सोने पर बढ़ा दुनिया का भरोसा: केंद्रीय बैंक बढ़ा रहे गोल्ड रिजर्व, कीमतों में बड़ी तेजी के संकेत

नई दिल्ली । वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच सोना एक बार फिर सबसे भरोसेमंद निवेश विकल्प के रूप में उभर रहा है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ा रहे हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के ताजा वार्षिक सर्वेक्षण ने यह संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में यह रुझान और तेज हो सकता है। इससे न केवल गोल्ड रिजर्व का महत्व बढ़ेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। सर्वेक्षण में 76 केंद्रीय बैंकों ने हिस्सा लिया, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है। इसमें शामिल 84 प्रतिशत केंद्रीय बैंकों का मानना है कि अगले पांच वर्षों में वैश्विक भंडार में सोने की हिस्सेदारी मौजूदा स्तर की तुलना में काफी अधिक होगी। दिलचस्प बात यह है कि विकसित देशों के साथ-साथ उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के केंद्रीय बैंक भी इस मुद्दे पर लगभग एक जैसी राय रखते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक वित्तीय प्रणाली में हो रहे बदलावों के कारण केंद्रीय बैंक अपनी आरक्षित संपत्तियों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं। लंबे समय तक अमेरिकी डॉलर को सबसे सुरक्षित रिजर्व मुद्रा माना जाता रहा, लेकिन हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक प्रतिबंधों और वैश्विक व्यापार में बदलावों के चलते कई देशों ने वैकल्पिक सुरक्षित संपत्तियों की तलाश शुरू कर दी है। सोना इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि करते हैं। वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। सर्वेक्षण में शामिल 74 प्रतिशत रिजर्व प्रबंधकों का अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में डॉलर की हिस्सेदारी और कम हो सकती है। ऐसे में सोना केंद्रीय बैंकों के लिए सुरक्षा कवच की भूमिका निभा सकता है। बाजार विशेषज्ञ और केडिया एडवाइजरी के निदेशक अजय केडिया का कहना है कि दीर्घकालिक दृष्टि से सोने का रुख बेहद मजबूत बना हुआ है। हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और महंगाई के दबाव के कारण निकट भविष्य में सोने पर कुछ दबाव देखने को मिल सकता है, लेकिन लंबी अवधि में इसकी संभावनाएं सकारात्मक हैं। उनका अनुमान है कि अगले एक वर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना नई ऊंचाइयों को छू सकता है। सोने की बढ़ती मांग केवल निवेशकों तक सीमित नहीं है। केंद्रीय बैंकों की खरीदारी भी बाजार को मजबूत आधार प्रदान कर रही है। जब दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संस्थान अपनी संपत्तियों का बड़ा हिस्सा सोने में स्थानांतरित करते हैं, तो यह निवेशकों के लिए भी एक मजबूत संकेत माना जाता है। यही कारण है कि आर्थिक संकट, युद्ध, महंगाई और मुद्रा अवमूल्यन जैसी परिस्थितियों में सोने की मांग तेजी से बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक अनिश्चितता बनी रहती है और केंद्रीय बैंक इसी तरह सोना खरीदते रहते हैं, तो आने वाले वर्षों में गोल्ड मार्केट में नई तेजी देखने को मिल सकती है। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा और दीर्घकालिक निवेश का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बनता जा रहा है।
न्यू जर्सी में एमबाप्पे का महाधमाका: जस्ट फोंटेन का ऐतिहासिक रिकॉर्ड ध्वस्त, दिग्गजों की सूची में शीर्ष की ओर बढ़े फ्रांसीसी कप्तान

नई दिल्ली । पिछले संस्करण की उपविजेता रही फ्रांस की फुटबॉल टीम ने फीफा विश्व कप 2026 में अपने अभियान का शानदार और धमाकेदार आगाज किया है। अमेरिका के न्यू जर्सी में खेले गए ग्रुप ‘आई’ के एक बेहद रोमांचक और कड़े मुकाबले में फ्रांस ने अफ्रीकी महाद्वीप की मजबूत टीम सेनेगल को 3-1 से पराजित कर दिया। इस मुकाबले में फ्रांस की जीत के महानायक उनके स्टार स्ट्राइकर और कप्तान कायलियन एमबाप्पे रहे, जिन्होंने मैच के उत्तरार्ध में अपने जादुई खेल से पासा पलट दिया। एमबाप्पे ने मुकाबले में दो महत्वपूर्ण गोल दागे और इस शानदार प्रदर्शन की बदौलत उन्होंने फुटबॉल इतिहास की एक अत्यंत प्रतिष्ठित और बड़ी उपलब्धि अपने नाम दर्ज करा ली है। मैच के शुरुआती हिस्से की बात करें तो पहले हाफ में सेनेगल की टीम ने उम्मीद से कहीं बेहतर और आक्रामक खेल का प्रदर्शन किया। मैच के 7वें मिनट में ही सेनेगल के इस्माइला सर्र ने फ्रांस के मजबूत डिफेंस को भेदते हुए गोल पोस्ट के समीप पहुंचकर पहला खतरनाक प्रयास किया। सेनेगल ने पूरे पहले हाफ में फ्रांसीसी टीम पर लगातार दबाव बनाए रखा। फ्रांस की ओर से 19वें मिनट में ओस्मान डेम्बेले ने जवाबी हमला किया, लेकिन वे गोल करने में असफल रहे। इसके बाद 25वें मिनट में सेनेगल के निकोलस जैक्सन गोल करने के बेहद करीब पहुंचे, परंतु उनका शॉट पोस्ट के ठीक बगल से बाहर निकल गया। खेल के 40वें मिनट में स्टार खिलाड़ी सादियो माने का एक बेहतरीन शॉट भी चूक गया, जिसके चलते पहला हाफ पूरी तरह से गोलरहित बराबरी पर समाप्त हुआ और पहले हाफ में एमबाप्पे भी अधिकांश समय गेंद से दूर ही नजर आए। हालांकि, दूसरे हाफ की शुरुआत होते ही फ्रांसीसी टीम ने अपनी रणनीति बदलते हुए बेहद आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया। मैच के 57वें मिनट में एमबाप्पे ने सेनेगल के डिफेंडरों को छकाते हुए एक बेहतरीन मौका बनाया, लेकिन सेनेगल के गोलकीपर एडौर्ड मेंडी ने मुस्तैदी दिखाते हुए उसे नाकाम कर दिया। फ्रांस के खिलाड़ियों ने दबाव जारी रखा और आखिरकार 66वें मिनट में गतिरोध टूट गया। माइकल ओलिसे से मिले एक सटीक पास को नियंत्रित करते हुए कप्तान कायलियन एमबाप्पे ने सेनेगल के डिफेंस को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया और गोलकीपर को चकमा देते हुए गेंद को जाल में पहुंचाकर फ्रांस को 1-0 की महत्वपूर्ण बढ़त दिला दी। एक गोल की बढ़त हासिल करने के बाद फ्रांस का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुंच गया। मैच के 82वें मिनट में युवा फॉरवर्ड ब्रैडली बारकोला ने एक और दर्शनीय गोल दागकर फ्रांस की बढ़त को दोगुना यानी 2-0 कर दिया। निर्धारित 90 मिनट के खेल के बाद लग रहा था कि मैच इसी स्कोर पर समाप्त होगा, लेकिन रेफरी द्वारा जोड़े गए 8 मिनट के इंजरी टाइम ने मुकाबले के रोमांच को चरम पर पहुंचा दिया। इंजरी टाइम के शुरुआती पलों में सेनेगल के इब्राहिम मबाये ने एक शानदार गोल कर अपनी टीम की वापसी की उम्मीदें जगाईं और स्कोर 2-1 कर दिया। हालांकि, सेनेगल की यह खुशी कुछ ही सेकेंड टिक सकी, क्योंकि खेल खत्म होने की अंतिम सीटी बजने से ठीक पहले एमबाप्पे ने एक और अविश्वसनीय गोल दागकर फ्रांस को 3-1 से आगे कर दिया और जीत पूरी तरह पक्की कर दी। इस ऐतिहासिक मुकाबले में दो गोल करने के साथ ही कायलियन एमबाप्पे के नाम अब फीफा विश्व कप के इतिहास में कुल 14 गोल दर्ज हो गए हैं। इस कीर्तिमान के साथ ही उन्होंने फ्रांस के महान पूर्व खिलाड़ी जस्ट फोंटेन के 13 गोलों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है और वे अब विश्व कप इतिहास में फ्रांस के लिए सर्वाधिक गोल करने वाले इकलौते खिलाड़ी बन गए हैं। इसके साथ ही एमबाप्पे ने विश्व कप में सर्वाधिक गोल करने के मामले में जर्मनी के दिग्गज गेर्ड मुलर के 14 गोलों के सर्वकालिक रिकॉर्ड की भी बराबरी कर ली है। अब विश्व कप के इतिहास में उनसे ज्यादा गोल केवल ब्राजील के रोनाल्डो (15 गोल) और जर्मनी के मिरोस्लाव क्लोस (16 गोल) के नाम दर्ज हैं। एमबाप्पे का यह शानदार फॉर्म दर्शाता है कि वे आने वाले मैचों में फुटबॉल जगत के कई और बड़े रिकॉर्ड्स को अपने नाम करने के बेहद करीब हैं।
G7 में जापान का बड़ा संदेश: हिंद-प्रशांत सुरक्षा, चीन की चुनौतियां और होर्मुज जलडमरूमध्य पर जताई चिंता

फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और भू-राजनीतिक चुनौतियों पर व्यापक चर्चा हुई। इस दौरान जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों, चीन से जुड़ी रणनीतिक चुनौतियों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को प्रमुखता से उठाते हुए सदस्य देशों के बीच अधिक समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं भी दबाव का सामना कर रही हैं। जापानी प्रधानमंत्री ने जी-7 नेताओं के साथ हुई बैठकों और रात्रिभोज चर्चा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र आज विश्व राजनीति और वैश्विक व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना केवल एशियाई देशों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के आर्थिक और सामरिक हितों के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जापान ने चीन से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों और क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर अपना दृष्टिकोण साझेदार देशों के सामने रखा है। ताकाइची ने कहा कि जी-7 देशों के बीच इस बात पर व्यापक सहमति बनी है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में सहयोग और समन्वय को और मजबूत किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित और मजबूत बनाने पर जोर दिया। आधुनिक तकनीक, रक्षा उत्पादन और हरित ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आवश्यक खनिजों की उपलब्धता आज दुनिया की प्रमुख आर्थिक प्राथमिकताओं में शामिल हो चुकी है। पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए जापानी प्रधानमंत्री ने होर्मुज जलडमरूमध्य के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए सभी पक्षों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समुद्री व्यापार निर्बाध रूप से जारी रहे और किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो। ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा भी चर्चा का केंद्र रहा। जापान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ सहयोग बढ़ाने और परमाणु प्रसार को रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन किया। जापान का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों के प्रसार को नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है। इसी सम्मेलन में भारत ने भी विकास साझेदारी और वैश्विक दक्षिण की भूमिका को मजबूती से उठाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि किसी भी साझेदारी की वास्तविक सफलता इस बात में है कि वह सहयोगी देशों को आत्मनिर्भर बनने में कितना सक्षम बनाती है। उन्होंने अफ्रीका में भारत की विकास परियोजनाओं, कौशल विकास कार्यक्रमों और क्षमता निर्माण प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत साझेदारी के माध्यम से दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। उधर, चीन के बढ़ते निर्यात को लेकर यूरोपीय देशों की चिंताएं भी चर्चा का विषय बनी रहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी शुल्कों के बावजूद चीन का औद्योगिक उत्पादन और निर्यात क्षमता मजबूत बनी हुई है, जिससे वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा और आर्थिक संतुलन से जुड़े नए सवाल खड़े हो रहे हैं। कुल मिलाकर, जी-7 शिखर सम्मेलन ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में सुरक्षा, व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़े मुद्दे वैश्विक एजेंडे के केंद्र में रहने वाले हैं।
गोविंदा और सुनीता आहूजा के तलाक की खबरों पर बेटी टीना का बड़ा खुलासा, शादी में दरार के दावों को बताया महज अफवाह

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा जगत में लंबे समय तक ‘जोड़ी नंबर 1’ के रूप में मशहूर रहे अभिनेता गोविंदा और उनकी पत्नी सुनीता आहूजा के वैवाहिक जीवन को लेकर सोशल मीडिया पर एक चौंकाने वाला दावा तेजी से वायरल हो रहा है। इंटरनेट पर विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर यह अफवाह फैलाई जा रही है कि इस स्टार कपल की 39 साल पुरानी शादी में गंभीर खटपट चल रही है और दोनों जल्द ही तलाक लेकर अलग होने वाले हैं। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स में तो यहां तक दावा कर दिया गया कि सुनीता आहूजा ने इशारों-इशारों में पति के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर को लेकर शक जाहिर किया है। इन लगातार बढ़ती और परेशान करने वाली अटकलों के बीच अब गोविंदा की बेटी टीना आहूजा ने सामने आकर इस पूरे विवाद का सच उजागर किया है। एक प्रमुख मीडिया संस्थान से विशेष बातचीत के दौरान टीना आहूजा ने माता-पिता के रिश्ते और उनके तलाक को लेकर चल रही खबरों पर खुलकर अपनी बात रखी। टीना ने इन दावों को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि वे इस तरह की मनगढ़ंत कहानियां अपने बचपन के दिनों से देखती आ रही हैं। उनके अनुसार, फिल्म इंडस्ट्री में हर दशक में किसी न किसी सेलिब्रिटी को लेकर एक नई और झूठी कहानी गढ़ दी जाती है, जिसका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए टीना ने कहा कि पहले के समय में इस तरह की गॉसिप और भ्रामक खबरें केवल फिल्मी पत्रिकाओं और मैगजीन्स में छपती थीं। इसके बाद जब इंटरनेट का दौर आया, तो यह खबरें वेबसाइट्स पर दिखने लगीं और अब वर्तमान समय में इंस्टाग्राम तथा यूट्यूब जैसे डिजिटल माध्यमों पर व्यूज बटोरने के लिए ऐसी अफवाहों को परोसा जा रहा है। उन्होंने दर्द साझा करते हुए कहा कि आखिरकार वे भी एक इंसान हैं और जब कोई उनके परिवार के बारे में इस तरह की आधारहीन और खींची हुई बातें लिखता है, तो वे अंदर से बेहद परेशान हो जाती हैं। टीना आहूजा ने कड़े शब्दों में कहा कि आज के डिजिटल युग में केवल ‘क्लिकबेट’ यानी लोगों का ध्यान खींचने और लाइक्स-व्यूज कमाने के लिए ऐसी झूठी खबरें जानबूझकर क्रिएट की जाती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे कोई संत नहीं हैं कि उन्हें इन नकारात्मक बातों से फर्क न पड़े, निश्चित रूप से ऐसी झूठी खबरें उन्हें और उनके परिवार को प्रभावित करती हैं। हालांकि, फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा होने के नाते समय के साथ उन्होंने खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाना सीख लिया है। पारिवारिक रिश्तों की मजबूती पर भरोसा जताते हुए टीना ने कहा कि जब आपको अपने घर और माता-पिता का असली सच पता होता है, तो ऐसी फालतू की बातों पर प्रतिक्रिया न देना ही सबसे बेहतर विकल्प होता है। उन्होंने साफ कर दिया कि गोविंदा और सुनीता के बीच सब कुछ पूरी तरह ठीक है और उनके अलग होने की बातें महज एक कोरी कल्पना हैं। गौरतलब है कि टीना आहूजा इन दिनों अपने प्रोफेशनल वर्कफ्रंट को लेकर भी चर्चा में हैं। उन्होंने अपनी मां सुनीता आहूजा के साथ टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा है, जहां वे जीटीवी के नए रियलिटी शो ‘मां है ना’ में नजर आ रही हैं, जिसे अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी द्वारा होस्ट किया जा रहा है।
पीओके में बढ़ा असंतोष: पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई पर उठे सवाल, स्वतंत्र जांच की मांग तेज

नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जारी अशांति और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं। हाल के दिनों में वहां प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई कार्रवाई, गिरफ्तारियों और कथित मौतों को लेकर पाकिस्तान सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियां आलोचनाओं के घेरे में हैं। खास बात यह है कि इस बार आवाज केवल स्थानीय स्तर से नहीं, बल्कि उन कश्मीरी समूहों की ओर से भी उठ रही है जो लंबे समय से कश्मीर मुद्दे पर अलग रुख रखते आए हैं। कश्मीर डायस्पोरा कोएलिशन के अध्यक्ष डॉ. मुबीन शाह ने पीओके की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान प्रशासन ने लोगों की आवाज सुनने के बजाय दमन का रास्ता अपनाया है, जिससे क्षेत्र में असंतोष और बढ़ा है। उनका कहना है कि पीओके में हो रही घटनाओं ने नियंत्रण रेखा के दोनों ओर रहने वाले कश्मीरियों को झकझोर दिया है। डॉ. शाह ने कहा कि कश्मीरी समाज के लिए यह क्षेत्र केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक महत्व रखता है। ऐसे में वहां आम नागरिकों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई ने लोगों के मन में गहरी नाराजगी पैदा की है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि स्थानीय लोगों की समस्याओं और मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया तो स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है। पीओके में चल रहे आंदोलन को जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी का समर्थन प्राप्त है। इस आंदोलन के समर्थन में कई प्रवासी कश्मीरी संगठनों ने पाकिस्तान सरकार के सामने 12 सूत्रीय मांग पत्र भी रखा है। इसमें प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग रोकने, गिरफ्तार लोगों की जानकारी सार्वजनिक करने और हिंसा तथा मौतों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग शामिल है। संगठनों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी है तथा नागरिकों की आवाज को दबाने के बजाय संवाद के माध्यम से समाधान तलाशा जाना चाहिए। कश्मीर डायस्पोरा कोएलिशन, जो दुनिया के कई देशों में सक्रिय कश्मीरी संगठनों का संयुक्त मंच है, ने भी इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात कही है। संगठन का मानना है कि पीओके में मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने मांग की है कि घटनाओं की स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच कराई जाए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और यदि किसी स्तर पर अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जा सके। विश्लेषकों का मानना है कि पीओके में उभर रहा यह असंतोष केवल स्थानीय आर्थिक समस्याओं तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक नीतियों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकारों से जुड़े व्यापक मुद्दों का रूप लेता दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में पाकिस्तान सरकार इस स्थिति से कैसे निपटती है, इस पर क्षेत्र की राजनीतिक दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।
मिरोस्लाव क्लोस के सर्वकालिक महान रिकॉर्ड की मेसी ने की बराबरी, केन्सास सिटी में अर्जेंटीना की धमाकेदार जीत के साथ फुटबॉल इतिहास में स्वर्णिम अध्याय दर्ज

नई दिल्ली । वैश्विक फुटबॉल के महाकुंभ फीफा वर्ल्ड कप 2026 में अर्जेंटीना के महान फुटबॉलर लियोनेल मेसी ने एक नया और अभूतपूर्व इतिहास रच दिया है। अमेरिका के केन्सास सिटी में अल्जीरिया के खिलाफ खेले गए एक बेहद रोमांचक मुकाबले में अर्जेंटीना के कप्तान ने अपने जादुई खेल का प्रदर्शन करते हुए शानदार हैट्रिक जमाई। इस ऐतिहासिक प्रदर्शन के दम पर अर्जेंटीना ने मुकाबले में 3-0 की एकतरफा और मजबूत बढ़त हासिल की। इसके साथ ही 37 वर्षीय दिग्गज खिलाड़ी लियोनेल मेसी के नाम अब फीफा वर्ल्ड कप इतिहास में कुल 16 गोल दर्ज हो गए हैं, जो खेल जगत के सबसे बड़े मंच पर एक महारिकॉर्ड के रूप में स्थापित हो गया है। इस शानदार और अविस्मरणीय हैट्रिक के साथ ही लियोनेल मेसी ने जर्मनी के पूर्व दिग्गज स्ट्राइकर मिरोस्लाव क्लोस के उस ऐतिहासिक रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है, जो लंबे समय से अटूट माना जा रहा था। क्लोस ने साल 2002 से 2014 के बीच चार विश्व कप संस्करणों के कुल 24 मैचों में 16 गोल दागे थे। अब मेसी और क्लोस संयुक्त रूप से फीफा वर्ल्ड कप के इतिहास में सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए हैं। इस सूची में ब्राजील के महान खिलाड़ी रोनाल्डो 15 गोल के साथ दूसरे स्थान पर हैं, जबकि जर्मनी के गेर्ड मुलर और फ्रांस के युवा स्टार किलियन एमबाप्पे 14-14 गोल के साथ क्रमशः अगले पायदानों पर काबिज हैं। यह मेसी के लंबे और सुनहरे अंतरराष्ट्रीय करियर का एक अनूठा मोड़ है, क्योंकि उनके पांच विश्व कप संस्करणों के सफर में यह पहली बार है जब उन्होंने विश्व कप के किसी एकल मैच में हैट्रिक लगाई है। इसके साथ ही मेसी दुनिया के उन चुनिंदा खिलाड़ियों की फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं जिन्होंने पांच अलग-अलग विश्व कप टूर्नामेंटों में गोल करने का गौरव हासिल किया है। इस मामले में उन्होंने पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो के रिकॉर्ड की बराबरी की है। मैच के दौरान मेसी का दबदबा इस कदर था कि विरोधी टीम के गोलकीपर लुका जिदान उनके प्रहारों के सामने पूरी तरह बेबस नजर आए। मैच में मेसी के गोल करने का सिलसिला एक बेहद सटीक और पावरफुल शॉट के साथ शुरू हुआ, जिसे रोकने में विपक्षी गोलकीपर नाकाम रहे। इसके बाद दूसरा गोल तब देखने को मिला जब एलेक्सिस मैक एलिस्टर के एक जोरदार शॉट को अल्जीरियाई गोलकीपर नियंत्रित नहीं कर सके और रिबाउंड पर मुस्तैद खड़े मेसी ने गेंद को जाल में धकेलने में कोई चूक नहीं की। हैट्रिक को पूरा करने वाला तीसरा गोल पूरी तरह से मेसी के पारंपरिक और सिग्नेचर स्टाइल का नमूना था। पेनल्टी एरिया के कोने पर निको गोंजालेज से मिले पास को इंटर मियामी के इस स्टार खिलाड़ी ने अपने बाएं पैर के बाहरी हिस्से से नियंत्रित किया और बॉक्स के बाहर से एक ऐसा घुमावदार शॉट लगाया कि गेंद सीधे गोलपोस्ट के निचले बाएं कोने में समा गई। इस शानदार प्रदर्शन के बाद जब मैच के 79वें मिनट में कोच ने रणनीति के तहत लियोनेल मेसी को मैदान से बाहर बुलाने का निर्णय लिया, तो स्टेडियम में मौजूद हजारों दर्शकों ने खड़े होकर करतल ध्वनि से अपने चहेते खिलाड़ी का अभिवादन किया। साल 2006 में अपने विश्व कप सफर की शुरुआत करने वाले मेसी अब तक इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा 27 मैच खेलने वाले खिलाड़ी भी बन चुके हैं। अर्जेंटीना के रोसारियो शहर में जन्मे और बचपन से ही फुटबॉल को अपनी जिंदगी मानने वाले मेसी अब इतिहास का इकलौता सबसे सफल विश्व कप फुटबॉलर बनने के वैश्विक रिकॉर्ड से महज एक गोल दूर हैं। आने वाले मैचों में एक और गोल करते ही वे क्लोस को पीछे छोड़कर फुटबॉल के स्वर्णिम इतिहास में अकेले शीर्ष पर विराजमान हो जाएंगे।
शिव कृपा की प्राप्ति के लिए विरला संयोग है पंचमुखी बेलपत्र, घर की नकारात्मकता दूर करने और सुख-समृद्धि के लिए ज्योतिष में बताए गए अचूक उपा

नई दिल्ली । हिंदू धर्म और सनातन पूजा पद्धति में देवों के देव महादेव की आराधना का विशेष महत्व है। भगवान शिव की पूजा में आमतौर पर तीन पत्तियों वाले सामान्य बेलपत्र का उपयोग किया जाता है, जो हर जगह आसानी से उपलब्ध हो जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, तीन पत्तियों वाला बेलपत्र त्रिगुणों और त्रिनेत्र का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इन सबके बीच पांच पत्तियों वाले यानी पंचमुखी बेलपत्र का मिलना एक अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी संयोग माना जाता है। शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि पंचमुखी बेलपत्र में साक्षात भगवान शिव का वास होता है और जिस व्यक्ति को यह विरला बेलपत्र प्राप्त होता है, उस पर भोलेनाथ की असीम और विशेष अनुकंपा होती है। मध्य प्रदेश। शिव पुराण और प्राचीन ज्योतिषीय ग्रंथों के अनुसार, पंचमुखी बेलपत्र को शिवलिंग पर अर्पित करना अमोघ फलदायी माना गया है। यदि कोई भक्त पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ इस दुर्लभ बेलपत्र को महादेव के चरणों में या शिवलिंग पर अर्पित करता है, तो उसके जीवन से सभी प्रकार की परेशानियां, मानसिक तनाव और दरिद्रता का परित्याग हो जाता है। जिस प्रकार आध्यात्मिक जगत में एकमुखी रुद्राक्ष को मिलना सबसे कठिन और दुर्लभ माना जाता है, ठीक उसी प्रकार पांच, सात या ग्यारह पत्तियों वाले बेलपत्र का मिलना भी प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार है। इसी दुर्लभता का फायदा उठाकर कई बार बाजार में स्वार्थी तत्वों द्वारा नकली बेलपत्र भी बेचे जाते हैं, जिससे भक्तों को सावधान रहने की आवश्यकता है। प्राकृतिक और असली पंचमुखी बेलपत्र की पहचान करना बेहद सरल है, बशर्ते इसके नियमों की सही जानकारी हो। असली पंचमुखी बेलपत्र की मुख्य विशेषता यह होती है कि इसके पांचों पत्ते एक ही प्राकृतिक डंठल से आपस में जुड़े होते हैं। इन्हें अलग से किसी गोंद, केमिकल या धागे की सहायता से नहीं जोड़ा जाता है। बनावट के लिहाज से इसमें सबसे ऊपर का मध्य पत्ता आकार में थोड़ा बड़ा होता है और उसके दोनों किनारों पर दो-दो छोटे पत्ते समानांतर रूप से जुड़े होते हैं। पहचान का एक और मुख्य बिंदु यह है कि इन पांचों पत्तियों की प्राकृतिक जाली, शिराएं और गहरा हरा रंग पूरी तरह से एक समान होता है, जिसमें कोई कृत्रिम अंतर दिखाई नहीं देता है। ज्योतिष शास्त्र में पंचमुखी बेलपत्र के कई चमत्कारी और अचूक उपायों का वर्णन किया गया है, जो मानव जीवन की दिशा बदल सकते हैं। यदि कोई परिवार लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहा हो, व्यापार में लगातार घाटा हो रहा हो या नौकरी में पदोन्नति की बाधाएं समाप्त नहीं हो रही हों, तो उन्हें पंचमुखी बेलपत्र का उपाय अवश्य करना चाहिए। इसके लिए जातक को पूरी श्रद्धा के साथ इस दिव्य बेलपत्र को शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए और पूजा संपन्न होने के बाद इसे आशीर्वाद स्वरूप घर लाकर अपनी तिजोरी या धन रखने के स्थान पर पवित्रता से रख देना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से धीरे-धीरे धन की आवक बढ़ती है और तंगी दूर होती है। इसके अतिरिक्त, घर की नकारात्मक ऊर्जा और पारिवारिक कलह को शांत करने में भी यह बेलपत्र बेहद प्रभावी माना जाता है। इसके निवारण के लिए शिवलिंग पर चढ़ाए गए पंचमुखी बेलपत्र को घर लाकर अपने पूजा स्थल या मंदिर में स्थापित करना चाहिए। श्रद्धालु चाहें तो इसे भगवान शिव और माता पार्वती के चित्र या प्रतिमा के समीप एक सुंदर फ्रेम में मढ़वाकर भी रख सकते हैं। प्रतिदिन इस पंचमुखी बेलपत्र की नियमित पूजा-आरती करने से घर के भीतर मौजूद सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियां नष्ट हो जाती हैं और सुख, शांति तथा समृद्धि का वास होता है।
एक थप्पड़ ने बदल दी थी जिंदगी: खूबसूरत हीरोइन से बॉलीवुड की सबसे मशहूर ‘मंथरा’ बनने तक का सफर

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे कलाकार हुए हैं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए सफलता हासिल की, लेकिन अभिनेत्री ललिता पवार की कहानी सबसे अलग और प्रेरणादायक मानी जाती है। एक समय वह हिंदी फिल्मों की बेहद खूबसूरत और लोकप्रिय नायिका थीं, लेकिन एक दुर्घटना ने उनकी पूरी जिंदगी बदलकर रख दी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने अभिनय के दम पर ऐसा मुकाम हासिल किया, जिसे आज भी याद किया जाता है। यह घटना साल 1942 की है, जब फिल्म ‘जंग-ए-आजादी’ की शूटिंग चल रही थी। फिल्म में ललिता पवार मुख्य अभिनेत्री थीं, जबकि अभिनेता भगवान दादा उनके साथ काम कर रहे थे। एक दृश्य में भगवान दादा को ललिता पवार के गाल पर थप्पड़ मारना था। शूटिंग के दौरान यह थप्पड़ इतना जोरदार पड़ा कि ललिता पवार जमीन पर गिर पड़ीं और उनकी हालत गंभीर हो गई। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि उनके चेहरे की नस प्रभावित हो गई है। बताया जाता है कि इलाज के दौरान स्थिति और बिगड़ गई। लंबे समय तक अस्पताल में रहने के बाद जब वह सामान्य जीवन में लौटीं तो उनके चेहरे के बाईं ओर लकवे का असर दिखाई देने लगा। उनकी एक आंख सिकुड़ गई थी और चेहरे की बनावट भी पहले जैसी नहीं रही। उस दौर में फिल्म उद्योग में नायिकाओं के लिए सुंदरता को सबसे बड़ी शर्त माना जाता था, इसलिए इस हादसे ने उनके लीड अभिनेत्री बनने के सपनों को लगभग खत्म कर दिया। करीब तीन वर्षों तक इलाज और संघर्ष के बाद ललिता पवार ने फिर से फिल्मों में वापसी की कोशिश की। हालांकि अब उन्हें मुख्य नायिका के रोल नहीं मिल रहे थे। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय खुद को नए किरदारों के अनुरूप ढाल लिया। उन्होंने मां, बहन, चाची और सास जैसे चरित्र भूमिकाएं निभानी शुरू कीं। धीरे-धीरे उनकी अलग पहचान बनने लगी। उनकी सिकुड़ी हुई आंख और सख्त चेहरे के भाव नकारात्मक भूमिकाओं में बेहद प्रभावशाली साबित हुए। देखते ही देखते वह हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय खलनायिका और सास के रूप में मशहूर हो गईं। रामानंद सागर की लोकप्रिय टीवी श्रृंखला ‘रामायण’ में निभाया गया ‘मंथरा’ का किरदार आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित है। इस भूमिका ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। ललिता पवार का निजी जीवन भी संघर्षों से भरा रहा। वैवाहिक जीवन में भी उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके उन्होंने अपने काम और आत्मविश्वास को कभी कमजोर नहीं होने दिया। यही वजह रही कि उन्होंने हिंदी, मराठी और गुजराती भाषाओं की 700 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया उनके नाम सबसे लंबे अभिनय करियर का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी दर्ज है, जो उनकी मेहनत और समर्पण का प्रमाण है। एक हादसे ने भले ही उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी, लेकिन उन्होंने उस दर्द को अपनी ताकत बना लिया और अभिनय की दुनिया में अमर हो गईं। 24 फरवरी 1998 को कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद ललिता पवार ने अंतिम सांस ली। हालांकि वह इस दुनिया को छोड़ गईं, लेकिन उनका संघर्ष, साहस और अभिनय आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ इच्छाशक्ति इंसान को नई पहचान दिला सकती है।
मोहम्मद रफी ने अपने बच्चों को क्यों रखा सिंगिंग से दूर? दिग्गज गायक की सोच जानकर रह जाएंगे हैरान

नई दिल्ली । भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में जब भी महान गायकों का जिक्र होगा, मोहम्मद रफी का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। अपनी मधुर आवाज और बहुमुखी गायन शैली से उन्होंने दशकों तक संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज किया। रोमांटिक गीत हों, दर्द भरे नगमे हों या फिर देशभक्ति के गीत, रफी साहब ने हर अंदाज में अपनी अमिट छाप छोड़ी। लेकिन उनके जीवन से जुड़ा एक सवाल हमेशा लोगों के मन में उठता रहा है कि आखिर उनके बच्चों ने गायकी को अपना करियर क्यों नहीं बनाया। मोहम्मद रफी के कुल सात बच्चे थे। उनकी पहली शादी बशीरा से हुई थी, जिनसे उनका एक बेटा सईद हुआ। बाद में उन्होंने बिलकिस बानो से निकाह किया, जिनसे उनके तीन बेटे और तीन बेटियां हुईं। इतने बड़े संगीत परिवार से होने के बावजूद उनके किसी भी बच्चे ने प्रोफेशनल सिंगिंग की दुनिया में कदम नहीं रखा। इसके पीछे की वजह खुद रफी साहब की सोच थी। मोहम्मद रफी पर लिखी गई किताब ‘मोहम्मद रफी: माय अब्बा’ में उनकी बहू यास्मीन खालिद ने इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है। उनके अनुसार रफी साहब कभी नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे केवल उनके नाम और विरासत के सहारे संगीत जगत में उतरें। उनका मानना था कि जिस मुकाम तक वह अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा के दम पर पहुंचे थे, वहां तक पहुंचना आसान नहीं है। उन्हें डर था कि उनके बच्चों की तुलना हमेशा उनसे की जाएगी और यह दबाव उनके लिए बोझ बन सकता है। यास्मीन के मुताबिक, रफी साहब ने अपने बच्चों को शुरू से ही एक सामान्य जीवन देने की कोशिश की। उन्होंने उन्हें बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ाया और संगीत की दुनिया की चमक-दमक से दूर रखा। वह चाहते थे कि उनके बच्चे अपनी पसंद और योग्यता के अनुसार जीवन में आगे बढ़ें, न कि पिता की पहचान के दबाव में कोई रास्ता चुनें। रफी साहब की सादगी भी उतनी ही मशहूर थी जितनी उनकी गायकी। बताया जाता है कि वह रोज सुबह पांच बजे उठते थे और नियमित रूप से रियाज करते थे। उन्हें साधारण जीवन पसंद था और वह घर का बना खाना ही खाना पसंद करते थे। मीडिया से दूरी बनाए रखना भी उनकी आदतों में शामिल था। उनका मानना था कि वह एक आम इंसान हैं और उनके पास बताने के लिए कोई सनसनीखेज कहानी नहीं है। संगीत के इस महान सितारे का जीवन भले ही बेहद सफल रहा, लेकिन उनका व्यक्तिगत जीवन विनम्रता और अनुशासन से भरा हुआ था। यही कारण था कि उन्होंने अपने बच्चों पर कभी अपनी पहचान का बोझ नहीं डाला। उन्होंने उन्हें स्वतंत्र रूप से जीवन जीने और अपनी राह चुनने की आजादी दी। 31 जुलाई 1980 को मात्र 55 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से मोहम्मद रफी का निधन हो गया था। उनके निधन की खबर ने पूरे देश को शोक में डुबो दिया था। भारी बारिश के बावजूद हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे थे। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि रफी साहब केवल एक महान गायक ही नहीं, बल्कि करोड़ों दिलों की धड़कन थे। आज भी मोहम्मद रफी के गीत लोगों की जुबान पर हैं और उनकी आवाज संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित है। उनके बच्चों ने भले ही गायकी को पेशा नहीं बनाया, लेकिन रफी साहब की विरासत आज भी भारतीय संगीत जगत की सबसे अनमोल धरोहरों में गिनी जाती है।
दिल्ली के झुग्गी पुनर्वास पर बड़ा फैसला, 4 लाख परिवारों को मिलेगा सीधा लाभ; यमुना जल परियोजना पर राज्यों में बनी सहमति

नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास और शहरी विकास को लेकर केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम उठाया है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री Amit Shah की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में राजधानी के करीब 4 लाख परिवारों को लाभ पहुंचाने वाली व्यापक पुनर्वास योजना को मंजूरी देने की दिशा में सहमति बनी है। इस बैठक में दिल्ली के शहरी ढांचे को मजबूत करने और झुग्गी क्षेत्रों को व्यवस्थित आवासीय कॉलोनियों में बदलने पर विशेष जोर दिया गया। बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि नई पुनर्वास कॉलोनियों का विकास केवल आवास तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें आंगनवाड़ी केंद्र, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र, खेल मैदान और अन्य आवश्यक सामुदायिक सुविधाएं भी शामिल होंगी। इसका उद्देश्य पुनर्वासित परिवारों को बेहतर और संतुलित शहरी जीवन उपलब्ध कराना है। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि झुग्गी पुनर्वास नीति-2026 को जल्द अधिसूचित किया जाए ताकि प्रक्रिया को कानूनी और प्रशासनिक आधार मिल सके। इस उच्चस्तरीय बैठक में केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्री Manohar Lal Khattar, दिल्ली की मुख्यमंत्री Rekha Gupta तथा उपराज्यपाल T. S. Singh Sandhu भी मौजूद रहे। सभी पक्षों ने मिलकर पुनर्वास परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने और PPP मॉडल के तहत विकास कार्यों को लागू करने पर सहमति जताई। योजना के तहत DDA और DUSIB को निर्देश दिया गया है कि पांच झुग्गी क्लस्टरों के लिए 45 दिनों के भीतर टेंडर प्रक्रिया शुरू की जाए और 50 अतिरिक्त क्लस्टरों के लिए परियोजना रिपोर्ट तैयार की जाए। सरकार का लक्ष्य है कि पुनर्वास कार्यों में पारदर्शिता और गति दोनों सुनिश्चित की जाए, ताकि लंबे समय से लंबित परियोजनाओं को समय पर पूरा किया जा सके। बैठक में यमुना नदी के जल प्रबंधन और किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना पर भी अहम निर्णय लिया गया। छह राज्यों ने मिलकर इस परियोजना के क्रियान्वयन पर सहमति जताई है, जिससे दिल्ली सहित पूरे यमुना बेसिन क्षेत्र में जल आपूर्ति को मजबूत करने की उम्मीद है। विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश के जल हिस्से में से कुछ भाग दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराने पर सहमति बनी है, जिससे राजधानी में जल संकट को कम करने में मदद मिलेगी। सरकारी अधिकारियों का मानना है कि यह समग्र योजना दिल्ली के शहरी विकास और जल संसाधन प्रबंधन में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। आने वाले समय में इससे न केवल झुग्गी क्षेत्रों का पुनर्गठन होगा, बल्कि राजधानी के बुनियादी ढांचे में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिलेगा।