रिकॉर्ड IPO, लेकिन नया निवेश कम: भारतीय बाजार से विदेशी कंपनियों की बड़ी पूंजी निकासी ने बढ़ाई चिंता
नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी आईपीओ की गतिविधियां पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई हैं। लगातार बढ़ती लिस्टिंग, निवेशकों की मजबूत भागीदारी और ऊंचे वैल्यूएशन ने भारत को दुनिया के सबसे आकर्षक पूंजी बाजारों में शामिल कर दिया है। हालांकि इस तेजी के बीच एक ऐसा रुझान उभर रहा है, जिसने बाजार विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। कई विदेशी कंपनियां अपनी भारतीय इकाइयों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कर रही हैं, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य नया निवेश जुटाना नहीं बल्कि अपनी मौजूदा हिस्सेदारी बेचकर पूंजी निकालना दिखाई दे रहा है। हाल के वर्षों में बाजार में आई कई बड़ी लिस्टिंग में देखा गया है कि कंपनियों ने नए शेयर जारी करने के बजाय ऑफर फॉर सेल मॉडल को प्राथमिकता दी। इस व्यवस्था में कंपनी के कारोबार के लिए नई पूंजी नहीं आती, बल्कि मौजूदा निवेशक अपने शेयर बेचकर धन प्राप्त करते हैं। परिणामस्वरूप बाजार से जुटाई गई बड़ी राशि सीधे पुराने निवेशकों या मूल कंपनियों के पास पहुंच जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय बाजार में मिल रहा प्रीमियम वैल्यूएशन इस प्रवृत्ति की सबसे बड़ी वजह है। वैश्विक स्तर पर कई कंपनियों को अपने घरेलू बाजारों की तुलना में भारत में कहीं अधिक मूल्यांकन मिल रहा है। ऐसे में विदेशी कंपनियों के लिए अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचकर आकर्षक लाभ अर्जित करना स्वाभाविक रणनीति बन गया है। इससे उन्हें नकदी प्राप्त होती है और निवेश पर बेहतर रिटर्न भी हासिल होता है। यह स्थिति तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब बड़ी संख्या में आईपीओ का उद्देश्य विस्तार, उत्पादन क्षमता बढ़ाने या रोजगार सृजन के लिए पूंजी जुटाना न होकर केवल हिस्सेदारी का हस्तांतरण बन जाए। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अधिकांश लिस्टिंग इसी दिशा में आगे बढ़ती हैं, तो आईपीओ बाजार की मूल अवधारणा पर सवाल उठ सकते हैं। आम तौर पर आईपीओ को कंपनियों के विकास, नए निवेश और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार का माध्यम माना जाता है। दूसरी ओर, इस प्रवृत्ति का असर विदेशी मुद्रा प्रवाह और रुपये की स्थिति पर भी पड़ सकता है। जब बड़ी मात्रा में धन विदेशी मूल कंपनियों के पास वापस जाता है, तो पूंजी निकासी का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। हालांकि इसका प्रभाव तत्काल दिखाई नहीं देता, लेकिन दीर्घकाल में यह मुद्रा बाजार और निवेश प्रवाह के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि केवल ऑफर फॉर सेल आधारित आईपीओ को नकारात्मक नहीं माना जा सकता। कई बार शुरुआती निवेशकों या प्रमोटरों के लिए आंशिक एग्जिट स्वाभाविक व्यावसायिक प्रक्रिया होती है। लेकिन जब अधिकांश बड़ी लिस्टिंग में नए निवेश की हिस्सेदारी सीमित हो और पूंजी निकासी प्रमुख उद्देश्य बन जाए, तब संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता महसूस होती है। भारत का पूंजी बाजार वर्तमान में मजबूत निवेशक आधार, बेहतर आर्थिक वृद्धि और उच्च वैल्यूएशन के कारण वैश्विक कंपनियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यही वजह है कि आने वाले समय में भी कई बड़ी विदेशी कंपनियों की भारतीय इकाइयों के आईपीओ बाजार में आने की संभावना है। इससे निवेशकों के लिए नए अवसर तो पैदा होंगे, लेकिन साथ ही यह बहस भी तेज होगी कि क्या आईपीओ बाजार आर्थिक विकास को गति देने का माध्यम बना हुआ है या फिर बड़े निवेशकों के लिए लाभ निकालने का मंच बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में नियामकों, निवेशकों और कंपनियों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता होगी ताकि आईपीओ बाजार का मूल उद्देश्य बरकरार रहे और पूंजी बाजार विकास, निवेश तथा रोजगार सृजन की दिशा में अपनी प्रभावी भूमिका निभाता रहे।
सेबी की सख्त कार्रवाई से घिरी Rajesh Exports, 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित राजस्व घोटाले ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

नई दिल्ली । देश की प्रमुख स्वर्ण आभूषण निर्यातक कंपनियों में शामिल Rajesh Exports एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) की ओर से कंपनी और उसके प्रमोटर समूह के खिलाफ कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच और अंतरिम कार्रवाई के बाद निवेशकों के बीच चिंता का माहौल बन गया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल शेयर मूल्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कंपनी की साख और कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। मामला कथित तौर पर राजस्व को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने और धन के संभावित दुरुपयोग से जुड़ा बताया जा रहा है। सेबी की कार्रवाई के बाद बाजार में कंपनी को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। इसका सीधा असर शेयर बाजार में भी देखने को मिला, जहां कंपनी के शेयर में पांच प्रतिशत का लोअर सर्किट लग गया और यह 104.65 रुपये के स्तर तक पहुंच गया। पिछले कुछ महीनों से शेयर में लगातार गिरावट का रुख बना हुआ है, जिससे निवेशकों की चिंता और गहरी हो गई है। इस घटनाक्रम का सबसे अधिक ध्यान बड़े संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी पर गया है। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, Life Insurance Corporation of India यानी एलआईसी के पास कंपनी में 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसके अलावा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की हिस्सेदारी 14.19 प्रतिशत और खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 14.55 प्रतिशत है। प्रमोटर समूह अभी भी कंपनी में 54.55 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा शेयरधारक बना हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि एलआईसी जैसे बड़े संस्थागत निवेशक के लिए यह निवेश उसके कुल पोर्टफोलियो का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है, इसलिए इस मामले का एलआईसी की वित्तीय स्थिति या उसके शेयर पर कोई बड़ा दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की संभावना कम है। हालांकि, Rajesh Exports के निवेशकों के लिए स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि नियामकीय जांच का असर अक्सर निवेशक विश्वास पर पड़ता है। इक्विटी बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि सेबी की कार्रवाई अपने आप में गंभीर संकेत है। उनके अनुसार, जब किसी सूचीबद्ध कंपनी के खिलाफ वित्तीय पारदर्शिता और फंड उपयोग को लेकर सवाल उठते हैं तो निवेशकों का भरोसा प्रभावित होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि बाजार में फिलहाल सतर्कता का माहौल दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर, कंपनी ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सेबी का आदेश केवल अंतरिम प्रकृति का है और अभी तक कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। कंपनी का दावा है कि उसके द्वारा घोषित राजस्व आंकड़े पूरी तरह सही हैं और राजस्व बढ़ाकर दिखाने जैसी कोई स्थिति नहीं है। प्रबंधन का कहना है कि मामले में किसी प्रकार की संचार संबंधी गलतफहमी हो सकती है और जल्द ही विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि Rajesh Exports का शेयर शेयर बाजार के ‘Z’ ग्रुप में सूचीबद्ध है, जहां केवल ट्रेड-फॉर-ट्रेड आधार पर कारोबार की अनुमति होती है। इस श्रेणी में शामिल कंपनियों पर पहले से ही निवेशकों की विशेष नजर रहती है। कंपनी का शेयर दिसंबर 2025 में 239 रुपये के अपने 52 सप्ताह के उच्च स्तर से करीब 56 प्रतिशत तक टूट चुका है। ऐसे में सेबी की जांच ने निवेशकों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। आने वाले दिनों में सेबी की जांच रिपोर्ट और कंपनी के आधिकारिक स्पष्टीकरण पर बाजार की नजर बनी रहेगी, क्योंकि यही तय करेगा कि निवेशकों का भरोसा दोबारा बहाल हो पाता है या नहीं।
सीएमएचओ मुंगेली ने जारी किया भर्ती नोटिफिकेशन, 20 जून तक करें आवेदन, 8वीं पास से स्नातकोत्तर तक के लिए अवसर

नई दिल्ली :स्वास्थ्य क्षेत्र में रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं और अनुभवी अभ्यर्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर सामने आया है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य कार्यालय (सीएमएचओ), मुंगेली द्वारा विभिन्न संविदा पदों पर भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की गई है। इस भर्ती अभियान के तहत कुल 106 रिक्त पदों पर योग्य उम्मीदवारों की नियुक्ति की जाएगी। आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इच्छुक अभ्यर्थी निर्धारित तिथि तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। जारी भर्ती अधिसूचना के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासनिक कार्यों से जुड़े कई पदों को शामिल किया गया है। इनमें प्रयोगशाला तकनीशियन, फिजियोथेरेपिस्ट, फार्मासिस्ट, पोषण परामर्शदाता, स्टाफ नर्स, नर्सिंग अधिकारी, ऑडियोलॉजिस्ट, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी, रेडियोग्राफर, परामर्शदाता, परिचारक, जूनियर सेक्रेटेरियल असिस्टेंट, ब्लॉक डेटा मैनेजर और अन्य पद शामिल हैं। भर्ती प्रक्रिया का उद्देश्य जिले में स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक सुदृढ़ बनाना तथा विभिन्न संस्थानों में आवश्यक मानव संसाधन उपलब्ध कराना है। ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 2 जून से प्रारंभ हो चुकी है। अभ्यर्थियों को निर्धारित पोर्टल के माध्यम से आवेदन करना होगा। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 20 जून तय की गई है। उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि वे अंतिम समय की तकनीकी समस्याओं से बचने के लिए समय रहते आवेदन प्रक्रिया पूरी कर लें। शैक्षणिक योग्यता पदानुसार अलग-अलग निर्धारित की गई है। कुछ पदों के लिए 8वीं, 10वीं और 12वीं उत्तीर्ण अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं, जबकि अन्य पदों के लिए डिप्लोमा, स्नातक, स्नातकोत्तर तथा विशेष तकनीकी और व्यावसायिक योग्यता अनिवार्य रखी गई है। नर्सिंग, ऑडियोलॉजी, स्वास्थ्य शिक्षा, सामाजिक कार्य, गृह विज्ञान और चिकित्सा क्षेत्र से संबंधित योग्यताधारी अभ्यर्थियों के लिए भी विभिन्न अवसर उपलब्ध हैं। आयु सीमा की बात करें तो आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है। अधिकतम आयु सीमा संबंधित पदों के अनुसार तय की गई है और कुछ श्रेणियों के लिए यह 70 वर्ष तक रखी गई है। आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों को शासन के नियमों के अनुसार आयु सीमा में छूट का लाभ भी मिलेगा। भर्ती प्रक्रिया में अभ्यर्थियों का चयन शैक्षणिक योग्यता, कार्य अनुभव, कौशल परीक्षण, लिखित परीक्षा, दस्तावेज सत्यापन और साक्षात्कार जैसे विभिन्न चरणों के आधार पर किया जाएगा। अंतिम चयन मेरिट और निर्धारित मानकों के अनुसार किया जाएगा। चयनित उम्मीदवारों को पद के अनुसार मासिक मानदेय प्रदान किया जाएगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वेतनमान 8,800 रुपये से लेकर 25,000 रुपये प्रतिमाह तक निर्धारित किया गया है। इससे स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य करने के इच्छुक उम्मीदवारों को रोजगार का अच्छा अवसर मिल सकता है। आवेदन शुल्क भी वर्गवार निर्धारित किया गया है। सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को 300 रुपये, अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को 200 रुपये तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांग और महिला उम्मीदवारों को 100 रुपये शुल्क का भुगतान ऑनलाइन माध्यम से करना होगा। स्वास्थ्य विभाग में निकली यह भर्ती विभिन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के लिए रोजगार के नए अवसर लेकर आई है। इच्छुक अभ्यर्थियों को आवेदन करने से पहले पात्रता, आवश्यक दस्तावेज और भर्ती संबंधी सभी दिशा-निर्देशों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने की सलाह दी गई है।
दिल्ली दंगों के सबसे चर्चित मामलों में शामिल अंकित शर्मा हत्याकांड, अदालत ने फैसला 11 जून तक टाला

नई दिल्ली । वर्ष 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या से जुड़े बहुचर्चित मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने अपना फैसला फिलहाल सुरक्षित रखते हुए सुनवाई की अगली तारीख 11 जून निर्धारित की है। अदालत को गुरुवार को इस मामले में निर्णय सुनाना था, लेकिन अब फैसला अगले सप्ताह सुनाया जाएगा। इस घटनाक्रम के बाद सभी पक्षों की निगाहें आगामी सुनवाई पर टिक गई हैं। अंकित शर्मा हत्याकांड दिल्ली दंगों से जुड़े सबसे चर्चित और संवेदनशील मामलों में शामिल रहा है। यह मामला न केवल अपनी गंभीरता बल्कि इससे जुड़े आरोपों और लंबे न्यायिक प्रक्रिया के कारण भी लगातार चर्चा में बना रहा। मामले में पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत कुल 11 आरोपी न्यायालय के समक्ष पेश हैं, जिन पर हत्या, दंगा, आपराधिक साजिश और अन्य गंभीर आरोप लगाए गए हैं। घटना फरवरी 2020 की है, जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा भड़क उठी थी। इसी दौरान 26 फरवरी को अंकित शर्मा का शव खजूरी खास क्षेत्र के एक नाले से बरामद किया गया था। उनकी मौत ने पूरे देश का ध्यान इस मामले की ओर खींचा था। इसके बाद पुलिस ने हत्या और दंगों से संबंधित विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। अभियोजन पक्ष का दावा है कि आरोपी एक संगठित भीड़ और कथित साजिश का हिस्सा थे, जिसने दंगों के दौरान हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया। जांच एजेंसियों ने अदालत के समक्ष विभिन्न दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों के बयान और अन्य सामग्री प्रस्तुत की है। वहीं बचाव पक्ष ने आरोपों का विरोध करते हुए अपने तर्क अदालत के समक्ष रखे हैं। मार्च 2023 में अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान सभी आरोपियों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए थे। इनमें हत्या, दंगा, घातक हथियारों के साथ दंगा करने, समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। इसके बाद लंबे समय तक चली सुनवाई में दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क विस्तार से प्रस्तुत किए। मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान यह केस कई बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। अदालतों में हुई सुनवाई, जमानत याचिकाओं और कानूनी बहसों ने इसे लगातार सुर्खियों में बनाए रखा। इसी वजह से फैसले का इंतजार केवल संबंधित पक्षों को ही नहीं बल्कि कानूनी और राजनीतिक हलकों को भी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में आने वाला फैसला दिल्ली दंगों से जुड़े अन्य मामलों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जाएगा। अदालत का निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहियों और कानूनी तथ्यों के आधार पर होगा, जिसका सभी पक्षों को इंतजार है। फिलहाल अदालत द्वारा फैसला टाले जाने के बाद एक सप्ताह और प्रतीक्षा बढ़ गई है। अब 11 जून को कड़कड़डूमा कोर्ट इस बहुचर्चित मामले में अपना अंतिम निर्णय सुनाएगी। ऐसे में आगामी तारीख को लेकर सुरक्षा एजेंसियों, कानूनी विशेषज्ञों और आम लोगों की नजरें अदालत की कार्यवाही पर बनी हुई हैं।
बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर सत्ता संघर्ष तेज, रितब्रता गुट ने 60 विधायकों के समर्थन का दावा कर बढ़ाया दबाव

नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरे नए शक्ति संघर्ष ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है। विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद पार्टी जिस आत्ममंथन के दौर से गुजर रही थी, उसी बीच अब संगठन के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पहली बार विधायक बने Ritabrata Banerjee के नेतृत्व में एक बागी समूह ने पार्टी के भीतर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए 60 विधायकों के समर्थन का दावा किया है। घटनाक्रम ने उस समय और अधिक गंभीर रूप ले लिया जब विधानसभा अध्यक्ष द्वारा रितब्रता बनर्जी को नेता विपक्ष के रूप में मान्यता दिए जाने की खबर सामने आई। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान सार्वजनिक बहस का विषय बन गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद संगठन के भीतर नेतृत्व, रणनीति और भविष्य की दिशा को लेकर जो सवाल उठ रहे थे, अब वे खुलकर सामने आने लगे हैं। विवाद की शुरुआत उस आरोप से जुड़ी बताई जा रही है जिसमें दावा किया गया कि विपक्ष के नेता के चयन संबंधी एक पत्र में कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर गंभीर अनियमितताएं हुईं। इस मामले में शिकायत दर्ज होने के बाद पार्टी नेतृत्व और कुछ विधायकों के बीच तनाव बढ़ गया। इसके तुरंत बाद संबंधित नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई, जिससे असंतोष और गहरा गया। राजनीतिक हलकों में सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर है कि आखिर एक नए विधायक ने इतनी कम अवधि में बड़ी संख्या में विधायकों को अपने साथ कैसे जोड़ लिया। जानकारों का मानना है कि चुनावी पराजय के बाद संगठन के भीतर कई स्तरों पर असंतोष मौजूद था, जिसे रितब्रता गुट ने राजनीतिक रूप से संगठित करने में सफलता हासिल की। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व द्वारा बुलाई गई बैठकों में बड़ी संख्या में विधायकों की अनुपस्थिति को भी इसी असंतोष का संकेत माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, हाल ही में पार्टी प्रमुख Mamata Banerjee के आवास पर आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में बड़ी संख्या में विधायक शामिल नहीं हुए थे। इसके अलावा चुनावी हार के बाद आयोजित कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी अपेक्षित उपस्थिति नहीं देखी गई। इन घटनाओं ने पार्टी नेतृत्व की पकड़ और संगठनात्मक एकजुटता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि बागी समूह का कहना है कि उसका उद्देश्य पार्टी को तोड़ना नहीं है। समूह से जुड़े नेताओं का दावा है कि वे अब भी तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक मंच और विचारधारा के साथ जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि वे नेतृत्व परिवर्तन की मांग नहीं कर रहे, बल्कि संगठन के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया और विधायकों की राय को महत्व दिए जाने की बात उठा रहे हैं। इसके बावजूद राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि यदि यह असंतोष लंबे समय तक बना रहता है तो पार्टी के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं। विधानसभा के भीतर शक्ति संतुलन, संगठनात्मक नियंत्रण और भविष्य की रणनीति जैसे मुद्दों पर नेतृत्व को जल्द निर्णय लेने पड़ सकते हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह विवाद केवल आंतरिक मतभेदों तक सीमित रहता है या फिर बंगाल की राजनीति में किसी बड़े पुनर्संरेखण का कारण बनता है। फिलहाल तृणमूल कांग्रेस एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां संगठनात्मक एकता बनाए रखना और असंतुष्ट नेताओं को साथ लेकर चलना उसके लिए सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन गया है।
नया राजनीतिक मील का पत्थर: 10 जून को नेहरू का रिकॉर्ड पीछे छोड़ भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बनेंगे मोदी

नई दिल्ली । भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 10 जून 2026 एक महत्वपूर्ण तारीख के रूप में दर्ज होने जा रही है। इस दिन प्रधानमंत्री Narendra Modi देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने का नया रिकॉर्ड अपने नाम कर लेंगे। लगातार तीसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री पद संभाल रहे मोदी इस उपलब्धि के साथ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru के लंबे समय से कायम रिकॉर्ड को पीछे छोड़ देंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार 26 मई 2014 को देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में लगातार जीत हासिल कर उन्होंने लगातार तीसरी बार सरकार बनाई। 10 जून 2026 को वह प्रधानमंत्री पद पर लगातार 4,399 दिन पूरे कर लेंगे, जो किसी भी निर्वाचित भारतीय प्रधानमंत्री का सबसे लंबा निरंतर कार्यकाल होगा। अब तक यह रिकॉर्ड जवाहरलाल नेहरू के नाम दर्ज था। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू ने लगभग 16 वर्षों तक लगातार देश का नेतृत्व किया था। उन्होंने 1952, 1957 और 1962 के आम चुनावों में जीत के बाद लगातार प्रधानमंत्री पद संभाला और अपने निधन तक इस जिम्मेदारी का निर्वहन किया। उनका निर्वाचित कार्यकाल 4,398 दिनों का माना जाता है, जिसे अब मोदी पीछे छोड़ने जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह उपलब्धि केवल कार्यकाल की अवधि तक सीमित नहीं है, बल्कि लगातार तीन आम चुनावों में जनता से मिले जनादेश को भी दर्शाती है। प्रधानमंत्री मोदी पहले ही अपनी पार्टी को लगातार तीन लोकसभा चुनावों में जीत दिलाने के मामले में नेहरू की बराबरी कर चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र में यह उपलब्धि बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि लंबे समय तक जनता का भरोसा बनाए रखना किसी भी राजनीतिक नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती होती है। इससे पहले जुलाई 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री Indira Gandhi के सबसे लंबे निरंतर कार्यकाल का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिया था। इंदिरा गांधी ने 1966 से 1977 तक लगातार प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया था। उनका यह रिकॉर्ड लंबे समय तक भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मानक माना जाता रहा। मोदी की राजनीतिक यात्रा भी भारतीय राजनीति में एक अलग पहचान रखती है। वह स्वतंत्रता के बाद जन्म लेने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं। इसके अलावा वह देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी बन चुके हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में लंबे कार्यकाल के बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा और 2014 में केंद्र की सत्ता संभाली। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिकॉर्ड भारत की बदलती राजनीतिक संरचना और मतदाताओं की प्राथमिकताओं को भी दर्शाता है। पिछले एक दशक में केंद्र सरकार की नीतियों, विकास योजनाओं, बुनियादी ढांचे के विस्तार, डिजिटल परिवर्तन और वैश्विक मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका ने प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक पहचान को मजबूत किया है। वहीं विपक्ष लगातार सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता रहा है, जिससे लोकतांत्रिक बहस भी मजबूत हुई है। भारतीय राजनीति के इतिहास में लंबे कार्यकाल वाले नेताओं की सूची में नेहरू, इंदिरा गांधी और मोदी जैसे नाम प्रमुख रहे हैं। अब 10 जून को मोदी के नाम एक और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज होने जा रही है, जो आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र और राजनीतिक इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों में शामिल रहेगी।
भारतीय खेलों को नई दिशा देने की तैयारी, कोचों के लिए राष्ट्रीय मान्यता प्रणाली विकसित करेगा खेल मंत्रालय, NCAB गठन की प्रक्रिया शुरू

नई दिल्ली । भारतीय खेलों की कोचिंग व्यवस्था में व्यापक सुधार लाने की दिशा में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। खेल मंत्री मनसुख मंडाविया ने संकेत दिए हैं कि देशभर में कोचिंग की गुणवत्ता को एक समान और अधिक प्रभावी बनाने के लिए नेशनल कोच एक्रेडिटेशन बोर्ड (NCAB) की स्थापना की तैयारी की जा रही है। यह पहल पुलेला गोपीचंद की अध्यक्षता वाली टास्क फोर्स की सिफारिशों पर आधारित है, जिसने भारतीय खेल तंत्र में कोचिंग सुधारों के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। खेल मंत्रालय द्वारा गठित नौ सदस्यीय टास्क फोर्स ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट इसी वर्ष जनवरी में सौंपी थी। रिपोर्ट में कोचों के प्रशिक्षण, मूल्यांकन, प्रमाणन और प्रशासनिक निगरानी के लिए एक केंद्रीय संस्था की आवश्यकता पर बल दिया गया था। इसी के आधार पर अब मंत्रालय राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है जो कोचिंग मानकों को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बना सके। मंडाविया ने कहा कि भविष्य में कोचिंग को खेल विज्ञान के साथ और अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ा जाएगा। उनका मानना है कि आधुनिक खेलों में विज्ञान आधारित प्रशिक्षण की भूमिका लगातार बढ़ रही है, लेकिन कई मामलों में नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों का पूरा लाभ खिलाड़ियों तक नहीं पहुंच पा रहा है। ऐसे में कोचों को भी आधुनिक प्रशिक्षण पद्धतियों के अनुरूप तैयार करना आवश्यक हो गया है। टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि प्रस्तावित NCAB केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं होगा, बल्कि भारतीय कोचिंग तंत्र के लिए केंद्रीय समन्वयक की भूमिका निभाएगा। यह संस्था प्रशिक्षण मानकों का निर्धारण करेगी, जवाबदेही सुनिश्चित करेगी और खेल मंत्रालय, राष्ट्रीय खेल महासंघों, शिक्षण संस्थानों तथा ओलंपिक आंदोलन से जुड़े संगठनों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करेगी। वर्तमान समय में ओलंपिक खेलों के लिए अधिकांश कोचिंग प्रशिक्षण पटियाला स्थित नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल संस्थान के माध्यम से संचालित होता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि देशभर में कोचिंग की गुणवत्ता और प्रशिक्षण प्रक्रियाओं में एकरूपता की कमी है। इसी चुनौती को दूर करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नई संरचना तैयार की जा रही है। मंत्रालय ने बताया कि NCAB के कार्यान्वयन के लिए प्रशासनिक ढांचा तैयार किया जा रहा है। इसके साथ ही राष्ट्रीय कोच रजिस्ट्री, ऑनलाइन एक्रेडिटेशन पोर्टल और समर्पित हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाओं पर भी काम शुरू हो चुका है। इन पहलों का उद्देश्य कोचों की पेशेवर पहचान को मजबूत करना और उनके विकास के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है। खेल मंत्रालय ने कोचिंग संसाधनों के विस्तार पर भी विशेष जोर दिया है। मंत्री ने बताया कि भारतीय खेल प्राधिकरण में रिक्त पड़े 700 से अधिक कोचिंग पदों को वर्ष के अंत तक भरने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लिए भर्ती प्रक्रिया को तेज किया गया है और अनुभवी ओलंपियन खिलाड़ियों को भी कोचिंग प्रणाली से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। अब तक लगभग 250 रिक्त पदों पर नियुक्तियां की जा चुकी हैं। इसी क्रम में पूर्वोत्तर भारत में खेल अवसंरचना को मजबूत करने के लिए शिलांग में 150 करोड़ रुपये की लागत से हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग सेंटर विकसित किया जा रहा है। यह केंद्र अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार होगा और विभिन्न खेलों के खिलाड़ियों को उच्च स्तरीय प्रशिक्षण सुविधाएं प्रदान करेगा। सरकार का मानना है कि इन पहलों से भारत की खेल प्रतिभाओं को बेहतर प्रशिक्षण वातावरण मिलेगा और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रदर्शन और मजबूत होगा।
फिल्म ‘मां बहन’ की रिलीज के बीच तृप्ति डिमरी का खुलासा, बोलीं- बचपन में खूब डांट और मार पड़ी है

नई दिल्ली । अपनी नई फिल्म मां बहन की रिलीज को लेकर उत्साहित अभिनेत्री तृप्ति डिमरी इन दिनों लगातार चर्चा में हैं। फिल्म के प्रमोशन के दौरान उन्होंने अपने बचपन से जुड़ी कई दिलचस्प यादें साझा कीं, जिन्होंने बातचीत को हल्के-फुल्के और भावनात्मक रंग से भर दिया। अपने पुराने दिनों को याद करते हुए अभिनेत्री ने बताया कि बचपन में उन्हें अक्सर डांट और सजा का सामना करना पड़ता था, लेकिन आज वे उन अनुभवों को मुस्कुराते हुए याद करती हैं। एक बातचीत में तृप्ति ने कहा कि लगभग हर बच्चे की तरह उन्हें भी अपने माता-पिता से कभी न कभी डांट या मार पड़ी होगी। उन्होंने हंसते हुए बताया कि उनके बचपन में यह इतना सामान्य था कि कभी-कभी बिना किसी बड़ी वजह के भी उन्हें डांट पड़ जाती थी। मजाकिया अंदाज में उन्होंने कहा कि जिस दिन उन्हें मार नहीं पड़ती थी, उस दिन भी किसी न किसी कारण से डांट सुनने को मिल जाती थी। उनकी यह बात सुनकर मौजूद लोग भी मुस्कुरा उठे। अभिनेत्री ने कहा कि बचपन की ये घटनाएं उस समय भले ही कठिन लगती थीं, लेकिन समय बीतने के साथ वे जीवन की प्यारी यादों का हिस्सा बन जाती हैं। उनका मानना है कि परिवार और परवरिश से जुड़े ऐसे अनुभव व्यक्ति के व्यक्तित्व को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि आज वे उन दिनों को किसी शिकायत के बजाय स्नेह और अपनत्व के साथ याद करती हैं। अपनी फिल्म के बारे में बात करते हुए तृप्ति ने बताया कि कहानी में मौजूद तीनों प्रमुख किरदार अलग-अलग परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करते हैं। उनके अनुसार, फिल्म का परिवार पूरी तरह व्यवस्थित नहीं है, बल्कि उसमें कई तरह की उलझनें और विसंगतियां हैं। हालांकि यही अव्यवस्था कहानी को रोचक बनाती है और दर्शकों को किरदारों से जोड़ती है। उन्होंने कहा कि फिल्म में ऐसे कई मौके आते हैं जब मुख्य पात्रों को अचानक पैदा हुई मुश्किल परिस्थितियों से निपटने के लिए नए रास्ते खोजने पड़ते हैं। यही संघर्ष और हास्य का मिश्रण फिल्म को मनोरंजक बनाता है। कहानी केवल कॉमेडी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रिश्तों, पारिवारिक बंधनों और कठिन समय में एक-दूसरे का साथ देने की भावना को भी प्रमुखता से दिखाया गया है। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी के निर्देशन में बनी यह फिल्म अब दर्शकों के लिए उपलब्ध है। फिल्म में तृप्ति के साथ माधुरी दीक्षित नेने, रवि किशन, धारणा दुर्गा, गीतांजलि कुलकर्णी, अरुणोदय सिंह और शार्दुल भारद्वाज जैसे कलाकार भी अहम भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। फिल्म की कहानी एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है जिसकी जिंदगी तब अचानक बदल जाती है जब घर की रसोई में एक लाश मिलती है। इसके बाद घटनाओं का सिलसिला शुरू होता है और परिवार के सदस्यों को कई अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कॉमेडी, रहस्य और पारिवारिक भावनाओं के संतुलन के साथ फिल्म दर्शकों को एक अलग अनुभव देने का प्रयास करती है।
दिलीप कुमार के सामने बोला पहला डायलॉग और खुल गए किस्मत के दरवाजे, अरुणा ईरानी ने साझा की यादगार कहानी

नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा में पांच दशक से अधिक समय तक अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रभाव छोड़ने वाली वरिष्ठ अभिनेत्री अरुणा ईरानी ने अपने करियर की शुरुआत से जुड़ा एक दिलचस्प और प्रेरणादायक किस्सा साझा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे बचपन में एक साधारण ऑडिशन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्हें फिल्मी दुनिया तक पहुंचाने का रास्ता तैयार किया। अरुणा ईरानी ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि उस समय वह काफी छोटी थीं और अपने परिवार के साथ एक रिहायशी इमारत में रहती थीं। एक दिन वहां एक कास्टिंग टीम बच्चों की तलाश में पहुंची। टीम ने इमारत में रहने वाले बच्चों को अभिनय के लिए ऑडिशन देने का निमंत्रण दिया। बच्चों को आकर्षित करने के लिए वहां वेफर्स और कोल्ड ड्रिंक की भी व्यवस्था की गई थी, जिससे माहौल उत्साहपूर्ण बन गया था। उन्होंने बताया कि यह सुनकर वह भी अपने दोस्तों के साथ ऑडिशन स्थल पर पहुंच गईं। उस समय उन्हें अभिनय की दुनिया के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी और वह अन्य बच्चों की तरह वहां मौजूद माहौल का आनंद ले रही थीं। ऑडिशन के दौरान वह एक कोने में खड़ी होकर आराम से वेफर्स खा रही थीं और कोल्ड ड्रिंक पी रही थीं। तभी वहां मौजूद लोगों में से किसी की नजर उन पर पड़ी और उन्हें सामने बुलाया गया। अरुणा ने बताया कि जब वह आगे बढ़ीं तो उन्हें पता चला कि सामने हिंदी सिनेमा के महान अभिनेता दिलीप कुमार बैठे हुए हैं। यह उनके लिए बेहद अप्रत्याशित और यादगार क्षण था। उन्होंने कहा कि दिलीप कुमार ने उनसे पूछा कि क्या वह संवाद बोल सकती हैं। इसके बाद उन्हें एक छोटा-सा संवाद दिया गया और उसे डर के भाव के साथ बोलने के लिए कहा गया। अभिनेत्री के अनुसार उन्होंने बिना घबराए पूरे आत्मविश्वास के साथ संवाद प्रस्तुत किया। उनके प्रदर्शन से वहां मौजूद लोग प्रभावित हुए और उन्हें ऑडिशन के लिए चुन लिया गया। यही वह पल था जिसने उनके अभिनय करियर की नींव रखी और फिल्मी दुनिया में प्रवेश का रास्ता खोल दिया। अरुणा ईरानी ने कहा कि उस दिन का अनुभव आज भी उनकी स्मृतियों में ताजा है। उनके अनुसार जीवन में कई बार ऐसे अवसर अचानक सामने आते हैं, जो भविष्य को पूरी तरह बदल देते हैं। यदि वह उस दिन ऑडिशन में नहीं जातीं, तो शायद उनका जीवन किसी दूसरी दिशा में आगे बढ़ता। उन्होंने यह भी बताया कि अभिनय के प्रति उनका रुझान पारिवारिक माहौल से भी प्रभावित था। उनके पिता नाट्य गतिविधियों से जुड़े हुए थे, जबकि उनकी मां भी अभिनय क्षेत्र में सक्रिय थीं। यही कारण था कि परिवार ने उनके अभिनय करियर का समर्थन किया और उन्हें अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर मिला। अरुणा ईरानी का फिल्मी सफर भारतीय सिनेमा के सबसे सफल और लंबे करियरों में गिना जाता है। उन्होंने अपने अभिनय से विभिन्न पीढ़ियों के दर्शकों का मनोरंजन किया और कई यादगार भूमिकाओं के जरिए इंडस्ट्री में एक अलग पहचान बनाई। उनका यह अनुभव न केवल संघर्ष और अवसर की कहानी है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि प्रतिभा और सही मौके का मेल किसी भी व्यक्ति की जिंदगी को नई दिशा दे सकता है।
शिवपुरी में धरना दे रहे कांग्रेसियों पर हमला, नामजद शिकायत के बावजूद कार्रवाई न होने का आरोप

मध्य प्रदेश । शिवपुरी जिले के पिछोर क्षेत्र में कांग्रेस के धरने के दौरान हिंसा का मामला सामने आया है। 27 मई को नवीन नगर परिषद भवन के पास चल रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बीच अचानक हालात बिगड़ गए, जब करीब 10 से 12 मोटरसाइकिलों पर सवार होकर 25 से 30 लोग मौके पर पहुंचे। आरोप है कि इन लोगों के हाथों में लाठी-डंडे और प्लास्टिक पाइप थे। धरना स्थल पर पहुंचते ही उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हमला कर दिया, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई और लोग जान बचाकर भागने लगे। वीडियो वायरल, हमले की पुष्टि का दावाघटना का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें कुछ नकाबपोश युवक बाइक से आते और फिर अचानक मारपीट करते नजर आ रहे हैं। वीडियो में भगदड़ और हंगामे जैसी स्थिति भी देखी जा सकती है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह वीडियो हमले की पुष्टि करता है और इसी आधार पर आरोपियों की पहचान कर तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए। कांग्रेस का आरोप: सुनियोजित हमला, कार्रवाई में देरीब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष अनिल गुप्ता के अनुसार इस हमले में कई कार्यकर्ता घायल हुए हैं, जिनमें अतुल पाराशर, राजवीर सिंह परमार, रामस्वरूप कुशवाह और चंद्रशेखर गौतम सहित अन्य शामिल हैं। कांग्रेस का आरोप है कि यह हमला पूरी तरह सुनियोजित था और विपक्षी आवाज को दबाने की कोशिश की गई। जिला कांग्रेस अध्यक्ष मोहित अग्रवाल ने भी आरोप लगाया कि नामजद शिकायत देने के बावजूद पुलिस ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। नामजद शिकायत और पुलिस की स्थितिकांग्रेस द्वारा दी गई शिकायत में मंगल लोधी, सुनील लोधी, आजाद लोधी, सौरव लोधी, जीवन लोधी, असवेन्द्र लोधी, कपूर लोधी और आकाश लोधी सहित कई लोगों के नाम शामिल हैं। हालांकि, पिछोर थाना प्रभारी नीतू सिंह अहिरवार का कहना है कि कुछ नामजद आरोपियों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) जांच में घटना स्थल पर मौजूदगी साबित नहीं हुई है। साथ ही सीसीटीवी फुटेज में कई लोग चेहरा ढके हुए नजर आए हैं, जिससे पहचान में कठिनाई हो रही है। पुलिस के अनुसार पहले अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज करने की बात कही गई थी, लेकिन शिकायतकर्ता नामजद एफआईआर पर अड़े रहे। फिलहाल मामले की जांच जारी है और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। जांच जारी, तनाव बरकरारघटना के बाद राजनीतिक तनाव बढ़ गया है और कांग्रेस लगातार कार्रवाई की मांग कर रही है। वहीं पुलिस जांच और साक्ष्य जुटाने में लगी हुई है।