इंग्लैंड ने मेक्सिको को हराकर क्वार्टर फाइनल में बनाई जगह, जूड बेलिंगहम के डबल धमाके से 3-2 की रोमांचक जीत

नई दिल्ली । फीफा वर्ल्ड कप 2026 के प्री-क्वार्टर फाइनल में इंग्लैंड ने शानदार जुझारूपन दिखाते हुए मेक्सिको को 3-2 से हराकर क्वार्टर फाइनल में प्रवेश कर लिया। रोमांच से भरपूर इस मुकाबले में इंग्लैंड ने एक समय दो गोल की बढ़त बनाई और बाद में एक खिलाड़ी कम होने के बावजूद मेक्सिको की जोरदार चुनौती को नाकाम कर दिया। इस हार के साथ मेक्सिको का विश्व कप अभियान समाप्त हो गया, जबकि इंग्लैंड ने अंतिम आठ में अपनी जगह पक्की कर ली। खराब मौसम के कारण देर से शुरू हुए मुकाबले में दोनों टीमों ने शुरुआत से ही आक्रामक खेल दिखाया। लगातार हमलों के बीच इंग्लैंड को पहली सफलता 36वें मिनट में मिली जब जूड बेलिंगहम ने शानदार गोल कर टीम को बढ़त दिलाई। इसके महज 98 सेकंड बाद बेलिंगहम ने एक और गोल दागकर इंग्लैंड की बढ़त 2-0 कर दी और मेक्सिको पर दबाव बढ़ा दिया। हालांकि मेक्सिको ने भी हार नहीं मानी। 42वें मिनट में क्विनोन्स ने गोल कर टीम को मुकाबले में वापस ला दिया। पहले हाफ की समाप्ति तक इंग्लैंड 2-1 से आगे था और मुकाबला पूरी तरह खुला हुआ नजर आ रहा था। दूसरे हाफ की शुरुआत में इंग्लैंड को बड़ा झटका लगा जब डिफेंडर जारेल क्वान्सा को खतरनाक टैकल के कारण रेड कार्ड दिखाया गया। इसके बाद इंग्लैंड को लगभग पूरा दूसरा हाफ केवल 10 खिलाड़ियों के साथ खेलना पड़ा। बावजूद इसके टीम ने संयम बनाए रखा और आक्रामक रवैया नहीं छोड़ा। 60वें मिनट में इंग्लैंड को पेनल्टी मिली जब मेक्सिको के गोलकीपर राउल रेंजल ने एंथनी गॉर्डन को पेनल्टी बॉक्स में गिरा दिया। कप्तान हैरी केन ने इस मौके को भुनाते हुए गेंद को गोल में पहुंचाया और टूर्नामेंट में अपना छठा गोल करते हुए इंग्लैंड की बढ़त 3-1 कर दी। इसके बाद 69वें मिनट में वीएआर समीक्षा के बाद मेक्सिको को भी पेनल्टी मिली। राउल जिमिनेज ने बिना कोई गलती किए गोल दागकर अंतर 3-2 कर दिया। अंतिम 20 मिनटों में मेक्सिको ने बराबरी के लिए लगातार हमले किए लेकिन इंग्लैंड का रक्षात्मक प्रदर्शन और गोलकीपर जॉर्डन पिकफोर्ड के शानदार बचाव उसकी उम्मीदों पर भारी पड़े। मैच के आखिरी क्षणों में पिकफोर्ड ने कई महत्वपूर्ण सेव कर इंग्लैंड की बढ़त बरकरार रखी और टीम को क्वार्टर फाइनल का टिकट दिला दिया। अब इंग्लैंड का अगला मुकाबला 12 जुलाई को नॉर्वे के खिलाफ होगा, जहां उसकी नजर सेमीफाइनल में जगह बनाने पर रहेगी।
तीन देशों की अहम यात्रा पर रवाना हुए प्रधानमंत्री मोदी, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ आर्थिक व रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा नया विस्तार

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छह दिवसीय विदेश यात्रा पर इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे के लिए रवाना हो गए हैं। यह यात्रा भारत के लिए कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस दौरान विभिन्न द्विपक्षीय बैठकों, उच्चस्तरीय वार्ताओं और भारतीय समुदाय के साथ संवाद के माध्यम से तीनों देशों के साथ सहयोग को और व्यापक बनाने पर जोर रहेगा। यात्रा का उद्देश्य व्यापार, निवेश, रक्षा, शिक्षा, तकनीक और लोगों के बीच संबंधों को नई दिशा देना भी है। रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री ने कहा कि यह दौरा भारत के प्रमुख विकास साझेदार देशों के साथ संबंधों को और मजबूत करने का अवसर प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को नई गति देने के साथ-साथ युवाओं के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराने पर भी विशेष ध्यान रहेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि इस यात्रा से भारत के वैश्विक सहयोग और क्षेत्रीय साझेदारी को नया बल मिलेगा। यात्रा का पहला पड़ाव इंडोनेशिया है, जहां प्रधानमंत्री कई उच्चस्तरीय कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। दोनों देशों के बीच वर्षों से मजबूत सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और समुद्री संबंध रहे हैं। इस दौरे के दौरान द्विपक्षीय सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों की समीक्षा के साथ भविष्य की साझेदारी को और व्यापक बनाने पर चर्चा होने की संभावना है। सांस्कृतिक विरासत से जुड़े कार्यक्रम भी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे, जो दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को नई मजबूती देंगे। इंडोनेशिया के बाद प्रधानमंत्री ऑस्ट्रेलिया पहुंचेंगे, जहां रक्षा, सुरक्षा, व्यापार, निवेश, शिक्षा, कौशल विकास और तकनीकी सहयोग जैसे प्रमुख विषयों पर वार्ता होगी। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग, उभरती प्रौद्योगिकियों, नवाचार और खेल विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाने पर विशेष जोर रहने की उम्मीद है। ऑस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात करेंगे। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय को भारत और संबंधित देशों के बीच सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। ऐसे संवाद दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संपर्क को और मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। यात्रा के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री न्यूजीलैंड जाएंगे। इस दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को नई गति देने, निवेश बढ़ाने और व्यावसायिक सहयोग को विस्तार देने पर चर्चा होगी। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत बनाने के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा। भारतीय समुदाय के साथ संवाद भी इस दौरे का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा। भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापार, शिक्षा, कृषि, नवाचार और सेवा क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में यह यात्रा दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित उच्चस्तरीय संवाद से दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को और मजबूती मिल सकती है। प्रधानमंत्री की यह तीन देशों की यात्रा भारत की एक्ट ईस्ट नीति और मुक्त, समावेशी तथा नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अवधारणा को भी आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इसके साथ ही क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री सहयोग और वैश्विक साझेदारी को मजबूत करने के भारत के प्रयासों को भी इस दौरे से नई गति मिलने की उम्मीद है।
अंकारा में वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा मंथन, नाटो समिट में ट्रंप का फोकस रक्षा बजट, हथियार सहयोग और रूस-यूक्रेन युद्ध पर रहेगा

नई दिल्ली। वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था और बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच नाटो का आगामी शिखर सम्मेलन तुर्किए की राजधानी अंकारा में आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी सबसे अधिक चर्चा में है। सम्मेलन के दौरान उनका मुख्य फोकस रक्षा खर्च बढ़ाने, सदस्य देशों के बीच जिम्मेदारियों के संतुलित बंटवारे और रक्षा औद्योगिक सहयोग को मजबूत करने पर रहेगा। इसके साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध और यूरोप की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं। ट्रंप सम्मेलन के दौरान तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। दोनों नेताओं के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा, रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को लेकर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा ट्रंप यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से भी अलग-अलग मुलाकात करेंगे। इन बैठकों में क्षेत्रीय संघर्षों, सुरक्षा सहयोग और भविष्य की रणनीति पर विचार-विमर्श किया जाएगा। समिट के कार्यक्रम के अनुसार ट्रंप नाटो नेताओं के आधिकारिक स्वागत समारोह, सामूहिक फोटो सत्र और कार्यकारी बैठकों में हिस्सा लेंगे। सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष रक्षा और सुरक्षा से जुड़े विभिन्न प्रस्तावों पर चर्चा करेंगे। समापन से पहले ट्रंप मीडिया को संबोधित करेंगे और उसके बाद अपनी निर्धारित द्विपक्षीय बैठकों को पूरा करेंगे। इस बार सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विषय नाटो देशों द्वारा रक्षा बजट बढ़ाने की प्रतिबद्धता माना जा रहा है। पिछले वर्ष सदस्य देशों ने अपनी सकल घरेलू उत्पाद का पांच प्रतिशत रक्षा क्षेत्र पर खर्च करने की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया था। अब इस लक्ष्य की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की जाएगी। अमेरिका चाहता है कि सभी सदस्य देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए तय समयसीमा के भीतर रक्षा निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि करें। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि यूरोप के कई देशों ने रक्षा खर्च बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं। पोलैंड, नॉर्डिक देशों और बाल्टिक क्षेत्र के देशों को इस मामले में अग्रणी बताया जा रहा है, जबकि जर्मनी भी निर्धारित लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इसके बावजूद अमेरिका का मानना है कि सभी सदस्य देशों को समान रूप से जिम्मेदारी निभानी होगी ताकि गठबंधन का सामूहिक सुरक्षा ढांचा और अधिक मजबूत बन सके। सम्मेलन में रक्षा उत्पादन बढ़ाने और सैन्य उपकरणों के संयुक्त निर्माण पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। अमेरिका का उद्देश्य सहयोगी देशों के साथ आधुनिक हथियार प्रणालियों, रक्षा तकनीक और उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है। माना जा रहा है कि सम्मेलन के दौरान रक्षा क्षेत्र में कई बड़े निवेश और सैन्य खरीद से जुड़े समझौतों की घोषणा भी हो सकती है, जिनकी कुल कीमत अरबों डॉलर तक पहुंच सकती है। रूस-यूक्रेन युद्ध भी सम्मेलन के सबसे अहम विषयों में रहेगा। ट्रंप और जेलेंस्की की प्रस्तावित बैठक में युद्ध समाप्त करने के संभावित विकल्पों और कूटनीतिक प्रयासों पर चर्चा होने की संभावना है। अमेरिका का कहना है कि युद्ध को जल्द समाप्त करना मानवीय और वैश्विक सुरक्षा दोनों दृष्टि से आवश्यक है। बैठक के बाद ट्रंप की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी बातचीत हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था तेजी से बदली है और इसी कारण नाटो अपने रणनीतिक ढांचे में व्यापक बदलाव कर रहा है। ऐसे समय में अंकारा समिट को गठबंधन की भविष्य की रक्षा नीति, सामूहिक सुरक्षा और सदस्य देशों की साझा जिम्मेदारियों को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण सम्मेलन माना जा रहा है।
नाटो की एकजुटता पर उठे सवाल, अंकारा बैठक से पहले रक्षा बजट, अमेरिकी रणनीति और यूरोपीय असहमति बनी बड़ी परीक्षा

नई दिल्ली । अंकारा में इस सप्ताह होने जा रहे नाटो शिखर सम्मेलन से पहले संगठन के भीतर बढ़ते मतभेद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के बीच गठबंधन जहां एकजुटता का संदेश देने की तैयारी कर रहा है, वहीं रक्षा खर्च, पश्चिम एशिया की स्थिति और भविष्य की रणनीतिक दिशा जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के अलग-अलग रुख ने उसकी एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हो रहा है जब हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रम ने सहयोगी देशों के बीच दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट कर दिया है। कई यूरोपीय देशों ने कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका के उद्देश्य का समर्थन किया, लेकिन किसी भी सैन्य अभियान में प्रत्यक्ष भागीदारी से दूरी बनाए रखी। इससे यह संकेत मिला कि सुरक्षा संबंधी मामलों में सभी सदस्य समान रणनीति अपनाने के पक्ष में नहीं हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय देशों की प्राथमिकताएं अमेरिका से अलग हैं। उनके लिए क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा और संभावित शरणार्थी संकट जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचना उनकी रणनीतिक आवश्यकता माना जा रहा है। इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे संघर्षों के अनुभवों ने भी कई यूरोपीय सरकारों को सैन्य अभियानों को लेकर अधिक सतर्क बना दिया है। सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विषय रक्षा बजट बढ़ाने की योजना रहने की संभावना है। सदस्य देशों ने पहले 2035 तक रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद के पांच प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य स्वीकार किया था। हालांकि इस लक्ष्य को लागू करना कई देशों के लिए आसान नहीं माना जा रहा है। आर्थिक सुस्ती, बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और सामाजिक कल्याण पर बढ़ते खर्च के कारण अनेक सरकारों के सामने संसाधनों का संतुलन बड़ी चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई यूरोपीय देशों में मतदाता स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी प्राथमिकताओं को रक्षा बजट से अधिक महत्व देते हैं। ऐसे में सरकारों के लिए सैन्य खर्च में बड़े स्तर की वृद्धि को राजनीतिक समर्थन दिलाना कठिन हो सकता है। यही कारण है कि लक्ष्य तय होने के बावजूद उसके क्रियान्वयन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। नाटो की रणनीतिक दिशा को लेकर भी बहस तेज होती जा रही है। अमेरिका लंबे समय से यूरोपीय देशों से अपनी सुरक्षा व्यवस्था में अधिक वित्तीय और सैन्य योगदान की अपेक्षा करता रहा है। इसके पीछे उद्देश्य यह माना जा रहा है कि यूरोप अपनी पारंपरिक रक्षा जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा स्वयं संभाले, जबकि अमेरिका अपनी प्राथमिकताओं को अन्य क्षेत्रों की ओर केंद्रित कर सके। सम्मेलन से पहले तुर्किए के कई शहरों में नाटो विरोधी प्रदर्शन भी देखने को मिले। प्रदर्शनकारियों ने रक्षा खर्च बढ़ाने के बजाय सार्वजनिक सेवाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक निवेश की मांग की। उनका कहना है कि बढ़ते सैन्य बजट का असर सामाजिक कल्याण योजनाओं पर पड़ सकता है। इसी प्रकार के विरोध प्रदर्शन हाल के वर्षों में यूरोप के अन्य देशों में भी सामने आए हैं। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सम्मेलन के दौरान रक्षा खरीद से जुड़े कई महत्वपूर्ण समझौतों पर चर्चा हो सकती है। इससे सदस्य देशों की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने का प्रयास होगा, लेकिन साथ ही यह बहस भी जारी रहेगी कि गठबंधन की भविष्य की रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। ऐसे में अंकारा शिखर सम्मेलन केवल सुरक्षा सहयोग का मंच नहीं, बल्कि नाटो की आंतरिक एकजुटता और दीर्घकालिक भविष्य की भी अहम परीक्षा माना जा रहा है।
कतर दौरे में भारत-कतर रिश्तों को नई मजबूती, एस. जयशंकर ने प्रधानमंत्री अल थानी के साथ ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय मुद्दों पर की व्यापक चर्चा

नई दिल्ली। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कतर की अपनी आधिकारिक यात्रा पूरी करते हुए दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बातचीत की। दौरे के दौरान उन्होंने कतर के प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी से मुलाकात कर ऊर्जा, व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी, सुरक्षा और लोगों के बीच संबंधों सहित द्विपक्षीय सहयोग के विभिन्न आयामों की व्यापक समीक्षा की। दोनों नेताओं ने भविष्य में सहयोग के नए अवसरों पर भी विस्तार से विचार-विमर्श किया। यह यात्रा विदेश मंत्री के बहु-देशीय पश्चिम एशिया दौरे का पहला चरण थी। इस दौरे का उद्देश्य क्षेत्र के प्रमुख देशों के साथ भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को और मजबूत करना, क्षेत्रीय हालात पर चर्चा करना तथा साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर समन्वय बढ़ाना है। कतर के बाद उनका कार्यक्रम बहरीन, कुवैत और ओमान की यात्राओं का भी है। बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक सहयोग, निवेश बढ़ाने की संभावनाओं और आपसी संपर्क को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया। इसके साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के कई मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान हुआ। पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े विषय भी चर्चा के प्रमुख केंद्र रहे। विदेश मंत्री ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी संवाद में कतर की सक्रिय मध्यस्थता भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों में कतर की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। दोनों नेताओं ने साझा हितों वाले बहुपक्षीय विषयों पर भी सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की। दोहा प्रवास के दौरान डॉ. जयशंकर ने भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की। उन्होंने कतर के विकास और समाज में भारतीय समुदाय के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी भारतीय नागरिकों ने अपने दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन किया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि विदेशों में रह रहे भारतीयों का कल्याण सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। विदेश मंत्री ने कहा कि भारतीय समुदाय के अनुभव, सुझाव और सहभागिता भारत-कतर संबंधों को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर मजबूत होते संबंधों को द्विपक्षीय साझेदारी की बड़ी ताकत बताया और भविष्य में इसे और विस्तार देने की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कतर नेतृत्व का भारत के नागरिकों की सुरक्षा और उनके हितों का ध्यान रखने के लिए आभार भी व्यक्त किया। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि आर्थिक सहयोग के साथ-साथ सुरक्षा, कनेक्टिविटी और मानवीय संबंधों को भी आगे बढ़ाने से रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती मिलेगी। विदेश मंत्री का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच भारत क्षेत्र के देशों के साथ अपने सहयोग को और गहरा करने की दिशा में सक्रिय कूटनीतिक पहल कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस यात्रा से भारत और कतर के बीच ऊर्जा, व्यापार, निवेश तथा क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्रों में भविष्य की साझेदारी को नया विस्तार मिलने की संभावना मजबूत हुई है।
भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

नई दिल्ली । इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत को अपने सबसे मजबूत और भरोसेमंद मित्र देशों में शामिल बताते हुए कहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय की है जब अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है और अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी अलग-अलग बयान सामने आए हैं। एक साक्षात्कार में नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका निश्चित रूप से इजरायल का महत्वपूर्ण सहयोगी है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इजरायल के पक्ष में कई अहम फैसले लिए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दुनिया में इजरायल के मित्र केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है, जहां से इजरायल को मजबूत समर्थन प्राप्त होता है। नेतन्याहू ने भारत का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि 140 करोड़ आबादी वाले देश से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिकों की सक्रियता का भी जिक्र किया और कहा कि उनके आधिकारिक फेसबुक पेज पर भारत से बड़ी संख्या में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं और समर्थन देखने को मिलता है। उनके अनुसार यह दोनों देशों के बीच मजबूत जनसंपर्क और सकारात्मक भावनाओं का संकेत है। इजरायली प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत के अलावा कई अन्य देशों के नेता भी निजी स्तर पर इजरायल के साथ सहयोग की इच्छा रखते हैं। उन्होंने दावा किया कि रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में अनेक देश इजरायल के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं। उनके अनुसार सुरक्षा और तकनीकी सहयोग भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है। नेतन्याहू की यह टिप्पणी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मौजूदा समय में डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे प्रमुख नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नेतन्याहू ने कहा कि ट्रंप निश्चित रूप से व्हाइट हाउस में इजरायल के सबसे बड़े मित्र रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर सभी की राय समान होना जरूरी नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि इजरायल के कई अन्य अंतरराष्ट्रीय सहयोगी भी हैं, जिनमें भारत प्रमुख स्थान रखता है। साक्षात्कार के दौरान नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी अपनी सरकार का रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनका कहना था कि इस मुद्दे पर उनकी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोच समान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच किसी परमाणु समझौते पर सहमति नहीं बनती है, तब भी इजरायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू का भारत का उल्लेख करना दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों की ओर भी संकेत देता है। हाल के वर्षों में रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भारत और इजरायल के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत को सार्वजनिक रूप से मजबूत मित्र बताना दोनों देशों के संबंधों के महत्व को रेखांकित करने वाला बयान माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी का इंडोनेशिया दौरा कई मोर्चों पर अहम, रणनीतिक सहयोग से लेकर डिजिटल कनेक्टिविटी तक बनेंगे नए आयाम

नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की विदेश यात्रा के पहले चरण में होने वाला इंडोनेशिया दौरा भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। 6 से 8 जुलाई तक प्रस्तावित इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल सहयोग, कृषि, खनिज संसाधनों और सांस्कृतिक संबंधों सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत बनाने पर विशेष जोर रहेगा। भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुई है। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने के साथ-साथ विभिन्न द्विपक्षीय समझौतों की समीक्षा और भविष्य की सहयोग योजनाओं को गति देने का अवसर भी मानी जा रही है। दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षित समुद्री मार्गों को साझा प्राथमिकता मानते हैं। रक्षा और समुद्री सुरक्षा इस यात्रा के प्रमुख एजेंडों में शामिल हैं। दोनों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और रक्षा उद्योग में सहयोग को और व्यापक बनाने पर चर्चा होने की संभावना है। समुद्री सुरक्षा, समुद्री निगरानी और हिंद महासागर क्षेत्र में समन्वय बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए आपसी सहयोग को और मजबूत करने के पक्षधर हैं। आर्थिक सहयोग भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण पहलू रहेगा। भारत और इंडोनेशिया के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ रहा है और दोनों देश निवेश के नए अवसरों की तलाश में हैं। विनिर्माण, ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स और कृषि जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा होगी। दोनों देशों के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने पर भी जोर दिया जाएगा। महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों के क्षेत्र में सहयोग को भी प्राथमिकता मिलने की संभावना है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी निर्माण और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े उद्योगों के लिए आवश्यक खनिजों की उपलब्धता को देखते हुए दोनों देश आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने और औद्योगिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। डिजिटल सहयोग इस यात्रा का एक और प्रमुख आयाम है। दोनों देशों के बीच डिजिटल भुगतान प्रणाली, ई-कॉमर्स, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और तकनीकी नवाचार के क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास किए जाएंगे। इससे व्यापार, पर्यटन, निवेश और लोगों के बीच संपर्क को और अधिक सरल तथा प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। कृषि, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़े क्षेत्रों में भी अनुभव साझा करने पर जोर रहेगा। टिकाऊ कृषि, खाद्यान्न सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, डिजिटल कृषि और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में दोनों देश एक-दूसरे के सफल मॉडलों से सीखने और सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इस यात्रा का सांस्कृतिक पक्ष भी विशेष महत्व रखता है। भारत और इंडोनेशिया के बीच हजारों वर्षों पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक और समुद्री संबंध रहे हैं। साझा विरासत, सभ्यतागत जुड़ाव और लोगों के बीच संपर्क को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों और उच्चस्तरीय मुलाकातों का आयोजन भी प्रस्तावित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा भारत और इंडोनेशिया के संबंधों को व्यापक रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक साझेदारी के नए चरण में पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
62 करोड़ का फ्लायओवर बना मुसीबत, इंदौर के सत्यसाई चौराहे पर गड्ढों और कीचड़ में रेंग रहा ट्रैफिक

इंदौर । इंदौर के सबसे व्यस्त यातायात मार्गों में शामिल सत्यसाई चौराहा इन दिनों लोगों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बना हुआ है। यहां मध्यप्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की देखरेख में 62 करोड़ रुपए की लागत से छह लेन फ्लायओवर का निर्माण किया जा रहा है। परियोजना को मार्च 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन तय समय सीमा बीतने के तीन महीने बाद भी केवल करीब 40 प्रतिशत काम ही पूरा हो पाया है। निर्माण की धीमी रफ्तार और एजेंसी की लापरवाही का खामियाजा अब रोजाना हजारों वाहन चालकों को भुगतना पड़ रहा है। बारिश शुरू होने के बाद हालात और भी खराब हो गए हैं। निर्माणाधीन क्षेत्र की सर्विस रोड जगह-जगह उखड़ चुकी है और गहरे गड्ढों में बारिश का पानी भर जाने से उनकी गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है। देवास नाका से विजय नगर की ओर जाने वाले मार्ग पर वाहन चालक हर दिन जोखिम उठाकर सफर करने को मजबूर हैं। सत्यसाई स्कूल के आसपास सड़क की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि दोपहिया और चारपहिया वाहनों के फिसलने तथा दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा लगातार बना हुआ है। एबी रोड से बसंत विहार कॉलोनी की ओर जाने वाले मार्ग पर भी हालात बेहतर नहीं हैं। यहां 15 से 20 फीट लंबे और करीब दो फीट गहरे गड्ढे सड़क पर बने हुए हैं। निर्माण सामग्री और गिट्टी सड़क पर बिखरी होने से वाहन चालक संतुलन खो रहे हैं। कई जगह चैंबर के ढक्कन भी धंस चुके हैं जिससे हादसे की आशंका और बढ़ गई है। फ्लायओवर की गर्डर लॉन्चिंग का अधिकांश कार्य पूरा हो चुका है लेकिन इसके बावजूद सर्विस रोड का बड़ा हिस्सा अब भी बैरिकेड्स से बंद पड़ा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निर्माण एजेंसी समय रहते सड़क की मरम्मत कर बैरिकेड्स हटा देती तो यातायात के लिए अतिरिक्त जगह उपलब्ध हो जाती और रोज लगने वाले जाम से काफी राहत मिल सकती थी। स्थिति को और गंभीर बना रही है सड़क किनारे अव्यवस्थित पार्किंग। विजय नगर से देवास नाका की ओर जाने वाले संकरे मार्ग पर कई दुकानों के सामने वाहन खड़े रहने से यातायात प्रभावित हो रहा है। बारिश के दौरान यह समस्या और विकराल रूप ले लेती है तथा लंबा जाम लग जाता है। एमपीआरडीसी ने अप्रैल में दावा किया था कि मानसून से पहले सर्विस रोड को कंक्रीट से विकसित कर चौड़ा किया जाएगा और क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत भी पूरी कर दी जाएगी। हालांकि जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। न तो सर्विस रोड का काम पूरा हुआ और न ही खराब सड़कों की प्रभावी मरम्मत की गई। 15 मार्च 2024 को शुरू हुई इस परियोजना का लगभग 60 प्रतिशत काम अब भी अधूरा है। ऐसे में शहरवासियों की चिंता बढ़ गई है कि यदि निर्माण की रफ्तार इसी तरह धीमी रही तो फ्लायओवर के पूरा होने में अभी और लंबा समय लग सकता है। तब तक लोगों को बारिश, गड्ढों, कीचड़ और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याओं से लगातार जूझना पड़ेगा।
जानिए भारतीय नागरिकता की पूरी सच्चाई

– कैलाश चन्द्रभारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ, किंतु उस समय सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि आखिर भारत का नागरिक कौन होगा। देश के विभाजन के कारण लाखों लोग भारत और पाकिस्तान के बीच आ-जा रहे थे। ऐसी स्थिति में संविधान-निर्माताओं ने यह आवश्यक समझा कि संविधान लागू होने के दिन, अर्थात 26 जनवरी 1950 को यह स्पष्ट कर दिया जाए कि किन व्यक्तियों को भारतीय नागरिक माना जाएगा। इसी उद्देश्य से संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5 से 11) में नागरिकता का मूल संवैधानिक ढांचा निर्धारित किया गया। बाद में संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाकर नागरिकता प्राप्त करने, उसके समाप्त होने तथा उससे संबंधित समस्त विषयों का विस्तृत कानूनी प्रावधान किया। नागरिकता क्या है?नागरिकता किसी व्यक्ति और राष्ट्र के बीच स्थापित वह कानूनी एवं संवैधानिक संबंध है, जिसके आधार पर व्यक्ति को राज्य के प्रति अधिकार और कर्तव्य दोनों प्राप्त होते हैं। भारतीय नागरिक को मतदान का अधिकार, कुछ संवैधानिक पदों पर नियुक्ति का अधिकार तथा संविधान द्वारा प्रदत्त अनेक अधिकार प्राप्त होते हैं। इसके साथ ही उस पर राष्ट्र के प्रति निर्धारित कर्तव्यों का पालन करने का दायित्व भी होता है। यह स्मरणीय है कि भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं होता, किंतु प्रत्येक भारतीय नागरिक को भारत में रहने तथा संविधान के संरक्षण का अधिकार प्राप्त होता है। अनुच्छेद 5 – संविधान लागू होने पर नागरिकतायह नागरिकता संबंधी मूल अनुच्छेद है। इसके अनुसार 26 जनवरी 1950 को वह व्यक्ति भारत का नागरिक माना गया, जिसका भारत में अधिवास (डोमिसाइल) था तथा जो निम्नलिखित में से किसी एक शर्त को पूरा करता था, वह भारत में जन्मा हो, अथवा उसके माता या पिता में से कोई एक भारत में जन्मा हो अथवा संविधान लागू होने से पूर्व कम-से-कम पांच वर्ष तक भारत में सामान्य रूप से निवास करता रहा हो। इस प्रकार नागरिकता के तीन मूल आधार थे- जन्म, वंश और निवास। अनुच्छेद 6 – पाकिस्तान से भारत आने वाले लोगदेश के विभाजन के पश्चात पाकिस्तान से भारत आने वाले लाखों लोगों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रावधान किया गया। यदि वे निर्धारित शर्तों को पूरा करते थे और भारत में स्थायी रूप से बसने के इच्छुक थे, तो उन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान की जा सकती थी। अनुच्छेद 7 – भारत से पाकिस्तान जाने वाले लोगजो व्यक्ति 1 मार्च 1947 के बाद भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे, उन्हें सामान्यतः भारतीय नागरिक नहीं माना गया। तथापि, पुनर्वास की अनुमति प्राप्त कर भारत लौटने वाले व्यक्तियों के लिए विशेष अपवाद का प्रावधान रखा गया। अनुच्छेद 8 – विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगविदेशों में निवास करने वाले ऐसे व्यक्ति, जिनके माता-पिता अथवा दादा-दादी भारतीय मूल के थे, वे भारतीय दूतावास में पंजीकरण कराकर निर्धारित शर्तों के अनुसार भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते थे। अनुच्छेद 9 – विदेशी नागरिकता लेने का प्रभावयदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाती है। इसका कारण यह है कि भारत पूर्ण दोहरी नागरिकता (ड्यूल सिटिजनशिप) की व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता। अनुच्छेद 10 – नागरिकता की निरंतरताइस अनुच्छेद के अनुसार संविधान लागू होने के समय जो व्यक्ति भारतीय नागरिक था, उसकी नागरिकता बनी रहेगी, किंतु वह संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अधीन होगी। अनुच्छेद 11 – संसद की शक्तिइस अनुच्छेद द्वारा संसद को नागरिकता के संबंध में विस्तृत कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया। इसी संवैधानिक अधिकार के आधार पर नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाया गया। नागरिकता अधिनियम, 1955यह भारत का प्रमुख नागरिकता कानून है। इसके अनुसार भारतीय नागरिकता पाँच आधारों पर प्राप्त की जा सकती है, जन्म से, वंश से, पंजीकरण द्वारा, प्राकृतिककरण द्वारा तथा किसी नए क्षेत्र के भारत में विलय होने पर। भारतीय नागरिकता प्रदान करने के यही पाँच वैधानिक आधार हैं। प्रमुख संशोधनवर्ष 1955 में नागरिकता अधिनियम लागू हुआ। वर्ष 1986 में जन्म से नागरिकता प्राप्त करने के नियमों को अधिक कठोर बनाया गया। वर्ष 1992 में वंश से नागरिकता प्राप्त करने संबंधी प्रावधानों में संशोधन किया गया। वर्ष 2003 में अवैध प्रवासी (इल्लीगल माइग्रेंट) की परिभाषा स्पष्ट की गई तथा राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय पहचान रजिस्टर से संबंधित प्रावधान जोड़े गए। वर्ष 2005 में ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (ओसीआई) की व्यवस्था प्रारंभ हुई। यहां यह ध्यान रखने योग्य है कि ओसीआई पूर्ण भारतीय नागरिकता नहीं है। ओसीआई धारक मतदान नहीं कर सकते, चुनाव नहीं लड़ सकते और कुछ संवैधानिक पदों पर नियुक्त नहीं हो सकते। वर्ष 2015 में पीआईओ और ओसीआई योजनाओं का एकीकरण किया गया। वर्ष 2019 में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) पारित किया गया, जिसके अंतर्गत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए कुछ धार्मिक समुदायों के पात्र व्यक्तियों के लिए विशेष प्रावधान किए गए। वर्ष 2024 में सीएए लागू करने के नियम अधिसूचित किए गए तथा पात्र व्यक्तियों के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया प्रारंभ की गई। क्या आधार कार्ड, वोटर आईडी और पैन कार्ड नागरिकता का प्रमाण हैं?यह नागरिकता से जुड़ा सबसे बड़ा भ्रम है। सामान्यतः यह मान लिया जाता है कि यदि किसी व्यक्ति के पास आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड, राशन कार्ड अथवा आयकर रसीद है, तो वह स्वतः भारतीय नागरिक है। वस्तुतः यह धारणा विधिक दृष्टि से सही नहीं है। इन सभी दस्तावेजों का उद्देश्य अलग-अलग है। आधार कार्ड व्यक्ति की पहचान स्थापित करने के लिए जारी किया जाता है। पैन कार्ड आयकर संबंधी पहचान का दस्तावेज है। राशन कार्ड सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ प्राप्त करने के लिए बनाया जाता है। मतदाता पहचान-पत्र मतदान की प्रक्रिया में उपयोग के लिए है, जबकि आयकर रसीद केवल यह प्रमाणित करती है कि संबंधित व्यक्ति ने कर का भुगतान किया है। इनमें से कोई भी दस्तावेज स्वयं भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है और न ही किसी व्यक्ति को अपने-आप भारतीय नागरिक बना देता है। किसी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण केवल भारतीय संविधान, नागरिकता अधिनियम, 1955 तथा उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के अनुसार ही किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर कोई प्रश्न उत्पन्न होता है, तो उसका निर्णय सक्षम प्राधिकारी उपलब्ध वैधानिक अभिलेखों, साक्ष्यों तथा लागू कानून के आधार पर करता है, इसलिए पहचान, निवास, करदाता, मतदाता और नागरिक- ये पांचों
सूरत और अहमदाबाद की पहचान से आगे निकला कोयम्बटूर, जानिए क्यों तमिलनाडु का यह शहर आज भारत की असली 'टेक्सटाइल सिटी' कहलाता है

नई दिल्ली। भारत में कपड़ा उद्योग का इतिहास हजारों वर्षों पुराना माना जाता है। प्राचीन काल से ही यहां सूती और रेशमी वस्त्रों का निर्माण होता रहा है। समय के साथ इस उद्योग ने आधुनिक रूप लिया और देश के अलग-अलग शहर कपड़ा उत्पादन के प्रमुख केंद्र बनते गए। कभी कानपुर को टेक्सटाइल कैपिटल कहा जाता था तो अहमदाबाद और सूरत भी लंबे समय तक वस्त्र उद्योग के बड़े केंद्र रहे। हालांकि वर्तमान समय में तमिलनाडु का कोयम्बटूर भारत की ‘टेक्सटाइल सिटी’ के रूप में सबसे मजबूत पहचान बना चुका है। कोयम्बटूर को यह पहचान केवल कपड़ा उत्पादन की वजह से नहीं मिली, बल्कि यहां विकसित हुए संपूर्ण टेक्सटाइल उद्योग ने इसे देश के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक शहरों में शामिल कर दिया है। शहर में बड़ी संख्या में स्पिनिंग मिल्स, टेक्सटाइल यूनिट्स, गारमेंट निर्माण केंद्र और प्रोसेसिंग प्लांट संचालित हैं। यही कारण है कि यह भारत में सूती धागे के सबसे बड़े उत्पादन केंद्रों में गिना जाता है। इस शहर की भौगोलिक परिस्थितियां भी कपड़ा उद्योग के लिए अनुकूल मानी जाती हैं। यहां का मौसम, औद्योगिक वातावरण और प्रशिक्षित श्रमिकों की उपलब्धता उत्पादन क्षमता को लगातार मजबूत बनाती है। वर्षों से विकसित औद्योगिक ढांचे ने कोयम्बटूर को टेक्सटाइल क्षेत्र में स्थिर और भरोसेमंद पहचान दिलाई है। यही वजह है कि देश की कई प्रमुख वस्त्र कंपनियां यहां से अपना उत्पादन संचालित करती हैं। कोयम्बटूर की सबसे बड़ी विशेषता इसका एकीकृत टेक्सटाइल नेटवर्क है। यहां कपास की खरीद से लेकर धागा तैयार करने, बुनाई, रंगाई, प्रिंटिंग और तैयार परिधान बनाने तक की पूरी प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर ही पूरी हो जाती है। इससे उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है और उद्योग की कार्यक्षमता भी बढ़ती है। इस मॉडल ने शहर को देश के सबसे संगठित टेक्सटाइल क्लस्टरों में शामिल कर दिया है। शहर में तैयार होने वाला कॉटन यार्न देश के अनेक राज्यों की वस्त्र इकाइयों तक पहुंचता है। उच्च गुणवत्ता वाले सूती धागे की वजह से यहां का उत्पादन गारमेंट उद्योग और निर्यात आधारित कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा निटवियर, फैब्रिक, होम टेक्सटाइल्स, तौलिये और अन्य तैयार वस्त्रों का भी बड़े पैमाने पर निर्माण किया जाता है। कोयम्बटूर का योगदान केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है। यहां निर्मित टेक्सटाइल उत्पादों की आपूर्ति कई विदेशी बाजारों में भी होती है। सूती धागा, तैयार कपड़े, टेक्निकल टेक्सटाइल और होम फर्निशिंग उत्पादों का निर्यात इस शहर की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार देता है। इसी वजह से यह भारत के प्रमुख निर्यात केंद्रों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए हुए है। टेक्सटाइल उत्पादन के साथ-साथ कोयम्बटूर मशीन निर्माण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहां टेक्सटाइल मशीनरी, मोटर्स, स्पेयर पार्ट्स और इंजीनियरिंग उपकरणों का भी बड़े पैमाने पर निर्माण होता है। इससे वस्त्र उद्योग को स्थानीय स्तर पर आवश्यक मशीनें और तकनीकी सहायता आसानी से उपलब्ध हो जाती है। भारत का कपड़ा उद्योग आज भी देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। कृषि के बाद यह सबसे अधिक रोजगार उपलब्ध कराने वाले क्षेत्रों में शामिल है और निर्यात में भी इसकी उल्लेखनीय हिस्सेदारी है। इसी मजबूत औद्योगिक व्यवस्था, व्यापक उत्पादन क्षमता और निर्यात में अहम योगदान के कारण कोयम्बटूर को आज भारत की ‘टेक्सटाइल सिटी’ के रूप में विशेष पहचान प्राप्त है।