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हरियाली बनी बंजर जमीन, सोनीपत में फैक्ट्री के केमिकल ने उजाड़ा जंगल, प्रदूषण विभाग ने की बड़ी कार्रवाई

नई दिल्ली। हरियाणा के सोनीपत जिले से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले केमिकल युक्त पानी ने हजारों पेड़ों को बर्बाद कर दिया। यह मामला मुरथल इलाके के नांगल खुर्द क्षेत्र का बताया जा रहा है, जहां एक बीयर फैक्ट्री से निकला जहरीला पानी वन विभाग की जमीन तक पहुंच गया और देखते ही देखते हरे-भरे पेड़ सूखकर ठूंठ में बदल गए।

स्थानीय लोगों के अनुसार यह समस्या लंबे समय से बनी हुई थी, लेकिन समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के कारण हालात लगातार बिगड़ते गए। क्षेत्र में जहां-जहां फैक्ट्री का दूषित पानी पहुंचा, वहां की हरियाली पूरी तरह खत्म होती नजर आई। पेड़ों की शाखाएं सूख चुकी हैं और जमीन बंजर जैसी दिखाई देने लगी है। वहीं जिन हिस्सों तक यह जहरीला पानी नहीं पहुंच पाया, वहां अब भी हरियाली सामान्य रूप से मौजूद है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि पेड़ों के सूखने की मुख्य वजह केमिकल युक्त पानी ही है।

स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि आसपास संचालित फैक्ट्रियों से निकलने वाला दूषित पानी लगातार जमीन में छोड़ा जा रहा था, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा बल्कि भूजल की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि इस पानी के कारण मवेशियों की तबीयत खराब हो रही है और लोगों में गंभीर बीमारियों को लेकर डर बढ़ता जा रहा है। कई लोगों ने यह भी आशंका जताई कि अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले समय में स्वास्थ्य संकट और गहरा सकता है।

मामले के सामने आने और पेड़ों के बड़े पैमाने पर सूखने की पुष्टि होने के बाद प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने कार्रवाई शुरू की। जांच के दौरान यह पाया गया कि एक बीयर फैक्ट्री की दीवार के नीचे से केमिकल युक्त पानी वन क्षेत्र की ओर जा रहा था। इसके बाद विभाग ने फैक्ट्री के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए उस पर 39 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और इकाई को तत्काल प्रभाव से सील कर दिया।

इस कार्रवाई के बाद क्षेत्र में प्रशासनिक लापरवाही और निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते निरीक्षण और रोकथाम की कार्रवाई होती तो हजारों पेड़ों को बचाया जा सकता था। पर्यावरण विशेषज्ञ भी मानते हैं कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट का सही तरीके से निस्तारण नहीं होने पर इसका असर मिट्टी, जल और जैव विविधता पर लंबे समय तक पड़ता है।

पूरे मामले ने एक बार फिर औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती को सामने ला दिया है। तेजी से बढ़ते औद्योगिक क्षेत्रों में यदि प्रदूषण नियंत्रण नियमों का सख्ती से पालन नहीं कराया गया तो आने वाले समय में ऐसे मामले और गंभीर रूप ले सकते हैं। फिलहाल प्रशासन की कार्रवाई के बाद स्थानीय लोग उम्मीद कर रहे हैं कि क्षेत्र में प्रदूषण पर नियंत्रण होगा और पर्यावरण को दोबारा सुरक्षित बनाने के प्रयास तेज किए जाएंगे।

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