Chambalkichugli.com

ग्रेनाइट खदान बनी काल 40 फीट ऊंचाई से गिरी चट्टान ट्रैक्टर के हुए टुकड़े मध्य प्रदेश के 5 मजदूरों सहित 7 की मौत

मध्यप्रदेश । कर्नाटक के बेंगलुरु के निकट स्थित मदापट्टना की एक ग्रेनाइट खदान में गुरुवार को हुए भीषण हादसे ने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं। करीब 40 फीट ऊंचाई से विशाल चट्टान गिरने से मध्य प्रदेश के पांच मजदूरों समेत सात लोगों की मौके पर ही मौत हो गई जबकि पांच अन्य मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसा इतना भयावह था कि चट्टान की चपेट में आने से ट्रैक्टर और लोडिंग वाहन पूरी तरह टूटकर कई हिस्सों में बिखर गए। खदान में काम कर रहे मजदूरों के बीच अफरा तफरी मच गई और हर तरफ चीख पुकार सुनाई देने लगी। हादसे के समय खदान में करीब 16 मजदूर पत्थर निकालने का काम कर रहे थे। शुरुआती जानकारी के अनुसार ऊपरी हिस्से में ड्रिलिंग का कार्य चल रहा था तभी अचानक विशाल ग्रेनाइट चट्टान खिसककर नीचे आ गिरी। नीचे काम कर रहे मजदूरों को संभलने का मौका भी नहीं मिला और कई लोग भारी मलबे के नीचे दब गए। राहत एवं बचाव दल ने कई घंटे तक अभियान चलाकर घायलों और मृतकों को बाहर निकाला। गंभीर रूप से घायल मजदूरों को तुरंत नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया जहां उनका इलाज जारी है। इस हादसे में जान गंवाने वाले पांचों मजदूर मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के जैतहरी क्षेत्र के रहने वाले थे। मृतकों की पहचान भुवनेश्वर सिंह गौंड राजपाल सिंह रामअवतार सिंह और राजेश प्रसाद चौधरी के रूप में हुई है जबकि एक अन्य मृतक की पहचान की प्रक्रिया जारी है। वहीं गुलाब सिंह राजपाल सिंह और छोटू लाल सहित कई मजदूर घायल हुए हैं। बताया जा रहा है कि अधिकांश मजदूर बेहतर रोजगार और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए कर्नाटक में काम करने गए थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार चट्टान का वजन इतना अधिक था कि उसकी चपेट में आते ही ट्रैक्टर और अन्य मशीनें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। कई मजदूरों के सिर हाथ और पैरों में गंभीर चोटें आईं। अस्पताल और खदान परिसर में मौजूद परिजनों का रो रोकर बुरा हाल था। एक मृतक के परिवार ने बताया कि वह बेटियों की शादी के बाद हुए कर्ज को चुकाने के लिए मजदूरी करने गया था लेकिन अब परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य भी नहीं रहा। हादसे के बाद कर्नाटक सरकार ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं। मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि प्रारंभिक जांच में ब्लास्टिंग की बजाय चट्टान खिसकने या मिट्टी धंसने की आशंका सामने आई है। विस्तृत जांच रिपोर्ट के आधार पर वास्तविक कारण स्पष्ट होगा और भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए नए सुरक्षा मानक लागू किए जाएंगे। उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वर ने खदान की अनुमति देने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कराने के निर्देश दिए हैं। मध्य प्रदेश के श्रम मंत्री प्रहलाद पटेल ने बताया कि राज्य सरकार लगातार कर्नाटक प्रशासन के संपर्क में है और मृतकों तथा घायलों से जुड़ी पूरी जानकारी जुटाई जा रही है। खदान मालिक ने मृतकों के परिजनों को दस दस लाख रुपए तथा घायलों को पांच पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। यह दर्दनाक हादसा एक बार फिर खनन क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था और मजदूरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

आषाढ़ मास की योगिनी एकादशी पर बन रहा विशेष संयोग; गृहस्थों और वैष्णव संप्रदाय के लिए पंचांग ने जारी किए अलग-अलग शुभ मुहूर्त

नई दिल्ली । सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना और आत्मशुद्धि के लिए सबसे उत्तम और पवित्र दिनों में गिना जाता है। इसी कड़ी में आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली योगिनी एकादशी का स्थान बेहद विशिष्ट माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में इसे समस्त कष्टों और अनजाने में हुए पापों को दूर करने वाला एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत बताया गया है। इस वर्ष वर्ष 2026 में एक खास ज्योतिषीय और खगोलीय स्थिति बन रही है, क्योंकि एकादशी तिथि 10 जुलाई और 11 जुलाई, दोनों ही तारीखों को स्पर्श कर रही है। इसी तिथि विस्तार के कारण देश भर के श्रद्धालुओं और व्रत रखने वाले परिवारों के मन में सही तारीख को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। वैदिक पंचांग की गणना और शास्त्रों के नियमों के आधार पर ज्योतिषाचार्यों ने इस भ्रम को दूर करते हुए सही तिथि और शुभ मुहूर्त का निर्धारण किया है। वैदिक पंचांग की गणितीय गणना के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर होने जा रहा है। यह तिथि अगले दिन यानी 11 जुलाई 2026, शनिवार की सुबह 5 बजकर 23 मिनट तक प्रभावी बनी रहेगी, जिसके तत्काल बाद द्वादशी तिथि का आगमन हो जाएगा। इस बार एक अनोखा ज्योतिषीय संयोग यह देखने को मिल रहा है कि दोनों ही दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि पूर्ण रूप से उपस्थित नहीं रहेगी। 11 जुलाई को सूर्योदय होने से पूर्व ही एकादशी तिथि समाप्त हो जाएगी और द्वादशी का आरंभ हो जाएगा। शास्त्रों में इस तरह की स्थिति को तकनीकी रूप से एकादशी क्षय की संज्ञा दी जाती है। शास्त्रों और पुराणों में वर्णित नियमों के अनुसार, जब ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जहां किसी भी दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि पूर्ण रूप से उपलब्ध न हो, तब पहले दिन ही व्रत रखने का विधान सबसे श्रेष्ठ और उत्तम माना गया है। इस शास्त्रीय मान्यता और पंचांगीय गणना के आधार पर गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले सामान्य श्रद्धालुओं के लिए 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को योगिनी एकादशी का व्रत रखना पूरी तरह से शास्त्र-सम्मत और उचित रहेगा। वहीं दूसरी ओर, वैष्णव संप्रदाय और सन्यासी परंपरा का पालन करने वाले श्रद्धालु 11 जुलाई 2026, शनिवार को इस पावन व्रत का संपादन करेंगे। धार्मिक नियमों के अनुसार, योगिनी एकादशी व्रत के कड़े आचरण और संयम की शुरुआत एक दिन पूर्व यानी दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाती है। दशमी के दिन व्रती को पूरी तरह से सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और हर प्रकार के तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए। इस दौरान मूंग, मसूर, गेहूं, जौ और बैंगन जैसी चीजों का सेवन वर्जित माना गया है। एकादशी के मुख्य दिन श्रद्धालुओं को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा स्थल पर कलश की स्थापना कर भगवान विष्णु के स्वरूप की विधिवत आराधना की जाती है, जिसमें पीले पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित किया जाता है। पूजा के दौरान विष्णु मंत्रों का जाप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इस व्रत के दौरान कुछ विशेष और कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है, जिसमें सबसे प्रमुख चावल का त्याग है। एकादशी के दिन व्रती के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भी चावल का सेवन वर्जित रहता है। इसके अतिरिक्त, एकादशी और द्वादशी दोनों ही दिनों में तुलसी दल यानी तुलसी के पत्ते तोड़ना पूरी तरह निषेध माना गया है, इसलिए पूजा के लिए आवश्यक पत्तों को एक दिन पूर्व ही तोड़कर सुरक्षित रख लेना चाहिए। व्रत का समापन अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पारण करके किया जाता है। पारण से पूर्व अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को अन्न और धन का दान देना पद्म पुराण के अनुसार अत्यंत कल्याणकारी माना गया है, जो मानव जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

मध्य प्रदेश की सियासत में नए संकेत सीएम के मंच पर कांग्रेस विधायक कैलाश के बदले तेवर और साउथ में छाए शिवराज

मध्यप्रदेश । मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर ऐसे घटनाक्रम देखने को मिले जिन्होंने सियासी गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। कहीं मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में कांग्रेस विधायक की सक्रिय मौजूदगी चर्चा का विषय बनी तो कहीं मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का बदला हुआ अंदाज लोगों की नजरों में रहा। वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का लोकप्रिय मामा वाला अंदाज अब दक्षिण भारत तक पहुंचता दिखाई दिया। इन घटनाओं ने प्रदेश की राजनीति में नए राजनीतिक संकेतों को लेकर अटकलों का दौर तेज कर दिया है। सिवनी में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस विधायक ठाकुर रजनीश सिंह पूरे समय मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के आसपास सक्रिय दिखाई दिए। कार्यक्रम में विधायक कभी मुख्यमंत्री के पीछे तो कभी उनके आगे चलते नजर आए। मंच पर भी उन्होंने मुख्यमंत्री से बातचीत करने की कोशिश की लेकिन मुख्यमंत्री अपना संबोधन समाप्त कर आगे बढ़ गए। यह दृश्य इसलिए भी खास माना गया क्योंकि कार्यक्रम शुरू होने से पहले यही विधायक मुख्यमंत्री की नीतियों के विरोध में सड़क पर प्रदर्शन करते नजर आए थे। विरोध के बाद उसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के साथ उनकी सहज मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया। राजनीतिक जानकार इसे बदलते राजनीतिक समीकरणों और व्यावहारिक राजनीति का उदाहरण मान रहे हैं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री को पत्र लिखने के विवाद के बाद नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का बदला हुआ अंदाज भी चर्चा में रहा। भाजपा प्रदेश कार्यालय में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने लगभग हर सवाल का जवाब मुस्कुराते हुए दिया। मुख्यमंत्री को लिखी चिट्ठी पर उन्होंने कहा कि अब यह अध्याय समाप्त हो चुका है। इंदौर में मुख्यमंत्री की बैठक रद्द होने के सवाल पर उन्होंने जिम्मेदारी बैठक तय करने वालों पर डाल दी। मंत्रिमंडल विस्तार और अन्य राजनीतिक मुद्दों पर भी उन्होंने हल्के अंदाज में जवाब दिए लेकिन पूरे समय उनके चेहरे पर मुस्कान बनी रही। राजनीतिक विश्लेषक इसे संयमित रणनीति और विवादों से दूरी बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। उधर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का लोकप्रिय मामा वाला अंदाज अब मध्य प्रदेश की सीमाओं से बाहर भी लोगों के बीच पहचान बना रहा है। आंध्र प्रदेश के तिरुपति में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जैसे ही लोग उन्हें देखने पहुंचे भीड़ से मामा मामा के नारे गूंजने लगे। लोगों के उत्साह को देखते हुए शिवराज सिंह चौहान भी सीधे उनके बीच पहुंचे और सभी का अभिवादन स्वीकार किया। उनका सहज और आत्मीय व्यवहार एक बार फिर लोगों का ध्यान खींचने में सफल रहा। भाजपा नेताओं का मानना है कि शिवराज की यही जनसंपर्क शैली उन्हें देशभर में अलग पहचान दिला रही है। इसी बीच प्रदेश की नौकरशाही में भी एक रोचक चर्चा सामने आई। राज्य पुलिस सेवा के एक अधिकारी को कुछ दिनों तक आईपीएस बनने की बधाइयां मिलती रहीं लेकिन बाद में स्पष्ट हुआ कि उनका नाम अंतिम सूची में शामिल ही नहीं था। इसके बाद यह मामला भी प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। प्रदेश की राजनीति में लगातार सामने आ रहे ऐसे घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में राजनीतिक गतिविधियां और भी तेज होने वाली हैं। नेताओं की सक्रियता बदलते व्यवहार और नए राजनीतिक संदेश अब सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए अहम मायने रखने लगे हैं।

बारिश बनी आफत मध्य प्रदेश के कई जिले जलमग्न शिप्रा उफान पर मकान बहे खेत डूबे अगले 24 घंटे बेहद भारी

मध्यप्रदेश । मध्य प्रदेश में मानसून अब पूरी तरह सक्रिय हो चुका है और लगातार हो रही तेज बारिश ने कई जिलों में जनजीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया है। उज्जैन से लेकर पांढुर्णा खरगोन बालाघाट और ग्वालियर तक बारिश ने तबाही का मंजर खड़ा कर दिया है। नदियां उफान पर हैं सड़कें जलमग्न हो गई हैं खेतों में पानी भर गया है और कई इलाकों में लोगों का आवागमन पूरी तरह बाधित हो गया है। मौसम विभाग ने अगले चौबीस घंटे को बेहद संवेदनशील बताते हुए कई जिलों के लिए रेड और ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। उज्जैन में लगातार हुई मूसलाधार बारिश के कारण शिप्रा नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ गया। नदी किनारे बने कई मंदिर पानी में डूब गए जिससे श्रद्धालुओं की आवाजाही भी प्रभावित हुई। इसी दौरान गांवड़ी लोढ़ा क्षेत्र में एक सहायक सचिव बाइक सहित तेज बहाव में बह गए जिनकी तलाश के लिए राहत और बचाव दल लगातार अभियान चला रहा है। एक अन्य घटना में पुलिया पार करते समय एक युवक मोटरसाइकिल सहित तेज धारा में बह गया लेकिन उसने पेड़ की टहनियों का सहारा लेकर अपनी जान बचा ली। इस घटना का वीडियो भी सामने आया है जिसने लोगों को झकझोर दिया। इंदौर में भी बारिश का असर गंभीर रहा जहां दो दिन पहले पानी में बहे एक व्यक्ति का शव काफी तलाश के बाद बरामद किया गया। पांढुर्णा जिले में नदी के किनारे बने कई कच्चे मकान तेज बहाव में ढह गए जबकि घरेलू सामान और पशु भी पानी में बह गए। खरगोन के कसरावद क्षेत्र में कुछ घंटों की तेज बारिश ने खेतों और सड़कों को जलमग्न कर दिया। बालाघाट के कई वार्डों में जलभराव के कारण लोगों को घरों से निकलना मुश्किल हो गया। ग्वालियर रतलाम और अन्य जिलों में भी लगातार बारिश का दौर जारी है। मौसम विभाग के अनुसार खंडवा और हरदा में अति भारी बारिश की संभावना को देखते हुए रेड अलर्ट जारी किया गया है। धार बड़वानी खरगोन देवास बुरहानपुर और बैतूल सहित कई जिलों में भी अत्यधिक वर्षा होने का अनुमान है। वहीं उज्जैन रतलाम राजगढ़ रायसेन नर्मदापुरम सागर छिंदवाड़ा बालाघाट डिंडौरी और अनूपपुर सहित अनेक जिलों में भारी बारिश की चेतावनी जारी की गई है। विभाग का कहना है कि कुछ स्थानों पर चार से आठ इंच तक बारिश दर्ज हो सकती है जिससे नदियों और जलाशयों का जलस्तर और बढ़ सकता है। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे नदी नालों और पुलियाओं को पार करने का प्रयास न करें तथा मौसम विभाग और स्थानीय प्रशासन की सलाह का पालन करें। निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है। राहत और बचाव दल लगातार संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत सहायता पहुंचाई जा सके। मानसून की यह सक्रियता कृषि के लिए राहत लेकर आई है लेकिन कई क्षेत्रों में यह बारिश अब संकट का रूप ले चुकी है। यदि अगले कुछ दिनों तक वर्षा का यही सिलसिला जारी रहा तो बाढ़ और जलभराव की स्थिति और गंभीर हो सकती है। ऐसे में नागरिकों की सतर्कता और प्रशासन की सक्रियता ही संभावित नुकसान को कम करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगी।

क्रिस्टियानो रोनाल्डो का कमाल और गोंसालो रामोस का कहर; क्रोएशिया को रोमांचक मुकाबले में हराकर पुर्तगाल सेमीफाइनल में पहुंचा

नई दिल्ली । फीफा विश्व कप 2026 से एक बेहद रोमांचक और दिल दहला देने वाला परिणाम सामने आया है, जहां पुर्तगाल ने एक कड़े मुकाबले में क्रोएशियाई टीम को शिकस्त देकर सेमीफाइनल का टिकट पक्का कर लिया है। पूरे मैच के दौरान दोनों टीमों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली, लेकिन अंतिम क्षणों में पुर्तगाल के रणनीतिक खेल और आक्रामक रुख ने मैच का पासा पूरी तरह पलट दिया। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही पुर्तगाल ने क्रोएशिया का विश्व विजेता बनने का सपना आखिरी मिनटों में तोड़ दिया और अब खिताबी दौड़ के अगले चरण में उसका सामना मजबूत स्पेनिश टीम से होने जा रहा है। इस मुकाबले में पुर्तगाल के स्टार फॉरवर्ड क्रिस्टियानो रोनाल्डो और युवा सनसनी गोंसालो रामोस ने अपनी टीम के लिए सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मैच की शुरुआत से ही क्रोएशिया के मजबूत डिफेंस ने पुर्तगाली आक्रमण को रोकने की हरसंभव कोशिश की और ल्यूका मॉड्रिच के नेतृत्व में कुछ बेहतरीन काउंटर-अटैक भी किए। खेल के अधिकांश समय दोनों टीमें एक-दूसरे पर बढ़त बनाने के लिए संघर्ष करती रहीं और मुकाबला बराबरी पर चलता रहा। मैदान पर मौजूद दर्शकों को एक बेहद कड़ा और रक्षात्मक खेल देखने को मिल रहा था, जहां कोई भी टीम गलती करने को तैयार नहीं थी। मैच के अंतिम मिनटों में पुर्तगाल ने अपने आक्रमण को और तेज किया, जिसका नेतृत्व स्वयं क्रिस्टियानो रोनाल्डो कर रहे थे। रोनाल्डो के बेहतरीन पासिंग गेम और मैदान पर उनकी जादुई उपस्थिति ने क्रोएशियाई रक्षकों पर भारी दबाव बना दिया। इसी दबाव का फायदा उठाते हुए गोंसालो रामोस ने विपक्षी टीम के खेमे में तहलका मचा दिया और अंतिम सीटी बजने से ठीक पहले एक शानदार मैदानी गोल दागकर अपनी टीम को निर्णायक बढ़त दिला दी। क्रोएशिया की टीम इस अप्रत्याशित गोल के बाद संभलने का मौका भी नहीं पा सकी और निर्धारित समय समाप्त होने के साथ ही मुकाबला पुर्तगाल के पक्ष में चला गया। क्रोएशियाई टीम के लिए यह हार बेहद निराशाजनक रही, क्योंकि उनके अनुभवी खिलाड़ियों ने मैच को अतिरिक्त समय में खींचने और पेनल्टी शूटआउट तक ले जाने की पूरी रणनीति बना ली थी। अंतिम पलों में रक्षापंक्ति की एक छोटी सी चूक ने उनकी पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया। इस जीत के साथ ही पुर्तगाल ने टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में अपनी जगह सुरक्षित कर ली है। अब फुटबॉल प्रशंसकों की निगाहें पुर्तगाल और स्पेन के बीच होने वाले महामुकाबले पर टिक गई हैं, जिसे इस विश्व कप का सबसे बड़ा और कड़ा मुकाबला माना जा रहा है।

मध्यप्रदेश में UCC लागू करने की तैयारी तेज शादी लिव इन और तलाक के लिए बनेंगे एक समान कानून गुजरात मॉडल पर तैयार ड्राफ्ट

मध्यप्रदेश । मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम बढ़ा दिया है। राज्य के लिए यूसीसी का प्रारूप तैयार हो चुका है और इसे मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के समक्ष प्रस्तुत भी किया गया है। मुख्यमंत्री की ओर से दिए गए सुझावों को शामिल करने के बाद समिति अंतिम ड्राफ्ट सरकार को सौंपेगी। माना जा रहा है कि यह कानून लागू होने के बाद शादी तलाक लिव इन रिलेशनशिप उत्तराधिकार और वसीयत जैसे पारिवारिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करेगा। सूत्रों के अनुसार मध्यप्रदेश का प्रस्तावित यूसीसी काफी हद तक गुजरात में लागू समान नागरिक संहिता के मॉडल पर आधारित है। बताया जा रहा है कि ड्राफ्ट के अधिकांश प्रावधान गुजरात कानून से प्रेरित हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह है कि धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासी भी इस कानून के दायरे में आएंगे जबकि अपनी पारंपरिक जनजातीय रीति रिवाजों का पालन करने वाले आदिवासियों को इससे बाहर रखा जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार धार्मिक परंपराओं में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। सभी समुदाय अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार विवाह कर सकेंगे। हिंदू विवाह के फेरे मुस्लिम निकाह सिख आनंद कारज ईसाई चर्च विवाह और अन्य मान्य पद्धतियां पहले की तरह जारी रहेंगी। अंतर केवल इतना होगा कि विवाह से जुड़े कानूनी अधिकार और जिम्मेदारियां सभी नागरिकों के लिए समान होंगी। ड्राफ्ट में प्रत्येक विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रावधान रखा गया है। विवाह होने के 60 दिन के भीतर उसका रजिस्ट्रेशन कराना होगा। यदि निर्धारित समय में पंजीकरण नहीं हो पाता है तो बाद में तय प्रक्रिया के तहत इसे कराया जा सकेगा। हालांकि केवल रजिस्ट्रेशन न होने से विवाह अमान्य नहीं माना जाएगा लेकिन नियमों का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई संभव होगी। नई शादियों के साथ पहले से हुए विवाह और तलाक का भी सरकारी रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा ताकि भविष्य में दस्तावेजों और कानूनी विवादों में पारदर्शिता बनी रहे। यूसीसी के तहत पति पत्नी और बच्चों के अधिकारों को लेकर भी समान नियम प्रस्तावित किए गए हैं। भरण पोषण की परिभाषा केवल भोजन और आवास तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि शिक्षा स्वास्थ्य वस्त्र और अन्य आवश्यक जरूरतें भी इसमें शामिल होंगी। अदालत परिस्थितियों के अनुसार स्थायी गुजारा भत्ता तय कर सकेगी। बच्चों की अभिरक्षा और देखभाल से जुड़े मामलों में भी समान कानूनी प्रावधान लागू होंगे। संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में भी एक समान नियम लागू करने की तैयारी है। यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत के निधन करता है तो उसकी संपत्ति का बंटवारा तय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होगा। गर्भ में पल रहे बच्चे के अधिकारों को भी मान्यता दी जाएगी। वहीं यदि कोई व्यक्ति मृतक की हत्या का दोषी पाया जाता है तो उसे संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलेगा। बीमारी या शारीरिक दिव्यांगता के आधार पर किसी भी उत्तराधिकारी के अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकेंगे। ड्राफ्ट में वसीयत तैयार करने उसे संशोधित करने या निरस्त करने की प्रक्रिया भी स्पष्ट की गई है। यदि किसी वसीयत के पीछे दबाव धोखाधड़ी या जबरदस्ती साबित होती है तो उसे अमान्य माना जाएगा। संपत्ति विवाद की स्थिति में अदालत संपत्ति की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठा सकेगी और जरूरत पड़ने पर संरक्षक नियुक्त कर सकेगी। प्रस्तावित कानून के तहत शादी तलाक और अन्य पारिवारिक मामलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। इसके लिए रजिस्ट्रार जनरल और रजिस्ट्रार की नियुक्ति होगी। यदि किसी व्यक्ति का आवेदन अस्वीकार किया जाता है तो उसे अपील का अधिकार भी मिलेगा। रिकॉर्ड में छेड़छाड़ झूठी जानकारी देने या फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने पर दंड का प्रावधान भी रखा गया है। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से पारिवारिक मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी और सभी नागरिकों को समान कानूनी संरक्षण मिल सकेगा।

गरुड़ पुराण के पन्नों में छिपा है आपके अगले जन्म का रहस्य; जीवित रहते किए गए कर्म ही तय करते हैं मनुष्य, पशु या पक्षी का शरीर

नई दिल्ली । सनातन धर्म के अठारह पुराणों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण महाग्रंथ गरुड़ पुराण में मनुष्य के जीवन, मृत्यु और उसके पश्चात मिलने वाले अगले जन्म को लेकर कई गूढ़ और चौंकाने वाले तथ्यों का विश्लेषण किया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार, मृत्यु के बाद किसी जीव को कौन सा शरीर प्राप्त होगा, यह कोई आकस्मिक घटना या भाग्य का खेल नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से मनुष्य द्वारा अपने वर्तमान जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्मों के लेखा-जोखा पर निर्भर करता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि मनुष्य अपने जीवित रहते ही अपने अगले जन्म की पृष्ठभूमि तैयार कर लेता है और उसके वर्तमान कर्म ही यह सुनिश्चित करते हैं कि वह पुनः मानव योनि में आएगा या किसी पशु-पक्षी के रूप में धरती पर जन्म लेगा। धार्मिक ग्रंथ के प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार, जो व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवनकाल में सदाचार का पालन करते हैं, निस्वार्थ भाव से दीन-दुखियों की सहायता करते हैं और धर्म के मार्ग से कभी विचलित नहीं होते, उन्हें मृत्यु के उपरांत पुनः मनुष्य जीवन का उपहार मिलता है। ऐसी पुण्यात्माओं को अगले जन्म में संस्कारी, समृद्ध और प्रतिष्ठित परिवारों में जन्म लेने का सुअवसर प्राप्त होता है, जहां उन्हें समाज में उचित मान-सम्मान और तमाम भौतिक सुख-सुविधाएं सुलभ होती हैं। इसके विपरीत, जो लोग जीवन भर केवल लोभ, मोह, छल-कपट, चोरी और दूसरों को प्रताड़ित करने जैसे कृत्य में संलिप्त रहते हैं, उनका अगला जीवन अत्यंत कष्टदायी और दयनीय हो जाता है। ऐसे नकारात्मक आचरण वाले व्यक्तियों को मानव चोले से वंचित होकर विभिन्न पशु-पक्षियों की निकृष्ट योनियों में भटकना पड़ता है। गरुड़ पुराण में विभिन्न प्रकार के विशिष्ट अपराधों और पापों के आधार पर मिलने वाले विशिष्ट जन्मों और उनके दंड का भी विस्तृत विवरण दिया गया है। ग्रंथ के अनुसार, जो मनुष्य जीवन भर दूसरों के अन्न की चोरी करता है अथवा छल से किसी के धन को हड़पता है, वह अपने अगले जन्म में चूहा या नेवला बनता है। इसी प्रकार, जो लोग समाज में पूजनीय अपने माता-पिता, गुरुजनों अथवा वयोवृद्ध बुजुर्गों का अनादर और अपमान करते हैं, उन्हें अगले जन्म में कौआ या कोई ऐसा अप्रिय पक्षी बनना पड़ता है जिसे मानव समाज सहज रूप से देखना पसंद नहीं करता। इसके अतिरिक्त, पराई महिलाओं पर कुदृष्टि रखने वाले और अपनों के साथ विश्वासघात करने वाले पुरुषों के लिए गरुड़ पुराण में कठोरतम दंड का प्रावधान है; ऐसे लोग अगले जन्म में भयानक अजगर या रेंगने वाले विषैले जीवों के रूप में धरती पर आते हैं। आलस्य और अकर्मण्यता को भी सनातन व्यवस्था में एक बड़ा दोष माना गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जो लोग पूर्णतः आलसी होते हैं और स्वयं पुरुषार्थ न करके केवल दूसरों की गाढ़ी कमाई पर ऐश करते हैं, वे अगले जन्म में गधा या बैल के रूप में जन्म लेते हैं ताकि वे प्रकृति के नियम के तहत कठिन शारीरिक श्रम का वास्तविक महत्व समझ सकें। इसी क्रम में, जो लोग समाज में अपने ऊंचे पद, सत्ता और बाहुबल के घमंड में चूर होकर असहाय एवं कमजोर वर्गों पर अत्याचार करते हैं, उन्हें अगले जन्म में हिंसक प्रवृत्ति के पशुओं जैसे शेर या भेड़िए का शरीर प्राप्त होता है, जहां उन्हें स्वयं के अस्तित्व की रक्षा और भोजन के लिए दर-दर भटकना पड़ता है और निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। मूलतः, गरुड़ पुराण यह दार्शनिक संदेश देता है कि संपूर्ण प्रकृति हर जीव को उसके मूल स्वभाव और आचरण के अनुरूप ही अगला भौतिक शरीर प्रदान करती है। यदि किसी व्यक्ति का आंतरिक स्वभाव हिंसक, क्रूर और तामसी है, तो उसे स्वाभाविक रूप से जानवर का शरीर मिलता है, और यदि वह भीतर से शांत, करुणामयी तथा परोपकारी है, तो वह पुनः मनुष्य का श्रेष्ठ जीवन प्राप्त करता है। यह आध्यात्मिक व्यवस्था मानव को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि उसके वर्तमान आचरण में सुधार लाने के उद्देश्य से प्रतिपादित की गई है। गरुड़ पुराण का परम संदेश यही है कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभता से मिलता है, इसलिए सांसारिक नफरत और लोभ को त्यागकर प्रेम, दया और धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए क्योंकि मृत्यु के बाद केवल कर्म ही जीव के साथ जाते हैं।

जब अजेय बजरंगबली की शक्ति भी पड़ गई थी कम; जानिए उन तीन महायोद्धाओं की गाथा जिनके सामने वीर हनुमान को स्वीकार करनी पड़ी थी हार

नई दिल्ली । सनातन धर्म और पौराणिक ग्रंथों में पवनपुत्र हनुमान जी को असीम बल, बुद्धि और अजेय शक्ति का प्रतीक माना गया है। रामायण काल से लेकर महाभारत काल तक उनके पराक्रम की अनगिनत गाथाएं प्रचलित हैं, जहां बड़े से बड़े मायावी राक्षस और योद्धा उनके सामने टिक नहीं सके। लेकिन धार्मिक इतिहास में कुछ ऐसे अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट प्रसंगों का भी वर्णन मिलता है, जब अप्रतिहत शक्तियों के स्वामी बजरंगबली को भी विशेष परिस्थितियों के कारण झुकना पड़ा या अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी। पौराणिक वृत्तांतों के अनुसार, ऐसे तीन प्रमुख अवसर आए जब हनुमान जी की शक्ति भी काम नहीं आई और उन्हें पराजय का वधु स्वीकार करना पड़ा। ऐसी ही पहली घटना महान संत और सिद्ध तपस्वी मच्छिंद्रनाथ जी से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार मच्छिंद्रनाथ जी भगवान श्रीराम की भक्ति में पूरी तरह लीन होकर रामेश्वरम के समीप समुद्र में स्नान कर रहे थे। उसी समय वहां मौजूद हनुमान जी ने एक साधारण वानर का रूप धारण कर उनकी परीक्षा लेने का विचार किया। हनुमान जी ने अपनी मायावी शक्ति से वहां मूसलाधार बारिश शुरू कर दी और स्वयं को बचाने के लिए एक कृत्रिम गुफा बनाने का उपक्रम करने लगे। जब मच्छिंद्रनाथ जी ने उन्हें इस कृत्य पर टोकते हुए ज्ञान दिया, तो हनुमान जी ने उनकी आध्यात्मिक क्षमता पर प्रश्न उठाते हुए उन्हें युद्ध की सीधी चुनौती दे दी। इसके बाद दोनों के मध्य एक भीषण युद्ध छिड़ गया, परंतु मच्छिंद्रनाथ जी की मंत्र शक्ति और योग बल के सामने हनुमान जी का प्रत्येक प्रहार निष्फल साबित हुआ। अंततः वायुदेव के हस्तक्षेप के बाद इस युद्ध को विराम दिया गया और हनुमान जी ने सहर्ष अपनी हार स्वीकार की। द्वितीय प्रसंग रामायण काल के सबसे विनाशकारी युद्ध के दौरान का है, जो रावण के परम पराक्रमी पुत्र मेघनाद यानी इंद्रजीत से संबद्ध है। माता सीता की खोज में लंका पहुंचे हनुमान जी ने जब अशोक वाटिका को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया और रावण के छोटे पुत्र अक्षय कुमार का वध कर दिया, तब लंकाधिपति ने क्रोधित होकर मेघनाद को रणभूमि में भेजा। युद्ध क्षेत्र में जब मेघनाद के सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र हनुमान जी के सामने विफल हो गए, तब उसने अत्यंत विवश होकर पवनपुत्र पर सीधे ब्रह्मास्त्र का संधान कर दिया। यद्यपि हनुमान जी को स्वयं ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त था कि कोई भी अस्त्र उनका अनिष्ट नहीं कर सकता, परंतु सृष्टि के रचयिता और ब्रह्मास्त्र की मर्यादा एवं मान रखने के लिए हनुमान जी ने स्वेच्छा से स्वयं को उस बंधन में बंधने दिया। तकनीकी दृष्टिकोण से इस प्रसंग में मेघनाद हनुमान जी की गति को रोकने और उन्हें बंदी बनाने में सफल रहा था। तृतीय और सर्वाधिक भावुक कर देने वाला वृत्तांत भगवान श्रीराम के आत्मज लव और कुश से जुड़ा हुआ है। लंका विजय के पश्चात जब अयोध्या में प्रभु श्रीराम द्वारा अश्वमेध यज्ञ का भव्य आयोजन किया गया, तो यज्ञ का अश्व देश के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण कर रहा था। इसी दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में निवास कर रहे बालक लव और कुश ने उस अश्व को बंदी बना लिया। अश्व को मुक्त कराने हेतु जब श्रीराम की चतुरंगिणी सेना वहां पहुंची, तो दोनों बालकों के अभूतपूर्व युद्ध कौशल के सम्मुख लक्ष्मण और शत्रुघ्न जैसे महारथी भी परास्त हो गए। स्थिति को नियंत्रण से बाहर होते देख स्वयं हनुमान जी, भरत और सुग्रीव के साथ युद्ध के मैदान में उतरे। रणभूमि में जब हनुमान जी ने इन दो अत्यंत छोटे बालकों के अलौकिक शौर्य और पराक्रम को देखा, तो वे विस्मय में पड़ गए। वास्तविकता का पता लगाने के लिए जब उन्होंने नेत्र बंद कर ध्यान लगाया, तो उन्हें तुरंत यह बोध हो गया कि ये दोनों बालक कोई साधारण क्षत्रिय नहीं, बल्कि उनके आराध्य प्रभु श्रीराम और माता सीता के ही अंश हैं। इस सत्य से अवगत होने के पश्चात हनुमान जी के लिए अपने ही स्वामी की संतानों पर अस्त्र उठाना सर्वथा असंभव हो गया। उन्होंने तुरंत युद्ध न करने का नीतिगत निर्णय लिया और अस्त्र त्याग कर शांत खड़े हो गए। इसके बाद लव और कुश ने उन पर निरंतर कई तीखे प्रहार किए, किंतु हनुमान जी ने बिना किसी प्रतिरोध या पलटवार के सब कुछ अत्यंत शांत भाव से सहन किया और प्रेम पूर्वक अपनी पराजय स्वीकार कर ली।

'मुन्ना भाई एमबीबीएस' के सेट से अचानक क्यों गायब हो जाते थे संजय दत्त? सह-कलाकार यतिन कार्येकर ने सालों बाद बयां किया शूटिंग का अनसुना दर्द

नई दिल्ली । बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता संजय दत्त के जीवन में एक दौर ऐसा भी था, जब वे अपनी पेशेवर प्रतिबद्धताओं और गंभीर कानूनी लड़ाइयों के बीच बुरी तरह फंसे हुए थे। साल 2003 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ की शूटिंग के दौरान सेट पर बने रहने के लिए उन्हें जिस मानसिक और शारीरिक संघर्ष से गुजरना पड़ा, उसका एक बेहद भावुक और अनसुना पहलू अब सामने आया है। फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सह-कलाकार और अनुभवी अभिनेता यतिन कार्येकर ने हाल ही में उस दौर की परिस्थितियों को याद करते हुए कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। यतिन कार्येकर ने बताया कि फिल्म की शूटिंग के दौरान संजय दत्त आर्म्स एक्ट मामले और टाडा अदालत की सख्त कानूनी प्रक्रियाओं का सामना कर रहे थे। स्थिति इतनी अनिश्चित थी कि सेट पर काम करते समय भी अभिनेता का पूरा ध्यान अपनी अदालती तारीखों और कानूनी मामलों पर लगा रहता था। सेट पर मौजूद हर व्यक्ति इस बात से वाकिफ था कि संजय दत्त किस भारी मानसिक दबाव और तनाव के साए में कैमरे के सामने अभिनय कर रहे थे। शूटिंग के दिनों के माहौल को साझा करते हुए कार्येकर ने बताया कि अक्सर सेट पर अचानक एक फोन कॉल आता था और उसे सुनते ही संजय दत्त बिना किसी से कुछ कहे या बिना कोई औपचारिकता निभाए चुपचाप सेट छोड़कर चले जाते थे। उन्हें अचानक अदालत की कार्यवाही में शामिल होने के लिए तुरंत रवाना होना पड़ता था। ऐसे अनपेक्षित घटनाक्रमों के कारण फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी को कई बार भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। संजय दत्त के अचानक चले जाने के बाद निर्देशक को पूरी स्थिति को संभालने के लिए तुरंत अपने पूर्व-निर्धारित शूटिंग शेड्यूल में बदलाव करने पड़ते थे। निर्देशक हिरानी को अक्सर उन दृश्यों या शॉट्स को पूरी तरह बदलना पड़ता था, जिनमें संजय दत्त की मौजूदगी अनिवार्य थी। अभिनेता की अनुपस्थिति के कारण सेट पर मौजूद अन्य कलाकारों के साथ अलग दृश्यों की योजना बनाई जाती थी ताकि शूटिंग का कीमती समय बर्बाद न हो और काम सुचारू रूप से चलता रहे। इस भारी व्यक्तिगत संकट और कानूनी दबाव के बावजूद संजय दत्त ने कभी भी अपने काम की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। जब भी वे अदालत की कार्यवाही से लौटकर वापस सेट पर आते थे, तो वे पूरी तरह से अपने किरदार ‘मुन्ना भाई’ में ढल जाते थे। कार्येकर के अनुसार, संजय दत्त की यह क्षमता अद्भुत थी कि वे इतनी बड़ी मानसिक उथल-पुथल के बीच भी कैमरे के सामने आते ही अपने सारे गम और तनाव भूलकर एक जीवंत प्रदर्शन देने में सफल रहते थे। फिल्म के क्रू और साथी कलाकारों ने भी उस कठिन समय में संजय दत्त का भरपूर सहयोग किया। सेट पर मौजूद सभी लोग अभिनेता की बेबसी और उनकी पारिवारिक परिस्थितियों को गहराई से समझते थे। उनके पिता सुनील दत्त भी उस समय बेटे को इस संकट से निकालने के लिए हर संभव कानूनी और नैतिक प्रयास कर रहे थे। यही कारण था कि पूरी टीम ने बिना किसी शिकायत के हर विपरीत परिस्थिति में निर्देशक और अभिनेता के साथ तालमेल बिठाया। ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ न केवल संजय दत्त के करियर की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक साबित हुई, बल्कि इसने उनके गिरते हुए करियर को एक नई संजीवनी भी प्रदान की थी। आज सालों बाद जब सेट के ये वाकये सामने आ रहे हैं, तो यह साफ होता है कि पर्दे पर दर्शकों को हंसाने और गुदगुदाने वाले ‘मुन्ना भाई’ के पीछे एक अभिनेता का कितना बड़ा व्यक्तिगत दर्द और अदालती संघर्ष छिपा हुआ था, जिसने भारतीय सिनेमा इतिहास की एक कालजयी फिल्म को आकार दिया।

मार्क्स नहीं हुनर बनाएगा सफल पेरेंट्स को डॉ संजीव अग्रवाल की सीख बच्चों को दें सीखने की आजादी

मध्‍य प्रदेश। आज के समय में शिक्षा केवल परीक्षा में अधिक अंक लाने तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि बदलते दौर में सफलता का असली आधार ज्ञान के साथ कौशल और व्यक्तित्व विकास बन चुका है। ऐसे समय में सेज यूनिवर्सिटी के चांसलर और सेज ग्रुप के सीएमडी डॉ संजीव अग्रवाल ने अभिभावकों को महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा है कि बच्चों को केवल नंबरों की दौड़ में उलझाने के बजाय उनकी प्रतिभा और स्किल्स को विकसित करने पर जोर देना चाहिए। उनका मानना है कि भविष्य में वही युवा सबसे आगे होंगे जिनके पास व्यावहारिक ज्ञान नई सोच और चुनौतियों का सामना करने की क्षमता होगी। डॉ संजीव अग्रवाल का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री दिलाना नहीं बल्कि ऐसे युवाओं का निर्माण करना होना चाहिए जो आत्मनिर्भर बनने के साथ दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर तैयार करें। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों को ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जहां छात्र सिर्फ नौकरी पाने की तैयारी न करें बल्कि नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से जॉब क्रिएटर बनकर समाज और देश के विकास में योगदान दें। उन्होंने बताया कि सेज यूनिवर्सिटी में विद्यार्थियों के समग्र विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यदि कोई छात्र नियमित रूप से कक्षा में उपस्थित नहीं होता तो केवल सूचना देकर जिम्मेदारी पूरी नहीं की जाती बल्कि शिक्षक स्वयं उसके घर तक पहुंचते हैं और उसकी पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं को समझने का प्रयास करते हैं। संस्थान का उद्देश्य हर छात्र को शिक्षा से जोड़कर रखना और उसकी क्षमता को सही दिशा देना है। डॉ अग्रवाल के अनुसार आज की शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रह सकती। इसलिए विश्वविद्यालय में स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों के साथ उद्योग जगत के विशेषज्ञों को भी छात्रों से संवाद के लिए बुलाया जाता है। कैंपस में स्टार्टअप कॉन्क्लेव करियर डे और विभिन्न व्यावसायिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं ताकि विद्यार्थी वास्तविक दुनिया की चुनौतियों को समझ सकें और अपने करियर की बेहतर तैयारी कर सकें। उनका कहना है कि विद्यार्थियों को प्रकृति के करीब रहने व्यावहारिक सोच विकसित करने और नई परिस्थितियों में स्वयं निर्णय लेने का अवसर भी मिलना चाहिए। अपने छात्र जीवन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि पहले शिक्षा का स्वरूप काफी अलग था। उस समय शिक्षक केवल किताबों तक सीमित ज्ञान देते थे लेकिन अब समय बदल चुका है। आज सफल होने के लिए कम्युनिकेशन स्किल्स लीडरशिप टीमवर्क और तकनीकी दक्षता जैसी क्षमताएं भी उतनी ही जरूरी हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके समय में भी कम अंक आने का डर रहता था लेकिन आज कई अभिभावक बच्चों पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाल देते हैं जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है और वे अपनी वास्तविक प्रतिभा का प्रदर्शन नहीं कर पाते। युवाओं के लिए उनका संदेश भी स्पष्ट है कि सफलता मेहनत धैर्य और निरंतर सीखने की प्रक्रिया से मिलती है। यदि किसी प्रयास में तुरंत सफलता न मिले तो निराश होने की जरूरत नहीं बल्कि उसे अनुभव मानकर आगे बढ़ना चाहिए। उनका विश्वास है कि लगातार मेहनत करने वाले लोगों के लिए अवसर जरूर बनते हैं और ईमानदारी के साथ किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। डॉ संजीव अग्रवाल का मानना है कि भारत का भविष्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था में छिपा है जो बच्चों को केवल अच्छे अंक नहीं बल्कि बेहतर इंसान जिम्मेदार नागरिक और सफल पेशेवर बनने की प्रेरणा दे। जब शिक्षा में स्किल्स नवाचार और नैतिक मूल्यों को बराबर महत्व मिलेगा तभी देश की युवा शक्ति वास्तव में राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ताकत बन सकेगी।