महाराष्ट्र में नए सियासी उलटफेर के संकेत, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस संग एनसीपी के दोनों धड़ों की गोपनीय बैठक से गरमाया राजनीतिक माहौल

नई दिल्ली । महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बहुत बड़े सियासी फेरबदल के संकेत मिल रहे हैं, जिसने राज्य के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आधिकारिक आवास पर मंगलवार देर रात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों के वरिष्ठ नेताओं की ताबड़तोड़ बैठकें हुईं। इन गोपनीय मुलाकातों के बाद से ही कयासों का बाजार बेहद गर्म है और विपक्षी खेमे में भारी बेचैनी देखी जा रही है। सबसे बड़ी चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी कांग्रेस और महाविकास अघाड़ी गठबंधन को बड़ा झटका देकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के पाले में जाने की तैयारी कर रही है। प्राप्त विवरण के अनुसार, एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल ने पहले दक्षिण मुंबई स्थित शरद पवार के आवास ‘सिल्वर ओक’ पर जाकर उनसे बेहद लंबी मंत्रणा की। इसके तुरंत बाद वे देर शाम सीधे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात करने पहुंचे। इस दौरान राजनीतिक तापमान तब और बढ़ गया जब सत्ताधारी एनसीपी (अजित पवार गुट) के वरिष्ठ नेता सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल भी अलग से मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे। हालांकि बैठक में शामिल किसी भी नेता या मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से इस चर्चा के मुख्य एजेंडे पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है, लेकिन दोनों ही गुटों के सूत्रों ने इस बात को स्वीकार किया है कि पर्दे के पीछे किसी बड़े राजनीतिक समझौते की पटकथा लिखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जुलाई 2023 में पार्टी के विभाजन के बाद यह पहली बार है जब शरद पवार की पार्टी सबसे बड़े रणनीतिक संकट का सामना कर रही है। अंदरूनी सूत्रों की मानें तो शरद पवार गुट के कुल 10 विधायकों में से कम से कम आधे से अधिक विधायक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन में शामिल होने के प्रबल पक्ष में हैं। लंबे समय तक विपक्षी खेमे में रहने के कारण इन विधायकों को अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए आवश्यक विकास निधि जुटाने और प्रशासनिक मंजूरियां हासिल करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, जिससे उनके जमीनी राजनीतिक कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे थे। पार्टी के प्रांतीय नेतृत्व ने हाल ही में अपने विधायकों की इस गंभीर भावना और चिंताओं से शीर्ष आलाकमान को विस्तार से अवगत कराया था। यद्यपि शरद पवार ने इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक अपनी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है और न ही पार्टी के अगले कदम को लेकर कोई सार्वजनिक घोषणा की है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि वे अपने विधायकों के भारी दबाव के कारण इस नए विकल्प पर बेहद गंभीरता से विचार कर रहे हैं। इस साल की शुरुआत में मुंबई महानगरपालिका चुनावों के बाद से ही दोनों धड़ों के एक होने या शरद गुट के कांग्रेस में विलय की खबरें आती रही हैं, लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के कड़े विरोध के कारण अब बाजी पूरी तरह एनडीए की ओर मुड़ती हुई दिखाई दे रही है। संख्या बल के रणनीतिक गणित को देखें तो विधानसभा में शरद पवार गुट के पास वर्तमान में 10 विधायक और लोकसभा में 8 सांसद मौजूद हैं। हालांकि यह महाराष्ट्र के प्रमुख राजनीतिक दलों में संख्या के हिसाब से छोटा समूह प्रतीत हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा नीत एनडीए के लिए इसकी उपयोगिता बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। केंद्र सरकार आगामी संसद सत्रों में सीमांकन विधेयक जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनों को पारित कराने की योजना बना रही है, जिसके लिए उसे उच्च सदन और निम्न सदन दोनों में अतिरिक्त मतों की आवश्यकता है। ऐसे समय में एनडीए के शीर्ष रणनीतिकार शरद पवार गुट से मिलने वाले किसी भी संभावित वैधानिक समर्थन का खुले दिल से स्वागत करने के लिए तैयार दिख रहे हैं। यह राजनीतिक उथल-पुथल सिर्फ शरद पवार खेमे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अजित पवार गुट के भीतर भी भारी अंतर्विरोध और मंथन का दौर जारी है। इस साल जनवरी के अंत में एक दुखद विमान हादसे में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजित पवार के असामयिक निधन के बाद से राज्य की राजनीति का पूरा परिदृश्य बदल चुका है। उनके निधन के बाद से दोनों गुटों के दोबारा एक होने की सुगबुगाहट तो तेज हुई थी, लेकिन नेतृत्व को लेकर बात नहीं बन सकी। अब सुनेत्रा पवार के नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर ही कानूनी आपत्तियां उठाई जा रही हैं, जिसने संगठन के आंतरिक असंतोष को उजागर कर दिया है। इन सभी बदलते हालातों के बीच दिल्ली से लेकर मुंबई तक की राजनीतिक नजरें अब शरद पवार के अंतिम फैसले पर टिकी हुई हैं।
US ने ईरान पर लगाया सात कारोबारी जहाजों पर हमले का आरोप, भारतीय नाविक भी प्रभावित

वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव (West Asia Crisis) के बीच अमेरिका (America) ने ईरान (Iran) पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) (US Central Command -CENTCOM) ने कहा है कि पिछले सात दिनों में ईरान ने सात वाणिज्यिक (कमर्शियल) जहाजों को निशाना बनाया, जिससे करीब एक दर्जन नागरिक चालक दल (क्रू) के सदस्य मारे गए, लापता हुए या घायल हुए हैं। अमेरिका ने कहा कि इन घटनाओं के लिए वह ईरान को जिम्मेदार मानता है। सेंटकॉम के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने बयान जारी कर कहा कि ईरानी बलों ने जानबूझकर नागरिक जहाजों को निशाना बनाया है। उनके मुताबिक, पिछले एक सप्ताह में ईरान ने सात कारोबारी जहाजों पर हमले किए। इसके अलावा ईरान ने पड़ोसी खाड़ी देशों की ओर दर्जनों मिसाइलें और ड्रोन भी दागे। उन्होंने कहा कि अमेरिका निर्दोष लोगों की जान को खतरे में डालने वाली ईरान की आक्रामक गतिविधियों के लिए उसे जवाबदेह ठहरा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ा तनावअमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और जहाजों की आवाजाही को बाधित कर रहा है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त तेल और व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। सेंटकॉम ने बताया कि उसने ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों से आने-जाने वाले जहाजों पर नौसैनिक नाकेबंदी फिर से शुरू कर दी है। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कदम ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने के लिए उठाया गया है, जिनका इस्तेमाल व्यापारिक जहाजों पर हमलों में किया जा रहा है। अमेरिका के अनुसार, इस अभियान के तहत क्षेत्र में 20 से अधिक अमेरिकी युद्धपोत और सैकड़ों सैन्य विमान तैनात किए गए हैं। भारत ने जताई चिंताइस बीच भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो जहाजों; एमटी अल बहियाह और एमटी मोम्बासा; पर हुए हमले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। इन दोनों जहाजों पर कुल 46 चालक दल के सदस्य सवार थे, जिनमें 30 भारतीय नाविक शामिल थे। यूएई ने भी हमले की पुष्टि कीसंयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि यूएई के झंडे वाले टैंकर मोम्बासा और बहियाह को होर्मुज जलडमरूमध्य के दक्षिणी हिस्से में, ओमान के क्षेत्रीय जल में, ईरानी क्रूज मिसाइलों से निशाना बनाया गया। इन घटनाओं के बाद पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है। समुद्री व्यापार, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। वहीं, अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और तेज होने की आशंका भी जताई जा रही है।
पोलैंड के उप विदेश मंत्री ने की PM मोदी की तारीफ…. बोले- रूसी राष्ट्रपति मानते हैं उनकी बात

वारसॉ। पोलैंड के उप विदेश मंत्री (Polish Deputy Foreign Minister ) व्लादिस्लाव थियोफिल बार्टोशेवस्की (Vladislav Theophil Bartoshevsky) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) की सराहना की है। उन्होंने पीएम मोदी को एक बहुत प्रसिद्ध और सम्मानित वैश्विक राजनेता बताया। उन्होंने कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) भारतीय प्रधानमंत्री की बातों पर ध्यान देते हैं। बार्टोशेवस्की ने एक प्रेस वार्ता में कहा कि पीएम मोदी ने साल 2022 के अंत में राष्ट्रपति पुतिन को यूक्रेन में सामरिक परमाणु हथियारों (टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स) का इस्तेमाल करने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने में प्रभावपोलिश नेता ने कहा कि पीएम मोदी रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए अपना प्रभाव डाल सकते हैं। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी उन गिने-चुने लोगों में से एक हैं जो वास्तव में राष्ट्रपति पुतिन पर कुछ दबाव और प्रभाव डाल सकते हैं। भारत इस संघर्ष को रोकने के लिए ऐसा कर सकता है। उन्होंने कहा कि भारत एक गुटनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में रूस और पूर्व सोवियत संघ के साथ लंबे समय से संबंध बनाए हुए है। पश्चिम एशिया संघर्ष पर भारत का रुखपश्चिम एशिया संघर्ष पर भारत के रुख को सही बताते हुए बार्टोशेवस्की ने कहा कि भारत एक बड़ा और महत्वपूर्ण देश है। भारत को तेल सहित वस्तुओं के मुक्त प्रवाह से लाभ होता है। भारत खाड़ी देशों से आने वाले तेल और गैस पर बहुत निर्भर है। पोलैंड भी ईरान के संपर्क में है और कूटनीतिक समाधान चाहता है। उन्होंने कहा कि हम भी पीएम मोदी की तरह ही समझदारी से बात करने की कोशिश कर रहे हैं। पुतिन ने भी की थी भारत की तारीफरूस और यूक्रेन के बीच युद्ध फरवरी 2022 में शुरू हुआ था। पिछले महीने सेंट पीटर्सबर्ग इकोनॉमिक फोरम में राष्ट्रपति पुतिन ने भी भारत को एक महान देश बताया था। उन्होंने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का समर्थन किया था। पुतिन ने कहा था कि भारत का अपनी पसंद के देशों के साथ आर्थिक संबंध विकसित करना स्वाभाविक है। पुतिन ने भारत पर दबाव बनाने की अमेरिकी कोशिशों की आलोचना करते हुए इसे द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए नुकसानदेह बताया था। पुतिन ने पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की आर्थिक वृद्धि की सराहना की थी और कहा था कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। उन्होंने इसे पीएम मोदी के नेतृत्व में सरकार की कड़ी मेहनत का परिणाम बताया था। उन्होंने भारत और रूस के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी को भी रेखांकित किया था।
भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश

वॉशिंगटन। अमेरिका (America) के दोनों प्रमुख दलों के सीनेटरों (Senators) ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने वाला बहुप्रतीक्षित विधेयक (Bill) पेश किया है। इसमें भारत समेत पांच देशों का नाम शामिल है, जिन पर रूस से तेल की खरीद जारी रखने पर शुल्क लगाया जा सकता है। कुछ सांसद इस प्रस्ताव को “लिंडसे ग्राहम रूस अकाउंटेबिलिटी बिल” (Lindsey Graham Russia Accountability Bill) कह रहे हैं। इसे मंगलवार को कैपिटल हिल में डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल और जीन शाहीन के साथ रिपब्लिकन सीनेटर रोजर विकर, केटी ब्रिट और दोनों दलों के एक दर्जन से अधिक सांसदों ने पेश किया। यह विधेयक सीनेटर लिंडसे ग्राहम के निधन के तुरंत बाद पेश किया गया है। ग्राहम ने करीब दो वर्षों तक इस विधेयक पर काम किया था और उनके सहयोगियों ने उन्हें इसका प्रमुख सूत्रधार बताया। इस विधेयक में ग्राहम ने रूसी तेल खरीद करने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की सिफारिश की थी। अमेरिकी सांसदों ने क्यों पेश किया 100 फीसदी टैरिफ वाला बिल? मुख्य डेमोक्रेटिक प्रायोजक ब्लूमेंथल ने कहा कि यह विधेयक केवल शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें रूस की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से, ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र, रक्षा उद्योग, रूसी उद्योगपतियों तथा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। विधेयक में प्रशासन को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने वाले देशों पर शून्य से अधिक दर पर शुल्क लगा सके। हालांकि, शुल्क की अधिकतम सीमा तय की गई है। विधेयक के अनुसार, अब शुल्क केवल रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों पर लागू होगा। विधेयक के प्रायोजकों ने कहा कि इस सूची में चीन और भारत सबसे ऊपर हैं। संशोधित मसौदे में पहले प्रस्तावित 500 फीसदी शुल्क को घटाकर अधिकतम 100 फीसदी कर दिया गया है। टैरिफ वाले देशों की सूची में भारत का भी नामब्लूमेंथल ने जिन पांच देशों का नाम लिया, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। विधेयक में रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों को भी दायरे में लाने का प्रावधान है। हालांकि, जो देश अपनी कुल गैस का 15 फीसदी से कम रूस से आयात करते हैं और इन आयातों को कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें इससे छूट मिलेगी। इस प्रावधान से अधिकांश यूरोपीय सहयोगी देशों को राहत मिलेगी। सीनेटरों ने स्पष्ट किया कि शुल्क की वास्तविक दर अभी तय नहीं की गई है। इसे विधेयक में निर्धारित नहीं किया गया है, बल्कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) तय करेंगे। ब्लूमेंथल ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शुल्क की दर इतनी होगी कि “चीन, भारत और रूस से तेल तथा गैस खरीदने वाले अन्य बड़े देशों को इससे हतोत्साहित किया जा सके।” हालांकि, उन्होंने कोई निश्चित प्रतिशत बताने से इनकार कर दिया। ट्रंप के पास छूट देने का विशेषाधिकारविधेयक में राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। अगर बाद में शुल्क कम किया जाता है तो इसकी जानकारी कांग्रेस को देना भी अनिवार्य होगा। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सीनेटर जेम्स रिश ने कहा कि उन्होंने एक अलग प्रावधान जोड़ने पर जोर दिया, जिसके तहत रूस के तथाकथित “शैडो फ्लीट” यानी उन तेल टैंकरों पर कार्रवाई की जाएगी, जिनका इस्तेमाल मौजूदा प्रतिबंधों से बचकर तेल निर्यात के लिए किया जाता है। सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को पहले के मसौदे की तुलना में काफी सीमित किया गया है। पहले के संस्करण में कथित तौर पर 63 देशों तक पर शुल्क लगाने का प्रावधान था। ब्लूमेंथल ने कहा कि मौजूदा मसौदा केवल रूस से तेल खरीदने वाले पांच और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों पर केंद्रित है। इनमें कुछ देशों के नाम दोनों सूचियों में शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलाव ट्रंप प्रशासन के सुझाव पर किया गया है और प्रशासन ने लिखित रूप से इस विधेयक का समर्थन भी किया है। लिंडसे ग्राहम को लेकर क्या बोले अमेरिकी सांसद?सांसदों ने उम्मीद जताई कि संशोधित मसौदे को प्रतिनिधि सभा में भी व्यापक समर्थन मिलेगा, क्योंकि पहले के व्यापक प्रस्ताव पर कई सांसदों ने आपत्ति जताई थी। विधेयक की घोषणा के दौरान कई सीनेटरों ने लिंडसे ग्राहम को श्रद्धांजलि दी। सीनेटर रोजर विकर ने कहा कि ग्राहम के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान उन्होंने कई उपलब्धियां देखीं, लेकिन “यह उनका सबसे बड़ा योगदान है।” सीनेटर टेड क्रूज ने कहा कि ग्राहम ने निधन से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ इस विधेयक की शर्तों पर सीधे बातचीत की थी। उन्होंने सांसदों से अपील की कि इसे भारी बहुमत से पारित कर ग्राहम को श्रद्धांजलि दी जाए। सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को जल्द पारित करना जरूरी है। उन्होंने यूक्रेन की युद्धक्षेत्र में बढ़त और रूस की ओर से नागरिक इलाकों पर जारी हमलों का हवाला दिया। कई सीनेटरों ने उम्मीद जताई कि अगस्त के अंत तक सीनेट इस पर कार्रवाई कर सकती है। उनका कहना है कि पर्याप्त समर्थन मिलते ही इस पर मतदान कराया जाएगा। जब राष्ट्रपति ट्रंप के उस सुझाव के बारे में पूछा गया कि इस विधेयक में ईरान या हिजबुल्ला पर प्रतिबंधों को भी शामिल किया जा सकता है, तो ब्लूमेंथल ने कहा कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता मौजूदा विधेयक को आगे बढ़ाने की है। हालांकि, उन्होंने भविष्य में अलग विधेयक लाने की संभावना से इनकार नहीं किया। भारत पर क्यों गहराया संकट?भारत ने अब तक रियायती दर पर रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने के लिए पश्चिमी देशों के दबाव को स्वीकार नहीं किया है। 2022 के बाद से रूस से भारत का तेल आयात काफी बढ़ा है और अब यह भारत के कुल तेल आयात का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। नई दिल्ली पहले भी कह चुका है कि यह व्यापार देश की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हित में है। भारत का यह भी कहना रहा है कि इससे वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलती है। यह विधेयक अभी सीनेट की प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद प्रतिनिधि सभा से भी पारित होना बाकी है। इसके बाद ही इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के
क्या अंग्रेजी को माना जा सकता है भारतीय भाषा? सीबीएसई की त्रिभाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का साफ इनकार

नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू की जा रही तीन-भाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी नई भाषा को सीखना कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही एक बड़ा संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल भी उठाया कि क्या अंग्रेजी को एक भारतीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इस नीति के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि नए नियमों के तहत अंग्रेजी को गैर-मूल भाषा की श्रेणी में रखा गया है, जिससे छात्रों के सामने भाषाई चयन का संकट खड़ा हो गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में दायर नई याचिकाओं पर केंद्र सरकार और सीबीएसई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए आगामी 22 जुलाई की तारीख तय की है। केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने इस विषय पर अपना आधिकारिक पक्ष रखने के लिए दस दिनों का समय मांगा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के संवैधानिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है, हालांकि स्थानीय भाषाओं की परिभाषा और उनके वर्गीकरण पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता हो सकती है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सीबीएसई का यह सर्कुलर बिना उचित कानूनी अधिकार के जारी किया गया है, जो छात्रों पर जबरन भाषा थोपने जैसा है। नई नीति के अनुसार, कक्षा नौ के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषाएं होनी चाहिए। इसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ेगा जो कक्षा पांच से निरंतर एक निश्चित भाषाई पैटर्न का पालन कर रहे हैं। वकीलों ने चिंता जताई कि यदि कोई छात्र संस्कृत के स्थान पर पंजाबी या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा चुनना चाहता है, तो स्कूलों के पास न तो पर्याप्त योग्य शिक्षक उपलब्ध हैं और न ही आवश्यक पाठ्यपुस्तकें। अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि भले ही बोर्ड ने छात्रों को संविधान की 22 आधिकारिक भाषाओं में से चयन करने का विकल्प दिया है, लेकिन देश के सभी स्कूलों के लिए इतने बड़े पैमाने पर भाषाई शिक्षकों की नियुक्ति करना और आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसके अतिरिक्त, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की वेबसाइट पर निर्धारित समय सीमा के बाद भी केवल तीन भाषाओं की ही पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकी हैं, जिससे छात्रों की पढ़ाई बाधित होने की पूरी आशंका बनी हुई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत तैयार की गई इस त्रिभाषा नीति का मुख्य उद्देश्य स्कूली स्तर पर बच्चों को बहुभाषी बनाना और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है। ऐतिहासिक रूप से इस फॉर्मूले को पहली बार वर्ष 1964-66 में शिक्षा आयोग द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसे बाद में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया गया। नई व्यवस्था के तहत भाषाई चुनाव की प्रक्रिया को इस तरह तैयार किया गया है कि यदि कोई छात्र पहली दो भाषाओं के रूप में हिंदी और तमिल पढ़ रहा है, तो उसे तीसरी भाषा के रूप में एक और भारतीय भाषा या फिर अंग्रेजी अथवा किसी अन्य विदेशी भाषा का चयन करना होगा। प्रशासनिक स्पष्टीकरण के अनुसार, यह नई त्रिभाषा व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2026-27 में केवल नौवीं कक्षा के छात्रों पर ही पूरी तरह लागू होगी। वर्तमान में दसवीं कक्षा में पढ़ रहे छात्र पुरानी द्विभाषी व्यवस्था के तहत ही अपनी बोर्ड परीक्षाएं देंगे। नए नियमों के मुताबिक, यदि कोई छात्र अंग्रेजी विषय का चयन करता है, तो वह अन्य किसी विदेशी भाषा जैसे कोरियन, जापानी, फ्रेंच या जर्मन का चुनाव नहीं कर सकेगा। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि स्कूल असेसमेंट के दौरान तीसरी भाषा में उत्तीर्ण हुए बिना छात्रों को दसवीं कक्षा का उत्तीर्ण प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाएगा।
Morena Kidnapping Case: मुरैना में 3 साल के बच्चे का अपहरण, पिता ही बना किडनेपिंग का मास्टरमाइंड

Morena Kidnapping Case: मध्यप्रदेश। मुरैना के गायत्री कॉलोनी स्थित रेनबो पब्लिक स्कूल से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। जहां दिनदहाड़े एक 3 साल के बच्चे कार्तिकेय का अपहरण हो गया। सबसे ज्यादा चौकाने वाली बात तो यह है कि इस पूरी घटना का मास्टरमाइंड कोई और नहीं बल्कि बच्चे का पिता नीलेश खारवाड़ है। ईरान के पड़ोसी देश से अमेरिका हटाएगा अपनी सेना, सितंबर 2026 तक पूरी होगी वापसी ड्राइवर से करवाया किडनैप पुलिस जांच में सामने आया कि नीलेश हेमावास जिला पाली राजस्थान का रहने वाला है है। उसने ही अपने ड्राइवर के जरिए स्कूल से बेटे का किडनैप कराया। घटना के बाद पुलिस ने स्कूल और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली। फुटेज में एक संदिग्ध युवक बच्चे को ले जाता दिखाई दिया। जांच में उसकी पहचान नीरज के रूप में हुई, जो नीलेश खारवाड़ का ड्राइवर है। इसके बाद साइबर सेल की मदद से आरोपियों की लोकेशन ट्रेस की गई। जांच में पता चला कि दोनों बच्चे को लेकर धौलपुर के रास्ते राजस्थान के पाली की ओर निकल गए हैं। एमपी में जुलाई में बढ़ी गर्मी, 36 डिग्री के पार पहुंचा पारा, आज 21 जिलों में हल्की बारिश की संभावना मां बोलीं- पति बच्चे के सहारे दबाव बनाना चाहता है बच्चे की मां ने अपने पति पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि एक साल पहले भी उनके पति बिना बताए बेटे को अपने साथ ले गए थे। इस बार उन्होंने अपने ड्राइवर के जरिए स्कूल से ही बच्चे का अपहरण करा दिया। महिला का आरोप है कि पति बच्चे को अपने पास रखकर उन पर दोबारा साथ रहने का दबाव बनाना चाहता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर पिछली शिकायत पर कोतवाली पुलिस ने समय रहते कार्रवाई की होती, तो यह घटना दोबारा नहीं होती। Gwalior One Sided Love: सिरफिरे ने घर में घुसकर प्रेमिका को मारी गोली; बचने आया देवर भी बना निशाना पाली के लिए रवाना हुई मुरैना पुलिस पुलिस को जानकारी मिली है कि आरोपी बच्चे को लेकर पाली पहुंच चुके हैं। इसके बाद राजस्थान पुलिस को सूचना दे दी गई है। वहीं, मुरैना पुलिस की एक टीम भी बच्चे की तलाश के लिए पाली रवाना हो गई है। मामले में पुलिस का कहना है कि आरोपी को जल्द ही पकड़ लिया जायेगा।
एजबेस्टन में गिल और अक्षर का शानदार प्रदर्शन, इंग्लैंड को 6 विकेट से हराया, भारत की जीत की ये हैं 5 बड़ी वजहें

बर्मिंघम। भारतीय टीम ने एजबेस्टन में खेले गए पहले वनडे मुकाबले में इंग्लैंड को छह विकेट से हराकर न सिर्फ तीन मैचों की सीरीज में 1-0 की बढ़त हासिल की, बल्कि कई रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिए। कप्तान शुभमन गिल की शानदार बल्लेबाजी और अक्षर पटेल के बेहतरीन ऑलराउंड प्रदर्शन ने भारत को यादगार जीत दिलाई। 259 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत ने 45.2 ओवर में चार विकेट गंवाकर मुकाबला अपने नाम कर लिया। कप्तान शुभमन गिल ने 75 गेंदों में 80 रन की शानदार पारी खेली। उनकी पारी में 11 चौके और एक छक्का शामिल रहा। हालांकि, क्रैम्प और हैमस्ट्रिंग की परेशानी के कारण उन्हें रिटायर्ड हर्ट होकर मैदान छोड़ना पड़ा। इसके बाद अक्षर पटेल और वॉशिंगटन सुंदर ने जिम्मेदारी संभाली। दोनों ने पांचवें विकेट के लिए नाबाद 102 रनों की साझेदारी कर भारत की जीत पक्की कर दी। अक्षर ने नाबाद 57 रन बनाए, जबकि सुंदर ने नाबाद 52 रनों का योगदान दिया। गेंदबाजों ने पलटी इंग्लैंड की पारीइससे पहले इंग्लैंड ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। शुरुआत में मेजबान टीम मजबूत स्थिति में थी और एक समय उसका स्कोर 61 रन पर बिना विकेट के था। लेकिन भारतीय गेंदबाजों ने शानदार वापसी करते हुए इंग्लैंड को 107 रन तक पहुंचते-पहुंचते छह विकेट गंवाने पर मजबूर कर दिया। हालांकि जो रूट (76*) और लियाम डॉसन (68) ने सातवें विकेट के लिए 121 रनों की साझेदारी कर इंग्लैंड को 258 रन तक पहुंचाया। भारत की ओर से अक्षर पटेल ने शानदार गेंदबाजी करते हुए चार विकेट हासिल किए। प्रसिद्ध कृष्णा और गुरनूर बराड़ ने दो-दो विकेट लेकर इंग्लैंड की पारी को नियंत्रित रखा। भारत की जीत के 5 बड़े कारण1. 11 साल बाद एजबेस्टन में इंग्लैंड को मिली हारएजबेस्टन मैदान पर इंग्लैंड का वनडे रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा था। 2015 के बाद उसने इस मैदान पर लगातार आठ वनडे मुकाबले जीते थे। भारत ने 2014 के बाद पहली बार इसी मैदान पर इंग्लैंड को हराकर उसका विजयी सिलसिला तोड़ दिया। 2. इंग्लैंड के खिलाफ लगातार छठी वनडे जीतभारत की यह इंग्लैंड के खिलाफ वनडे क्रिकेट में लगातार छठी जीत है। यह किसी भी दौर में इंग्लैंड के खिलाफ भारत की सबसे लंबी जीत की श्रृंखला बन गई है। 3. गिल का एजबेस्टन में लगातार शानदार प्रदर्शनशुभमन गिल का एजबेस्टन से खास रिश्ता बनता जा रहा है। पिछले साल इसी मैदान पर टेस्ट मैच में 269 और 161 रन की यादगार पारियां खेलने वाले गिल ने अब वनडे में भी कप्तानी पारी खेलकर अपनी छाप छोड़ी। 4. अक्षर पटेल का ऑलराउंड जवाबटी20 सीरीज में आलोचनाओं का सामना करने वाले अक्षर पटेल ने वनडे में शानदार वापसी की। उन्होंने पहले गेंद से चार विकेट लिए और फिर नाबाद 57 रन बनाकर टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई। 5. यूके दौरे पर भारत की पहली जीतइंग्लैंड और आयरलैंड के खिलाफ टी20 मुकाबलों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद भारत को मौजूदा यूनाइटेड किंगडम दौरे पर पहली जीत मिली। इस जीत ने टीम के आत्मविश्वास को नई मजबूती दी है। एजबेस्टन की इस जीत में कप्तान गिल का नेतृत्व, गेंदबाजों की वापसी और अक्षर पटेल का ऑलराउंड प्रदर्शन भारत के लिए सबसे बड़ी सकारात्मक बातें रहीं।
शोहरत खोने के डर से बेखौफ शहनाज गिल ने किया रिजेक्शन और मानसिक तनाव का सामना, इम्तियाज अली संग काम करने की जताई इच्छा

नई दिल्ली । हिंदी और पंजाबी सिनेमा जगत में अपनी विशेष पहचान बना चुकीं अभिनेत्री शहनाज गिल ने हाल ही में फिल्म उद्योग में अपने व्यक्तिगत अनुभवों, मानसिक चुनौतियों और करियर के प्रति अपने दृष्टिकोण पर खुलकर बात की है। अभिनेत्री ने स्वीकार किया है कि ग्लैमर की इस दुनिया में वे दैनिक स्तर पर अकेलेपन का सामना करती हैं। उनके अनुसार, फिल्म जगत की व्यस्तताओं के बावजूद एक कलाकार के जीवन में यह अकेलापन बेहद स्वाभाविक है क्योंकि यहां लोग आते-जाते रहते हैं और अंततः इंसान को अपने दम पर ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। शहनाज गिल ने अकेलेपन को एक नकारात्मक तत्व के रूप में देखने के बजाय इसे आत्ममंथन का एक माध्यम माना है। उनका मानना है कि एकांत के इन क्षणों में उन्हें विभिन्न विषयों पर गहराई से सोचने का अवसर मिलता है। हालांकि अधिक सोचने और मानसिक तनाव से उन्हें अपने काम को बेहतर करने में मदद मिलती है, लेकिन जीवन में एक ऐसे मार्गदर्शक की कमी हमेशा खलती है जो संकट या गुस्से के समय उन्हें शांत कर सके। इस चकाचौंध भरी दुनिया में वे आज भी किसी ऐसे सच्चे साथी की तलाश में हैं जो भीड़ में भी उनके अस्तित्व को समझ सके। फिल्म इंडस्ट्री में अपने सामाजिक दायरे पर बात करते हुए अभिनेत्री ने स्पष्ट किया कि बॉलीवुड में उनके करीबी दोस्तों की संख्या बेहद सीमित है। उन्होंने माना कि फिल्म जगत के बदलते समीकरणों के कारण उन्हें लोगों पर भरोसा करने में कठिनाई होती है, जिसे आमतौर पर ट्रस्ट इश्यूज कहा जाता है। यहां दोस्त बहुत जल्दी बनते और बिगड़ते हैं, जिसके कारण एक वास्तविक संबंध को पहचान पाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। उनके लिए किसी भी रिश्ते या दोस्ती में आपसी सम्मान और एक-दूसरे को बिना किसी स्वार्थ के समर्थन देना सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता है। करियर के मोर्चे पर बात करते हुए शहनाज गिल ने व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में मिलने वाले रिजेक्शंस यानी अस्वीकृतियों के प्रति एक बेहद परिपक्व दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वे रिजेक्शन से घबराने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ने में विश्वास रखती हैं। एक कुशल अभिनेता के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए वे आलोचनाओं को बेहद सकारात्मक तरीके से स्वीकार करती हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि यदि कोई उनके सीधेपन या प्रेम का गलत फायदा उठाने का प्रयास करता है, तो वे स्थिति को नियंत्रित करना और खुद को संभालना बखूबी जानती हैं। आगामी परियोजनाओं को लेकर अभिनेत्री ने यह साफ कर दिया है कि वे केवल संख्या बढ़ाने के लिए फिल्मों का चयन नहीं करेंगी, बल्कि उनका पूरा ध्यान गुणवत्तापूर्ण कार्यों पर केंद्रित रहेगा। वे केवल उन्हीं स्क्रिप्ट्स को स्वीकार करेंगी जो एक कलाकार के रूप में उनकी क्षमताओं को चुनौती दें। अपनी भविष्य की योजनाओं को साझा करते हुए उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली के साथ काम करने की तीव्र इच्छा व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि वे इस अवसर को हासिल करने के लिए लगातार सकारात्मक प्रयास कर रही हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि वे एक दिन उनकी फिल्म की मुख्य अभिनेत्री के रूप में नजर आएंगी। आमतौर पर फिल्म सितारों में लोकप्रियता और फेम खोने का एक अनजाना डर देखा जाता है, लेकिन शहनाज गिल ने इस धारणा को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। उन्होंने बेहद तार्किक रूप से कहा कि लोकप्रियता एक अस्थायी पहलू है, जो आज है और कल समाप्त हो सकता है। वे इस वास्तविकता को पूरी तरह स्वीकार करती हैं कि शोहरत के पीछे भागने के बजाय अपने काम के प्रति ईमानदार रहना ज्यादा जरूरी है। फिलहाल वे अपनी अपकमिंग पंजाबी फिल्म ‘इश्कनामा’ को लेकर चर्चा में हैं और उनका पूरा ध्यान सिनेमाई पर्दे पर बेहतरीन प्रदर्शन करने पर केंद्रित है।
968 दिन बाद वनडे में वापसी, बुमराह ने रचा इतिहास, इंग्लैंड की धरती पर बनाए दो बड़े रिकॉर्ड

बर्मिंघम। लंबे इंतजार के बाद वनडे क्रिकेट में वापसी करने वाले जसप्रीत बुमराह ने अपनी वापसी को यादगार बना दिया। 2023 वनडे वर्ल्ड कप फाइनल के बाद पहली बार 50 ओवर के प्रारूप में उतरे बुमराह ने इंग्लैंड के खिलाफ बर्मिंघम में खेले गए मुकाबले में शानदार प्रदर्शन करते हुए कई रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए। 968 दिन बाद वनडे मैदान पर लौटे बुमराह ने न सिर्फ अपने 150 वनडे विकेट पूरे किए, बल्कि इंग्लैंड की धरती पर भारत के लिए सबसे ज्यादा वनडे विकेट लेने वाले गेंदबाज भी बन गए। 150 वनडे विकेट पूरे, शमी और कुलदीप के खास क्लब में शामिलजसप्रीत बुमराह ने वनडे क्रिकेट में 150 विकेट का आंकड़ा महज 4605 गेंदों में पूरा किया। इसके साथ ही वह भारत के लिए सबसे कम गेंदों में यह उपलब्धि हासिल करने वाले तीसरे गेंदबाज बन गए। भारत के लिए सबसे कम गेंदों में 150 वनडे विकेट लेने वाले गेंदबाजमोहम्मद शमी – 4070 गेंदकुलदीप यादव – 4513 गेंदजसप्रीत बुमराह – 4605 गेंदअजीत आगरकर – 5027 गेंदइरफान पठान – 5131 गेंद बुमराह ने मुकाबले के 13.1वें ओवर में अपनी पहली ही गेंद पर इंग्लैंड के बल्लेबाज हैरी ब्रूक को आउट कर दिया। उन्होंने ऑफ स्टंप के बाहर शॉर्ट ऑफ लेंथ गेंद फेंकी, जिसमें अतिरिक्त उछाल और बाहर की ओर मूवमेंट देखने को मिला। ब्रूक ने गेंद को थर्ड मैन की दिशा में खेलने की कोशिश की, लेकिन बल्ले का बाहरी किनारा लग गया। पहली स्लिप पर मौजूद रोहित शर्मा ने आसान कैच पकड़कर उन्हें पवेलियन भेज दिया। लंबे अंतराल के बाद वापसी के बावजूद बुमराह की गेंदबाजी में वही पुरानी धार नजर आई। उनकी रफ्तार, सटीक लाइन और खतरनाक मूवमेंट ने साबित कर दिया कि वह अब भी भारतीय गेंदबाजी आक्रमण के सबसे बड़े हथियारों में शामिल हैं। Milestone moment for #JaspritBumrah 💪 The Boom marks his much-awaited return by dismissing Harry Brook to claim his 150th ODI wicket! 🎯💥#ENGvIND 1st ODI 👉 Streaming LIVE on JioHotstar! pic.twitter.com/CCBxJyGKAn — Star Sports (@StarSportsIndia) July 14, 2026 इंग्लैंड में बुमराह का जलवा, बने नंबर-1 भारतीय गेंदबाजइंग्लैंड की परिस्थितियों में बुमराह का प्रदर्शन हमेशा प्रभावशाली रहा है। इस मुकाबले के बाद वह इंग्लैंड की धरती पर वनडे क्रिकेट में भारत के लिए सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बन गए। इंग्लैंड में भारत के लिए सबसे ज्यादा वनडे विकेट लेने वाले गेंदबाजजसप्रीत बुमराह – 31 विकेटरवींद्र जडेजा – 30 विकेटभुवनेश्वर कुमार – 28 विकेटमदन लाल – 27 विकेटमोहम्मद शमी – 26 विकेट वापसी के साथ मिला रिकॉर्ड का तोहफाबुमराह के लिए यह मुकाबला केवल टीम में वापसी का मौका नहीं था, बल्कि अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का भी अवसर था। चोट के कारण लंबे समय तक क्रिकेट से दूर रहने के बाद मैदान पर उतरते ही उन्होंने दिखा दिया कि क्यों उन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक तेज गेंदबाजों में गिना जाता है। करीब 968 दिन का इंतजार खत्म हुआ और बुमराह ने अपनी वापसी में वही पुराना अंदाज दिखाया—सटीक गेंदबाजी, घातक रफ्तार और रिकॉर्ड बनाने की क्षमता।
ईरान के पड़ोसी देश से अमेरिका हटाएगा अपनी सेना, सितंबर 2026 तक पूरी होगी वापसी

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति में एक अहम बदलाव होने जा रहा है। करीब 23 साल पहले इराक में सैन्य अभियान शुरू करने वाला अमेरिका अब वहां से अपनी सैन्य मौजूदगी खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी के साथ व्हाइट हाउस में हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि 30 सितंबर 2026 तक सभी अमेरिकी सैनिक इराक से वापस लौट जाएंगे। ट्रंप ने कहा कि अब इराक में अमेरिकी सेना रखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि भविष्य में दोनों देशों के संबंध सैन्य सहयोग के बजाय आर्थिक, व्यापारिक और निवेश आधारित होंगे। यह फैसला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच हालिया संघर्ष ने पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा और कूटनीतिक स्थिति को प्रभावित किया है। ईरान लंबे समय से इराक और मध्य पूर्व के अन्य हिस्सों से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की मांग करता रहा है। पिछले कई वर्षों में ईरान समर्थित समूहों की ओर से इराक में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर रॉकेट और ड्रोन हमले किए जाते रहे हैं। हालिया संघर्ष के दौरान भी अमेरिकी ठिकाने निशाने पर रहे। कई विशेषज्ञ इस घटनाक्रम को ईरान के लिए रणनीतिक बढ़त के तौर पर देख रहे हैं। उनका मानना है कि अमेरिकी सैन्य उपस्थिति कम होना क्षेत्र में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। संघर्ष के बीच बदली अमेरिका की रणनीतिहालिया युद्ध के दौरान ईरान ने इराक और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। जवाब में अमेरिका ने भी ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई की। लगातार बढ़ते तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच वॉशिंगटन अब अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव करता दिखाई दे रहा है। इससे पहले भी अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में अपनी कुछ सैन्य गतिविधियों को सीमित करने के संकेत दे चुका है। इराक छोड़ने का मतलब रिश्ते खत्म करना नहींराष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट किया कि सैनिकों की वापसी का अर्थ इराक से अमेरिका का पूरी तरह अलग होना नहीं है। उन्होंने कहा कि तेल, ऊर्जा, निवेश और व्यापार जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग आगे भी जारी रहेगा। इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने भी कहा कि 30 सितंबर तक अमेरिकी सैनिक देश से बाहर हो जाएंगे, लेकिन अमेरिकी कंपनियां इराक के विकास में अपनी भूमिका निभाती रहेंगी। यानी अब सैन्य ताकत की जगह आर्थिक साझेदारी पर जोर दिया जाएगा। 2003 में शुरू हुआ था अमेरिका का इराक मिशनअमेरिका का इराक मिशन साल 2003 में शुरू हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के नेतृत्व में अमेरिकी सेना ने सद्दाम हुसैन सरकार को हटाने के लिए इराक पर हमला किया था। उस समय इराक पर बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियार रखने का आरोप लगाया गया था, लेकिन बाद में ऐसे हथियार बरामद नहीं हुए। साल 2007 में इराक में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़कर 1.7 लाख से अधिक हो गई थी। ओबामा के कार्यकाल में भी हुई थी वापसी2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन ने अधिकांश अमेरिकी सैनिकों को इराक से वापस बुला लिया था। हालांकि 2014 में आतंकी संगठन आईएसआईएस के बढ़ते प्रभाव के बाद इराक सरकार के अनुरोध पर अमेरिकी सेना दोबारा वहां पहुंची। इसके बाद करीब 2,500 अमेरिकी सैनिक इराकी सेना को प्रशिक्षण देने और आतंकवाद विरोधी अभियानों में सहयोग कर रहे थे। 2024 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद अमेरिकी सैनिकों की संख्या धीरे-धीरे कम की जा रही थी और अब पूरी वापसी की समयसीमा तय कर दी गई है। ईरान संघर्ष में अमेरिकी सेना को इराक में नुकसानईरान के साथ हुए संघर्ष के दौरान इराक में अमेरिकी सेना को नुकसान भी उठाना पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, इस दौरान इराक में छह अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, जबकि कई अन्य घायल हुए। ईरान की ओर से किए गए बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों में इरबिल और ऐन अल-असद जैसे अमेरिकी सैन्य ठिकाने प्रभावित हुए। हमलों में सैन्य गोदाम, हैंगर, रनवे और उपकरणों को नुकसान पहुंचा। इसके अलावा सलाह अल-दीन प्रांत में ईरान समर्थित समूहों ने अमेरिका के MQ-9 रीपर ड्रोन को भी मार गिराने का दावा किया। रिपोर्टों में कहा गया है कि पूरे क्षेत्र में अमेरिका को करीब 2.3 से 2.8 अरब डॉलर के अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों का नुकसान हुआ।