विवाद की शुरुआत उस बयान से हुई जिसमें अनुपम खेर राम मंदिर से जुड़े एक मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे। इसी दौरान उन्होंने भगवान राम और द्वापर युग का उल्लेख किया। उनके इस कथन को लेकर कांग्रेस ने आपत्ति जताई और कहा कि सनातन परंपरा के अनुसार भगवान राम का अवतार त्रेता युग में माना जाता है, जबकि द्वापर युग भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ है। इसी आधार पर कांग्रेस ने अभिनेता के बयान को तथ्यात्मक रूप से गलत बताते हुए उनकी आलोचना की।
सुप्रिया श्रीनेत ने अपने बयान में सनातन धर्म की पारंपरिक काल गणना का उल्लेख करते हुए चारों युगों का क्रम बताया। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग क्रमशः चार युग हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान श्रीराम का अवतार त्रेतायुग में और भगवान श्रीकृष्ण का अवतार द्वापरयुग में माना जाता है। इसी संदर्भ में उन्होंने अभिनेता पर तंज कसते हुए कहा कि सार्वजनिक रूप से धार्मिक विषयों पर टिप्पणी करने से पहले तथ्यों की जानकारी होना आवश्यक है।
दूसरी ओर, अनुपम खेर का मूल बयान राम मंदिर से जुड़े एक कथित चोरी के मामले पर था। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा था कि किसी संस्था या आस्था से जुड़े स्थान पर यदि कोई गलत घटना होती है तो उसके आधार पर पूरे संस्थान या परंपरा पर प्रश्न नहीं उठाया जाना चाहिए। इसी दौरान युगों का उल्लेख करते हुए हुई कथित तथ्यात्मक त्रुटि विवाद का कारण बन गई। इसके बाद सोशल मीडिया पर उनके बयान का वीडियो तेजी से साझा किया जाने लगा और विभिन्न राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।
यह मामला केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धार्मिक परंपराओं की जानकारी और सार्वजनिक जीवन में तथ्यों की शुद्धता को लेकर भी चर्चा का विषय बन गया। राजनीतिक दलों के नेताओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। कुछ लोगों ने इसे सामान्य भाषाई चूक बताया, जबकि अन्य ने धार्मिक विषयों पर बोलते समय अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया।
वर्तमान विवाद ऐसे समय सामने आया है जब राम मंदिर और उससे जुड़े विषय लगातार सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बीच यह घटनाक्रम एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि इस पूरे मामले में दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों पर कायम हैं, लेकिन इस बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक बयान देते समय तथ्यात्मक सटीकता और संतुलित भाषा का विशेष महत्व होता है।