नई दिल्ली । बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों को मजबूत करने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि माता-पिता ने अपनी संपत्ति इस शर्त पर बच्चों को हस्तांतरित की है कि वे उनकी देखभाल करेंगे, लेकिन बाद में बच्चे इस जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं करते, तो माता-पिता को वह संपत्ति वापस लेने का कानूनी अधिकार है। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना कानून का उद्देश्य है और इस अधिकार का लाभ केवल आर्थिक रूप से कमजोर माता-पिता तक सीमित नहीं है।
यह मामला मुंबई के लोअर परेल स्थित एक फ्लैट से जुड़ा था, जहां एक बुजुर्ग दंपति और उनका बेटा एक ही घर में रहते थे। पिता ने कई वर्ष पहले अपनी कमाई से फ्लैट खरीदा था और बाद में विश्वास के आधार पर उसे उपहार स्वरूप अपने बेटे के नाम कर दिया। उपहार के साथ यह शर्त भी तय की गई थी कि बेटा अपने माता-पिता को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराएगा तथा उनके बुढ़ापे में उनकी उचित देखभाल करेगा।
समय बीतने के साथ परिवार के संबंधों में तनाव बढ़ता गया। माता-पिता का आरोप था कि बेटे का व्यवहार बदल गया और उन्हें अपेक्षित सम्मान तथा देखभाल नहीं मिली। हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें अपना ही घर छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानून के तहत संबंधित न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया और अपनी संपत्ति वापस दिलाने की मांग की।
मामले की सुनवाई के बाद न्यायाधिकरण ने बेटे और उसके परिवार को निर्धारित अवधि के भीतर फ्लैट खाली कर उसका कब्जा माता-पिता को सौंपने का निर्देश दिया। बेटे ने इस आदेश को चुनौती देते हुए अदालत में कहा कि उसके पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनका अपना व्यवसाय है और उनके पास अन्य संपत्तियां भी हैं। इसलिए उन्हें इस कानून के तहत राहत नहीं मिलनी चाहिए।
हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण से जुड़े कानून की धारा 23 स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था करती है कि यदि संपत्ति का हस्तांतरण देखभाल और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने जैसी शर्तों के साथ किया गया हो और प्राप्तकर्ता उन शर्तों का पालन न करे, तो संबंधित न्यायाधिकरण उस उपहार को निरस्त घोषित कर सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिकार का संबंध माता-पिता की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उनके साथ किए गए वादे और उसकी पूर्ति से है।
अदालत ने माना कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मान, देखभाल और सुरक्षित जीवन भी उनकी मूल आवश्यकताओं का हिस्सा हैं। यदि परिवार का कोई सदस्य संपत्ति प्राप्त करने के बाद अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटता है, तो कानून ऐसे बुजुर्गों को प्रभावी कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन अनेक वरिष्ठ नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है, जिन्होंने विश्वास के आधार पर अपनी संपत्ति बच्चों के नाम कर दी, लेकिन बाद में उपेक्षा या दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। इससे यह संदेश भी जाता है कि संपत्ति का हस्तांतरण केवल अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी साथ लेकर आता है। यदि उस जिम्मेदारी का पालन नहीं किया जाता, तो कानून बुजुर्ग माता-पिता को न्याय दिलाने के लिए उनके पक्ष में खड़ा है।