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गर्भवती दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति से हाईकोर्ट का इनकार: 31 सप्ताह के गर्भ को देखते हुए दिया फैसला


मध्य प्रदेश । जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में दुष्कर्म से गर्भवती हुई 16 वर्षीय नाबालिग को गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 31 सप्ताह की गर्भावस्था में भ्रूण का विकास ऐसे स्तर पर पहुंच चुका है कि गर्भपात को शिशु के जीवन को समाप्त करने के समान माना जाएगा। जस्टिस विवेक जैन की वेकेशन बेंच ने यह आदेश देते हुए याचिका खारिज कर दी और राज्य सरकार को पीड़िता के उपचार, प्रसव और नवजात शिशु की देखभाल सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

शादी का झांसा देकर दुष्कर्म का आरोप
मामला मंडला जिले के घुघरी थाना क्षेत्र का है। आरोप है कि ग्राम बहरा निवासी एक युवक ने 16 वर्षीय किशोरी को शादी का झांसा देकर 15 अक्टूबर 2025 से कई बार दुष्कर्म किया, जिसके चलते वह गर्भवती हो गई। गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक होने के कारण मामला कानूनी रूप से हाईकोर्ट में पहुंचा।

मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर एनीमिया का खुलासा
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने जिला अस्पताल मंडला की विशेषज्ञ चिकित्सकीय रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि पीड़िता 31 सप्ताह की गर्भवती है और उसका हीमोग्लोबिन स्तर 7.5 ग्राम है, जो गंभीर एनीमिया की स्थिति को दर्शाता है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गर्भस्थ शिशु जीवित और सामान्य रूप से विकसित हो रहा है, और इस अवस्था में गर्भपात कराना पीड़िता के लिए भी अत्यधिक जोखिमपूर्ण हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के ‘X बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था को केवल असाधारण परिस्थितियों में ही समाप्त किया जा सकता है, जैसे मां के जीवन को गंभीर खतरा या भ्रूण में गंभीर विकृति। इस मामले में ऐसी कोई चिकित्सकीय या कानूनी परिस्थिति नहीं पाई गई, जिसके आधार पर गर्भपात की अनुमति दी जा सके।

राज्य सरकार को सौंपी जिम्मेदारी
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पीड़िता को अस्पताल में उचित चिकित्सा सुविधा, निगरानी और देखभाल उपलब्ध कराई जाए। साथ ही, जन्म के बाद बच्चे की सुरक्षा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार निभाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पीड़िता या उसके परिजन बच्चे का पालन नहीं करना चाहते, तो वे कानूनी प्रक्रिया के तहत गोद देने की प्रक्रिया अपना सकते हैं।

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