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ईरान के पड़ोसी देश से अमेरिका हटाएगा अपनी सेना, सितंबर 2026 तक पूरी होगी वापसी


नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति में एक अहम बदलाव होने जा रहा है। करीब 23 साल पहले इराक में सैन्य अभियान शुरू करने वाला अमेरिका अब वहां से अपनी सैन्य मौजूदगी खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी के साथ व्हाइट हाउस में हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि 30 सितंबर 2026 तक सभी अमेरिकी सैनिक इराक से वापस लौट जाएंगे।

ट्रंप ने कहा कि अब इराक में अमेरिकी सेना रखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि भविष्य में दोनों देशों के संबंध सैन्य सहयोग के बजाय आर्थिक, व्यापारिक और निवेश आधारित होंगे।

यह फैसला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच हालिया संघर्ष ने पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा और कूटनीतिक स्थिति को प्रभावित किया है। ईरान लंबे समय से इराक और मध्य पूर्व के अन्य हिस्सों से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की मांग करता रहा है। पिछले कई वर्षों में ईरान समर्थित समूहों की ओर से इराक में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर रॉकेट और ड्रोन हमले किए जाते रहे हैं। हालिया संघर्ष के दौरान भी अमेरिकी ठिकाने निशाने पर रहे।

कई विशेषज्ञ इस घटनाक्रम को ईरान के लिए रणनीतिक बढ़त के तौर पर देख रहे हैं। उनका मानना है कि अमेरिकी सैन्य उपस्थिति कम होना क्षेत्र में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

संघर्ष के बीच बदली अमेरिका की रणनीति
हालिया युद्ध के दौरान ईरान ने इराक और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। जवाब में अमेरिका ने भी ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई की। लगातार बढ़ते तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच वॉशिंगटन अब अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव करता दिखाई दे रहा है। इससे पहले भी अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में अपनी कुछ सैन्य गतिविधियों को सीमित करने के संकेत दे चुका है।

इराक छोड़ने का मतलब रिश्ते खत्म करना नहीं
राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट किया कि सैनिकों की वापसी का अर्थ इराक से अमेरिका का पूरी तरह अलग होना नहीं है। उन्होंने कहा कि तेल, ऊर्जा, निवेश और व्यापार जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग आगे भी जारी रहेगा।

इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने भी कहा कि 30 सितंबर तक अमेरिकी सैनिक देश से बाहर हो जाएंगे, लेकिन अमेरिकी कंपनियां इराक के विकास में अपनी भूमिका निभाती रहेंगी। यानी अब सैन्य ताकत की जगह आर्थिक साझेदारी पर जोर दिया जाएगा।

2003 में शुरू हुआ था अमेरिका का इराक मिशन
अमेरिका का इराक मिशन साल 2003 में शुरू हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के नेतृत्व में अमेरिकी सेना ने सद्दाम हुसैन सरकार को हटाने के लिए इराक पर हमला किया था। उस समय इराक पर बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियार रखने का आरोप लगाया गया था, लेकिन बाद में ऐसे हथियार बरामद नहीं हुए। साल 2007 में इराक में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़कर 1.7 लाख से अधिक हो गई थी।

ओबामा के कार्यकाल में भी हुई थी वापसी
2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन ने अधिकांश अमेरिकी सैनिकों को इराक से वापस बुला लिया था। हालांकि 2014 में आतंकी संगठन आईएसआईएस के बढ़ते प्रभाव के बाद इराक सरकार के अनुरोध पर अमेरिकी सेना दोबारा वहां पहुंची।

इसके बाद करीब 2,500 अमेरिकी सैनिक इराकी सेना को प्रशिक्षण देने और आतंकवाद विरोधी अभियानों में सहयोग कर रहे थे। 2024 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद अमेरिकी सैनिकों की संख्या धीरे-धीरे कम की जा रही थी और अब पूरी वापसी की समयसीमा तय कर दी गई है।

ईरान संघर्ष में अमेरिकी सेना को इराक में नुकसान
ईरान के साथ हुए संघर्ष के दौरान इराक में अमेरिकी सेना को नुकसान भी उठाना पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, इस दौरान इराक में छह अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, जबकि कई अन्य घायल हुए। ईरान की ओर से किए गए बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों में इरबिल और ऐन अल-असद जैसे अमेरिकी सैन्य ठिकाने प्रभावित हुए। हमलों में सैन्य गोदाम, हैंगर, रनवे और उपकरणों को नुकसान पहुंचा।

इसके अलावा सलाह अल-दीन प्रांत में ईरान समर्थित समूहों ने अमेरिका के MQ-9 रीपर ड्रोन को भी मार गिराने का दावा किया। रिपोर्टों में कहा गया है कि पूरे क्षेत्र में अमेरिका को करीब 2.3 से 2.8 अरब डॉलर के अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों का नुकसान हुआ।

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