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गुटखा बैन की हकीकत: कानून के बावजूद नहीं थमा तंबाकू, बढ़ते रहे कैंसर केस

मध्यप्रदेश। मध्य प्रदेश में ‘मसाला गुटखा’ पर 2012 में लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद जमीनी हकीकत चिंताजनक बनी हुई है। सरकार ने उस समय तंबाकू और सुपारी के खतरनाक मिश्रण को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने का दावा किया था, लेकिन 14 साल बाद भी ओरल कैंसर के मामलों में कमी के बजाय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार प्रतिबंध के बाद से ओरल कैंसर के मरीजों में लगभग 42.37 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिबंध का वास्तविक असर इसलिए नहीं दिखा क्योंकि गुटखा कंपनियों ने अपने उत्पाद बेचने का तरीका बदल दिया। प्रतिबंध के बाद कंपनियों ने ‘ट्विन-पाउच’ सिस्टम शुरू किया, जिसमें पान मसाला और तंबाकू को अलग-अलग पैकेट में बेचा जाने लगा। उपभोक्ता दोनों को मिलाकर उपयोग करते हैं, जिससे अंतिम उत्पाद वही खतरनाक मिश्रण बन जाता है जिसे रोकने के लिए बैन लगाया गया था। विशेषज्ञों के अनुसार, यह व्यवस्था कानून की एक तकनीकी खामी का फायदा उठाती है, क्योंकि नियम केवल मिश्रित उत्पाद पर रोक लगाते हैं, जबकि अलग-अलग पैकेट में बिक्री वैध मानी जाती है। परिणामस्वरूप बाजार में तंबाकू की उपलब्धता और उसका सेवन लगभग पहले जैसा ही बना हुआ है। डॉक्टरों का कहना है कि ओरल कैंसर के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति को मुंह खोलने में दिक्कत, लंबे समय तक घाव या सफेद-लाल धब्बे जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। शुरुआती चरण में इलाज से बीमारी को गंभीर रूप लेने से रोका जा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय है कि जब तक तंबाकू उत्पादों पर सख्त और व्यावहारिक नियंत्रण नहीं होगा, तब तक ओरल कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय कमी लाना मुश्किल रहेगा।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आचार्य प्रशांत बोले: जलवायु संकट की जड़ मानव मन की अधूरी समझ

नई दिल्ली, 31 मई। दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने शुक्रवार को यूके के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आयोजित एक विशेष संवाद सत्र में कहा कि मानवता के सामने खड़े सबसे बड़े संकट, विशेषकर जलवायु परिवर्तन, केवल तकनीकी समाधान या नीतिगत हस्तक्षेपों से नहीं सुलझाए जा सकते। उनके अनुसार इन समस्याओं की वास्तविक जड़ मनुष्य के आंतरिक जीवन और उसकी अनियंत्रित इच्छाओं में निहित है। ऐतिहासिक कैम्ब्रिज यूनियन में आयोजित इस फायर-साइड चैट में बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षाविद् और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम में आचार्य प्रशांत ने आधुनिक सभ्यता के विकास, उपभोगवाद, जलवायु संकट और आंतरिक शिक्षा की आवश्यकता पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मानवता ने विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन मनुष्य के भीतर की समझ और आत्मबोध को विकसित करने की दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। उनके अनुसार बाहरी विकास और आंतरिक अपरिपक्वता का यही असंतुलन आज वैश्विक संकटों का कारण बन रहा है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि शिक्षा संस्थान लोगों को कौशल और ज्ञान तो प्रदान करते हैं, लेकिन जीवन के मूलभूत प्रश्नों—जैसे इच्छा, अहंकार, संतोष और आत्मपहचान—पर गंभीर चिंतन को शायद ही कभी स्थान दिया जाता है। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक स्वयं समस्या नहीं हैं, बल्कि समस्या उस मानसिकता में है जो उनका उपयोग करती है। जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि केवल तकनीकी दक्षता बढ़ाने से उपभोग कम नहीं होता। इतिहास में कई बार ऐसा देखा गया है कि नई तकनीकों ने संसाधनों की खपत को और बढ़ाया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उपभोग को संचालित करने वाली मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को नहीं समझा गया, तो कोई भी तकनीकी समाधान स्थायी परिणाम नहीं दे पाएगा। संवाद के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु संकट का समाधान किसी अतिरिक्त प्रयास में नहीं, बल्कि अनावश्यक गतिविधियों और अत्यधिक उपभोग को रोकने में निहित है। उनके अनुसार मानवता को लगातार अधिक करने की बजाय यह समझने की आवश्यकता है कि क्या करना बंद किया जाना चाहिए। पूर्व और पश्चिम के बीच संवाद तथा विभिन्न विचारधाराओं के बीच सेतु निर्माण के प्रश्न पर उन्होंने आंतरिक ईमानदारी को सबसे महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने उपनिषदों में वर्णित ‘विद्या’ और ‘अविद्या’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक सभ्यता ने बाहरी ज्ञान में तो उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन आंतरिक बोध की उपेक्षा की है। अपने व्यक्तिगत जीवन की चर्चा करते हुए आचार्य प्रशांत ने बताया कि तकनीक और प्रबंधन की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने महसूस किया कि समाज की अधिकांश समस्याओं की जड़ मानवीय चेतना और आंतरिकता से जुड़ी हुई है। इसी समझ ने उन्हें अध्यात्म और आत्मबोध के क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा संचालित अध्ययन कार्यक्रमों में छात्र उपनिषदों, भगवद्गीता, बौद्ध दर्शन और अन्य वैश्विक ज्ञान परंपराओं के माध्यम से जीवन और मनुष्य की प्रकृति को समझने का प्रयास करते हैं। कार्यक्रम के अंत में आचार्य प्रशांत ने कहा कि विज्ञान, अर्थशास्त्र, व्यापार और चिकित्सा जैसे सभी क्षेत्र अंततः मानव कल्याण के लिए हैं, लेकिन जब तक निर्णय लेने वाले मनुष्य की चेतना और समझ विकसित नहीं होगी, तब तक व्यवस्थाएँ अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगी। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन केवल कार्बन उत्सर्जन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानव मनोविज्ञान, लालच और अनियंत्रित इच्छाओं से जुड़ा हुआ प्रश्न भी है।

जल संकट के बीच चेतावनी: तालाबों की जमीन पर बढ़ते अतिक्रमण से बिगड़ सकता है हालात

मध्यप्रदेश। इंदौर में बढ़ते जल संकट के बीच तालाबों की स्थिति को लेकर सामने आई नगर निगम की ताजा रिपोर्ट ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। 27 मई 2026 तक की समीक्षा में शहर के 26 प्रमुख तालाबों में से 23 पर अतिक्रमण पाया गया है। इनमें से केवल 8 मामलों में ही अतिक्रमण हटाया जा सका है, जबकि 9 मामलों में कार्रवाई अभी भी जारी है। रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक अतिक्रमण सिरपुर तालाब क्षेत्र में दर्ज किए गए हैं। छोटा सिरपुर तालाब पर पांच और बड़ा सिरपुर तालाब पर तीन अतिक्रमण चिन्हित किए गए हैं। इसके अलावा पीपल्यापाला, बिलावली और अन्य जलाशयों के आसपास भी अवैध कब्जों की स्थिति सामने आई है। नगर निगम के रिकॉर्ड के मुताबिक अधिकांश अतिक्रमण तालाब की भूमि और उसके कैचमेंट क्षेत्र में किए गए हैं, जो बारिश के पानी के संग्रहण और भूजल पुनर्भरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। कई मामलों में प्रशासन द्वारा नोटिस जारी किए गए हैं और सीमांकन की कार्रवाई भी की गई है, लेकिन अभी तक सभी अवैध कब्जे पूरी तरह हटाए नहीं जा सके हैं। शहर में करोड़ों रुपए खर्च कर तालाबों के सौंदर्यीकरण, गहरीकरण और संरक्षण के प्रयास किए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद अतिक्रमण की समस्या लगातार बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तालाबों की जमीन और जलग्रहण क्षेत्र पर कब्जे इसी तरह बढ़ते रहे, तो आने वाले समय में इंदौर में जल संकट और गंभीर रूप ले सकता है। विशेषज्ञ लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि तालाब केवल जल संग्रहण का साधन नहीं हैं, बल्कि भूजल स्तर को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इनका संरक्षण और अतिक्रमण हटाना बेहद जरूरी है, ताकि शहर की जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

ओरल कैंसर का बढ़ता संकट: शुरुआती पहचान से बच सकते हैं 90% मरीज, फिर भी देरी जारी

मध्यप्रदेश। इंदौर में ओरल (मुख) कैंसर को लेकर बेहद चिंताजनक स्थिति सामने आई है। दंत विशेषज्ञों के अनुसार देश में लगभग 60 से 80 प्रतिशत मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब बीमारी तीसरी या चौथी यानी अंतिम स्टेज में पहुंच चुकी होती है। इसका मुख्य कारण तंबाकू, गुटखा, बीड़ी-सिगरेट जैसे नशे की आदतों को सामान्य मान लेना और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो लगभग 90 प्रतिशत मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। लेकिन देरी होने पर इलाज की सफलता दर घटकर केवल 20 से 30 प्रतिशत रह जाती है, जिससे मरीज की जान पर गंभीर खतरा बना रहता है। यह खुलासा ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ के अवसर पर आयोजित एक दंत एवं मुख परीक्षण शिविर में सामने आया, जहां 500 से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की गई। यह शिविर इंडियन डेंटल एसोसिएशन (IDA) मध्यप्रदेश, इंदौर शाखा और शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय के सहयोग से आयोजित किया गया। डॉक्टरों के अनुसार शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय में प्रतिदिन औसतन 3 से 5 ऐसे मरीज सामने आ रहे हैं, जिनमें प्रीकैंसर यानी कैंसर से पहले के लक्षण पाए जाते हैं। समय पर जांच, बायोप्सी और इलाज से इन मामलों को गंभीर अवस्था में जाने से रोका जा सकता है। सरकारी अस्पतालों में ओरल कैंसर का इलाज निशुल्क उपलब्ध है। चिकित्सकों ने सलाह दी है कि जो लोग तंबाकू या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं, उन्हें हर छह महीने में नियमित रूप से मुख परीक्षण जरूर कराना चाहिए। जागरूकता बढ़ाने के लिए रविवार सुबह कृष्णपुरा छत्री से राजबाड़ा तक एक रैली भी निकाली जाएगी, जिसमें डॉक्टर, छात्र और सामाजिक संगठन शामिल होंगे। इसका उद्देश्य लोगों को तंबाकू से होने वाले खतरों और मुख कैंसर के शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूक करना है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मुंह में लंबे समय तक न भरने वाले घाव, सफेद या लाल धब्बे, भोजन निगलने में दिक्कत और आवाज में बदलाव जैसे लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही आगे चलकर गंभीर बीमारी का संकेत हो सकते हैं।

महाकालेश्वर मंदिर में भव्य भस्म आरती: पंचामृत से अभिषेक, रजत आभूषणों से श्रृंगार

मध्यप्रदेश। उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में रविवार तड़के भस्म आरती के दौरान भक्तों ने अलौकिक और दिव्य दर्शन का अनुभव किया। सुबह चार बजे जैसे ही मंदिर के पट खोले गए, पंडे-पुजारियों ने गर्भगृह में विराजित सभी देव प्रतिमाओं का विधिवत पूजन किया। इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया और पंचामृत—दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस—से अभिषेक कर आरती की शुरुआत हुई। भस्म आरती के दौरान प्रथम घंटा बजाकर भगवान को हरि ओम जल अर्पित किया गया। इसके पश्चात कपूर आरती संपन्न हुई और भगवान महाकाल के मस्तक पर भांग, चंदन एवं त्रिपुंड अर्पित कर भव्य श्रृंगार प्रारंभ किया गया। श्रृंगार पूरा होने के बाद ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से आच्छादित कर विधिवत भस्म रमाई गई। इसके बाद भगवान महाकाल का राजसी स्वरूप में अलंकरण किया गया, जिसमें भांग, ड्रायफ्रूट, चंदन, आभूषण और विभिन्न प्रकार के पुष्पों का उपयोग किया गया। विशेष रूप से रजत शेषनाग मुकुट, रजत मुंडमाल, रुद्राक्ष माला और सुगंधित पुष्पों की मालाएं भगवान को अर्पित की गईं। मोगरा और गुलाब के पुष्पों से सुसज्जित स्वरूप ने मंदिर में उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। आरती के दौरान भगवान महाकाल को फल और मिष्ठान का भोग भी लगाया गया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और बाबा महाकाल के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म अर्पण की परंपरा का निर्वहन किया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भस्म अर्पित होने के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि भस्म आरती को महाकाल मंदिर की सबसे विशेष और अलौकिक आरती माना जाता है, जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु शामिल होने पहुंचते हैं।

इंदौर में बड़ी राहत: प्रभावित मकान मालिकों को टीडीआर से मिलेगा आर्थिक लाभ

मध्यप्रदेश। इंदौर नगर निगम शहर के मास्टर प्लान के तहत प्रमुख सड़कों के चौड़ीकरण कार्य को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। यातायात व्यवस्था को सुगम बनाने के उद्देश्य से छावनी रोड और जिंसी रोड के चौड़ीकरण कार्य को प्राथमिकता दी जा रही है। इस दौरान जिन भवनों और मकानों का हिस्सा सड़क चौड़ीकरण की जद में आया है, उनके भू-स्वामियों को टीडीआर (ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स) का लाभ दिया जाएगा। नगर निगम ने स्पष्ट किया है कि प्रभावित भू-खण्ड धारकों को अपने स्वामित्व संबंधी आवश्यक दस्तावेज संबंधित जोनल कार्यालय में जमा कराने होंगे। भवन अधिकारी या भवन निरीक्षक द्वारा दस्तावेजों का सत्यापन पूरा होने के बाद टीडीआर प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा। निगम के अनुसार, प्रभावित संपत्तियों के शेष हिस्से पर भवन स्वीकृति के समय निर्धारित एफएआर (फ्लोर एरिया रेशियो) के अतिरिक्त एफएआर का लाभ टीडीआर प्रमाण पत्र के माध्यम से प्राप्त किया जा सकेगा। इससे मकान मालिकों को अपने बचे हुए भू-भाग पर निर्माण क्षमता में अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। इसके अलावा यदि भू-स्वामी अपने शेष भू-भाग पर अतिरिक्त एफएआर का उपयोग नहीं करना चाहते हैं, तो वे टीडीआर प्रमाण पत्र को नगर निगम सीमा क्षेत्र में कहीं भी कलेक्टर गाइडलाइन दर के अनुसार विक्रय कर सकते हैं। इससे उन्हें आर्थिक लाभ प्राप्त होगा। टीडीआर प्रमाण पत्र के लिए कई प्रकार के दस्तावेज आवश्यक होंगे, जिनमें फॉर्म-1, आधार कार्ड, पैन कार्ड, रजिस्ट्री की प्रति, म्यूटेशन प्रमाण पत्र, प्रॉपर्टी टैक्स रसीद और फॉर्म-3 शामिल हैं। इसके साथ ही फॉर्म-4, खसरा पी-2, भू-उपयोग प्रमाण पत्र, नक्शा, सर्वे प्लान, नोटिस प्रतियां, कलेक्टर गाइडलाइन और शपथ पत्र भी जमा करना अनिवार्य किया गया है। नगर निगम का कहना है कि छावनी रोड और जिंसी रोड पर चल रहे चौड़ीकरण कार्य के दौरान प्रभावित लोगों को नियमानुसार टीडीआर का लाभ देने की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी, ताकि उन्हें समय पर राहत और आर्थिक सुविधा मिल सके।

इंदौर में पानी बचाने की मुहिम तेज: कमिश्नर ने दिए सख्त निर्देश, टोटियां न लगाने पर भी कार्रवाई

मध्यप्रदेश। इंदौर में बढ़ते जल संकट को देखते हुए नगर निगम ने सख्त रुख अपना लिया है। नगर निगम कमिश्नर क्षितिज सिंघल ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि शहर में किसी भी स्थिति में पानी की बर्बादी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब फालतू पानी बहाने वालों को पहले समझाइश दी जाएगी और यदि इसके बाद भी सुधार नहीं होता है तो उन पर चालानी कार्रवाई की जाएगी। कमिश्नर ने सभी जोन के स्वास्थ्य अधिकारियों, प्रभारी मुख्य स्वच्छता निरीक्षकों और सहायक निरीक्षकों को नियमित रूप से अपने क्षेत्रों का निरीक्षण करने के निर्देश दिए हैं। खास तौर पर उन स्थानों पर ध्यान देने को कहा गया है जहां जल संयोजनों में टोटियां नहीं लगी हैं और पानी अनियंत्रित रूप से बहता रहता है। नगर निगम ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में पहले नागरिकों को जागरूक किया जाएगा और उन्हें पानी की बचत के लिए प्रेरित किया जाएगा। लेकिन बार-बार चेतावनी के बावजूद लापरवाही पाए जाने पर संबंधित लोगों पर नियमानुसार जुर्माना लगाया जाएगा। साथ ही रोजाना की गई कार्रवाई की रिपोर्ट अपर आयुक्त को भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार, शहर में निरीक्षण के दौरान यह सामने आया है कि कई इलाकों में नलों में टोटियां नहीं होने के कारण पानी सप्लाई के समय बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद हो रहा है। इससे न केवल जल संकट और गहराता है, बल्कि कई जगह जलभराव और गंदगी की समस्या भी उत्पन्न होती है। नगर निगम ने नागरिकों से अपील की है कि वे पीने के पानी का उपयोग केवल आवश्यक कार्यों के लिए करें। गाड़ियों की धुलाई, आंगन और परिसर की सफाई जैसे कार्यों में पानी की बर्बादी से बचने की सलाह दी गई है। कमिश्नर ने कहा है कि जल संरक्षण आज की सबसे बड़ी जरूरत है और हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह पानी की एक-एक बूंद का महत्व समझे और उसे बचाने में योगदान दे। गौरतलब है कि इंदौर में पिछले कुछ समय से जल संकट को लेकर लोगों में असंतोष देखने को मिला है। कई इलाकों में पानी की किल्लत को लेकर प्रदर्शन और चक्काजाम जैसी स्थितियां भी बन चुकी हैं। ऐसे में नगर निगम अब आपूर्ति प्रबंधन के साथ-साथ जल संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दे रहा है।

मन की बात’ में पीएम मोदी का संदेश, गर्मी से बचाव के लिए अपनाएं सावधानी और पारंपरिक पेयों का लें सहारा

नई दिल्ली । देश के विभिन्न राज्यों में लगातार बढ़ रहे तापमान और लू जैसी परिस्थितियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से विशेष सतर्कता बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा कि गर्मी के इस मौसम में स्वास्थ्य की सुरक्षा को प्राथमिकता देना बेहद आवश्यक है और लोगों को पर्याप्त मात्रा में पानी पीने के साथ-साथ धूप और गर्म हवाओं से बचाव के लिए सभी जरूरी उपाय अपनाने चाहिए। उन्होंने नागरिकों से यह भी आग्रह किया कि गर्मी से बचाव के लिए जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें और अपनी दिनचर्या में सावधानी को शामिल करें। अपने मासिक संवाद कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के अधिकांश हिस्सों में इस समय तेज गर्मी का प्रभाव देखा जा रहा है। ऐसे में शरीर को हाइड्रेट रखना और अनावश्यक रूप से धूप में निकलने से बचना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि किसी कारणवश बाहर जाना आवश्यक हो तो लोगों को पूरी तैयारी और सतर्कता के साथ निकलना चाहिए ताकि गर्मी से होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से बचा जा सके। प्रधानमंत्री ने भारतीय जीवनशैली और पारंपरिक खानपान की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि गर्मी से राहत पाने के कई उपाय हमारी रसोई और लोक परंपराओं में पहले से मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, वैसे-वैसे देश के विभिन्न हिस्सों में खानपान और पेय पदार्थों की प्रकृति भी बदल जाती है। कहीं मिट्टी के मटकों का ठंडा पानी लोगों की प्यास बुझाता है तो कहीं दही और अन्य शीतल खाद्य पदार्थ भोजन का अहम हिस्सा बन जाते हैं। इसी तरह कई क्षेत्रों में कच्चे आम और अन्य पारंपरिक सामग्री से तैयार पेय गर्मी से राहत देने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि भारत के पारंपरिक ग्रीष्मकालीन पेय केवल स्वाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे देश की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। विभिन्न राज्यों में तैयार किए जाने वाले ये पेय स्थानीय परिस्थितियों, मौसम और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि इनका महत्व केवल खाद्य पदार्थ के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी देखा जाता है। प्रधानमंत्री ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में लोकप्रिय पारंपरिक पेयों का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तर भारत में आम पन्ना गर्मी से राहत देने वाला एक लोकप्रिय पेय है। पंजाब और हरियाणा में लस्सी की अपनी अलग पहचान है, जबकि राजस्थान और गुजरात में छाछ को दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। पूर्वी भारत के कई हिस्सों में सत्तू का शरबत गर्मी के मौसम में ऊर्जा और ताजगी प्रदान करने वाला प्रमुख पेय माना जाता है। उन्होंने पश्चिमी और दक्षिणी भारत की परंपराओं का भी उल्लेख किया। कोंकण और गोवा क्षेत्र में कोकम आधारित पेय लोकप्रिय हैं, जबकि दक्षिण भारत में पानकम और सम्बारम जैसे पेयों का विशेष महत्व है। ओडिशा में बेल से तैयार पेय गर्मी के मौसम में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि ये सभी पेय भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और विविधता के प्रतीक हैं। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे गर्मी के मौसम में पारंपरिक और प्राकृतिक पेयों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। उनका कहना था कि ये पेय न केवल शरीर को ठंडक प्रदान करते हैं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी होते हैं। बढ़ते तापमान के बीच सावधानी, संतुलित खानपान और पर्याप्त जल सेवन ही स्वस्थ रहने का सबसे प्रभावी उपाय है।

इंदौर में दर्दनाक हादसे: ट्रैक्टर से गिरकर किसान की मौत, सड़क दुर्घटना में युवक ने गंवाई जान

मध्यप्रदेश। इंदौर में शनिवार को अलग-अलग जगहों पर हुए सड़क हादसों ने दो लोगों की जान ले ली, जबकि एक अन्य दुर्घटना में चार युवक घायल हो गए। इन घटनाओं के बाद क्षेत्र में शोक का माहौल है और पुलिस ने मामलों की जांच शुरू कर दी है। पहला हादसा खुडैल थाना क्षेत्र के गोगाखेड़ी गांव में हुआ, जहां निरंजनपुर निवासी 58 वर्षीय किसान केदार अपने खेत में काम कर रहे थे। जानकारी के अनुसार, वह ट्रैक्टर चला रहे थे तभी अचानक उनका संतुलन बिगड़ गया और वे नीचे गिर पड़े। इसी दौरान ट्रैक्टर का पहिया उनके ऊपर से गुजर गया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। आसपास मौजूद लोग उन्हें तुरंत गोकुलदास अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मृतक के परिवार में एक बेटा है, जो खेती-किसानी का काम करता है। दूसरी घटना भी खुडैल थाना क्षेत्र में ही देवगुराड़िया के पास हुई, जहां 23 वर्षीय युवक प्रीतम सिंह दोपहिया वाहन से जा रहे थे। इसी दौरान किसी अज्ञात वाहन ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी। हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हो गए और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। पुलिस ने अज्ञात वाहन चालक के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। इसी बीच तीसरी घटना विजयनगर थाना क्षेत्र के सयाजी स्क्वेयर पर सामने आई, जहां एक तेज रफ्तार थार जीप अनियंत्रित होकर पलट गई। हादसे में वाहन में सवार चार युवक घायल हो गए। स्थानीय लोगों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर उन्हें बाहर निकाला और अस्पताल भेजा। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि अचानक सामने वाहन आने के कारण थार चालक ने नियंत्रण खो दिया, जिससे यह हादसा हुआ। हालांकि पुलिस का कहना है कि वास्तविक कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। लगातार हो रहे इन हादसों ने सड़क सुरक्षा और तेज रफ्तार वाहनों को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। पुलिस सभी मामलों की जांच में जुटी हुई है।

1 जून से पेट्रोल, डीजल और एटीएफ के निर्यात शुल्क में राहत, घरेलू ईंधन कीमतों पर नहीं पड़ेगा कोई असर

नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू निर्यात शुल्क की दरों में एक बार फिर संशोधन करते हुए 1 जून से नए शुल्क ढांचे को लागू करने का निर्णय लिया है। सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर लगने वाले शुल्क में बदलाव किया गया है, जबकि घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल पर लागू उत्पाद शुल्क की दरों को यथावत रखा गया है। इस फैसले का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप कर ढांचे को संतुलित बनाए रखना और देश में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना माना जा रहा है। नई व्यवस्था के तहत पेट्रोल के निर्यात पर 1.5 रुपये प्रति लीटर, डीजल के निर्यात पर 13.5 रुपये प्रति लीटर और एटीएफ के निर्यात पर 9.5 रुपये प्रति लीटर शुल्क निर्धारित किया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन दरों का निर्धारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल तथा पेट्रोलियम उत्पादों की औसत कीमतों को ध्यान में रखकर किया गया है। समय-समय पर की जाने वाली समीक्षा के आधार पर इन शुल्कों में आवश्यक बदलाव किए जाते हैं ताकि वैश्विक मूल्य परिवर्तनों का संतुलित प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़े। पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्यात शुल्क की व्यवस्था मार्च 2026 में लागू की गई थी। उस समय पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता के कारण सरकार ने देश के भीतर ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद घरेलू आपूर्ति प्रभावित न हो और आवश्यक ऊर्जा संसाधनों का संतुलित प्रबंधन किया जा सके। पिछले कुछ महीनों के दौरान सरकार ने बाजार परिस्थितियों के अनुसार कई बार शुल्क दरों में संशोधन किया है। मई के मध्य में हुए बदलाव के दौरान पेट्रोल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाया गया था, जबकि डीजल पर शुल्क में कटौती की गई थी। अब नई समीक्षा के बाद पेट्रोल और डीजल दोनों पर शुल्क को और कम किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की स्थिति और आपूर्ति संबंधी चिंताओं में कुछ हद तक सुधार देखा गया है। डीजल पर लागू निर्यात शुल्क में पिछले दो महीनों के दौरान कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। मार्च के अंत में निर्धारित दर को अप्रैल में काफी बढ़ाया गया था, लेकिन बाद में बाजार की परिस्थितियों में बदलाव आने पर इसे चरणबद्ध तरीके से कम किया गया। इसी तरह एटीएफ पर लागू शुल्क भी पहले बढ़ाया गया था, जिसके बाद लगातार समीक्षा के दौरान उसमें कटौती की गई है। नवीनतम संशोधन के बाद एटीएफ पर शुल्क पहले की तुलना में काफी कम स्तर पर पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात शुल्क में यह संशोधन वैश्विक ऊर्जा बाजार की मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए किया गया है। हालांकि घरेलू उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि पेट्रोल और डीजल पर लागू कर संरचना में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे आम उपभोक्ताओं के लिए ईंधन की खुदरा कीमतों पर तत्काल कोई प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। सरकार की यह नीति ऊर्जा सुरक्षा, घरेलू आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार की चुनौतियों के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। आने वाले समय में वैश्विक तेल कीमतों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर शुल्क संरचना की आगे भी समीक्षा की जा सकती है।