इंदौर में युवक को बीच सड़क रोका, मारपीट के बाद कार में बैठाने की कोशिश; तीन आरोपियों पर केस दर्ज

मध्य प्रदेश। इंदौर के राजेंद्र नगर थाना क्षेत्र में एक युवक के साथ कथित तौर पर रास्ता रोककर मारपीट करने और उसे जबरन कार में बैठाने की कोशिश का मामला सामने आया है। पुलिस ने पीड़ित की शिकायत के आधार पर तीन आरोपियों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। घटना के बाद क्षेत्र में चर्चा का माहौल है और पुलिस आरोपियों की तलाश में जुटी हुई है। पुलिस के अनुसार, फरियादी रोहित शर्मा (28) निवासी सदर बाजार मैन रोड, इंदौर ने राजेंद्र नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में रोहित ने बताया कि 11 जून 2026 को दोपहर करीब 2 बजे वह केशरबाग सर्विस रोड स्थित टिंकुस कैफे के सामने से गुजर रहा था। इसी दौरान कुछ लोगों ने उसका रास्ता रोक लिया और उसके साथ विवाद शुरू कर दिया। शिकायत के मुताबिक, आरोपियों में शामिल एक युवक स्कूटर पर सवार था। उसने रोहित के स्कूटर के सामने अपना वाहन लगाकर उसे रोक लिया। इसके बाद एक कार में सवार कपिल जायसवाल, अमन बैस और एक अन्य युवक वहां पहुंचे। रोहित का आरोप है कि आरोपियों ने पुरानी रंजिश को लेकर उसके साथ गाली-गलौज शुरू कर दी। पीड़ित के अनुसार, विवाद बढ़ने पर तीनों आरोपियों ने मिलकर उसके साथ हाथ-मुक्कों से मारपीट की। रोहित ने आरोप लगाया है कि मारपीट के दौरान उसे जबरदस्ती कार में बैठाकर अपने साथ ले जाने का प्रयास भी किया गया। हालांकि, उसने शोर मचाकर आसपास मौजूद लोगों से मदद मांगी, जिसके बाद स्थानीय लोग मौके पर पहुंचने लगे। लोगों को आता देख आरोपी वहां से भाग निकले। घटना के बाद रोहित ने थाने पहुंचकर पूरी जानकारी पुलिस को दी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने नामजद आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है और आरोपियों की तलाश के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। राजेंद्र नगर थाना पुलिस के मुताबिक, शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच के साथ-साथ घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज भी खंगाले जा रहे हैं, ताकि घटना की पूरी परिस्थितियों को स्पष्ट किया जा सके। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि दोनों पक्षों के बीच किस प्रकार की पुरानी रंजिश थी और विवाद की वास्तविक वजह क्या थी। फिलहाल मामले में जांच जारी है। पुलिस का कहना है कि जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वहीं, पीड़ित द्वारा लगाए गए आरोपों की भी पुलिस विभिन्न स्तरों पर पुष्टि करने में जुटी हुई है।
राजा रघुवंशी हत्याकांड में फिर उठी CBI जांच की मांग, भाई बोले- परिवार को अब भी इंसाफ का इंतजार

मध्य प्रदेश। इंदौर के चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड में एक बार फिर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग उठी है। मृतक राजा रघुवंशी के भाई विपिन रघुवंशी ने राज्य सरकार से अपील करते हुए कहा है कि मामले की निष्पक्ष, व्यापक और गहन जांच के लिए इसे सीबीआई को सौंपा जाना चाहिए। उनका कहना है कि परिवार को अब भी न्याय का इंतजार है और इस मामले की सच्चाई पूरी तरह सामने आना जरूरी है। विपिन रघुवंशी का दावा है कि यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा है और इसमें दूसरे राज्य का भी पहलू जुड़ा हुआ है। ऐसे में केंद्रीय एजेंसी द्वारा जांच कराए जाने से मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष पड़ताल हो सकेगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अन्य चर्चित मामलों में सीबीआई जांच कराई जा सकती है, तो राजा रघुवंशी हत्याकांड में भी ऐसी जांच होनी चाहिए। गौरतलब है कि इंदौर के ट्रांसपोर्ट कारोबारी राजा रघुवंशी अपनी पत्नी सोनम रघुवंशी के साथ हनीमून के लिए शिलांग गए थे। पुलिस के अनुसार, वहां उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी। जांच के दौरान पुलिस ने आरोप लगाया था कि सोनम रघुवंशी ने अन्य लोगों के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची और घटना को अंजाम दिया। मामले में सोनम सहित अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। वर्तमान में सोनम रघुवंशी जमानत पर बाहर हैं। इसी संदर्भ में विपिन रघुवंशी ने आशंका जताई है कि जमानत पर बाहर होने के कारण मामले से जुड़े साक्ष्यों और गवाहों पर प्रभाव पड़ने की संभावना हो सकती है। उन्होंने कहा कि परिवार चाहता है कि मामले की पूरी सच्चाई सामने आए और दोषियों को कड़ी सजा मिले। हालांकि, यह परिवार की ओर से व्यक्त की गई आशंका और मांग है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। विपिन ने कहा कि उनके परिवार को अभी तक यह महसूस नहीं होता कि राजा को पूर्ण न्याय मिला है। उनका मानना है कि सीबीआई जांच से मामले की हर कड़ी की नए सिरे से जांच संभव होगी और किसी भी संभावित पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया कि परिवार की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस मांग पर गंभीरता से विचार किया जाए। राजा रघुवंशी हत्याकांड सामने आने के बाद देशभर में चर्चा का विषय बना था। मामले में पुलिस जांच, गिरफ्तारियां और बाद की कानूनी प्रक्रियाएं लगातार सुर्खियों में रही हैं। अब मृतक के परिजनों द्वारा एक बार फिर सीबीआई जांच की मांग किए जाने से यह मामला दोबारा चर्चा में आ गया है। फिलहाल मामले में कानूनी प्रक्रिया जारी है और संबंधित अदालत में सुनवाई की कार्रवाई आगे बढ़ रही है। वहीं, परिजन लगातार यह मांग कर रहे हैं कि मामले की जांच किसी केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए ताकि उन्हें न्याय मिलने का भरोसा मजबूत हो सके।
दुनिया की सबसे बड़ी राम प्रतिमा परियोजना रुकी, तसलीमा नसरीन ने पूछा- अल्पसंख्यकों के अधिकारों का क्या होगा?

नई दिल्ली । बांग्लादेश के गाइबांधा जिले में निर्माणाधीन भगवान राम की विशाल प्रतिमा पर रोक लगाए जाने के बाद देश में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। पलाशबाड़ी उपजिला स्थित श्रीश्री राधागोविंद और काली मंदिर परिसर में चल रही इस परियोजना को प्रशासनिक स्तर पर रोक दिए जाने से स्थानीय स्तर पर तनाव का माहौल बना हुआ है और विभिन्न सामाजिक तथा धार्मिक समूहों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। मंदिर परिसर में प्रस्तावित प्रतिमा को लेकर पिछले कुछ समय से विवाद जारी था। स्थानीय स्तर पर कुछ संगठनों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा था, जबकि मंदिर प्रबंधन और समर्थक इसे धार्मिक आस्था तथा सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय बता रहे थे। इसी बीच अधिकारियों द्वारा निर्माण गतिविधियों को रोकने के निर्देश दिए गए, जिसके बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। इस घटनाक्रम पर बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांत का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि यदि देश में विभिन्न धार्मिक समुदायों को अपने पूजा स्थलों के निर्माण और विस्तार का अधिकार प्राप्त है, तो अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक गतिविधियों पर आपत्ति क्यों जताई जा रही है। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक और कानून आधारित व्यवस्था में सभी नागरिकों को समान धार्मिक अधिकार मिलना चाहिए। तसलीमा नसरीन ने यह भी चिंता जताई कि किसी धार्मिक परियोजना के विरोध में धमकियों, उकसावे या सामाजिक दबाव का माहौल बनना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, किसी भी विवाद का समाधान संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से होना चाहिए, न कि सामाजिक तनाव या टकराव के जरिए। उन्होंने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा किसी भी आधुनिक राष्ट्र की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। मामले ने इसलिए भी अधिक ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि संबंधित क्षेत्र में अतीत में मंदिरों और धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे में निर्माण कार्य पर रोक लगने के बाद स्थानीय हिंदू समुदाय के बीच चिंता और असुरक्षा की भावना बढ़ने की बात भी कही जा रही है। समुदाय के प्रतिनिधियों का मानना है कि धार्मिक आस्था से जुड़ी परियोजनाओं को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से देखा जाना चाहिए। इस मुद्दे पर कुछ अन्य सार्वजनिक हस्तियों और सामाजिक विश्लेषकों ने भी अपनी राय रखी है। उनका कहना है कि धार्मिक विविधता किसी भी समाज की ताकत होती है और विभिन्न समुदायों के पूजा स्थलों के प्रति समान सम्मान बनाए रखना सामाजिक सौहार्द के लिए आवश्यक है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बहुसांस्कृतिक समाजों में सहिष्णुता और परस्पर सम्मान ही स्थायी शांति का आधार बनते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक प्रतिमा या निर्माण परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों और सामाजिक समावेशन जैसे व्यापक मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में प्रशासनिक निर्णय, स्थानीय संवाद और कानूनी प्रक्रियाएं इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। फिलहाल निर्माण कार्य पर रोक के कारण स्थिति पर सभी पक्षों की नजर बनी हुई है। इस घटनाक्रम ने बांग्लादेश में धार्मिक अधिकारों और सामाजिक संतुलन से जुड़े प्रश्नों को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।
छोले-कुलचे की रेहड़ी से टीम इंडिया तक: जालंधर के अर्जुन राजपूत का अंडर-19 टीम में चयन, मेहनत ने बदली तकदीर

नई दिल्ली। कहते हैं कि सपनों की कोई आर्थिक सीमा नहीं होती। यदि इरादे मजबूत हों, मेहनत सच्ची हो और परिवार का साथ मिले, तो साधारण परिस्थितियों से निकलकर भी असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। पंजाब के जालंधर निवासी अर्जुन राजपूत की कहानी इसी जज्बे और संघर्ष की मिसाल बनकर सामने आई है। छोले-कुलचे की रेहड़ी लगाने वाले एक मेहनतकश पिता के बेटे अर्जुन ने भारतीय अंडर-19 क्रिकेट टीम में चयनित होकर अपने परिवार, शहर और प्रदेश का नाम रोशन कर दिया है। जालंधर के राम नगर इलाके में रहने वाले अर्जुन राजपूत का चयन भारतीय अंडर-19 क्रिकेट टीम में हुआ है। अगले महीने 4 जुलाई को टीम श्रीलंका दौरे के लिए रवाना होगी, जहां अर्जुन पहली बार भारत की नीली जर्सी पहनकर मैदान में उतरेंगे। यह पल न केवल उनके लिए बल्कि उनके पूरे परिवार के लिए गर्व और खुशी का अवसर है। अर्जुन एक प्रतिभाशाली ऑलराउंडर हैं। वह बाएं हाथ के बल्लेबाज होने के साथ-साथ दाएं हाथ के ऑफ स्पिन गेंदबाज भी हैं। क्रिकेट के प्रति उनका जुनून बचपन से ही दिखाई देने लगा था। उन्होंने महज आठ-नौ वर्ष की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने अपनी क्रिकेट यात्रा की शुरुआत हरभजन सिंह क्रिकेट अकादमी से की, जहां उन्हें कोच विक्रम सिद्धू का मार्गदर्शन मिला। अंडर-19 टीम में चयन के बाद अर्जुन ने अपनी खुशी साझा करते हुए कहा कि यह उनके जीवन का बेहद खास क्षण है। उन्होंने कहा कि देश का प्रतिनिधित्व करना हर खिलाड़ी का सपना होता है और वह श्रीलंका दौरे पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश करेंगे। अर्जुन ने भरोसा जताया कि टीम पूरे दमखम के साथ खेलेगी और ट्रॉफी जीतकर भारत लौटने का प्रयास करेगी। उन्होंने अपने माता-पिता के संघर्ष और त्याग को याद करते हुए कहा कि उनके पिता ने उनके सपनों को पूरा करने के लिए वर्षों तक कड़ी मेहनत की है। अर्जुन के अनुसार, उनके पिता डीएवी कॉलेज के बाहर छोले-कुलचे की रेहड़ी लगाते हैं और उन्होंने कभी भी बेटे की क्रिकेट यात्रा में आर्थिक कठिनाइयों को आड़े नहीं आने दिया। अर्जुन ने भावुक होकर कहा कि अब उनकी जिम्मेदारी है कि वह अपने पिता के सपनों को पूरा करें और उन्हें गर्व महसूस कराएं। पिता होती राम के लिए यह उपलब्धि किसी सपने के सच होने से कम नहीं है। उन्होंने बताया कि अर्जुन बचपन से ही क्रिकेट के प्रति समर्पित रहा है और दिन-रात मेहनत करता रहा। जब उन्हें बेटे के भारतीय अंडर-19 टीम में चयन की खबर मिली, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वहीं अर्जुन की मां नन्ही देवी ने कहा कि यह पूरे परिवार के लिए बेहद भावुक और गर्व का पल है। अर्जुन की बहन किरण राजपूत ने भी कहा कि भाई ने वर्षों तक लगातार मेहनत की और कभी हार नहीं मानी। अब उसकी मेहनत का फल पूरे देश के सामने है। परिवार का सपना था कि अर्जुन भारतीय टीम की नीली जर्सी पहने और अब वह सपना साकार हो चुका है। अर्जुन राजपूत की यह सफलता उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि मेहनत, समर्पण और आत्मविश्वास के सामने आर्थिक कठिनाइयां भी छोटी पड़ जाती हैं।
अमेरिका-ईरान समझौते पर बना संशय, होर्मुज में ड्रोन कार्रवाई और बंदर अब्बास धमाकों से फिर बढ़ा तनाव

नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के संबंध एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। दोनों देशों के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर हाल के दिनों में उम्मीदें जगी थीं, लेकिन ताजा घटनाक्रमों ने संकेत दिया है कि किसी व्यापक सहमति तक पहुंचने का रास्ता अभी भी जटिल बना हुआ है। कूटनीतिक बयानों, समुद्री गतिविधियों और सुरक्षा घटनाओं ने क्षेत्र की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है। अमेरिकी नेतृत्व की ओर से हाल ही में यह संकेत दिया गया कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव को समाप्त करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता अंतिम चरण में है। दावा किया गया कि बातचीत में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और जल्द ही औपचारिक घोषणा संभव हो सकती है। हालांकि, ईरानी पक्ष ने इन दावों पर सावधानीपूर्ण रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि वार्ता के कई पहलुओं पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और राष्ट्रीय हितों से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर उसकी स्थिति यथावत बनी हुई है। कूटनीतिक मतभेदों के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा गतिविधियों ने भी चिंता बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस रणनीतिक समुद्री मार्ग में ड्रोन गतिविधियों और सैन्य प्रतिक्रिया से जुड़ी घटनाएं सामने आई हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया कि समुद्री यातायात की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई की गई, जबकि ईरान की ओर से क्षेत्र में अपने सुरक्षा अधिकारों और निगरानी गतिविधियों को उचित ठहराया गया है। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण इस जलमार्ग की सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। इसी दौरान दक्षिणी ईरान के बंदर अब्बास और आसपास के समुद्री क्षेत्र से धमाकों की खबरों ने तनाव को और बढ़ा दिया। स्थानीय मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार, तटीय इलाकों में विस्फोट जैसी आवाजें सुनाई दीं, जिसके बाद विभिन्न संभावनाओं को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया। हालांकि घटनाओं के संबंध में विस्तृत और स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार बना हुआ है। समुद्री सुरक्षा के मुद्दे ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब ईरान ने कुछ हालिया घटनाओं को लेकर अमेरिका पर आरोप लगाए। ईरानी अधिकारियों ने दावा किया कि क्षेत्र में संचालित कुछ वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया गया, जबकि अमेरिकी पक्ष ने इन आरोपों पर अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। इस विवाद ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रश्न को फिर प्रमुखता से सामने ला दिया है। उधर मानवीय मुद्दे भी चर्चा में बने हुए हैं। गाजा क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं और मरीजों की निकासी से जुड़े मामलों पर अमेरिकी राजनीतिक हलकों में बहस तेज हुई है। कई सांसदों ने गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए राहत और चिकित्सा सहायता की मांग उठाई है। इससे क्षेत्रीय संघर्षों के मानवीय प्रभावों पर भी ध्यान केंद्रित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता प्रक्रिया जारी रहने के बावजूद क्षेत्र में मौजूद सुरक्षा चुनौतियां और रणनीतिक हित किसी भी त्वरित समाधान को कठिन बना सकते हैं। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर दोनों देशों के अगले कदमों, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक वार्ताओं और सुरक्षा घटनाक्रमों की दिशा ही यह तय करेगी कि तनाव कम होगा या स्थिति और अधिक जटिल रूप लेगी।
जब ‘बिस्मार्क’ ने डुबो दिया ब्रिटेन का गौरव, द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन युद्धपोत की ताकत ने बदल दिए थे समीकरण

नई दिल्ली । द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास में कुछ युद्धपोत ऐसे रहे हैं जिनका नाम आज भी सैन्य रणनीति, समुद्री शक्ति और युद्धक क्षमता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। जर्मनी का युद्धपोत बिस्मार्क उनमें सबसे प्रमुख माना जाता है। वर्ष 1941 में अटलांटिक महासागर में उसकी मौजूदगी मात्र ने ब्रिटिश नौसेना के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी थी। यही कारण था कि उसे नष्ट करने के लिए ब्रिटेन को अपने इतिहास के सबसे बड़े नौसैनिक अभियानों में से एक चलाना पड़ा। मई 1941 में डेनमार्क स्ट्रेट के समुद्री क्षेत्र में हुई लड़ाई ने बिस्मार्क को विश्वभर में चर्चा का विषय बना दिया। इस युद्ध के दौरान उसने ब्रिटिश नौसेना के गौरव माने जाने वाले HMS Hood को कुछ ही मिनटों में समुद्र की गहराइयों में पहुंचा दिया। उस समय हूड ब्रिटेन का सबसे प्रतिष्ठित युद्धपोत था और उसकी तबाही ने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को झकझोर दिया। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिस्मार्क केवल एक बड़ा जहाज नहीं, बल्कि अत्यंत खतरनाक युद्ध मशीन था। बिस्मार्क की सबसे बड़ी विशेषता उसका विशाल आकार था। लगभग 41,700 टन के मानक विस्थापन वाला यह युद्धपोत अपने दौर के सबसे बड़े और प्रभावशाली जहाजों में शामिल था। उस समय दुनिया के अधिकांश युद्धपोत उससे छोटे थे। केवल बाद में विकसित हुए कुछ अमेरिकी और जापानी युद्धपोत ही आकार में उससे आगे निकल सके। रफ्तार के मामले में भी बिस्मार्क अपने समकालीन युद्धपोतों से बेहतर माना जाता था। लगभग 56 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम गति उसे तेज कार्रवाई और रणनीतिक गतिशीलता प्रदान करती थी। विशाल आकार के बावजूद उसकी गति और संचालन क्षमता ने उसे युद्ध के मैदान में विशेष बढ़त दी। इस युद्धपोत की एक और बड़ी ताकत उसकी सुरक्षा प्रणाली थी। जहाज के ढांचे को कई जलरोधी खंडों में विभाजित किया गया था, जिससे गंभीर क्षति के बावजूद उसके डूबने की संभावना कम हो जाती थी। यही वजह थी कि बाद में ब्रिटिश नौसेना को उसे निष्क्रिय करने के लिए लगातार गोलाबारी, हवाई हमलों और टॉरपीडो का सहारा लेना पड़ा। बिस्मार्क की मजबूती ने उसे उस समय के सबसे सुरक्षित युद्धपोतों में स्थान दिलाया। हथियारों की दृष्टि से भी बिस्मार्क बेहद शक्तिशाली था। उसकी आठ 15 इंच की मुख्य तोपें एक साथ भारी मात्रा में विस्फोटक और स्टील के गोले दागने में सक्षम थीं। हालांकि जापान के यामाटो जैसे कुछ युद्धपोत उससे अधिक भारी गोलाबारी कर सकते थे, फिर भी बिस्मार्क की फायर कंट्रोल प्रणाली और लक्ष्य भेदन क्षमता उसे बेहद प्रभावशाली बनाती थी। डेनमार्क स्ट्रेट की लड़ाई में उसने ब्रिटिश युद्धपोत Prince of Wales को भी गंभीर क्षति पहुंचाई। सटीक गोलाबारी के कारण जहाज के कई हिस्सों को नुकसान हुआ और ब्रिटिश नौसेना को पीछे हटना पड़ा। हालांकि बाद में Prince of Wales ने मरम्मत के बाद फिर से अभियान में हिस्सा लिया, लेकिन उस संघर्ष ने बिस्मार्क की युद्ध क्षमता का प्रदर्शन पूरी दुनिया के सामने कर दिया। HMS Hood के विनाश के बाद ब्रिटेन ने बिस्मार्क को हर कीमत पर नष्ट करने का निर्णय लिया। दर्जनों युद्धपोतों, क्रूजरों और विमानों को उसके पीछा करने के लिए लगाया गया। कई दिनों तक चले इस विशाल अभियान के बाद अंततः बिस्मार्क को घेरकर डुबो दिया गया, लेकिन तब तक वह नौसैनिक इतिहास में अपनी अमिट पहचान बना चुका था। आज भी बिस्मार्क को केवल एक युद्धपोत नहीं, बल्कि समुद्री युद्धक शक्ति, तकनीकी उत्कृष्टता और द्वितीय विश्व युद्ध की सबसे चर्चित नौसैनिक घटनाओं के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
जसपाल राणा के निधन पर राष्ट्र शोकाकुल, राष्ट्रपति मुर्मु से लेकर कई दिग्गज नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

नई दिल्ली। भारतीय निशानेबाजी के दिग्गज खिलाड़ी, प्रख्यात कोच और पद्मश्री सम्मानित जसपाल राणा के निधन से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। खेल जगत की इस बड़ी क्षति पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से लेकर केंद्र और राज्यों के अनेक वरिष्ठ नेताओं ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है। नेताओं ने अपने संदेशों में जसपाल राणा के खेल जीवन, उनके योगदान और युवा खिलाड़ियों को तैयार करने में निभाई गई उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को याद किया। जानकारी के अनुसार, जर्मनी के म्युनिख में आयोजित आईएसएसएफ वर्ल्ड कप से भारतीय दल के साथ लौटते समय उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। इसके बाद उन्हें दिल्ली के साकेत स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 49 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही खेल जगत और राजनीतिक क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने शोक संदेश में कहा कि जसपाल राणा भारतीय खेलों के ऐसे प्रतीक थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बढ़ाया। उन्होंने कहा कि एक खिलाड़ी और मार्गदर्शक के रूप में उनका योगदान सदैव याद रखा जाएगा तथा उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय शूटिंग में जसपाल राणा का योगदान अमूल्य है। उन्होंने कहा कि युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनका समर्पण हमेशा याद रखा जाएगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने उनके निधन को भारतीय खेल जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने शानदार करियर के दौरान देश को विश्व मंच पर गौरवान्वित किया। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि जसपाल राणा ने अपनी प्रतिभा, अनुशासन और समर्पण के बल पर भारत को अनेक गौरवपूर्ण क्षण दिए। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी और कोच दोनों रूपों में उनका योगदान भारतीय खेल इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा कि जसपाल राणा का निधन भारतीय खेल जगत के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर भारत को सम्मान दिलाने वाली उनकी उपलब्धियां और युवा खिलाड़ियों के मार्गदर्शन में निभाई गई भूमिका सदैव स्मरणीय रहेगी। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी उन्हें भारतीय निशानेबाजी का गौरव बताते हुए श्रद्धांजलि दी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जसपाल राणा को देवभूमि उत्तराखंड का गौरव बताते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व और कृतित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। वहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी उनके निधन को खेल जगत के लिए बड़ी क्षति करार दिया। राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी गहरा दुख व्यक्त किया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि जसपाल राणा भारतीय खेलों की सबसे बड़ी हस्तियों में से एक थे। उन्होंने न केवल देश का नाम विश्वभर में रोशन किया बल्कि नई पीढ़ी के निशानेबाजों को भी तैयार किया। कांग्रेस सांसद और बीसीसीआई उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला ने कहा कि भारतीय निशानेबाजी के स्वर्णिम अध्यायों में जसपाल राणा का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा। जसपाल राणा ने अपने करियर में अनेक अंतरराष्ट्रीय पदक जीतकर भारत को गौरवान्वित किया था। बाद में कोच के रूप में उन्होंने कई युवा खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके निधन से भारतीय खेल जगत ने एक ऐसे मार्गदर्शक को खो दिया है, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।
चीन की मदद से पाकिस्तान को मिली नई ताकत, लेकिन परमाणु और पारंपरिक पनडुब्बी क्षमता में भारत अभी भी कई कदम आगे

नई दिल्ली । चीन में निर्मित पहली हंगोर-क्लास पनडुब्बी के पाकिस्तान पहुंचने के साथ ही दक्षिण एशिया में समुद्री शक्ति संतुलन को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। कराची नौसैनिक अड्डे पर आयोजित समारोह में पाकिस्तान ने इस उपलब्धि को अपने नौसेना आधुनिकीकरण कार्यक्रम का महत्वपूर्ण चरण बताया। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई पनडुब्बी के शामिल होने के बावजूद समुद्री शक्ति के व्यापक परिदृश्य में भारत की बढ़त स्पष्ट रूप से कायम है। पाकिस्तान लंबे समय से अपनी नौसैनिक क्षमताओं को मजबूत करने के लिए चीन के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाता रहा है। हंगोर-क्लास पनडुब्बी इसी सहयोग का हिस्सा है। यह डीजल-इलेक्ट्रिक प्रणाली पर आधारित आधुनिक अटैक सबमरीन है, जिसमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक का उपयोग किया गया है। इस तकनीक की मदद से पनडुब्बी लंबे समय तक पानी के भीतर रह सकती है और उसकी पहचान करना अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है। पाकिस्तान को कुल आठ हंगोर-क्लास पनडुब्बियां मिलने की योजना है। इनमें से कुछ का निर्माण चीन में किया जा रहा है, जबकि शेष का निर्माण तकनीकी हस्तांतरण के तहत कराची में होगा। इससे पाकिस्तान अपनी घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता को भी मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। हालांकि रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत और पाकिस्तान की पनडुब्बी क्षमताओं में अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है। भारतीय नौसेना के पास परमाणु शक्ति से संचालित अरिहंत श्रेणी की बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं, जिन्हें देश की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। ये पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र की गहराइयों में रहकर रणनीतिक अभियानों को अंजाम देने में सक्षम हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अरिहंत श्रेणी की भूमिका केवल युद्ध संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की परमाणु त्रिस्तरीय प्रतिरोधक क्षमता का अभिन्न हिस्सा है। इस श्रेणी की तुलना पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों से करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि दोनों की रणनीतिक भूमिका अलग-अलग होती है। दूसरी ओर भारत की कलावरी श्रेणी की पनडुब्बियां भी आधुनिक तकनीक और उन्नत युद्धक प्रणालियों से लैस हैं। फ्रांसीसी डिजाइन पर आधारित इन पनडुब्बियों को कम ध्वनि उत्सर्जन, आधुनिक सेंसर और सटीक हथियार प्रणालियों के लिए जाना जाता है। समुद्री निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और सामरिक अभियानों में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि हंगोर-क्लास पाकिस्तान की पारंपरिक पनडुब्बी क्षमता को अवश्य मजबूत करेगी, लेकिन भारतीय नौसेना के परिचालन अनुभव, तकनीकी विविधता और संसाधनों के मुकाबले यह बढ़त सीमित है। भारतीय नौसेना के पास विमानवाहक पोत, उन्नत युद्धपोत, लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियां और बहुस्तरीय समुद्री सुरक्षा ढांचा मौजूद है, जो उसे क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत स्थिति प्रदान करता है। भारत वर्तमान में प्रोजेक्ट-75I तथा स्वदेशी परमाणु अटैक पनडुब्बी कार्यक्रमों पर भी कार्य कर रहा है। इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद भारतीय नौसेना की पानी के भीतर संचालन क्षमता और अधिक सशक्त होने की उम्मीद है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति और प्रभाव भी मजबूत होगा। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की नई पनडुब्बी उसकी नौसैनिक क्षमता में सकारात्मक वृद्धि का संकेत है, लेकिन इसे भारत की समुद्री बढ़त को चुनौती देने वाला निर्णायक बदलाव नहीं माना जा सकता। वर्तमान परिस्थितियों में समुद्री शक्ति, तकनीकी क्षमता, रणनीतिक संसाधनों और दीर्घकालिक सैन्य तैयारी के पैमानों पर भारत अब भी स्पष्ट रूप से मजबूत स्थिति में दिखाई देता है।
फीफा वर्ल्ड कप 2026: दक्षिण कोरिया की शानदार शुरुआत, चेकिया को 2-1 से हराकर दर्ज की दमदार जीत

नई दिल्ली। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में दक्षिण कोरिया ने अपने अभियान की शानदार शुरुआत करते हुए चेकिया को 2-1 से हराकर जीत दर्ज की। रोमांच से भरपूर इस मुकाबले में दक्षिण कोरिया ने दूसरे हाफ में एक गोल से पिछड़ने के बावजूद जबरदस्त वापसी की और अंततः मुकाबला अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ कोरियाई टीम ने टूर्नामेंट में अपने इरादे साफ कर दिए हैं। मैच की शुरुआत से ही दोनों टीमों ने आक्रामक रुख अपनाया। शुरुआती मिनटों में दक्षिण कोरिया ने गेंद पर बेहतर नियंत्रण रखते हुए चेकिया के डिफेंस पर लगातार दबाव बनाया। मैच के नौवें मिनट में कोरिया को फ्री किक के रूप में शानदार मौका मिला, लेकिन चेकिया के मजबूत रक्षापंक्ति ने उसे नाकाम कर दिया। इसके बाद 11वें मिनट में मिले कॉर्नर का भी दक्षिण कोरिया फायदा नहीं उठा सका। पहले हाफ में कोरिया ने कई हमले किए, लेकिन चेकिया का डिफेंस मजबूती से खड़ा रहा। दूसरी ओर चेकिया ने भी कुछ अच्छे मूव बनाए, हालांकि वह भी गोल करने में सफल नहीं हो सकी। दोनों टीमों के बीच कड़ा संघर्ष देखने को मिला और पहले 45 मिनट तक स्कोर 0-0 पर बराबरी पर रहा। दूसरे हाफ में चेकिया ने अधिक आक्रामक अंदाज में खेलना शुरू किया। इसका फायदा उसे 59वें मिनट में मिला जब लाडिसलाव क्रेजकी ने शानदार हेडर के जरिए गेंद को जाल में पहुंचाकर अपनी टीम को 1-0 की बढ़त दिला दी। इस गोल के बाद ऐसा लग रहा था कि मुकाबले का रुख चेकिया की ओर झुक सकता है, लेकिन दक्षिण कोरिया ने हार नहीं मानी। एक गोल से पीछे होने के बाद कोरियाई खिलाड़ियों ने अपनी गति और आक्रमण को और तेज किया। लगातार प्रयासों का परिणाम 67वें मिनट में मिला, जब हांग इन बियोम ने शानदार गोल दागकर स्कोर 1-1 से बराबर कर दिया। इस गोल ने दक्षिण कोरिया में नया जोश भर दिया और टीम ने जीत के लिए दबाव बनाए रखा। बराबरी का गोल मिलने के बाद दक्षिण कोरिया ने आक्रमण जारी रखा। मैच के 80वें मिनट में ओह हियोन ग्यू ने बेहतरीन फिनिशिंग का प्रदर्शन करते हुए टीम को 2-1 की बढ़त दिला दी। यह गोल मैच का निर्णायक क्षण साबित हुआ। इसके बाद चेकिया ने वापसी की भरपूर कोशिश की और कई हमले किए, लेकिन दक्षिण कोरिया के डिफेंस ने कोई गलती नहीं की। अंतिम मिनटों में मुकाबला बेहद रोमांचक रहा, लेकिन दक्षिण कोरिया ने संयम बनाए रखा और चेकिया को बराबरी का मौका नहीं दिया। निर्धारित समय समाप्त होने पर स्कोर 2-1 रहा और दक्षिण कोरिया ने फीफा वर्ल्ड कप 2026 में जीत के साथ अपने सफर की शुरुआत की। यह जीत टीम के आत्मविश्वास को बढ़ाने वाली साबित हो सकती है, जबकि चेकिया को अगले मुकाबलों में वापसी के लिए अधिक मजबूत प्रदर्शन करना होगा।
चार वर्षों तक कोमा से जूझने के बाद थाईलैंड की राजकुमारी का निधन, शाही परिवार और देश में शोक की लहर

नई दिल्ली । थाईलैंड के शाही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। देश के राजा महा वजीरालोंगकोर्न की सबसे बड़ी बेटी और उत्तराधिकार की प्रमुख दावेदारों में शामिल राजकुमारी बज्रकिटियाभा नरेंद्र देब्यावती का 47 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पिछले लगभग चार वर्षों से वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण कोमा में थीं और लगातार चिकित्सकीय निगरानी में उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन की खबर सामने आते ही पूरे थाईलैंड में शोक का माहौल बन गया। राजपरिवार की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, राजकुमारी की तबीयत पिछले कुछ समय से लगातार नाजुक बनी हुई थी। कई जटिल स्वास्थ्य समस्याओं के चलते उनके शरीर की स्थिति लगातार कमजोर होती गई। चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम लंबे समय से उनका उपचार कर रही थी, लेकिन स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया। अंततः उन्होंने जीवन की अंतिम लड़ाई हार दी। राजकुमारी की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं दिसंबर 2022 में उस समय शुरू हुई थीं, जब वह एक आधिकारिक कार्यक्रम के सिलसिले में देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के दौरे पर थीं। इसी दौरान उन्हें अचानक हृदय संबंधी गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा और वे बेहोश हो गईं। तत्काल उन्हें विशेष चिकित्सा सुविधा के लिए राजधानी लाया गया, जहां उनका इलाज शुरू हुआ। हालांकि उस घटना के बाद वह कभी पूरी तरह होश में नहीं लौट सकीं और लगातार कोमा की स्थिति में रहीं। राजकुमारी बज्रकिटियाभा को थाई शाही परिवार की सबसे प्रभावशाली और सक्रिय हस्तियों में गिना जाता था। उन्होंने केवल शाही जिम्मेदारियों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि कानून, कूटनीति और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी सार्वजनिक छवि एक शिक्षित, संवेदनशील और जिम्मेदार राजपरिवार सदस्य के रूप में स्थापित थी। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने अमेरिका में कानून की पढ़ाई की और अंतरराष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक उपलब्धियां हासिल कीं। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कानूनी क्षेत्र में काम किया और न्याय व्यवस्था से जुड़े विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। बाद में उन्हें विदेशों में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई, जहां उन्होंने राजनयिक के रूप में कार्य किया। राजकुमारी सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाती थीं। विशेष रूप से महिला अधिकारों और जेल सुधारों से जुड़े मुद्दों पर उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है। उन्होंने महिला कैदियों और गर्भवती बंदियों के कल्याण के लिए कई पहल का समर्थन किया। इसी कारण उन्हें मानवाधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़े मंचों पर भी सम्मान प्राप्त हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान मजबूत रही। कानून के शासन, न्यायिक सुधार और सामाजिक विकास के क्षेत्रों में उनकी सक्रियता को वैश्विक संस्थाओं ने भी सराहा था। बाद के वर्षों में उन्होंने सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का भी निर्वहन किया तथा राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। राजकुमारी के निधन को थाईलैंड के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है। राजनीतिक, सामाजिक और शाही हलकों में उनके योगदान को याद किया जा रहा है। देशभर में लोग उन्हें एक ऐसी शख्सियत के रूप में याद कर रहे हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में सेवा, जिम्मेदारी और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके निधन के साथ थाई शाही परिवार ने अपनी एक महत्वपूर्ण सदस्य को खो दिया है। आने वाले दिनों में देशभर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाने की संभावना है, जहां लोग उनके जीवन और योगदान को याद करेंगे।