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खजराना गणेश मंदिर के गर्भगृह में बदलाव की तैयारी, चौड़ा होगा प्रवेश द्वार; निकली 150 किलो चांदी

मध्य प्रदेश । इंदौर के विश्वप्रसिद्ध खजराना गणेश मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए एक बड़ा बदलाव किया जाने वाला है। आगामी सिंहस्थ और भविष्य में बढ़ने वाली भक्तों की संख्या को देखते हुए मंदिर प्रशासन ने गर्भगृह के मुख्य द्वार को चौड़ा करने का निर्णय लिया है। इस योजना के तहत वर्तमान प्रवेश द्वार को लगभग 10 फीट चौड़ा बनाया जाएगा, जिससे दर्शन व्यवस्था अधिक सुगम और व्यवस्थित हो सकेगी। मंदिर प्रशासन के अनुसार हाल ही में आयोजित मंदिर प्रबंध समिति की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। बैठक में समिति अध्यक्ष एवं इंदौर कलेक्टर Shivam Verma तथा नगर निगम आयुक्त Kshitij Singhal सहित अन्य अधिकारियों ने श्रद्धालुओं की सुविधा को प्राथमिकता देते हुए यह फैसला लिया। निर्णय के बाद विकास कार्यों की तैयारी शुरू कर दी गई है। सबसे पहले गर्भगृह के मुख्य द्वार पर लगी लगभग 150 किलो चांदी को सावधानीपूर्वक हटाया गया है। यह चांदी वर्षों से मंदिर के प्रवेश द्वार की शोभा बढ़ा रही थी। अब निर्माण कार्य पूरा होने के बाद इसके पुनः उपयोग या स्थापना को लेकर आगे निर्णय लिया जाएगा। मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित अशोक भट्ट के अनुसार, गर्भगृह का द्वार चौड़ा होने से श्रद्धालुओं को भगवान गणेश के दर्शन करने में अधिक सुविधा मिलेगी। वर्तमान में विशेष अवसरों और त्योहारों पर यहां भारी भीड़ उमड़ती है, जिससे दर्शन व्यवस्था प्रभावित होती है। सिंहस्थ के दौरान लाखों श्रद्धालुओं के आगमन की संभावना को देखते हुए यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निर्माण कार्य शुरू करने से पहले भवन की संरचनात्मक मजबूती का परीक्षण भी कराया जा रहा है। इसके लिए Shri Govindram Seksaria Institute of Technology and Science (एसजीएसआईटीएस) की विशेषज्ञ टीम ने मंदिर परिसर का निरीक्षण किया है। इंजीनियरों ने दीवारों, द्वार और आसपास की संरचना की तकनीकी जांच की है, ताकि विस्तार कार्य के दौरान मंदिर की मूल संरचना सुरक्षित रहे। मंदिर प्रशासन का कहना है कि परीक्षण रिपोर्ट मिलने के बाद ही निर्माण कार्य की अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। यदि रिपोर्ट अनुकूल रहती है तो आगामी दिनों में गर्भगृह के द्वार को चौड़ा करने का कार्य शुरू कर दिया जाएगा। खजराना गणेश मंदिर न केवल इंदौर बल्कि पूरे देश के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में यह विकास कार्य मंदिर की धार्मिक गरिमा बनाए रखते हुए श्रद्धालुओं को बेहतर और सुविधाजनक दर्शन व्यवस्था उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

CM NEWS EV CAR: EV पर सवार हुए CM मोहन यादव, काफिले में शामिल हुई नई इलेक्ट्रिक कार; जाने क्या है सन्देश!

CM MOHAN YADAV

CM NEWS EV CAR: भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अब अपने काफिले में इलेक्ट्रिक वाहन को शामिल कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नया कदम उठाया है। मुख्यमंत्री ने पहली बार महिंद्रा XEV 9e इलेक्ट्रिक कार में सफर किया और मुख्यमंत्री निवास से स्टेट हैंगर तक इसी गाड़ी से पहुंचे। यह फैसला सिर्फ वाहन बदलने के लिए नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है। बता दें कि इस पहल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ और ऊर्जा संरक्षण के विजन से जोड़कर भी देखा जा रहा है। भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते 500 किलोमीटर तक चल सकती है कार मुख्यमंत्री के काफिले में शामिल हुई यह नई इलेक्ट्रिक कार एक बार चार्ज होने पर करीब 500 किलोमीटर तक चल सकती है। कार में 360 डिग्री कैमरा समेत कई आधुनिक फीचर्स दिए गए हैं। सुरक्षा और संचालन को ध्यान में रखते हुए इसके ड्राइवरों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया है। इससे सरकारी स्तर पर इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने का संदेश भी जाएगा। US: ट्रंप को बड़ा झटका…. संसद में ईरान युद्ध रोकने का प्रस्ताव मंजूर नंबर प्लेट में छिपा ‘विकसित भारत’ का संदेश मुख्यमंत्री की नई EV का नंबर MP-02-VB-2047 है। इसमें ‘VB’ को ‘विकसित भारत’ और ‘2047’ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत लक्ष्य से जोड़कर देखा जा रहा है। इस नंबर के जरिए भी एक प्रतीकात्मक संदेश देने की कोशिश की गई है कि देश को स्वच्छ ऊर्जा और आधुनिक तकनीक के सहारे आगे बढ़ाना है। MP: मऊगंज में छात्रा ने फांसी लगाकर दी फांसी… NEET परीक्षा रद्द होने से डिप्रेशन में थी… सादगी और पर्यावरण पर लगातार फोकस मुख्यमंत्री मोहन यादव पहले भी सादगी की मिसाल पेश करते रहे हैं। पीएम मोदी की ईंधन बचाओ अपील के बाद वे कई बार टेम्पो ट्रैवलर और बस से कार्यक्रम स्थलों तक पहुंचते नजर आए हैं। साथ ही उन्होंने काफिले में वाहनों की संख्या कम करने जैसे फैसले भी लिए हैं। अब इलेक्ट्रिक वाहन को अपनाकर उन्होंने पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने का संदेश दिया है।

क्लीनचिट के बदले 3 लाख की डील! लोकायुक्त के भीतर भ्रष्टाचार का कथित नेटवर्क उजागर

मध्य प्रदेश । मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली लोकायुक्त संस्था खुद गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। एक कथित स्टिंग ऑपरेशन में लोकायुक्त के अधिकारियों और कर्मचारियों पर जांच प्रभावित करने, क्लीनचिट दिलाने और मामलों को कमजोर करने के बदले लाखों रुपये की रिश्वत मांगने के आरोप लगाए गए हैं। इस खुलासे ने प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण जांच एजेंसियों में से एक की कार्यप्रणाली पर बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के अनुसार, लोकायुक्त कार्यालय के एक टेक्नीशियन ने कथित तौर पर दावा किया कि डीएसपी स्तर के अधिकारियों के माध्यम से जांच में राहत दिलाई जा सकती है। आरोप है कि एक मामले में क्लीनचिट दिलाने के लिए 3 लाख रुपये और अन्य स्तरों पर अलग-अलग रकम की मांग की गई। स्टिंग में शामिल बातचीत में एक महिला डीएसपी द्वारा कथित तौर पर यह कहते हुए सुना गया कि “चोरी सब करते हैं, जो पकड़ाया वही चोर होता है”, जिसके बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया। कथित बातचीत के दौरान अधिकारियों ने जांच प्रक्रिया, नोटिस, वॉयस सैंपल और दस्तावेजों को लेकर भी चर्चा की। आरोप है कि जांच से जुड़ी गोपनीय जानकारी और ट्रांसक्रिप्ट तक उपलब्ध कराने की पेशकश की गई। इतना ही नहीं, कथित तौर पर पैसे नहीं मिलने पर संबंधित पक्ष पर दबाव बनाने और जांच प्रभावित करने जैसी बातें भी सामने आईं। मामले का एक और गंभीर पहलू यह है कि लोकायुक्त द्वारा प्रस्तुत खात्मा रिपोर्टों को लेकर भी सवाल उठे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष जनवरी से अप्रैल के बीच विशेष अदालत ने लोकायुक्त की ओर से पेश की गई कई खात्मा रिपोर्टों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने जांच में कमियां, अधूरे साक्ष्य और आवश्यक गवाहों के बयान दर्ज न किए जाने जैसी खामियों की ओर संकेत किया। आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में ट्रैप कार्रवाई की संख्या बढ़ी है, लेकिन दोषसिद्धि के मामलों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। इससे जांच की गुणवत्ता और अभियोजन की प्रभावशीलता पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। विपक्ष ने मामले की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि भ्रष्टाचार की जांच करने वाली संस्था पर ही ऐसे आरोप लगते हैं, तो आम नागरिकों का भरोसा प्रभावित होना स्वाभाविक है। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों या लोकायुक्त संगठन की ओर से अंतिम और आधिकारिक निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है। ऐसे मामलों में जांच पूरी होने और सक्षम एजेंसियों द्वारा तथ्यों की पुष्टि होने तक आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। फिलहाल यह मामला प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है।

बंगाल में नंबर गेम बनाम कानूनी लड़ाई: 58 विधायकों के दावे के बावजूद टीएमसी पर नियंत्रण आसान नहीं, स्पीकर की भूमिका होगी सबसे अहम

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर आंतरिक राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी के भीतर पनपे एक बड़े बागी गुट ने विधानसभा के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों के अपने साथ होने का दावा ठोक दिया है। इस संख्या बल ने देश को कुछ समय पहले हुए महाराष्ट्र के शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) विवाद की याद दिला दी है। हालांकि, देश के संवैधानिक कानून और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों के आलोक में देखा जाए, तो बागी गुट के लिए केवल 58 विधायकों के समर्थन के दम पर पूरी पार्टी पर नियंत्रण हासिल कर लेना इतना आसान नहीं होने वाला है। इस पूरे सियासी घमासान को सुलझाने और यह तय करने में कि वास्तविक तृणमूल कांग्रेस कौन सी है, पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और कानूनी कसौटियों से बंधी होगी। इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं को समझें तो साल 2003 में संसद द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण संशोधन के बाद संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) से पैराग्राफ 3 को पूरी तरह हटा दिया गया था। इस पैराग्राफ के हटने से पहले तक यदि किसी पार्टी के एक-तिहाई विधायक अलग होते थे, तो वे पार्टी में ‘विभाजन’ या स्प्लिट का तर्क देकर अयोग्यता की कार्रवाई से बच जाते थे। परंतु अब कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। वर्तमान नियमों के तहत यदि किसी राजनीतिक दल या उसके विधायी विंग में कोई फूट होती है और दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिका दायर करते हैं, तो कोई भी गुट स्वतः ही खुद को मूल या असली पार्टी होने का वैधानिक दावा नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना विवाद की लंबी सुनवाई के बाद अपने ऐतिहासिक फैसले में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि दलबदल के मामलों में केवल विधानसभा के भीतर का नंबर गेम असली पार्टी का निर्धारण नहीं कर सकता। देश की शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, जब किसी दल में दो स्पष्ट फाड़ हो जाते हैं, तो विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर विचार करते समय स्पीकर को अंधमूल्यांकन या केवल सिरों की गिनती करने से बचना होगा। अध्यक्ष को यह जांचना अनिवार्य है कि विधानसभा के बाहर, यानी मूल राजनीतिक संगठन में पार्टी का नेतृत्व ढांचा कैसा है और आम कार्यकर्ताओं तथा संगठन के पदाधिकारियों का झुकाव किस तरफ है। कोर्ट ने साफ कहा था कि यह महज आंकड़ों की बाजीगरी नहीं है, बल्कि संगठन की मूल आत्मा को पहचानना अनिवार्य है। अदालत के आदेशानुसार, असली पार्टी की पहचान करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को उस दल के मूल संविधान, नियमों और विनियमों को सर्वोपरि मानना होगा जो पार्टी के आंतरिक नेतृत्व के ढांचे को परिभाषित करते हैं। यदि विवाद के दौरान दोनों गुट अपने-अपने फायदे के हिसाब से पार्टी संविधान के अलग-अलग रूप या दस्तावेज पेश करते हैं, तो अध्यक्ष को केवल उसी दस्तावेज को वैध और प्रामाणिक मानना होगा जो राजनीतिक विवाद शुरू होने से ठीक पहले भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के पास आधिकारिक तौर पर जमा था। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि कोई भी बागी गुट रातों-रात बहुमत के प्रभाव में आकर पार्टी के मूल नियमों और लोकतांत्रिक ढांचे में मनमाना संशोधन न कर सके। इस संवैधानिक स्थिति को देखते हुए साफ है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ खड़ा हुआ बागी गुट यदि सिर्फ 58 विधायकों के हस्ताक्षर दिखाकर खुद को असली टीएमसी घोषित करने की मांग करता है, तो विधानसभा अध्यक्ष उसे सीधे मान्यता नहीं दे सकते। पश्चिम बंगाल के स्पीकर को कानूनन बाध्य होकर विधायकों की संख्या के अतिरिक्त, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज टीएमसी के सांगठनिक ढांचे, पार्टी अध्यक्ष की शक्तियों और मुख्य संगठन की जमीनी स्थिति को भी अपनी जांच के दायरे में लाना होगा। ऐसे में जब तक संगठन पर पकड़ साबित नहीं होती, तब तक बागी विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटकती रहेगी और टीएमसी पर पूर्ण नियंत्रण का उनका सपना कानूनी दांवपेंच में उलझा रहेगा।

भोपाल में बड़ा हादसा टला, निगम भवन की लिफ्ट में फंसी महिला; बैकअप सिस्टम नहीं होने से बढ़ी चिंता

भोपाल । भोपाल नगर निगम की नई मुख्यालय बिल्डिंग में बुधवार शाम उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब एक महिला कर्मचारी लिफ्ट के अंदर फंस गईं। लिंक रोड नंबर-2 स्थित 73 करोड़ रुपए की लागत से निर्मित इस अत्याधुनिक भवन में बिजली गुल होते ही लिफ्ट बीच रास्ते में रुक गई और महिला करीब 20 मिनट तक उसमें कैद रहीं। घटना ने भवन की सुरक्षा व्यवस्था और तकनीकी तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार महिला कर्मचारी ग्राउंड फ्लोर से तीसरी मंजिल पर जाने के लिए लिफ्ट में सवार हुई थीं। जैसे ही लिफ्ट ऊपर बढ़ी, अचानक बिजली चली गई और लिफ्ट सेकंड फ्लोर के पास अटक गई। अंदर फंसी महिला घबरा गईं, जबकि घटना की जानकारी मिलते ही भवन में मौजूद कर्मचारियों और नागरिकों की भीड़ मौके पर जमा हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक तकनीकी टीम के पहुंचने से पहले कुछ लोगों ने चाबी और पेचकस की मदद से लिफ्ट का दरवाजा खोलने की कोशिश भी की। हालांकि बाद में पहुंचे तकनीकी कर्मचारियों ने लोगों को ऐसा करने से रोका और लिफ्ट सिस्टम को रीसेट करने की प्रक्रिया शुरू की। करीब 10 मिनट की मशक्कत के बाद महिला को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। बाहर निकलते समय वह काफी घबराई हुई नजर आईं। नगर निगम की बिजली शाखा के कार्यपालन यंत्री आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि लिफ्ट में कोई तकनीकी खराबी नहीं थी, बल्कि बिजली बाधित होने के कारण यह बीच में रुक गई थी। हालांकि घटना ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि करोड़ों रुपए की लागत से बने नए भवन में ऑटो रेस्क्यू सिस्टम और पावर बैकअप जैसी जरूरी सुविधाएं क्यों नहीं हैं। कर्मचारियों और आम नागरिकों का कहना है कि रोजाना बड़ी संख्या में लोग इस भवन में आते हैं। ऐसे में लिफ्ट में ऑटोमैटिक रेस्क्यू डिवाइस और बैकअप पावर सिस्टम होना अनिवार्य है, ताकि बिजली जाने की स्थिति में यात्री सुरक्षित बाहर निकल सकें। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक लिफ्टों में सुरक्षा के लिए कई स्वचालित सिस्टम लगे होते हैं। बिजली जाने पर लिफ्ट निकटतम फ्लोर तक पहुंचने का प्रयास करती है। ऐसे समय में दरवाजा जबरन खोलने या छेड़छाड़ करने से सुरक्षा तंत्र प्रभावित हो सकता है और राहत कार्य में देरी हो सकती है। उल्लेखनीय है कि इस नई निगम बिल्डिंग का लोकार्पण 6 मई को मुख्यमंत्री Mohan Yadav ने किया था। भवन में निगम के अधिकांश विभागों को एक छत के नीचे लाने की योजना बनाई गई है। हालांकि उद्घाटन के एक महीने के भीतर सामने आई इस घटना ने भवन की तकनीकी तैयारियों और सुरक्षा मानकों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

भोपाल में रिश्ते का खौफनाक अंत, गर्दन-चेहरे पर किए वार; बहन की बहादुरी के बावजूद भाग निकला हमलावर

भोपाल । भोपाल में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां एक युवक ने अपनी पूर्व प्रेमिका पर बीच सड़क चाकू से हमला कर दिया। हमले में युवती गंभीर रूप से घायल हो गई, जबकि उसे बचाने आई उसकी बड़ी बहन भी आरोपी के हमले का शिकार हो गई। घटना का सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद इलाके में दहशत का माहौल है। जानकारी के अनुसार, घटना छोला मंदिर थाना क्षेत्र के शंकर नगर इलाके में मंगलवार शाम करीब चार बजे हुई। 23 वर्षीय युवती अपनी बड़ी बहन के साथ घर के पास जा रही थी, तभी आरोपी अक्षय चंदेल ने उनका रास्ता रोक लिया। बताया जा रहा है कि दोनों के बीच पहले प्रेम संबंध थे और कुछ समय तक वे लिव-इन रिलेशनशिप में भी रह चुके थे। बाद में दोनों के बीच विवाद होने पर युवती ने उससे दूरी बना ली थी। पुलिस के मुताबिक, रास्ता रोकने के बाद आरोपी ने पुरानी बातों को लेकर बहस शुरू कर दी। कुछ देर कहासुनी के बाद उसने जेब से चाकू निकाला और युवती पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। आरोपी ने उसकी गर्दन, चेहरे, पीठ और हाथों पर कई वार किए। अचानक हुए हमले से युवती गंभीर रूप से घायल होकर सड़क पर गिर पड़ी। इस दौरान युवती की बड़ी बहन उसे बचाने के लिए आगे आई, लेकिन आरोपी ने उस पर भी हमला कर दिया। चाकू का वार उसके बाएं गाल पर लगा, जिससे उसे गंभीर चोट आई। दोनों बहनों की चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग मौके की ओर दौड़े। प्रत्यक्षदर्शियों के जुटने पर आरोपी मौके से फरार हो गया। बताया जा रहा है कि भागने से पहले उसने युवती को जान से मारने की धमकी भी दी। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों घायलों को अस्पताल पहुंचाया। घायल युवती की हालत गंभीर बताई जा रही है, जबकि उसकी बहन का भी इलाज जारी है। पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी और पीड़िता के बीच पहले प्रेम संबंध थे। संबंध खत्म होने के बाद दोनों के बीच तनाव बना हुआ था। प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि इसी रंजिश के चलते आरोपी ने इस वारदात को अंजाम दिया। छोला मंदिर थाना पुलिस ने आरोपी अक्षय चंदेल के खिलाफ हत्या के प्रयास, मारपीट, धमकी और अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है। फिलहाल आरोपी फरार है और उसकी तलाश के लिए लगातार दबिश दी जा रही है। यह घटना एक बार फिर रिश्तों में बढ़ती हिंसा और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। पुलिस का कहना है कि आरोपी को जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा और मामले की विस्तृत जांच जारी है।

कर्नाटक में 'शिवकुमार युग' की शुरुआत: डीके शिवकुमार ने ली मुख्यमंत्री पद की शपथ, कैबिनेट में दिखा सिद्धारमैया का दबदबा

नई दिल्ली। कर्नाटक के राजनीतिक परिदृश्य में लंबे समय से चल रहा नेतृत्व का इंतजार आखिरकार समाप्त हो गया, जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु के लोक भवन में आयोजित एक भव्य और गरिमामय समारोह में राज्य के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। इस ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाक्रम के साथ ही राज्य में एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई है। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मुख्यमंत्री शिवकुमार ने तुमकुरु जिले के श्रद्धेय शैव संत वीरा गंगाधर अज्जैया के नाम पर और हाथ में भारत के संविधान की प्रति लेकर मुख्यमंत्री पद की कसम खाई। इस समारोह में कांग्रेस आलाकमान के वरिष्ठ नेताओं सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने शिरकत की, जिससे यह आयोजन पार्टी के लिए एक बड़े शक्ति प्रदर्शन में तब्दील हो गया। हालांकि, सत्ता की शीर्ष कमान डीके शिवकुमार के हाथों में सौंपे जाने के बावजूद, नवगठित मंत्रिपरिषद के स्वरूप को देखकर यह साफ हो गया है कि संगठन के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का राजनीतिक सिक्का और प्रभाव अभी भी मजबूती से कायम है। नई सरकार की शुरुआती कैबिनेट में सिद्धारमैया के वफादारों और करीबियों का दबदबा स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। राज्य के एक प्रमुख दलित चेहरे जी. परमेश्वर को उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि शुरुआती चरण में कैबिनेट रैंक के मंत्री के रूप में 12 अन्य विधायकों को भी शामिल किया गया है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा है कि पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया न केवल अपने गुट के वरिष्ठ विधायकों को मंत्रिपरिषद में तरजीह दिलाने में सफल रहे, बल्कि उन्होंने अपने बेटे यतींद्र सिद्धारमैया को भी नई कैबिनेट में सुरक्षित स्थान दिलाकर राजनीतिक रूप से पूरी तरह स्थापित कर दिया है। इसके साथ ही, एमएलसी बीके हरिप्रसाद को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जिसकी आधिकारिक घोषणा शपथ ग्रहण के कुछ घंटों बाद ही कर दी गई। मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालते ही डीके शिवकुमार पूरी तरह से प्रशासनिक एक्शन में नजर आए। उन्होंने तुरंत अपनी पहली कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता की और अपनी सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए इसे ‘युवा युग’ के आगाज़ का नाम दिया। इस बैठक में युवाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए कई बड़े और दूरगामी फैसलों पर मुहर लगाई गई। सरकार ने राज्य के सभी स्कूली छात्रों से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक के विद्यार्थियों के लिए मुफ्त बस पास की सुविधा देने का बड़ा निर्णय लिया है। इसके साथ ही बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए निजी क्षेत्र की नौकरियों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से एक विशेष डिजिटल रोजगार एक्सचेंज पोर्टल स्थापित करने की घोषणा की गई है। युवाओं को सरकारी तंत्र में पारदर्शी अवसर देने के लिए समयबद्ध भर्ती कैलेंडर जारी करने और राज्य भर में 10,000 ‘भारत जोड़ो युवा क्लब’ बनाने का फैसला भी लिया गया है। इसके अतिरिक्त, शहरी विकास को गति देने के लिए सड़कों की मरम्मत हेतु 2,000 करोड़ रुपये का विशेष बजट स्वीकृत किया गया है और आवासीय निर्माण को बढ़ावा देने के लिए बिल्डिंग नियमों में रियायत दी गई है। नई कैबिनेट के गठन में कांग्रेस आलाकमान ने राज्य के जटिल सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को संतुलित करने का पूरा प्रयास किया है। जातीय गणित के लिहाज से कर्नाटक के तीन सबसे प्रभावशाली समुदायों यानी वोक्कालिगा, लिंगायत और अनुसूचित जाति (SC) को प्रतिनिधित्व देते हुए प्रत्येक वर्ग से 3-3 मंत्री बनाए गए हैं। इसके अलावा सिद्धारमैया के अपने कुरुबा समुदाय से 2 मंत्रियों को जगह मिली है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST), मुस्लिम और ईसाई समुदायों से एक-एक चेहरे को मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया है। हालांकि, शुरुआती सूची में किसी भी महिला विधायक को जगह न मिलने पर राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। राज्य में कुल स्वीकृत मंत्रियों की संख्या 34 है, जिसे देखते हुए माना जा रहा है कि आगामी 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के ठीक बाद कैबिनेट का दूसरा विस्तार किया जाएगा, जिसमें शेष खाली पदों को भरा जाएगा और क्षेत्रीय असंतुलन को दूर किया जाएगा। फिलहाल, बेंगलुरु के इस भव्य समारोह में एआईसीसी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति ने यह संदेश दे दिया है कि कांग्रेस दक्षिण के इस महत्वपूर्ण राज्य में अपनी पकड़ को और मजबूत करने के लिए पूरी रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है।

अन्नामलाई के अगले कदम पर सस्पेंस, जन्मदिन से पहले तमिलनाडु BJP में इस्तीफों का दौर

नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष K. Annamalai को लेकर हो रही है। उनके राजनीतिक भविष्य पर उठ रहे सवालों ने न केवल भारतीय जनता पार्टी बल्कि पूरे राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। अटकलें हैं कि अन्नामलाई जल्द ही कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं, जिसके संकेत उनके हालिया बयानों और समर्थकों की गतिविधियों से मिल रहे हैं। चर्चा इस बात की भी है कि अपने 42वें जन्मदिन के अवसर पर अन्नामलाई कोई महत्वपूर्ण घोषणा कर सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घोषणा उनके भविष्य की दिशा तय कर सकती है। हालांकि अभी तक उन्होंने सार्वजनिक रूप से किसी नए राजनीतिक दल या मंच की घोषणा नहीं की है। सूत्रों के अनुसार, हाल ही में अन्नामलाई ने Amit Shah से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बाद आधिकारिक रूप से कोई जानकारी सामने नहीं आई, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे उनके भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण बैठक माना जा रहा है। इससे पहले उनके इस्तीफे की खबरों ने भी जोर पकड़ा था। अन्नामलाई का राजनीतिक सफर काफी तेज रहा है। पूर्व आईपीएस अधिकारी रहे अन्नामलाई ने 2020 में पुलिस सेवा छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। इसके कुछ ही महीनों बाद उन्हें तमिलनाडु भाजपा की कमान सौंप दी गई। उनके नेतृत्व में पार्टी का जनाधार बढ़ा और राज्य में भाजपा की राजनीतिक सक्रियता को नई पहचान मिली। हालांकि बाद में पार्टी नेतृत्व ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर Nainar Nagendran को जिम्मेदारी सौंप दी। इसके साथ ही भाजपा ने AIADMK के साथ अपने पुराने गठबंधन को भी पुनर्जीवित किया। इसके बाद से अन्नामलाई की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। राजनीतिक सस्पेंस को और बढ़ाने का काम उनके समर्थकों द्वारा लगाए गए पोस्टरों ने किया है। कोयंबटूर और मदुरै समेत कई शहरों में लगे पोस्टरों में अन्नामलाई को एक स्वतंत्र राजनीतिक चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनमें भाजपा के शीर्ष नेताओं की तस्वीरों का न होना भी चर्चाओं का विषय बना हुआ है। इस बीच पार्टी के अंदर भी बेचैनी दिखाई दे रही है। अन्नामलाई के भविष्य को लेकर फैल रही अटकलों के बाद कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने चिंता जाहिर की है। खबरें हैं कि भाजपा के कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफा भी दिया है, जिससे संगठन में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। फिलहाल सभी की निगाहें अन्नामलाई के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि वह भाजपा में बने रहते हैं तो यह पार्टी के लिए राहत की खबर होगी, लेकिन यदि वे अलग राजनीतिक राह चुनते हैं तो तमिलनाडु की राजनीति में एक नए समीकरण की शुरुआत हो सकती है।

भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते

नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव के बाद तुर्की एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में है। पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध रखने वाले तुर्की ने साफ कहा है कि वह अकेला ऐसा देश नहीं है जिसके इस्लामाबाद के साथ अच्छे रिश्ते हैं। तुर्की का मानना है कि भारत को इस मुद्दे को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है और दोनों देशों को आपसी सहयोग बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। तुर्की के विदेश मंत्री Hakan Fidan ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में भारत और पाकिस्तान को लेकर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारत और तुर्की के बीच कोई सीमा विवाद या ऐतिहासिक दुश्मनी नहीं है, इसलिए दोनों देशों के संबंध बेहतर होने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। फिदान ने कहा कि तुर्की के पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक और मित्रतापूर्ण संबंध हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह भारत के खिलाफ है। उनके अनुसार दुनिया के कई अन्य देशों के भी पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते हैं और किसी एक संबंध को लेकर पूरे द्विपक्षीय रिश्ते प्रभावित नहीं होने चाहिए। तुर्की के विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि कई देशों के बीच मतभेद होने के बावजूद वे सहयोग के रास्ते तलाशते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तुर्की के रूस, अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के साथ विभिन्न मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन इसके बावजूद संवाद और सहयोग जारी रहता है। उनका मानना है कि भारत और तुर्की को भी इसी तरह सकारात्मक एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में तुर्की की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विशेष रूप से पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा और रणनीतिक सहयोग को लेकर भारत में चिंता जताई जाती रही है। मीडिया रिपोर्टों में पहले यह दावा भी किया गया था कि भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान को तकनीकी और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई थी। हालांकि इन दावों पर विभिन्न पक्षों की अलग-अलग राय रही है। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुए सैन्य अभियान और उसके बाद दोनों देशों के बीच बढ़ी तनातनी को भी देखा जा रहा है। इसी संदर्भ में तुर्की के बयान को क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और तुर्की के बीच व्यापार, निवेश, पर्यटन और वैश्विक मंचों पर सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर समय-समय पर रिश्तों में तनाव का कारण बनता रहा है।

अधूरा सच और सुर्खियां: रणवीर सिंह से बैन हटने के बाद फेडरेशन ने कंगना रनौत के दावों को बताया बेबुनियाद

नई दिल्ली। फिल्म ‘डॉन 3’ को लेकर अभिनेता रणवीर सिंह और फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज (FWICE) के बीच उपजा गतिरोध भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन इस विवाद ने मनोरंजन उद्योग के भीतर एक नई वैचारिक जंग को जन्म दे दिया है। फेडरेशन द्वारा रणवीर सिंह पर से प्रतिबंध हटाने की घोषणा के तुरंत बाद ही अभिनेत्री और राजनेता कंगना रनौत तथा FWICE के मुख्य सलाहकार अशोक पंडित के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। पूरा मामला उस समय गरमा गया जब कंगना रनौत ने एक सार्वजनिक मंच से इस पूरे विवाद पर टिप्पणी की, जिसके जवाब में अशोक पंडित ने उन पर तथ्यों को जाने बिना केवल सुर्खियां बटोरने के लिए बयान देने का गंभीर आरोप लगाया है। दरअसल, यह विवाद तब शुरू हुआ जब कंगना रनौत अपनी आगामी फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ के ट्रेलर लॉन्च कार्यक्रम में शामिल हुईं। वहां जब मीडिया ने उनसे रणवीर सिंह पर लगे प्रतिबंध को लेकर सवाल पूछा, तो उन्होंने रणवीर का खुलकर समर्थन किया। कंगना ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा कि जब किसी व्यक्ति का कद और हैसियत बढ़ती है, तो उसके दुश्मनों की संख्या भी स्वतः ही बढ़ जाती है। सफलता के मार्ग में विरोधियों का आना स्वाभाविक है। इसके साथ ही उन्होंने खुद का उदाहरण देते हुए दावा किया कि उन्हें भी फिल्म उद्योग के कई धड़ों द्वारा प्रतिबंधित किया जा चुका है। कंगना ने रणवीर सिंह को सांत्वना देते हुए कहा था कि उन्हें इस बात से खुश होना चाहिए कि उनका कद अब इतना बड़ा हो चुका है कि लोग उनके खिलाफ खड़े हो रहे हैं। कंगना रनौत के इस बयान पर फिल्म उद्योग के कामगारों और तकनीशियनों की सबसे बड़ी संस्था FWICE के मुख्य सलाहकार अशोक पंडित ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने एक साक्षात्कार के दौरान कंगना को सीधे तौर पर आड़े हाथों लेते हुए कहा कि फिल्म बिरादरी के कुछ लोग बिना सोचे-समझे और बिना जमीनी सच्चाई को जाने केवल समाचारों में बने रहने के लिए गैर-जिम्मेदाराना प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कंगना के दावों का खंडन करते हुए अशोक पंडित ने अत्यंत सख्त शब्दों में कहा कि फेडरेशन किसी दुर्भावना के तहत कार्रवाई नहीं करता। उन्होंने कहा कि यदि कंगना को प्रतिबंधित किया गया था, तो उसकी वजह उनकी बेवजह की बयानबाजी थी, न कि उनका बढ़ता हुआ कद। उन्होंने साफ किया कि संगठन को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन क्या राय रखता है, क्योंकि फेडरेशन के सामने उद्योग से जुड़े हजारों दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों का भविष्य होता है। इस दौरान अशोक पंडित ने फेडरेशन के रुख को पूरी तरह से स्पष्ट करते हुए कहा कि संस्था का उद्देश्य कभी भी रणवीर सिंह को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना या प्रताड़ित करना नहीं था। उन्होंने पूरे मामले की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए बताया कि यह विवाद मूल रूप से आगामी फिल्म ‘डॉन 3’ से जुड़ा था, जिसके निर्माता-निर्देशक फरहान अख्तर ने फेडरेशन में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, रणवीर सिंह के अचानक इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से अलग होने के कारण निर्माताओं को भारी वित्तीय क्षति का सामना करना पड़ा था। इसी शिकायत और आर्थिक नुकसान के तकनीकी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए FWICE ने अभिनेता के खिलाफ असहयोग निर्देश जारी किया था। अशोक पंडित के मुताबिक, ऐसे बड़े विवादों का नकारात्मक असर केवल मुख्य अभिनेताओं पर नहीं पड़ता, बल्कि उस फिल्म से जुड़े सैकड़ों छोटे तकनीशियनों, दैनिक कामगारों और सह-कलाकारों के रोजगार पर भी पड़ता है। इसलिए फेडरेशन का कोई भी कदम किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि संपूर्ण फिल्म उद्योग के व्यावसायिक अनुशासन और सामूहिक हितों की रक्षा के लिए उठाया जाता है। बहरहाल, बुधवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से फेडरेशन ने रणवीर सिंह के खिलाफ जारी अपने सभी निर्देशों को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया है, जिससे ‘डॉन 3’ से जुड़ा विवाद तो सुलझ गया है, लेकिन कंगना और अशोक पंडित के बीच शुरू हुआ यह नया वाकयुद्ध आने वाले दिनों में और गहराने की आशंका है।