NFHS डेटा पर बढ़ा सियासी घमासान, नड्डा बोले- अधूरी जानकारी से नहीं, तथ्यों से होता है देश का भला

नई दिल्ली । राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है। स्वास्थ्य क्षेत्र की उपलब्धियों और चुनौतियों को लेकर दोनों दलों ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए हैं। इस विवाद का केंद्र स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों की व्याख्या और उनके सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण को लेकर उठे सवाल हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से केंद्र सरकार पर महिलाओं और बच्चों से जुड़े स्वास्थ्य तथा पोषण संबंधी आंकड़ों को सार्वजनिक न करने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि संबंधित आंकड़े सरकार की नीतिगत विफलताओं को उजागर करते हैं और इसी कारण उन्हें सार्वजनिक रूप से सामने नहीं लाया जा रहा है। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई। खरगे के आरोपों के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कड़ा प्रतिवाद किया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। नड्डा ने कहा कि अधूरी जानकारी या चुनिंदा तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है और इससे वास्तविक स्थिति की सही तस्वीर सामने नहीं आती। स्वास्थ्य मंत्री ने अपने जवाब में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के विभिन्न आंकड़ों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि पिछले वर्षों में देश के स्वास्थ्य ढांचे में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किए गए हैं। उनके अनुसार मातृ स्वास्थ्य सेवाओं, संस्थागत प्रसव और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की निगरानी में होने वाले प्रसव के मामलों में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। उन्होंने इसे स्वास्थ्य क्षेत्र में हुए व्यापक बदलावों और सरकारी प्रयासों का परिणाम बताया। नड्डा ने कहा कि गर्भावस्था के शुरुआती चरण में पंजीकरण कराने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है, जबकि अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में होने वाले प्रसव का प्रतिशत भी काफी बढ़ा है। उनके अनुसार इन बदलावों ने मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने तथा स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में योगदान दिया है। केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में हुए सुधारों का मूल्यांकन व्यापक आंकड़ों और दीर्घकालिक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि देश की स्वास्थ्य यात्रा की वास्तविक कहानी प्रगति और सुधार की है, न कि केवल कमियों और चुनौतियों की। उन्होंने सरकार द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, टीकाकरण कार्यक्रमों और चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने के प्रयासों का भी उल्लेख किया। दूसरी ओर कांग्रेस का आरोप है कि स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण संकेतकों में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है और सरकार इन पहलुओं पर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं बरत रही है। पार्टी का कहना है कि जनता को स्वास्थ्य संबंधी सभी आंकड़ों तक पूरी पहुंच मिलनी चाहिए ताकि नीतियों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े किसी भी देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति को मापने का महत्वपूर्ण आधार होते हैं। ऐसे में इन आंकड़ों की व्याख्या और प्रस्तुति को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है। हालांकि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर तथ्यात्मक और संतुलित चर्चा को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। फिलहाल एनएफएचएस के आंकड़ों को लेकर शुरू हुई यह बहस राजनीतिक स्तर पर जारी है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच और अधिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं, क्योंकि स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े विषय सीधे तौर पर करोड़ों नागरिकों के जीवन से जुड़े हुए हैं।
‘विवाह’ की पूनम से बनीं करोड़ों दिलों की पसंद, अमृता राव की सादगी और अभिनय का आज भी कायम है जादू

नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा में कई ऐसे कलाकार रहे हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा और सादगी के बल पर दर्शकों के दिलों में स्थायी जगह बनाई। अभिनेत्री अमृता राव भी उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में शामिल हैं जिन्होंने बिना किसी बड़े विवाद या अत्यधिक प्रचार के अपने अभिनय और व्यक्तित्व के दम पर अलग पहचान स्थापित की। खासतौर पर फिल्म ‘विवाह’ में निभाया गया उनका ‘पूनम’ का किरदार आज भी दर्शकों की स्मृतियों में जीवंत है। 7 जून 1981 को मुंबई में जन्मीं अमृता राव का पालन-पोषण एक पारंपरिक कोंकणी परिवार में हुआ। बचपन से ही पढ़ाई और सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि रखने वाली अमृता ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में पूरी की। बाद में उन्होंने मनोविज्ञान विषय के साथ स्नातक की पढ़ाई शुरू की, लेकिन मॉडलिंग और मनोरंजन जगत में बढ़ती संभावनाओं ने उन्हें एक अलग दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। करियर की शुरुआत उन्होंने मॉडलिंग से की। कई विज्ञापनों में दिखाई देने के बाद उन्हें संगीत वीडियो में भी काम करने का अवसर मिला। कैमरे के सामने उनकी सहज उपस्थिति और आत्मविश्वास ने विज्ञापन जगत का ध्यान आकर्षित किया। धीरे-धीरे फिल्म निर्माताओं की नजर उन पर पड़ी और उन्हें फिल्मों में अवसर मिलने लगे। साल 2002 में रिलीज हुई फिल्म ‘अब के बरस’ से अमृता ने बॉलीवुड में कदम रखा। हालांकि उनकी वास्तविक पहचान वर्ष 2003 में आई फिल्म ‘इश्क विश्क’ से बनी। इस फिल्म में उनके अभिनय को सराहा गया और युवा दर्शकों के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। फिल्म की सफलता ने उन्हें उद्योग में मजबूत स्थान दिलाया और उनके लिए नए अवसरों के द्वार खोले। इसके बाद अमृता ने ‘मस्ती’, ‘मैं हूं ना’, ‘वाह लाइफ हो तो ऐसी’, ‘शिखर’ और ‘प्यारे मोहन’ जैसी फिल्मों में काम किया। हालांकि उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में फिल्म ‘विवाह’ को विशेष स्थान प्राप्त है। इस पारिवारिक फिल्म में निभाए गए ‘पूनम’ के किरदार ने उन्हें देशभर के दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना दिया। उनके सरल, संस्कारी और संवेदनशील चरित्र को लोगों ने बेहद पसंद किया और यही भूमिका उनके करियर की पहचान बन गई। अमृता राव ने हिंदी फिल्मों के अलावा दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने तेलुगू फिल्म उद्योग में भी काम किया और कई चर्चित कलाकारों के साथ स्क्रीन साझा की। इसके बाद ‘वेलकम टू सज्जनपुर’, ‘जॉली एलएलबी’, ‘सत्याग्रह’, ‘सिंह साहब द ग्रेट’ और ‘ठाकरे’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया। निजी जीवन में अमृता ने लंबे समय तक रेडियो जॉकी अनमोल सूद के साथ संबंध में रहने के बाद वर्ष 2016 में विवाह किया। दोनों ने सादगीपूर्ण तरीके से शादी की और आज एक बेटे के माता-पिता हैं। विवाह के बाद अमृता ने परिवार को प्राथमिकता देते हुए फिल्मों में अपनी सक्रियता सीमित कर दी। वर्तमान समय में अमृता राव डिजिटल माध्यमों के जरिए अपने प्रशंसकों से जुड़ी हुई हैं। वह अपने पति के साथ एक लोकप्रिय यूट्यूब चैनल संचालित करती हैं, जहां जीवन से जुड़े अनुभव, पारिवारिक किस्से और विभिन्न चर्चित हस्तियों के साथ बातचीत साझा करती हैं। अभिनय, सादगी और संतुलित जीवनशैली के कारण अमृता राव आज भी भारतीय दर्शकों के बीच सम्मान और लोकप्रियता बनाए हुए हैं।
भतीजे अभिषेक बनर्जी के पर कतरे और खुद दिल्ली आ रहीं ममता, टीएमसी के नाराज सांसदों की दिल्ली में मौजूदगी से सियासी हलचल तेज

नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा आंतरिक असंतोष अब राज्य की भौगोलिक सीमाओं को पार कर देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया है। राज्य विधानसभा में 58 विधायकों की बड़ी बगावत का सामना कर रहीं मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी को अब देश की संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में भी एक बड़े विद्रोह की आशंका सताने लगी है। तृणमूल कांग्रेस के कई असंतुष्ट और नाराज लोकसभा सांसदों द्वारा अचानक दिल्ली में डेरा डाल दिए जाने के बाद से कोलकाता से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में कयासों का बाजार बेहद गर्म है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में दो-तिहाई बहुमत यानी ’19’ का एक ऐसा गणित है, जिसने तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की रातों की नींद उड़ा रखी है। दरअसल, वर्तमान लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 निर्वाचित सांसद हैं। देश के कड़े दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद एक साथ अलग गुट नहीं बनाते हैं, तो उनकी संसद सदस्यता रद्द हो सकती है। ऐसे में टीएमसी के संसदीय दल को वैधानिक रूप से तोड़ने और कार्रवाई से बचने के लिए कम से कम 19 सांसदों के एक साथ आने की आवश्यकता है। सूत्रों का दावा है कि बागी गुट इसी जादुई आंकड़े को छूने की कवायद में जुटा हुआ है। संसदीय दल में संभावित बिखराव को रोकने और डैमेज कंट्रोल के लिए ममता बनर्जी ने बेहद आक्रामक और रणनीतिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आधिकारिक आवास पर राष्ट्रीय कार्यसमिति की एक आपात बैठक बुलाकर ममता बनर्जी ने संगठनात्मक स्तर पर बड़ा फेरबदल किया है। इस बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के पर कतरने के साफ संकेत मिले हैं। ममता बनर्जी ने अभिषेक के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन को पार्टी का नया संयुक्त राष्ट्रीय सचिव नियुक्त कर दिया है, जिसे सीधे तौर पर अभिषेक के अधिकारों में कटौती के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, सांसदों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच उपजे इस असंतोष की सबसे बड़ी वजह डायमंड हार्बर के सांसद अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली है। बागी गुट का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी का संगठन चलाने का तरीका बेहद एकाकी है और वे पुराने व वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर एक विशेष ‘सिंडिकेट’ के जरिए पार्टी पर नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं। इसी कार्यप्रणाली से नाराज होकर कूचबिहार के सांसद जगदीश चंद्र बसुनिया समेत पार्टी के कुछ अन्य सांसद इस समय दिल्ली में मौजूद हैं, हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे निजी दौरा बताया जा रहा है। इसके साथ ही बंगाल के दो बड़े अभिनेता-सांसदों के भी अगले कुछ दिनों में दिल्ली पहुंचने की संभावना है। इस राजनीतिक घमासान के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने संगठन के साथ खड़े होने का दावा किया है। सांसद सौगत रॉय ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि यह सब कुछ ‘ऑपरेशन लोटस’ का हिस्सा है, जिसके तहत धनबल और केंद्रीय एजेंसियों के डर का इस्तेमाल कर क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ने का प्रयास किया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि पार्टी इस चुनौती का मजबूती से सामना करेगी। वहीं दूसरी ओर, कृष्णानगर की सांसद महुआ मोइत्रा और बर्धमान-दुर्गापुर के सांसद कीर्ति आजाद ने भी ममता बनर्जी के नेतृत्व के प्रति अपनी अटूट निष्ठा व्यक्त की है। इस बीच, अपनी पार्टी को बिखरने से बचाने और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकजुटता का संदेश देने के लिए खुद ममता बनर्जी आठ जून को दिल्ली के दौरे पर आ रही हैं। वे यहां ‘इंडिया’ गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक में शामिल होंगी, जहां उनके साथ अभिषेक बनर्जी और डेरेक ओ ब्रायन भी मौजूद रहेंगे। दिल्ली दौरे के दौरान ममता बनर्जी अपने नाराज सांसदों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर उनकी शिकायतों को दूर करने का प्रयास भी कर सकती हैं, ताकि लोकसभा में किसी भी तरह के संभावित विभाजन को समय रहते टाला जा सके।
अंडर-18 एशिया कप हॉकी के फाइनल में पहुंचा भारत, रोमांचक सेमीफाइनल में पाकिस्तान को 5-3 से रौंदा

नई दिल्ली । भारतीय युवा हॉकी टीम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुए मेन्स अंडर-18 हॉकी एशिया कप 2026 के खिताबी मुकाबले में प्रवेश कर लिया है। कावासाकी हेवी इंडस्ट्रीज हॉकी स्टेडियम में खेले गए एक बेहद रोमांचक और हाई-वोल्टेज सेमीफाइनल मुकाबले में भारत ने चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को 5-3 से करारी शिकस्त दी। इस महामुकाबले में भारतीय टीम की जीत के सबसे बड़े नायक स्टार खिलाड़ी पूर्ति आशीष तानी रहे, जिन्होंने विरोधी टीम के डिफेंस को पूरी तरह से ध्वस्त करते हुए अकेले ही चार शानदार गोल दागे और पाकिस्तान की फाइनल में पहुंचने की उम्मीदों को तोड़ दिया। मैच की शुरुआत से ही दोनों पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली। पहले क्वार्टर में दोनों ही टीमों ने आक्रामक रणनीति अपनाई और एक-दूसरे के गोल पोस्ट पर लगातार हमले किए। मुकाबले के 12वें मिनट में भारतीय टीम को एक पेनल्टी स्ट्रोक हासिल हुआ, जिस पर पाकिस्तान ने अंपायर के फैसले के खिलाफ रिव्यू भी लिया। हालांकि, वीडियो अंपायर ने मैदानी अंपायर के फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद पूर्ति आशीष तानी ने बिना कोई गलती किए गेंद को गोल पोस्ट में डाल दिया और भारत को 1-0 की शुरुआती बढ़त दिला दी। दूसरे क्वार्टर में पाकिस्तानी टीम ने खेल की रफ्तार बढ़ाई और मैच में जोरदार वापसी की। इस दौरान पाकिस्तान को लगातार कई पेनल्टी कॉर्नर मिले, लेकिन भारतीय रक्षापंक्ति और गोलकीपर ने मुस्तैदी दिखाते हुए उनके हमलों को नाकाम कर दिया। हालांकि, खेल के 27वें मिनट में पाकिस्तान के अदील ने भारतीय डिफेंस में सेंध लगाते हुए एक बेहतरीन मैदानी गोल दागा और स्कोर को 1-1 की बराबरी पर ला दिया। हाफ टाइम तक दोनों ही टीमें बराबरी पर थीं और मैच का रुख किसी भी ओर पलट सकता था। तीसरे क्वार्टर में भारत ने एक बार फिर अपने आक्रमण को तेज किया, जिसके परिणामस्वरूप 35वें मिनट में अली शाहरुख ने गोल कर भारत को 2-1 से आगे कर दिया। भारत की यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी और महज दो मिनट बाद ही पाकिस्तान के मुहम्मद फरहान असलम ने गोल कर स्कोर फिर से 2-2 कर दिया। इसके बाद पाकिस्तान ने मैच में पहली बार मानसिक बढ़त हासिल की, जब 42वें मिनट में उजैर अहमद ने एक पेनल्टी कॉर्नर को गोल में तब्दील कर पाकिस्तान को 3-2 से आगे कर दिया। इस समय भारतीय टीम गहरे दबाव में नजर आ रही थी। मुकाबले के आखिरी और चौथे क्वार्टर में भारतीय युवाओं ने अपनी असली क्षमता और जुझारूपन का परिचय दिया। पूर्ति आशीष तानी ने पहले भारत को 3-3 की बराबरी दिलाई और फिर खेल के 53वें मिनट में अपना तीसरा गोल दागकर न केवल अपनी हैट्रिक पूरी की, बल्कि भारत को 4-3 की बेहद महत्वपूर्ण बढ़त भी दिला दी। इस अचानक हुए हमले से पाकिस्तानी टीम पूरी तरह बिखर गई और दबाव में आ गई। मैच के अंतिम पलों में तानी ने अपनी खेल प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए मैच का चौथा और टीम का पांचवां गोल दागकर भारत की 5-3 से जीत पूरी तरह सुनिश्चित कर दी। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही भारतीय टीम ने यह साबित कर दिया है कि यह युवा ब्रिगेड बड़े और दबाव वाले मुकाबलों में किसी भी विपरीत परिस्थिति से वापसी करने का माद्दा रखती है। अब भारतीय टीम का पूरा ध्यान खिताबी मुकाबले पर केंद्रित है, जहां शनिवार को इसी मैदान पर उसका सामना मेजबान जापान की मजबूत टीम से होना है। खेल प्रेमियों को उम्मीद है कि सेमीफाइनल के स्टार रहे पूर्ति आशीष तानी फाइनल मैच में भी अपनी इसी जादुई फॉर्म को जारी रखेंगे और देश के लिए एशिया कप का खिताब जीतकर लाएंगे।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर दिल्ली में भारी सुरक्षा बल तैनात, बिना औपचारिक अनुमति प्रदर्शन की तैयारी में जुटी कॉकरोच पार्टी

नई दिल्ली । राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में हुई कथित धांधलियों और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाले एक बड़े छात्र आंदोलन से पहले राजनीतिक समीकरण बदलने लगे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं के बीच तेजी से पहचान बनाने वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) को मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का समर्थन जुटाने के प्रयास में बड़ा झटका लगा है। देश के सबसे बड़े युवा संगठनों में से एक इंडियन यूथ कांग्रेस (आईवाईसी) ने इस नए गुट के साथ किसी भी प्रकार का राजनीतिक मंच साझा करने या उनके आंदोलन में सीधे तौर पर शामिल होने से पूरी तरह इनकार कर दिया है। इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम के पीछे दोनों संगठनों के शीर्ष पदाधिकारियों के बीच हुई एक बंद कमरे की बैठक को माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और रणनीतिकार हाल ही में यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब से मुलाकात करने पहुंचे थे। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य जमीनी स्तर पर बड़े आंदोलनों का अनुभव रखने वाले यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का संगठनात्मक सहयोग प्राप्त करना था। सीजेपी का मानना था कि ऑनलाइन लोकप्रियता को सड़क पर एक प्रभावी और अनुशासित भीड़ में बदलने के लिए उन्हें कांग्रेस के युवा मोर्चे के संगठनात्मक ढांचे और तजुर्बे की आवश्यकता होगी, जिससे उनकी स्वीकार्यता आम जनता के बीच और अधिक मजबूत हो सके। हालांकि, यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष उदय भानु चिब ने इस प्रकार के किसी भी गठबंधन की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के युवाओं और छात्रों से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे को उठाने वाले हर संगठन का वे व्यक्तिगत और नैतिक तौर पर स्वागत करते हैं, लेकिन उनकी पार्टी की नीति किसी अन्य नए या अपरिचित संगठन के मंच पर जाकर उनके नेतृत्व में आंदोलन करने की इजाजत नहीं देती। कांग्रेस के भीतर चल रही रणनीतिक चर्चाओं के अनुसार, पार्टी का थिंक-टैंक इस नए आंदोलन को लेकर बेहद सतर्क और आशंकित नजर आ रहा है। कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों को अंदेशा है कि सीजेपी का यह नया छात्र आंदोलन वर्ष 2011 में हुए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन की राह पर जा सकता है, जिसने तत्कालीन सरकार के खिलाफ माहौल बनाकर अंततः एक नए राजनीतिक दल को जन्म दिया था। कांग्रेस को खुफिया इनपुट मिले हैं कि इस नए संगठन के तार उनके कुछ प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंदियों से परोक्ष रूप से जुड़े हो सकते हैं। यही वजह है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपने सभी सदस्यों और जमीनी कार्यकर्ताओं को निर्देश जारी किए हैं कि वे इस आंदोलन से एक निश्चित दूरी बनाकर रखें और युवाओं के इस मुद्दे को अपने स्वतंत्र मंचों से उठाएं। इस राजनीतिक खींचतान के बीच दिल्ली का सुरक्षा तंत्र और पुलिस प्रशासन भी पूरी तरह से अलर्ट मोड पर आ गया है। आगामी छह जून को प्रस्तावित इस विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर नई दिल्ली और जंतर-मंतर के आसपास के संवेदनशील इलाकों में एक हजार से अधिक दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों को तैनात कर दिया गया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अड़े इस संगठन के प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस ने पूरी सुरक्षा घेराबंदी कर दी है ताकि लुटियंस दिल्ली की कानून व्यवस्था में किसी भी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न हो। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, पुलिस प्रशासन को इस प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन के बारे में अब तक केवल सोशल मीडिया पोस्ट और ऑनलाइन प्रसारित हो रहे संदेशों के माध्यम से ही सूचनाएं प्राप्त हुई हैं। अभिजीत दीपके के नेतृत्व वाले इस संगठन की ओर से अब तक पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने या किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को प्रदर्शन की अनुमति के लिए कोई औपचारिक आवेदन या सूचना पत्र नहीं सौंपा गया है। पुलिस ने साफ किया है कि बिना पूर्व अनुमति के किसी भी प्रकार के जमावड़े की इजाजत नहीं दी जाएगी, हालांकि यदि संगठन की ओर से औपचारिक अनुरोध आता है, तो सुरक्षा और रूट नियमों के आधार पर उस पर विचार किया जा सकता है।
ग्लोबल फाइनेंस में डॉलर की बादशाहत को झटका, पुतिन का दावा- ब्रिक्स देशों की बढ़ती ताकत के आगे पस्त हो रहा पश्चिमी देशों का दबदबा

नई दिल्ली । वैश्विक वित्तीय और व्यापारिक व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक बड़ा और तीखा बयान जारी किया है। सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम (SPIEF) के मुख्य सत्र को संबोधित करते हुए रूसी राष्ट्रपति ने दावा किया है कि दुनिया भर में अब डॉलर और यूरो जैसी पारंपरिक पश्चिमी मुद्राओं के प्रति अविश्वास तेजी से बढ़ रहा है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जा रहे एकतरफा प्रतिबंधों, आर्थिक नाकेबंदी और अन्य देशों की वैध संपत्तियों को फ्रीज करने की नीतियों के कारण दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाएं, विशेषकर ब्रिक्स (BRICS) गठबंधन के सदस्य देश अब अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं की ओर रुख कर रहे हैं। इस महत्वपूर्ण आर्थिक सत्र के दौरान, जिसकी कमान भारतीय मीडिया जगत से जुड़ी वरिष्ठ पत्रकार के हाथों में थी, राष्ट्रपति पुतिन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की बदलती दिशा का विस्तृत खाका पेश किया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की वित्तीय नीतियां बेहद अदूरदर्शी और राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं, जो मध्य पूर्व से लेकर यूरोप तक अस्थिरता पैदा कर रही हैं। यूक्रेन विवाद के बाद रूस के राष्ट्रीय आरक्षित कोष (रिजर्व फंड) को फ्रीज किए जाने की कार्रवाई को उन्होंने खुले तौर पर एक अंतरराष्ट्रीय ‘चोरी’ करार दिया। पुतिन ने चेतावनी दी कि इस कदम ने वैश्विक बैंकिंग और भुगतान प्रणालियों की निष्पक्षता पर एक ऐसा दाग लगा दिया है जिसे मिटाना अब मुमकिन नहीं है। रूसी राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि दुनिया का हर संप्रभु राष्ट्र अब यह भली-भांति समझ चुका है कि यदि वे पश्चिमी देशों के भू-राजनीतिक हितों के आड़े आते हैं, तो पलक झपकते ही उनकी भी अंतरराष्ट्रीय संपत्तियां जब्त की जा सकती हैं और उन्हें वैश्विक भुगतान नेटवर्क से बाहर किया जा सकता है। इसी डर और असुरक्षा के माहौल ने वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों के विकास को गति दी है। वर्तमान में विभिन्न देश आपस में व्यापारिक लेन-देन के लिए अपनी स्थानीय मुद्राओं का उपयोग बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही सेंट्रल बैंकों की डिजिटल करेंसी (CBDC) और डिजिटल वित्तीय संपत्तियों की भूमिका अंतरराष्ट्रीय व्यापार में तेजी से मुख्यधारा का हिस्सा बनती जा रही है। रूस की अपनी आर्थिक स्थिति का उदाहरण देते हुए पुतिन ने बताया कि आज उनका देश अपने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ रूबल और अन्य राष्ट्रीय मुद्राओं में रिकॉर्ड स्तर पर व्यापार कर रहा है। रूस के कुल निर्यात व्यापार का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा अब सीधे तौर पर उनकी अपनी मुद्रा रूबल में निष्पादित हो रहा है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था को पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद स्थिरता प्रदान की है। उन्होंने आंकड़ों के जरिए यह साबित करने का प्रयास किया कि विकसित देशों का समूह यानी जी7 (G7) अब ब्रिक्स देशों के आर्थिक उभार के सामने लगातार अपनी चमक खोता जा रहा है। आर्थिक विकास के वैश्विक आंकड़ों को साझा करते हुए रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले पांच वर्षों के दौरान वैश्विक जीडीपी विकास में अकेले ब्रिक्स देशों का योगदान 49 प्रतिशत रहा है, जबकि इसके मुकाबले जी7 देशों की हिस्सेदारी मात्र 18 फीसदी पर सिमट कर रह गई है। क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर देखें तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स की हिस्सेदारी अब बढ़कर 40 प्रतिशत हो चुकी है, जबकि जी7 देश अब 20 प्रतिशत से भी नीचे खिसक गए हैं। पुतिन ने अनुमान जताया कि आने वाले वर्षों में ब्रिक्स देशों की आर्थिक विकास दर चार प्रतिशत से अधिक रहेगी, जबकि पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएं बमुश्किल एक प्रतिशत की दर से आगे बढ़ पाएंगी। अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों के संबंध में बात करते हुए पुतिन ने कहा कि वैश्विक व्यापार और लॉजिस्टिक्स का केंद्र अब पूरी तरह से पूर्व और दक्षिण की ओर स्थानांतरित हो रहा है। ‘नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर’ और ‘ट्रांस-आर्कटिक ट्रांसपोर्टेशन रूट’ जैसे नए व्यापारिक रास्ते अब पश्चिमी नियंत्रण वाले पारंपरिक जलमार्गों और हब को पूरी तरह से दरकिनार कर रहे हैं। उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (WTO) पर भी दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि जब तक पश्चिमी देशों को इन वैश्विक संस्थाओं से लाभ मिल रहा था, तब तक उन्होंने नियमों की दुहाई दी, लेकिन जैसे ही उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलने लगी, वे खुद ही इन नियमों से पीछे हट गए हैं।
विश्व नंबर वन मैग्नस कार्लसन को दो बार चटाई धूल, 20 वर्षीय ग्रैंडमास्टर प्रज्ञानंद बने नॉर्वे शतरंज जीतने वाले पहले भारतीय

नई दिल्ली । वैश्विक शतरंज के मानचित्र पर भारत के युवा ग्रैंडमास्टर रमेशबाबू प्रज्ञानंद ने एक नया और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। ओस्लो में आयोजित अत्यंत प्रतिष्ठित और दुनिया के सबसे कठिन शतरंज आयोजनों में से एक ‘नॉर्वे शतरंज टूर्नामेंट’ का खिताब जीतकर प्रज्ञानंद ने इतिहास रच दिया है। इस अभूतपूर्व सफलता के साथ ही वह इस अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता को जीतने वाले देश के पहले भारतीय शतरंज खिलाड़ी बन गए हैं। भारत के महानतम खिलाड़ी और पूर्व विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद भी अपने करियर में इस प्रतिष्ठित खिताब को हासिल नहीं कर सके थे, जिससे इस 20 वर्षीय युवा खिलाड़ी की उपलब्धि का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। प्रतियोगिता का अंतिम और निर्णायक दौर बेहद रोमांचक और अत्यधिक दबाव वाला रहा। अंतिम दिन की शुरुआत से पहले प्रज्ञानंद कुल 15 अंकों के साथ तालिका में तीसरे स्थान पर चल रहे थे और खिताब की रेस में पिछड़ते दिख रहे थे। हालांकि, उन्होंने अंतिम राउंड में जर्मनी के मजबूत ग्रैंडमास्टर विंसेंट कीमर के खिलाफ उत्कृष्ट मानसिक सुदृढ़ता और रणनीतिक कौशल का प्रदर्शन किया। क्लासिकल मुकाबले में उन्होंने बेहद सधी हुई चालें चलते हुए कीमर को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इस शानदार क्लासिकल जीत की बदौलत प्रज्ञानंद को पूरे 3 अंक मिले, जिससे उनका कुल स्कोर 18 अंकों पर पहुंच गया और उन्होंने अंक तालिका में शीर्ष स्थान पर कब्जा जमा लिया। इस टूर्नामेंट के परिणाम को प्रभावित करने में अन्य वैश्विक मुकाबलों की भी बड़ी भूमिका रही। अमेरिका के दिग्गज ग्रैंडमास्टर वेसली सो अंतिम दिन अपनी बढ़त को बरकरार रखने में नाकाम रहे और उनका मुकाबला ड्रॉ पर समाप्त हुआ, जिसके बाद वे आर्मागेडन टाई-ब्रेक के फेर में फंस गए। वेसली सो की इस रणनीतिक चूक ने भारतीय ग्रैंडमास्टर के लिए खिताबी जीत के द्वार पूरी तरह खोल दिए। प्रज्ञानंद ने इस सुनहरे अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया और आक्रामक खेल दिखाते हुए अंक तालिका में निर्णायक बढ़त हासिल कर ली, जिसने उनकी खिताबी जीत पर मुहर लगा दी। इस पूरे टूर्नामेंट के दौरान प्रज्ञानंद की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि विश्व के नंबर एक खिलाड़ी और पांच बार के विश्व चैंपियन मैग्नस कार्लसन के खिलाफ रही। भारतीय युवा खिलाड़ी ने कार्लसन को उनके ही घरेलू मैदान पर एक नहीं बल्कि दो बार क्लासिकल मुकाबलों में शिकस्त देकर पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। विश्व नंबर वन खिलाड़ी को इस तरह लगातार दबाव में लाना प्रज्ञानंद की वैश्विक स्तर पर बढ़ती ताकत को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, इस टूर्नामेंट में भारत के नवनियुक्त विश्व चैंपियन डी गुकेश भी अपनी चुनौती पेश कर रहे थे, लेकिन उतार-चढ़ाव भरे प्रदर्शन के कारण वे खिताब की दौड़ से बाहर हो गए, जबकि प्रज्ञानंद ने भारतीय उम्मीदों को मजबूती से संभाला। प्रज्ञानंद के लिए इस महासमर की शुरुआत बेहद धीमी और औसत रही थी, जहां शुरुआती दौर में वे लय हासिल करने के लिए संघर्ष करते दिखे थे। इसके बावजूद, टूर्नामेंट के दूसरे हाफ में उन्होंने जिस तरह की ऐतिहासिक और अदम्य वापसी की, उसने खेल समीक्षकों को बेहद प्रभावित किया है। उनकी यह जीत केवल उनकी खेल प्रतिभा का नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में शांत रहकर सटीक निर्णय लेने की उनकी अद्वितीय मानसिक क्षमता का जीवंत प्रमाण है। इस खिताबी जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रज्ञानंद आने वाले समय में विश्व शतरंज पटल पर लंबे समय तक अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
JANTAR-MANTAR UPDATE: जंतर-मंतर पर तनाव: कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के खिलाफ लामबंदी, सोशल मीडिया पर लाठियां लेकर पहुंचने की दी गई खुली धमकी

JANTAR-MANTAR UPDATE: नई दिल्ली । देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर भारी राजनीतिक और सामाजिक तनाव का गवाह बनने जा रहा है। इंटरनेट जगत से शुरू होकर युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) ने शनिवार को दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया है। इस आंदोलन के जरिए देश की शिक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं को एकजुट करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, इस प्रदर्शन की घोषणा के साथ ही दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था और कानून व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी हो गई हैं क्योंकि कई संगठन इस आंदोलन के पुरजोर विरोध में उतर आए हैं। सोशल मीडिया मंचों पर पिछले चौबीस घंटों से कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध और समर्थन को लेकर एक बड़ी वैचारिक और हिंसक जंग छिड़ गई है। एक तरफ जहां देश के विभिन्न हिस्सों से छात्र और युवा इस प्रदर्शन का हिस्सा बनने के लिए दिल्ली पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ प्रमुख हिंदूवादी संगठनों और कार्यकर्ताओं ने इस आंदोलन को रोकने के लिए सीधे तौर पर बल प्रयोग की चेतावनी दी है। इंटरनेट पर ऐसे कई वीडियो और पोस्ट प्रसारित हो रहे हैं जिनमें कार्यकर्ताओं को लाठियां और डंडे लेकर जंतर-मंतर पहुंचने के लिए उकसाया जा रहा है। MP RAPE CASE: युवती बोली- धर्म बदलने और निकाह का बनाया दबाव, 24 घंटे में हुआ गिरफ्तार अपने तीखे और विवादित बयानों के लिए अक्सर चर्चा में रहने वाले हिंदू रक्षा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष पिंकी चौधरी ने इस मामले में खुलकर धमकी दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने आधिकारिक हैंडल से एक संदेश जारी करते हुए कहा है कि वे इस कॉकरोच जनता पार्टी के खेल को पूरी तरह समझ रहे हैं। चौधरी ने अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों से आह्वान किया है कि वे छह जून को पूरी ताकत के साथ और हाथों में लाठियां लेकर पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन और जंतर-मंतर पहुंचें। उन्होंने खुले तौर पर प्रदर्शनकारियों को सबक सिखाने और पीटने की बात कही है, जिससे माहौल में बेहद कड़वाहट आ गई है। पिंकी चौधरी के अलावा अवैध धार्मिक निर्माणों के खिलाफ कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले एक्टिविस्ट प्रीत सिरोही ने भी सीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सिरोही ने एक वीडियो संदेश जारी कर लोगों से बड़ी संख्या में लाठियों के साथ दिल्ली पहुंचने की अपील की है। उन्होंने कहा कि वे स्वयं जंतर-मंतर पर मुस्तैद रहेंगे और यदि प्रदर्शन के दौरान किसी भी व्यक्ति द्वारा देश विरोधी या समाज विरोधी बातें की गईं, तो वे चुप नहीं बैठेंगे और तुरंत बल प्रयोग का सहारा लिया जाएगा। इन बयानों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर दोनों पक्षों के बीच तनाव और अधिक गहरा गया है। इस भारी विरोध और हिंसा की धमकियों के बीच कॉकरोच जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने बेहद सधी हुई और शांतिपूर्ण प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने अमेरिका से भारत लौटने के बाद अपने समर्थकों से लगातार अपील की है कि वे किसी भी प्रकार के उकसावे में न आएं। पार्टी प्रवक्ताओं ने आधिकारिक बयान जारी कर कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया है कि पूरा प्रदर्शन पूरी तरह से अहिंसक, अनुशासित और संवैधानिक दायरे में होना चाहिए। समर्थकों से हाथ में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा और किताबें लेकर आने को कहा गया है। Guna neet Student Accident: आधे घंटे तक रेल्वी ट्रैक पर तड़पती रही छात्रा, किसी ने नहीं की मदद पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को विशेष रूप से सतर्क रहने की सलाह देते हुए कहा है कि वे प्रदर्शन के दौरान अपने मोबाइल फोन से लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग करते रहें। सीजेपी नेतृत्व को अंदेशा है कि कुछ असामाजिक तत्व उनके शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने या उसमें हिंसा भड़काने के उद्देश्य से भीड़ में शामिल हो सकते हैं। ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पार्टी ने पुलिस प्रशासन पर भरोसा जताया है और समर्थकों से कहा है कि यदि कोई भी संदिग्ध गतिविधि दिखे, तो उसका वीडियो बनाकर तुरंत वहां तैनात पुलिसकर्मियों को सौंप दिया जाए ताकि कानून सम्मत कार्रवाई की जा सके।
राजामौली की 'वाराणसी' में दिखेगा राम-कुंभकर्ण का महायुद्ध, लेखक विजयेंद्र प्रसाद ने दिए 30 मिनट के रोंगटे खड़े कर देने वाले सीक्वेंस के संकेत

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा जगत में अपनी भव्य और रिकॉर्डतोड़ फिल्मों के लिए मशहूर निर्देशक एसएस राजामौली की आगामी फिल्म ‘वाराणसी’ इन दिनों लगातार चर्चा का केंद्र बनी हुई है। पिछले साल हैदराबाद में इस फिल्म का पहला टीजर रिलीज होने के बाद से ही दर्शक इसके हर एक दृश्य को बारीकी से समझने का प्रयास कर रहे हैं। अब इस फिल्म को लेकर एक बेहद बड़ा और चौंकाने वाला अपडेट सामने आया है, जिसने सिनेमा प्रेमियों के बीच उत्सुकता को कई गुना बढ़ा दिया है। फिल्म के लेखक और राजामौली के पिता के. विजयेंद्र प्रसाद ने फिल्म के एक बेहद महत्वपूर्ण और भव्य एक्शन सीक्वेंस का हिंट दिया है। एक विशेष कार्यक्रम के दौरान जब विजयेंद्र प्रसाद से पूछा गया कि वह इस फिल्म के किस खास दृश्य के बारे में दर्शकों को थोड़ा संकेत देना चाहेंगे, तो उन्होंने सीधे तौर पर राम और कुंभकर्ण के बीच होने वाले महायुद्ध का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि फिल्म में यह युद्ध का सीक्वेंस लगभग 30 मिनट लंबा होने वाला है। लेखक के अनुसार, यह आधा घंटा दर्शकों को पूरी तरह से मंत्रमुग्ध कर देगा और उनके रोंगटे खड़े कर देगा। इस खुलासे के बाद से ही सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई है कि आखिर फिल्म में कुंभकर्ण का ताकतवर किरदार कौन सा अभिनेता निभाने जा रहा है, जिसमें अभिनेता पृथ्वीराज के नाम की चर्चा सबसे आगे है। विजयेंद्र प्रसाद ने फिल्म के टीजर का संदर्भ देते हुए कहा कि दर्शकों ने पहले ही इसकी एक छोटी सी झलक देखी है, जिसमें राम और कुंभकर्ण के आमने-सामने होने के साथ-साथ हनुमान जी की पूंछ और उस पर एक रथ दिखाई दे रहा है। जब उनसे यह जानने का प्रयास किया गया कि क्या इस फिल्म की कहानी में अलग-अलग टाइम जोन्स या समय काल का कोई कॉन्सेप्ट शामिल है, तो उन्होंने इस पर अधिक जानकारी देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि फिल्म की गोपनीयता बनाए रखने के लिए फिलहाल इस विषय पर अधिक बात करना सही नहीं होगा, जिससे साफ है कि मेकर्स दर्शकों के लिए पर्दे पर बड़ा सरप्राइज प्लान कर रहे हैं। इस बीच निर्देशक एसएस राजामौली ने भी फिल्म के मुख्य अभिनेता महेश बाबू के लुक को लेकर अपनी भावनाएं साझा की हैं। राजामौली ने बताया कि जब पहले दिन महेश बाबू भगवान राम के लुक में फोटोशूट के लिए सेट पर आए, तो उनका वह रूप देखकर खुद निर्देशक के भी रोंगटे खड़े हो गए थे। उन्होंने कहा कि महेश बाबू के व्यक्तित्व में भगवान कृष्ण का आकर्षण और भगवान राम की असीम शांति एक साथ दिखाई देती है, जो इस किरदार के लिए पूरी तरह न्याय करती है। राजामौली ने उस लुक की तस्वीर को कुछ समय के लिए अपने फोन का वॉलपेपर भी बनाया था ताकि वे इसे बार-बार देख सकें, लेकिन बाद में गोपनीयता के कारण हटा दिया। ‘आरआरआर’ जैसी फिल्म से वैश्विक स्तर पर देश को ऑस्कर दिलाने वाले राजामौली इस बार ‘वाराणसी’ के जरिए तकनीकी और कहानी के स्तर पर एक नया कीर्तिमान स्थापित करने की तैयारी में हैं। फिल्म में पहली बार कुछ ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो भारतीय सिनेमा में पहले कभी नहीं देखी गईं। प्रियंका चोपड़ा और महेश बाबू स्टारर इस फिल्म की रिलीज डेट की घोषणा के बाद से ही ट्रेड एनालिस्ट्स इसे आने वाले समय की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर मान रहे हैं। विजयेंद्र प्रसाद और राजामौली की यह जोड़ी एक बार फिर इतिहास दोहराने के लिए पूरी तरह तैयार है।
डेटा आधारित वित्तीय शासन को मिलेगा नया आधार, राज्य वित्त आयोगों के लिए केंद्र जारी करेगा अहम रिपोर्ट

नई दिल्ली । देश में वित्तीय विकेंद्रीकरण को अधिक मजबूत, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में केंद्र सरकार एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रही है। स्थानीय निकायों की वित्तीय व्यवस्था को बेहतर आधार देने और राज्य वित्त आयोगों की कार्यक्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार की गई एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सोमवार को जारी की जाएगी। इस रिपोर्ट को स्थानीय शासन व्यवस्था में सुधार और साक्ष्य आधारित वित्तीय निर्णय प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा रहा है। रिपोर्ट का विमोचन मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन द्वारा किया जाएगा। इस अवसर पर पंचायती राज मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, सार्वजनिक वित्त विशेषज्ञ और नीति निर्माण से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम के दौरान डेटा आधारित नीतिनिर्माण, वित्तीय प्रबंधन और स्थानीय शासन में तकनीकी एवं सांख्यिकीय ढांचे की भूमिका पर भी चर्चा होने की संभावना है। केंद्र सरकार का मानना है कि मजबूत लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण केवल वित्तीय संसाधनों के हस्तांतरण तक सीमित नहीं है। इसके लिए स्थानीय निकायों के पास विश्वसनीय, अद्यतन और व्यापक आंकड़ों की उपलब्धता भी आवश्यक है। इसी सोच के साथ तैयार की गई रिपोर्ट राज्य वित्त आयोगों के लिए डेटा संग्रहण और उपयोग की एक व्यवस्थित रूपरेखा प्रस्तुत करती है, जिससे उनकी सिफारिशें अधिक सटीक और प्रभावी बन सकें। रिपोर्ट में विभिन्न विभागों और संस्थाओं के बीच डेटा साझा करने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके साथ ही आंकड़ों के मानकीकरण, विभिन्न डिजिटल प्रणालियों के बीच समन्वय बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर वित्तीय विश्लेषण की क्षमता विकसित करने से जुड़े सुझाव भी शामिल किए गए हैं। माना जा रहा है कि इन उपायों से आयोगों को निर्णय लेने के लिए अधिक भरोसेमंद और उपयोगी जानकारी उपलब्ध होगी। राज्य वित्त आयोग संविधान के तहत गठित महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाएं हैं, जिनकी भूमिका पंचायतों और अन्य स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन करने तथा संसाधनों के वितरण संबंधी सिफारिशें तैयार करने की होती है। ग्रामीण और शहरी विकास योजनाओं के प्रभावी संचालन में इन आयोगों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इनके सुझावों के आधार पर स्थानीय प्रशासन को वित्तीय संसाधनों का बेहतर आवंटन सुनिश्चित किया जाता है। पंचायती राज मंत्रालय के अनुसार राज्य वित्त आयोगों को अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए राजस्व, व्यय, जनसंख्या, आधारभूत संरचना, सेवा वितरण और परिसंपत्ति प्रबंधन जैसे क्षेत्रों से जुड़े विस्तृत आंकड़ों की आवश्यकता होती है। हालांकि कई राज्यों में विभिन्न विभागों से समय पर डेटा प्राप्त करने में कठिनाइयां सामने आती रही हैं, जिसके कारण आयोगों की सिफारिशों की गुणवत्ता और समयबद्धता प्रभावित होती है। इन्हीं चुनौतियों को दूर करने के उद्देश्य से विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया था। समिति ने विभिन्न राज्यों के अनुभवों और मौजूदा डेटा प्रणालियों का अध्ययन करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट में ऐसे व्यावहारिक उपाय सुझाए गए हैं जिनसे डेटा प्रबंधन प्रक्रिया को अधिक सक्षम और उपयोगी बनाया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि रिपोर्ट की सिफारिशें लागू होने के बाद राज्य वित्त आयोगों को बेहतर डेटा उपलब्ध होगा, जिससे स्थानीय निकायों के लिए अधिक सटीक वित्तीय सुझाव तैयार किए जा सकेंगे। इससे विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सुधार आएगा और वित्तीय संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही देश में वित्तीय विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को भी नई मजबूती मिलेगी।