धमकी और दबाव के आरोप से गरमाया मामला: शिक्षक गंभीर, पुलिस जांच में सवाल

मध्यप्रदेश। रीवा के संजय गांधी अस्पताल में एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां सरकारी शिक्षक अनिल कुमार तिवारी जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर उनका परिवार अस्पताल के बाहर पिछले 48 घंटों से भीषण गर्मी में अन्न-जल त्यागकर न्याय की मांग पर डटा हुआ है। परिवार का आरोप है कि घटना के 72 घंटे बीत जाने के बाद भी न तो संबंधित आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और न ही किसी प्रकार की गिरफ्तारी हुई है। इस देरी को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मामला उस समय और गंभीर हो गया जब शिक्षक ने आत्महत्या का प्रयास किया। बताया जा रहा है कि उन्होंने पहले अपनी कलाई की नस काटी और बाद में जहरीला पदार्थ खा लिया, जिसके बाद उनकी हालत अत्यंत नाजुक हो गई। डॉक्टरों के अनुसार जहर पूरे शरीर में फैल चुका है और उनका इलाज आईसीयू में चल रहा है। घटना से आहत उनकी पत्नी ने अस्पताल के बाहर पानी तक छोड़ दिया है और रोते हुए कहा कि यदि उनके पति को न्याय नहीं मिला तो वह भी जीवन समाप्त कर देंगी। वहीं बेटी ने भी साफ कहा है कि पूरा परिवार न्याय न मिलने पर सामूहिक आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने को मजबूर होगा। परिजनों के अनुसार विवाद की शुरुआत एक पेड़ कटाई के मामले से हुई थी, जिसके बाद मामला थाने तक पहुंचा और वहीं से तनाव बढ़ता गया। आरोप है कि शिक्षक को झूठे केस में फंसाया गया और थाने में मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। शिक्षक द्वारा लिखे गए सुसाइड नोट में विश्वविद्यालय थाना प्रभारी और एक पत्रकार पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। सुसाइड नोट में उन्होंने लिखा कि उन्हें बिना किसी अपराध के फंसाया गया और उनकी 28 साल की सेवा को बर्बाद कर दिया गया। परिवार का यह भी आरोप है कि पत्रकार ने पुलिस और प्रशासन में अपनी ऊंची पहुंच का हवाला देकर उन्हें धमकाया और अपमानित किया। वहीं, शिक्षक ने अपने नोट में उच्च स्तरीय जांच या सीबीआई जांच की मांग भी की है। घटना के बाद 72 घंटे बीत जाने के बावजूद किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी न होने से आक्रोश बढ़ता जा रहा है। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और सभी पहलुओं की समीक्षा की जा रही है। यह पूरा मामला अब प्रशासन, पुलिस और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।
गुजरात के केसर आम की खुशबू पहुंची लंदन, हीथ्रो एयरपोर्ट पर छाया भारतीय आमों का जलवा

नई दिल्ली । गुजरात के Gujarat के विभिन्न क्षेत्रों जैसे जूनागढ़, कच्छ और तलाला से आने वाले केसर आम अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। इन आमों को निर्यात से पहले आधुनिक तकनीक से गुजरना पड़ता है, जिसमें डी-सेपिंग, हॉट वाटर ट्रीटमेंट और हाइड्रो-कूलिंग जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य न केवल आम को लंबे समय तक सुरक्षित रखना है बल्कि उनकी गुणवत्ता और स्वाद को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाए रखना भी है। निर्यात प्रक्रिया के दौरान आमों को विशेष तापमान वाले गर्म पानी में उपचारित किया जाता है ताकि किसी भी प्रकार के कीट या फंगल संक्रमण को खत्म किया जा सके। इसके बाद उन्हें ठंडे पानी में रखा जाता है जिससे उनका प्राकृतिक रंग, ताजगी और संरचना बनी रहती है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद ही आमों को पैक करके विभिन्न देशों जैसे इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा और खाड़ी देशों में भेजा जाता है। निर्यातकों के अनुसार, भारतीय आमों की सबसे बड़ी मांग केसर और हाफूस किस्म की होती है। इनकी सुगंध, मिठास और प्राकृतिक स्वाद दुनिया के अन्य देशों में मिलने वाले आमों से अलग और अधिक प्रभावशाली माना जाता है। यही कारण है कि भारतीय आम अब केवल एक फल नहीं बल्कि एक प्रीमियम वैश्विक उत्पाद बन चुके हैं। लंदन और आसपास के क्षेत्रों में बसे भारतीय समुदाय के लिए यह आम केवल स्वाद का हिस्सा नहीं बल्कि अपने देश की यादों से जुड़ा एक भावनात्मक संबंध भी है। वहीं स्थानीय यूरोपीय उपभोक्ता भी अब भारतीय आमों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं, जिससे इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह आधुनिक तकनीक और संगठित कृषि प्रणाली के साथ उत्पादन और निर्यात जारी रहा तो आने वाले वर्षों में भारत के कृषि उत्पाद वैश्विक बाजार में और भी मजबूत स्थिति हासिल करेंगे।
रोशनी से डरती जिंदगी: रीवा के चार बच्चे दुर्लभ बीमारी से अंधेरे में जीने को मजबूर

मध्यप्रदेश। रीवा जिले के जवा तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत देवखर (कोरियान टोला) से एक बेहद दर्दनाक और भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई है, जहां एक ही परिवार के चार मासूम बच्चे ऐसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे हैं, जिसने उनकी पूरी जिंदगी को अंधेरे में धकेल दिया है। इस बीमारी के कारण सूरज की रोशनी उनके लिए राहत नहीं बल्कि सजा बन गई है। सुग्रीव कोरी के परिवार के चार बच्चे अनामिका (5 वर्ष), रिया (9 वर्ष), प्रियांशु (13 वर्ष) और पुष्पेंद्र (10 वर्ष)—जन्म से ही एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी एल्बिनिज्म से पीड़ित हैं। इस बीमारी में शरीर में मेलानिन नामक तत्व नहीं बन पाता, जिसके कारण बच्चों की त्वचा, बाल और आंखों का रंग पूरी तरह सफेद है और उनकी दृष्टि भी बेहद कमजोर है। इन बच्चों की हालत इतनी गंभीर है कि तेज धूप या रोशनी में उनकी आंखों में तेज जलन और चुभन होती है। बाहर निकलते ही उनकी आंखें बंद हो जाती हैं और संतुलन बिगड़ने से वे गिर जाते हैं। यही कारण है कि ये मासूम बच्चे अधिकांश समय अंधेरे कमरों में रहने को मजबूर हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि उनकी शारीरिक स्थिति के कारण उन्हें समाज में भी उपहास का सामना करना पड़ता है। गांव के कुछ लोग और बच्चे उन्हें ‘अंग्रेज’ कहकर चिढ़ाते हैं, जिससे वे मानसिक रूप से और अधिक आहत हो गए हैं। धीरे-धीरे उन्होंने घर से बाहर निकलना भी कम कर दिया है। परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर है। माता-पिता मजदूरी कर किसी तरह घर चला रहे हैं। ऐसे में बच्चों का इलाज बड़े अस्पतालों में कराना उनके लिए संभव नहीं है। मां माया कोरी और मंजू कोरी ने भावुक होकर बताया कि बच्चे पढ़ना चाहते हैं, लेकिन धुंधली दृष्टि के कारण उन्हें अक्षर भी स्पष्ट दिखाई नहीं देते। इस बीच एक और गंभीर समस्या सामने आई है कि बच्चों के बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट और रेटिना स्कैन मशीन में मैच नहीं हो पा रहे हैं, जिससे उनका सरकारी राशन कार्ड और अन्य दस्तावेज सक्रिय नहीं हो पा रहे हैं। इसके कारण परिवार को सरकारी राशन और योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा अब तक बच्चों का दिव्यांग प्रमाण पत्र भी नहीं बन सका है, जिससे वे पेंशन, छात्रवृत्ति और अन्य सरकारी सहायता से वंचित हैं। यह स्थिति परिवार की मुश्किलों को और बढ़ा रही है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि यह मामला आनुवंशिक बीमारी का प्रतीत होता है और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम से जांच कराकर उचित इलाज उपलब्ध कराया जाएगा। वहीं जिला प्रशासन ने भी इस मामले को गंभीर मानते हुए स्वास्थ्य टीम को गांव भेजने और आवश्यक सहायता देने की बात कही है। यह कहानी न केवल एक चिकित्सा चुनौती को दर्शाती है, बल्कि समाज और सिस्टम की जिम्मेदारी पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है।
जहां सैनिकों का साहस बना बदलाव की पहचान: सीमावर्ती तंगधार में विकास की नई कहानी लिखी जा रही है

नई दिल्ली । देश के सीमावर्ती क्षेत्रों को अक्सर केवल सुरक्षा और रणनीतिक महत्व के नजरिए से देखा जाता रहा है, लेकिन अब इन इलाकों की तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। जम्मू-कश्मीर के तंगधार क्षेत्र में एक ऐसी नई पहल सामने आई है, जो वीरता और विकास को एक साथ जोड़ते हुए सीमाओं की नई पहचान बना रही है। बर्फ से ढके पहाड़ों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच तैयार किया गया शौर्य गाथा कॉम्प्लेक्स अब केवल एक संरचना नहीं बल्कि साहस, समर्पण, संस्कृति और जनसेवा का प्रतीक बनता जा रहा है। यह पहल दिखाती है कि सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ वहां रहने वाले लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में भी सकारात्मक प्रयास किए जा सकते हैं। कुपवाड़ा जिले के साधना पास के निकट शमशाबरी पर्वत श्रृंखला के बीच विकसित यह क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य और रणनीतिक महत्व दोनों के लिए जाना जाता है। समुद्र तल से दस हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित यह इलाका लंबे समय से अपनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विशेष महत्व रखता है। यहां तैनात सैनिक हर मौसम में देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाते हैं। अब इसी वीरभूमि पर विकास और पर्यटन की एक नई कहानी आकार लेती दिखाई दे रही है। इस विशेष परिसर को इस प्रकार तैयार किया गया है कि यहां आने वाले लोग केवल पहाड़ों और बर्फीली वादियों का आनंद ही न लें, बल्कि उन सैनिकों के साहस, संघर्ष और बलिदान को भी महसूस कर सकें जो सीमाओं की रक्षा में लगातार डटे रहते हैं। परिसर में बनाए गए युद्ध स्मारक और संग्रहालय में सैन्य इतिहास की प्रेरणादायक झलक देखने को मिलती है। यहां वीर सैनिकों की कहानियों को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया है, जिससे आने वाले लोगों को देशभक्ति और समर्पण की भावना का अनुभव हो सके। इस पहल की सबसे खास बात यह है कि इसका उद्देश्य केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है। सीमावर्ती गांवों को नई पहचान देने और स्थानीय लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में भी यह प्रयास महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक खानपान, पहाड़ी जीवनशैली और हस्तशिल्प को भी बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। इससे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिलने के साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ने की संभावना है। इस परियोजना से पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि होने पर स्थानीय युवाओं को नए अवसर प्राप्त हो सकते हैं। छोटे व्यवसाय, स्थानीय उत्पाद और पारंपरिक कलाएं भी इससे लाभान्वित हो सकती हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास का यह मॉडल आने वाले समय में अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। इसके अलावा यहां विकसित किया गया हेलिपैड स्थानीय लोगों के लिए बड़ी सुविधा साबित हो सकता है। खराब मौसम और कठिन रास्तों वाले क्षेत्रों में आपातकालीन सेवाओं तथा राहत कार्यों को तेजी से संचालित करने में यह मददगार होगा। तंगधार की यह बदलती तस्वीर यह संदेश देती है कि सीमाओं की सुरक्षा के साथ विकास और जनसेवा को भी समान महत्व दिया जा सकता है। यह पहल शौर्य और सेवा की उस भावना को साकार करती दिखाई देती है जो देश की सीमाओं को नई संभावनाओं से जोड़ रही है।
रजत मुकुट और त्रिशूल के साथ महाकाल का दिव्य स्वरूप, रविवार की भस्म आरती में उमड़ा सैलाब

मध्यप्रदेश। उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में रविवार तड़के भस्म आरती के दौरान भव्य और दिव्य दृश्य देखने को मिला, जब सुबह चार बजे मंदिर के पट खुलते ही संपूर्ण गर्भगृह भक्तिभाव और वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठा। पट खुलने के बाद पंडे-पुजारियों ने सर्वप्रथम गर्भगृह में स्थापित सभी देवी-देवताओं का विधिवत पूजन किया। इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया और पंचामृत दूध, दही, घी, शक्कर तथा फलों के रस से उनका अभिषेक कर विशेष पूजन-अर्चन संपन्न हुआ। इसके पश्चात भगवान महाकाल को भांग, त्रिशूल, त्रिपुंड और डमरू अर्पित कर उनका दिव्य श्रृंगार किया गया। कपूर आरती के बाद ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से ढककर पारंपरिक रूप से भस्म रमाई गई, जो भस्म आरती की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा मानी जाती है। भस्म अर्पित होने के बाद बाबा महाकाल को शेषनाग का रजत मुकुट, रजत मुंडमाला और रुद्राक्ष की माला धारण कराई गई। साथ ही मोगरा और गुलाब के सुगंधित पुष्पों से बनी आकर्षक मालाओं से उनका श्रृंगार किया गया। इसके बाद फल और मिष्ठान का भोग अर्पित कर राजा स्वरूप दर्शन को पूर्ण किया गया। इस अद्भुत भस्म आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और उन्होंने बाबा महाकाल के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। पूरे मंदिर परिसर में “हर हर महादेव” के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठा। मान्यता के अनुसार, भस्म आरती के दौरान जब भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है, तो वे निराकार स्वरूप से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। महानिर्वाणी अखाड़ा की ओर से भस्म अर्पण की परंपरा निभाई गई, जिससे यह आरती और भी विशेष और आध्यात्मिक महत्व की बन गई।
मंदिर पहुंची लेकिन दर्शन न कर सकी: उज्जैन में बुजुर्ग महिला की दर्दनाक मौत

मध्यप्रदेश। उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर के बाहर शनिवार को एक अत्यंत भावुक कर देने वाली घटना सामने आई, जहां नासिक से आई 50 वर्षीय बुजुर्ग महिला की दर्शन की अंतिम इच्छा अधूरी रह गई और उनकी मौके पर ही मौत हो गई। जानकारी के अनुसार, महिला सीमा अपने पति भेरू के साथ लंबे समय से बीमार चल रही थीं और अपनी अंतिम इच्छा के रूप में महाकालेश्वर भगवान के दर्शन करने उज्जैन पहुंची थीं। पति स्वयं भी अस्वस्थ थे, लेकिन इसके बावजूद वे पत्नी को ट्राइसाइकिल के सहारे मंदिर तक लेकर पहुंचे। दोनों पति-पत्नी किसी तरह संघर्ष करते हुए मंदिर के गेट तक पहुंचे, लेकिन जैसे ही वे प्रवेश द्वार के पास पहुंचे, महिला की तबीयत अचानक बिगड़ गई। कुछ ही क्षणों में उनकी हालत गंभीर हो गई और उन्होंने वहीं दम तोड़ दिया। घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया। सूचना मिलने पर समाजसेवी अनिल डागर तत्काल वहां पहुंचे और उन्होंने पीड़ित परिवार की मदद करते हुए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं संभालीं। परिवार की स्थिति को देखते हुए अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी समाजसेवी की मदद से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार पूरी कराई गई। इस घटना ने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया और हर किसी की आंखें नम हो गईं। महाकाल मंदिर परिसर के बाहर घटी यह घटना श्रद्धा, आस्था और जीवन की नश्वरता का गहरा संदेश छोड़ गई।
उज्जैन सड़क हादसा: अंधेरे और निर्माण कार्य के बीच कार पलटी, एक युवक की जान गई

मध्यप्रदेश। उज्जैन जिले के बदनावर बायपास पर रविवार तड़के एक दर्दनाक सड़क हादसा हो गया, जिसमें इंदौर से सांवरिया सेठ दर्शन के लिए जा रहे युवकों की खुशियों से भरी यात्रा मातम में बदल गई। इस हादसे में एक युवक की मौत हो गई, जबकि 12वीं कक्षा के सात छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए। जानकारी के अनुसार, सभी युवक इंदौर से एक स्कॉर्पियो वाहन में सवार होकर सांवरिया सेठ के दर्शन और जन्मदिन मनाने के लिए रवाना हुए थे। यात्रा के दौरान यह हादसा सुबह करीब 4 बजे हुआ, जब सड़क पर घना अंधेरा था और सामने एक मृत गाय पड़ी होने के साथ-साथ सड़क निर्माण कार्य भी चल रहा था। इसी दौरान चालक ने वाहन को साइड में लेने की कोशिश की, लेकिन सड़क की स्थिति खराब होने और संतुलन बिगड़ने के कारण स्कॉर्पियो अनियंत्रित होकर खाई में जा गिरी। अचानक हुए इस हादसे से मौके पर चीख-पुकार मच गई। हादसे में 18 वर्षीय विशाल परिहार की मौत हो गई, जो इंदौर के एक कैफे में शेफ के रूप में काम करता था। वह अपने दोस्तों के साथ जन्मदिन और धार्मिक यात्रा के लिए निकला था, लेकिन यह सफर उसके जीवन का अंतिम सफर साबित हुआ। मृतक अपने परिवार में एक बहन और बड़े भाई के साथ जुड़ा हुआ था, जबकि उसके पिता पचोर के रहने वाले हैं। हादसे में घायल हुए अन्य युवकों की पहचान निलेश, पीयूष, चंदन, जीवन, ओम, आयुष और मिलन के रूप में हुई है। इनमें से निलेश और पीयूष की हालत गंभीर बताई जा रही है, जिन्हें प्राथमिक उपचार के बाद इंदौर रेफर किया गया है। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और स्थानीय लोगों की मदद से घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। पुलिस ने मामला दर्ज कर दुर्घटना के कारणों की जांच शुरू कर दी है। यह हादसा एक बार फिर रात के समय खराब सड़क व्यवस्था और लापरवाही से हो रहे हादसों की गंभीरता को उजागर करता है।
जिंदगी की जंग जीती नन्ही परी: 8 दिन की बच्ची की मुंबई में सफल हार्ट सर्जरी

मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश के शहडोल जिले से एक भावुक कर देने वाली और राहत भरी खबर सामने आई है, जहां महज 8 दिन की नवजात बच्ची ने जिंदगी की जंग जीतनी शुरू कर दी है। बच्ची के दिल में जन्मजात छेद होने के कारण उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी, जिसे देखते हुए डॉक्टरों ने तत्काल उच्च स्तरीय इलाज की आवश्यकता बताई। परिजन बच्ची को जबलपुर मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे, जहां जांच के बाद पता चला कि स्थिति बेहद गंभीर है और तत्काल उन्नत कार्डियक सर्जरी की जरूरत है। इसके बाद राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की त्वरित कार्रवाई से बच्ची को एयर एम्बुलेंस के माध्यम से मुंबई स्थित नारायणा अस्पताल भेजा गया। इस पूरी प्रक्रिया को आरबीएसके योजना, आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना और मुख्यमंत्री बाल हृदय उपचार योजना के तहत पूरी तरह निःशुल्क किया गया। करीब 1.60 लाख रुपये की लागत वाला यह इलाज पूरी तरह सरकारी सहायता से संभव हो पाया। डॉक्टरों के अनुसार, जन्म के कुछ ही दिनों बाद बच्ची की तबीयत तेजी से बिगड़ रही थी। जब उसे जबलपुर लाया गया, तब ऑक्सीजन स्तर केवल 30 से 50 के बीच रह गया था, जो बेहद गंभीर स्थिति को दर्शाता है। तत्काल उपचार शुरू कर उसे एचएनसीयू वार्ड में रखा गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की निगरानी में एयर एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई। बच्ची के पिता विक्रम दाहिया और अन्य परिजन भी उसके साथ मुंबई पहुंचे, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने तत्काल उपचार शुरू किया। मुंबई के नारायणा अस्पताल में पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. प्रिया प्रधान और कार्डियक सर्जन डॉ. प्रदीप कौशिक की टीम ने शनिवार को सफल सर्जरी की। ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने बताया कि बच्ची की हालत अब स्थिर है और सभी अंग—ब्रेन, किडनी और लीवर—सही तरीके से काम कर रहे हैं। सर्जरी के बाद बच्ची को एचएनसीयू में निगरानी में रखा गया है और उसमें लगातार सुधार देखा जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर इसी तरह सुधार जारी रहा तो जल्द ही उसे पूरी तरह स्वस्थ घोषित किया जा सकता है। यह मामला न केवल चिकित्सा क्षेत्र की सफलता को दर्शाता है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं और समय पर लिए गए निर्णयों की अहमियत को भी उजागर करता है, जिससे एक मासूम की जान बचाई जा सकी।
दोस्ती बनी दुश्मनी: आपत्तिजनक हरकत के बाद गला दबाकर हत्या से हड़कंप

मध्यप्रदेश। जबलपुर शहर के धनवंतरी नगर क्षेत्र में सामने आए सनसनीखेज हत्याकांड का पुलिस ने 24 घंटे के भीतर खुलासा कर दिया है। इस मामले में 28 वर्षीय युवक सुरेंद्र सिंह उर्फ चिंगम की हत्या उसके ही खास दोस्त आयुष यादव (26) ने की थी, जिसे पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। पुलिस पूछताछ में आरोपी आयुष यादव ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उसका कहना है कि वह पिछले लगभग दो वर्षों से मृतक सुरेंद्र के संपर्क में था, लेकिन इस दौरान सुरेंद्र अक्सर उसके साथ गलत तरीके से व्यवहार करता था और शराब के नशे में उसे परेशान करता था। आरोपी के अनुसार, कई बार मना करने के बावजूद वह लगातार उसे बुलाकर प्रताड़ित करता और मारपीट करता था। आयुष ने पुलिस को बताया कि घटना वाली रात भी सुरेंद्र ने उसे बुलाया और फिर कथित रूप से गलत हरकतें करने लगा। विरोध करने पर मारपीट हुई, जिससे वह मानसिक रूप से बेहद परेशान हो गया। इसी तनाव और गुस्से में उसने हत्या करने का निर्णय ले लिया। पुलिस के अनुसार, आरोपी ने पहले गमछे से गला दबाकर सुरेंद्र की हत्या की और बाद में मामले को आत्महत्या का रूप देने के लिए उसके बाएं हाथ की नस चाकू से काट दी। शव शुक्रवार सुबह उसके कमरे में मिला था, जिससे इलाके में सनसनी फैल गई थी। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया कि घटना से पहले सुरेंद्र का स्थानीय लोगों से विवाद हुआ था। वह शराब के नशे में गाली-गलौज कर रहा था, जिसके बाद वह अपने कमरे की ओर गया। कुछ ही समय बाद वहां विवाद और गिरने की आवाजें सुनी गई थीं। बाद में जब लोग पहुंचे तो आयुष वहां मौजूद था और उसने खुद को उसका दोस्त बताते हुए कहा कि वह ज्यादा शराब पीकर गिर गया है। इसके बाद दोनों अन्य लोगों ने उसे कमरे तक पहुंचाया, लेकिन अगली सुबह उसकी मौत की जानकारी मिली। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी यह स्पष्ट हुआ कि श्वासनली टूटने से गला घुटने के कारण उसकी मौत हुई है। एएसपी पल्लवी शुक्ला ने बताया कि मृतक सुरेंद्र के खिलाफ भी आधा दर्जन से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे। वहीं आरोपी आयुष ने पूछताछ में दावा किया कि वह लंबे समय से मानसिक रूप से परेशान था और लगातार प्रताड़ना से तंग आकर उसने यह कदम उठाया। फिलहाल पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया है। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी है और कई नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
4.72 करोड़ की मसूर खरीदी बनी विवाद: 6756 क्विंटल अमानक अनाज का मामला

मध्यप्रदेश। शिवपुरी जिले में समर्थन मूल्य खरीदी व्यवस्था के तहत बड़ी अनियमितता सामने आई है, जहां 4.72 करोड़ रुपये मूल्य की 6756 क्विंटल मसूर अमानक पाई गई है। उपार्जन केंद्रों से भंडारण के लिए भेजी गई इस मसूर में तय मानक से अधिक मात्रा में मिट्टी और कचरे की मौजूदगी पाई गई, जिससे पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारी के अनुसार, जिले में चना और मसूर की खरीदी मार्कफेड द्वारा की जा रही है, जबकि उपार्जन की जिम्मेदारी सेवा सहकारी संस्थाओं को सौंपी गई है। इन संस्थाओं ने निर्धारित गुणवत्ता मानकों की अनदेखी करते हुए भारी मात्रा में अमानक मसूर की खरीद कर ली। मानक के अनुसार उपज में अधिकतम 2 प्रतिशत तक ही कचरा और मिट्टी की अनुमति है, लेकिन जांच में 2.50 प्रतिशत से लेकर 5.50 प्रतिशत तक अशुद्धियां पाई गईं। गोदामों में भंडारण से पहले जब मार्कफेड सर्वेयरों ने सैंपल जांच की, तो बड़ी मात्रा में गड़बड़ी सामने आई। इसके बाद 6756 क्विंटल मसूर को अमानक घोषित कर अलग स्टेक में सुरक्षित रखवा दिया गया है। साथ ही संबंधित संस्थाओं को पत्र जारी कर इस मसूर की अपग्रेडिंग यानी सफाई और सुधार की प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार, अपग्रेडिंग पूरी होने तक इस मसूर के खिलाफ कोई भुगतान जारी नहीं किया जाएगा। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है, क्योंकि कुल लगभग 4.72 करोड़ रुपये का भुगतान फिलहाल अटक गया है। कई मामलों में यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कौन सी अमानक उपज किन किसानों से संबंधित है, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है। जिले में अब तक 2316 किसानों से 64,529 क्विंटल मसूर और 356 किसानों से 8,885 क्विंटल चना की खरीदी की जा चुकी है। कुल 31.60 करोड़ रुपये मूल्य की उपज में से 21.62 करोड़ रुपये के ईपीओ जारी किए गए हैं, जिनमें से 15.09 करोड़ रुपये किसानों के खातों में पहुंच चुके हैं। हालांकि, 10 प्रतिशत से अधिक मसूर अमानक पाए जाने के कारण किसानों के भुगतान पर संकट गहराता जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि जब तक पूरी उपज को मानक के अनुरूप अपग्रेड नहीं किया जाता, तब तक भुगतान प्रक्रिया रुकी रहेगी। वहीं चना और मसूर की खरीद 28 मई तक जारी रहने की जानकारी भी दी गई है। यह मामला न केवल खरीद प्रक्रिया की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि किसानों के भुगतान में देरी की गंभीर समस्या को भी उजागर करता है।