एक बातचीत में तृप्ति ने कहा कि लगभग हर बच्चे की तरह उन्हें भी अपने माता-पिता से कभी न कभी डांट या मार पड़ी होगी। उन्होंने हंसते हुए बताया कि उनके बचपन में यह इतना सामान्य था कि कभी-कभी बिना किसी बड़ी वजह के भी उन्हें डांट पड़ जाती थी। मजाकिया अंदाज में उन्होंने कहा कि जिस दिन उन्हें मार नहीं पड़ती थी, उस दिन भी किसी न किसी कारण से डांट सुनने को मिल जाती थी। उनकी यह बात सुनकर मौजूद लोग भी मुस्कुरा उठे।
अभिनेत्री ने कहा कि बचपन की ये घटनाएं उस समय भले ही कठिन लगती थीं, लेकिन समय बीतने के साथ वे जीवन की प्यारी यादों का हिस्सा बन जाती हैं। उनका मानना है कि परिवार और परवरिश से जुड़े ऐसे अनुभव व्यक्ति के व्यक्तित्व को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि आज वे उन दिनों को किसी शिकायत के बजाय स्नेह और अपनत्व के साथ याद करती हैं।
अपनी फिल्म के बारे में बात करते हुए तृप्ति ने बताया कि कहानी में मौजूद तीनों प्रमुख किरदार अलग-अलग परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करते हैं। उनके अनुसार, फिल्म का परिवार पूरी तरह व्यवस्थित नहीं है, बल्कि उसमें कई तरह की उलझनें और विसंगतियां हैं। हालांकि यही अव्यवस्था कहानी को रोचक बनाती है और दर्शकों को किरदारों से जोड़ती है।
उन्होंने कहा कि फिल्म में ऐसे कई मौके आते हैं जब मुख्य पात्रों को अचानक पैदा हुई मुश्किल परिस्थितियों से निपटने के लिए नए रास्ते खोजने पड़ते हैं। यही संघर्ष और हास्य का मिश्रण फिल्म को मनोरंजक बनाता है। कहानी केवल कॉमेडी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रिश्तों, पारिवारिक बंधनों और कठिन समय में एक-दूसरे का साथ देने की भावना को भी प्रमुखता से दिखाया गया है।
निर्देशक सुरेश त्रिवेणी के निर्देशन में बनी यह फिल्म अब दर्शकों के लिए उपलब्ध है। फिल्म में तृप्ति के साथ माधुरी दीक्षित नेने, रवि किशन, धारणा दुर्गा, गीतांजलि कुलकर्णी, अरुणोदय सिंह और शार्दुल भारद्वाज जैसे कलाकार भी अहम भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं।
फिल्म की कहानी एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है जिसकी जिंदगी तब अचानक बदल जाती है जब घर की रसोई में एक लाश मिलती है। इसके बाद घटनाओं का सिलसिला शुरू होता है और परिवार के सदस्यों को कई अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कॉमेडी, रहस्य और पारिवारिक भावनाओं के संतुलन के साथ फिल्म दर्शकों को एक अलग अनुभव देने का प्रयास करती है।