कानूनों में संशोधन कर यह सुनिश्चित किया गया कि पहले की सभी राजनीतिक नियुक्तियां, चाहे उनकी अवधि या शर्त कुछ भी रही हो, स्वतः समाप्त मानी जाएं। इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, एविएशन, मीडिया और सांस्कृतिक संस्थानों समेत कई अहम क्षेत्रों पर पड़ा है। सबसे बड़ा झटका देश के विश्वविद्यालयों को लगा है, जहां उपकुलपति, रजिस्ट्रार और अन्य शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी हटाए गए हैं। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिकल कॉलेजों, काउंसिल्स और रिसर्च संस्थानों के प्रमुख पदाधिकारी भी पदमुक्त कर दिए गए हैं। नेपाल मेडिकल काउंसिल, नेपाल पर्यटन बोर्ड और नेपाल नागरिक उड्डयन प्राधिकरण जैसे बड़े संस्थान भी इस फैसले की जद में आए हैं। यह कार्रवाई केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित नहीं रही, बल्कि शांति प्रक्रिया से जुड़े आयोगों तक पहुंच गई। माओवादी संघर्ष के बाद गठित सत्य निरूपण और बेपत्ता व्यक्तियों की जांच से जुड़े निकायों के पदाधिकारी भी हटा दिए गए हैं, जिससे इस फैसले की व्यापकता और भी साफ हो जाती है। सरकार का दावा है कि इससे राजनीतिक दखल कम होगा और संस्थानों की कार्यप्रणाली अधिक पेशेवर बनेगी। हालांकि विपक्ष इसे सत्ता का केंद्रीकरण और संस्थानों पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश बता रहा है। ऐसे में यह फैसला नेपाल की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़ा मुद्दा बनने की पूरी संभावना है।
नींद की कमी पर अनोखी पहल: सियोल में ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’, 80 साल के बुजुर्ग ने मारी बाजी

नई दिल्ली। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में एक अनोखा और दिलचस्प आयोजन देखने को मिला, जहां लोगों को सोने के लिए आमंत्रित किया गया। ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ नाम की इस प्रतियोगिता का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि देश में बढ़ती नींद की कमी की गंभीर समस्या की ओर ध्यान खींचना था। सियोल मेट्रोपॉलिटन गवर्नमेंट द्वारा आयोजित इस इवेंट में हजारों युवा हान नदी किनारे स्थित पार्क में पहुंचे और खुले आसमान के नीचे सुकून की नींद लेने की कोशिश की। तेज-रफ्तार जिंदगी और काम के भारी दबाव के लिए मशहूर दक्षिण कोरिया में युवाओं के बीच नींद की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। यही वजह है कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए प्रतिभागियों को थका हुआ और पेट भरकर आने की शर्त दी गई थी, ताकि वे गहरी नींद ले सकें। कई प्रतिभागी मजेदार वेशभूषा में पहुंचे। कोई ‘स्लीपिंग ब्यूटी’ बना तो कोई ‘स्लीपिंग प्रिंस’। प्रतियोगिता में शामिल 20 वर्षीय छात्र पार्क जून-सियोक पारंपरिक शाही पोशाक पहनकर आए और बताया कि पढ़ाई और पार्ट-टाइम जॉब के कारण उन्हें रोजाना सिर्फ 3-4 घंटे ही नींद मिल पाती है। वहीं, अनिद्रा से जूझ रही एक शिक्षिका कोआला की ड्रेस में नजर आईं, ताकि वह इस मौके पर सुकून से सो सकें। इस अनोखे मुकाबले में प्रतिभागियों की नींद की गुणवत्ता को मापने के लिए उनकी हार्ट रेट मॉनिटर की गई, जिससे पता चल सके कि कौन सबसे गहरी और शांत नींद ले रहा है। प्रतियोगिता की शुरुआत दोपहर में हुई और कुछ ही देर में पूरे पार्क में सन्नाटा छा गया, मानो शहर की भागदौड़ थम गई हो। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इस ‘नींद की जंग’ में 80 वर्षीय बुजुर्ग ने बाजी मार ली, जबकि दूसरे स्थान पर एक 37 वर्षीय ऑफिस वर्कर रहे, जो नाइट शिफ्ट और काम के दबाव से बेहद थके हुए थे। यह प्रतियोगिता सिर्फ एक इवेंट नहीं, बल्कि एक बड़ा संदेश है कि आधुनिक जीवनशैली में नींद की अनदेखी किस हद तक बढ़ चुकी है। OECD देशों में सबसे कम सोने वाले देशों में शामिल दक्षिण कोरिया अब इस समस्या को लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और यह ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ उसी दिशा में एक अनोखी पहल बनकर सामने आया है।
दिल्ली में मेट्रो क्रांति का अगला चरण, सात नए रूट से बदल जाएगी शहर की ट्रैफिक तस्वीर.

नई दिल्ली। दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को एक नया और बड़ा विस्तार देने की दिशा में राजधानी में मेट्रो नेटवर्क को और मजबूत करने की योजना सामने आई है। इस प्रस्ताव के तहत शहर में सात नए मेट्रो कॉरिडोर विकसित किए जाने की तैयारी है, जिससे न केवल आवागमन आसान होगा बल्कि दिल्ली के दूर-दराज और घनी आबादी वाले क्षेत्रों को भी सीधे मुख्य शहर से जोड़ने में मदद मिलेगी। इस विस्तार योजना के तहत करीब 97 किलोमीटर लंबा नया मेट्रो नेटवर्क तैयार किया जाएगा, जिसमें लगभग 65 नए स्टेशन शामिल होंगे। यह कदम राजधानी के उन इलाकों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, जहां अब तक मेट्रो कनेक्टिविटी सीमित थी या बिल्कुल नहीं थी। नरेला, नजफगढ़, पालम, रोहिणी और पूर्वी दिल्ली जैसे क्षेत्रों को इस परियोजना से सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है। नए कॉरिडोरों में शहर के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने के लिए कई महत्वपूर्ण रूट शामिल किए गए हैं। इनमें उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिल्ली को आपस में जोड़ने वाली लाइनें भी हैं, जो यात्रियों के लिए यात्रा को अधिक तेज और सुविधाजनक बनाएंगी। कुछ रूट ऐसे भी हैं जो मौजूदा मेट्रो लाइनों को आपस में जोड़कर ट्रांसफर सिस्टम को और आसान बनाएंगे, जिससे भीड़ और समय दोनों में कमी आने की संभावना है। इस योजना का सबसे बड़ा उद्देश्य राजधानी के बढ़ते ट्रैफिक दबाव को कम करना और लोगों को निजी वाहनों पर निर्भरता से मुक्त करना है। नए रूट उन इलाकों को भी कवर करेंगे जहां तेजी से शहरीकरण हो रहा है और आबादी लगातार बढ़ रही है। इससे न केवल दैनिक यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति मिलेगी। परियोजना में शामिल कॉरिडोर अलग-अलग दिशाओं में शहर को जोड़ते हुए एक व्यापक नेटवर्क तैयार करेंगे। इससे दूर-दराज के आवासीय क्षेत्रों को सीधे व्यावसायिक और प्रशासनिक केंद्रों से जोड़ा जा सकेगा। कई इलाकों में यह पहली बार होगा जब लोगों को सीधी मेट्रो सुविधा उपलब्ध होगी। इस पूरे विस्तार को चरणबद्ध तरीके से पूरा करने की योजना है, जिसमें कुछ कॉरिडोर को प्राथमिकता के आधार पर तेजी से विकसित किया जाएगा। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यह प्रोजेक्ट राजधानी की यातायात व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव लेकर आएगा।
ब्राज़ील में बारिश का कहर: बाढ़-भूस्खलन से 6 मौतें, हजारों लोग बेघर

नई दिल्ली। दक्षिण अमेरिका के ब्राज़ील के पूर्वोत्तर हिस्से में भारी बारिश ने तबाही मचा दी है। लगातार दो दिनों तक हुई मूसलाधार वर्षा के चलते बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं में कम से कम छह लोगों की मौत हो गई, जबकि हजारों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि कई इलाकों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। सबसे ज्यादा असर पेर्नंबुको राज्य में देखने को मिला, जहां बाढ़ और लैंडस्लाइड के कारण चार लोगों की जान चली गई। वहीं पड़ोसी पैराइबा में भी दो लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। तेज बारिश के चलते नदियां उफान पर हैं और निचले इलाकों में पानी भर जाने से हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक करीब डेढ़ हजार परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है, जबकि कई इलाकों में राहत और बचाव कार्य तेजी से जारी है। प्रशासन ने आपात अलर्ट जारी करते हुए लोगों को सतर्क रहने और अनावश्यक रूप से घरों से बाहर न निकलने की सलाह दी है। मौसम विभाग ने भले ही आने वाले दिनों में बारिश की तीव्रता कम होने की संभावना जताई है, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। प्रशासन का कहना है कि जमीन में नमी बढ़ने से भूस्खलन का जोखिम बना हुआ है, ऐसे में लोगों को सावधानी बरतनी होगी। यह आपदा एक बार फिर दिखाती है कि चरम मौसम की घटनाएं किस तरह बड़े पैमाने पर जन-धन का नुकसान कर रही हैं।
डिजिटल निगरानी, भारी सुरक्षा और सख्त नियमों के बीच बंगाल में वोटों की गिनती की तैयारी

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतगणना से पहले सुरक्षा व्यवस्था को इस स्तर तक सख्त कर दिया गया है कि पूरे राज्य के काउंटिंग सेंटर अब पूरी तरह सुरक्षित और नियंत्रित क्षेत्रों में बदल गए हैं। प्रशासन ने यह सुनिश्चित करने के लिए व्यापक इंतजाम किए हैं कि वोटों की गिनती प्रक्रिया पूरी तरह शांतिपूर्ण, पारदर्शी और बिना किसी बाधा के संपन्न हो। इस बार सुरक्षा व्यवस्था को तीन स्तरों में बांटा गया है, जहां हर स्तर पर अलग-अलग जिम्मेदारियां तय की गई हैं। सबसे बाहरी घेरा राज्य पुलिस के नियंत्रण में है, जो भीड़ को नियंत्रित करने और अनधिकृत प्रवेश को रोकने का काम कर रही है। इसके बाद केंद्रीय सुरक्षा बलों का दूसरा घेरा है, जहां हर व्यक्ति की सख्त जांच के बाद ही आगे बढ़ने की अनुमति दी जा रही है। सबसे अंदरूनी घेरा काउंटिंग हॉल के आसपास बनाया गया है, जो सबसे संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यहां केवल उन्हीं लोगों को प्रवेश मिल रहा है जिनके पास QR कोड आधारित पहचान पत्र मौजूद है। इस प्रणाली के जरिए हर व्यक्ति की डिजिटल जांच की जा रही है, जिससे किसी भी तरह की फर्जी एंट्री या अनधिकृत पहुंच की संभावना लगभग समाप्त हो गई है। सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए पूरे काउंटिंग सेंटर में सीसीटीवी कैमरों की व्यापक व्यवस्था की गई है। इन कैमरों से हर गतिविधि पर लगातार नजर रखी जा रही है और लाइव फीड को निगरानी केंद्रों तक भेजा जा रहा है, जिससे किसी भी स्थिति पर तुरंत कार्रवाई संभव हो सके। इसके अलावा मतगणना हॉल के अंदर मोबाइल फोन ले जाने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। केवल अधिकृत अधिकारियों को ही मोबाइल रखने की अनुमति दी गई है, ताकि किसी भी तरह की सूचना लीक या बाहरी हस्तक्षेप को रोका जा सके। सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए बड़ी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है। संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त बलों को तैनात कर निगरानी बढ़ा दी गई है। साथ ही, काउंटिंग सेंटरों के आसपास सख्त नियंत्रण लागू किया गया है ताकि किसी भी तरह की भीड़ या अव्यवस्था न हो सके। मतगणना से पहले स्ट्रांग रूम की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, जहां ईवीएम मशीनों को कड़ी निगरानी में रखा गया है। इन स्थानों पर चौबीसों घंटे सुरक्षा बलों की तैनाती है और लगातार निगरानी जारी है ताकि किसी भी तरह की छेड़छाड़ की संभावना न रहे। इस बार की सुरक्षा व्यवस्था तकनीक और मानव संसाधनों के संयोजन से बेहद मजबूत बनाई गई है। उद्देश्य साफ है कि मतगणना प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष, सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से संपन्न हो, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर जनता का भरोसा और मजबूत हो सके।
ईरान का ट्रंप को 14 सूत्रीय अल्टीमेटम: ‘युद्ध खत्म करो, प्रतिबंध हटाओ, मुआवजा दो’

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच कूटनीतिक हल की कोशिशें तेज हो गई हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के 9 सूत्रीय शांति फ्रेमवर्क के जवाब में ईरान ने नया 14 सूत्रीय प्रस्ताव भेजकर साफ संकेत दिया है कि वह अपने शर्तों पर समझौता चाहता है। पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए वॉशिंगटन तक पहुंचाए गए इस प्रस्ताव में तेहरान ने युद्ध खत्म करने से लेकर प्रतिबंध हटाने और मुआवजे तक की सख्त मांगें रख दी हैं, जिससे वैश्विक राजनीति में हलचल बढ़ गई है। ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस प्रस्ताव में सबसे अहम शर्त यह है कि अमेरिका सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तुरंत रोके, लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में युद्ध खत्म किया जाए और अमेरिकी सेना को वापस बुलाया जाए। इसके अलावा हॉर्मुज जलडमरूमध्य के लिए नई व्यवस्था बनाने, नौसैनिक नाकेबंदी हटाने और क्षेत्रीय तनाव कम करने की भी बात कही गई है। ईरान ने साफ तौर पर आर्थिक प्रतिबंध खत्म करने, जब्त संपत्तियां लौटाने और युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा देने की मांग भी शामिल की है। तेहरान ने अमेरिका के 2 महीने के युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज करते हुए 30 दिन में सभी मुद्दों के समाधान की समयसीमा सुझाई है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने दो टूक कहा कि अब फैसला अमेरिका को करना है या तो कूटनीति का रास्ता चुने या फिर टकराव के लिए तैयार रहे। उनका कहना है कि ईरान दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार है और अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। वहीं दूसरी ओर ट्रंप ने इस 14 सूत्रीय प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका इसकी समीक्षा कर रहा है, लेकिन इसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि ईरान ने आक्रामक रुख जारी रखा तो सैन्य कार्रवाई दोबारा हो सकती है। ट्रंप के मुताबिक, “ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन नेतृत्व और शर्तों को लेकर स्पष्टता नहीं है।” इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि एक तरफ बातचीत के दरवाजे खुले हैं, तो दूसरी तरफ युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि अमेरिका और ईरान कूटनीति की राह पकड़ते हैं या फिर मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े टकराव की ओर बढ़ता है।
बारिश बनी मौत का कारण, नंगे तार की चपेट में आकर 17 वर्षीय छात्र की दर्दनाक मौत

नई दिल्ली। बारिश की तेज बौछारों के बीच बेंगलुरु की सड़कें पानी से भरी हुई थीं, और हर तरफ फिसलन और अव्यवस्था का माहौल था। इसी दौरान एक सामान्य-सी घटना ने एक परिवार की पूरी दुनिया उजाड़ दी। 17 वर्षीय छात्र की बिजली के करंट की चपेट में आने से मौके पर ही मौत हो गई, जब वह अपनी बाइक पार्क करने की कोशिश कर रहा था। यह घटना उस समय हुई जब छात्र अपने परिवार के साथ व्यस्त इलाके में गया हुआ था। बारिश के कारण सड़क पर पानी जमा था और आसपास का माहौल बेहद असुरक्षित हो चुका था। जैसे ही वह बाइक को खंभे के पास खड़ा करने के लिए आगे बढ़ा, उसका संपर्क वहां मौजूद एक खुले बिजली के तार से हो गया। पानी में फैले करंट ने पलभर में स्थिति को जानलेवा बना दिया। कुछ ही सेकंड में वह तेज बिजली के झटके से गिर पड़ा। आसपास मौजूद लोग तुरंत मदद के लिए दौड़े, लेकिन हालात इतने खतरनाक थे कि कोई भी उसे छूने की हिम्मत नहीं कर सका। पानी में फैला करंट किसी भी नजदीकी संपर्क को भी जानलेवा बना रहा था, जिससे राहत कार्य तुरंत शुरू नहीं हो पाया। परिवार के सामने ही यह हादसा हुआ, जिसने उन्हें सदमे में डाल दिया। किसी को समझ नहीं आया कि इतनी सामान्य सी स्थिति इतनी बड़ी त्रासदी में कैसे बदल गई। कुछ ही देर में छात्र ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, और पूरे इलाके में सन्नाटा छा गया। बारिश के चलते पहले से ही शहर की स्थिति खराब थी। कई जगहों पर जलभराव और बिजली के खंभों की खराब हालत लोगों के लिए खतरा बनी हुई थी। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या शहर में बिजली और सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं। स्थानीय लोगों के अनुसार, बारिश के दौरान खुले तार और कमजोर रखरखाव ऐसे हादसों का बड़ा कारण बनते हैं। अगर समय रहते इन खतरों को ठीक कर लिया जाए, तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। यह हादसा केवल एक व्यक्तिगत क्षति नहीं है, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है कि मौसम की मार के साथ-साथ बुनियादी ढांचे की लापरवाही कितनी खतरनाक साबित हो सकती है। एक परिवार का युवा हमेशा के लिए खो गया, और उसके पीछे रह गई एक ऐसी कहानी जो हर किसी को झकझोर देती है।
हॉर्मुज संकट के बीच भारत की बड़ी कामयाबी: 45 हजार टन LPG लेकर ‘सर्व शक्ति’ ने तोड़ी नाकेबंदी

नई दिल्ली। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और नाकेबंदी के बीच भारत के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अमेरिका-ईरान तनातनी के कारण जहां इस अहम समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो चुकी है, वहीं भारत से जुड़ा एलपीजी टैंकर ‘सर्व शक्ति’ सफलतापूर्वक इस खतरनाक मार्ग को पार कर आगे बढ़ गया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर संकट गहराता जा रहा है और भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए हर शिपमेंट बेहद अहम बन चुका है। मरीन ट्रैफिक डेटा के मुताबिक करीब 45 हजार टन एलपीजी लेकर चल रहा यह टैंकर ईरान के लारक और क़ेश्म द्वीप के पास से तय मार्ग का पालन करते हुए ओमान की खाड़ी में दाखिल हुआ। जहाज पर 18 भारतीय चालक दल के सदस्य मौजूद हैं और यह विशाखापत्तनम की ओर बढ़ रहा है। इस पूरे ऑपरेशन को इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि अमेरिकी नाकेबंदी के बाद यह भारत से जुड़ा पहला बड़ा एलपीजी टैंकर है जिसने हॉर्मुज का रास्ता पार किया है। इस कार्गो को सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने खरीदा है, हालांकि कंपनी ने आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि इस शिपमेंट का सुरक्षित पहुंचना भारत के लिए बड़ी रणनीतिक सफलता है, क्योंकि मिडिल ईस्ट से सप्लाई बाधित होने के कारण देश में एलपीजी की उपलब्धता पर दबाव बना हुआ है। दरअसल, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता है। ऐसे में हॉर्मुज जैसे संवेदनशील मार्ग पर रुकावट का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। हाल के दिनों में सप्लाई में कमी के चलते कई जगहों पर घबराहट, लंबी कतारें और सीमित वितरण जैसी स्थिति देखने को मिली। यही वजह है कि सरकार ने एलपीजी टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर ईरान से बातचीत तेज की और वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी शुरू कीं। बताया जा रहा है कि भारत अब तक इस संकट के बीच कम से कम आठ एलपीजी जहाजों को सुरक्षित निकालने में सफल रहा है। साथ ही घरेलू उत्पादन को भी तेजी से बढ़ाया गया है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी के मुताबिक देश में उत्पादन बढ़ाकर करीब 54 हजार टन प्रतिदिन कर दिया गया है, जबकि खपत को संतुलित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना तकनीकी रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। सामान्य हालात में यह सफर 10 से 14 घंटे का होता है, लेकिन मौजूदा तनाव के बीच इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप, लोकेशन गड़बड़ी और सुरक्षा जोखिमों के कारण यह और जटिल हो गया है। कई जहाज ट्रैकिंग से बचने के लिए अपने ट्रांसपोंडर तक बंद कर देते हैं। इन सभी चुनौतियों के बीच ‘सर्व शक्ति’ का सुरक्षित पारगमन न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए राहत भरी खबर है, बल्कि यह भी दिखाता है कि संकट के दौर में कूटनीति, रणनीति और लॉजिस्टिक्स के दम पर देश अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है। आने वाले दिनों में हॉर्मुज की स्थिति कैसी रहती है, इस पर भारत की ऊर्जा आपूर्ति और बाजार की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।