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पश्चिम एशिया तनाव का असर: Silver में 5,000 रुपये से ज्यादा की तेजी, कीमती धातुओं में उछाल

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच गुरुवार को घरेलू कमोडिटी बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में तेजी देखने को मिली। Multi Commodity Exchange of India (एमसीएक्स) पर शुरुआती कारोबार में सोने में हल्की गिरावट दिखी, लेकिन बाद में इसमें मजबूती लौट आई। वहीं चांदी ने शुरुआती कमजोरी से उबरते हुए तेज उछाल दर्ज किया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार निचले स्तर पर मजबूत खरीदारी के कारण चांदी में यह तेजी देखने को मिली। सोने की कीमतों में हल्की बढ़तखबर लिखे जाने तक दोपहर करीब 1:36 बजे एमसीएक्स पर अप्रैल डिलीवरी वाला सोना 361 रुपये यानी 0.22 प्रतिशत की तेजी के साथ 1,62,150 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार करता नजर आया। सोने ने दिन की शुरुआत 1,62,799 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर से की थी, जो पिछले बंद भाव 1,61,789 रुपये से ज्यादा था। हालांकि बाद में वैश्विक बाजार से कमजोर संकेत मिलने के कारण इसकी कीमतों में कुछ गिरावट भी देखी गई। मांग क्षेत्र बना 1.56–1.57 लाख का स्तरविशेषज्ञों का मानना है कि 1,56,000 से 1,57,000 रुपये का स्तर सोने के लिए मजबूत मांग क्षेत्र बना हुआ है। विश्लेषकों के अनुसार यदि कीमतें इस स्तर से ऊपर बनी रहती हैं, तो मध्यम अवधि में सोने का तेजी वाला रुझान बरकरार रह सकता है। अगर सोना 1,65,000 रुपये के स्तर से ऊपर मजबूती से निकलता है, तो आगे चलकर 1,75,000 से 1,80,000 रुपये तक नई तेजी देखने को मिल सकती है। चांदी में 5,900 रुपये से ज्यादा का उछालदूसरी ओर चांदी की कीमतों में सत्र के दौरान मजबूत तेजी दर्ज की गई। एमसीएक्स पर मई डिलीवरी वाली चांदी 5,911 रुपये यानी 2.20 प्रतिशत की बढ़त के साथ 2,74,402 रुपये प्रति किलोग्राम पर कारोबार करती नजर आई। चांदी ने 2,69,212 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर कारोबार की शुरुआत की थी, जो इसके पिछले बंद भाव 2,68,491 रुपये से थोड़ा ज्यादा था। दिन के दौरान मजबूत खरीदारी के कारण इसकी कीमतों में तेजी और बढ़ गई। वैश्विक बाजार में मिला-जुला रुखवैश्विक बाजार में हालांकि सोने की कीमतों में हल्की गिरावट देखने को मिली। स्पॉट गोल्ड लगभग 0.2 प्रतिशत गिरकर 5,165.73 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स भी करीब 0.2 प्रतिशत गिरकर 5,171.40 डॉलर प्रति औंस पर रहे। वहीं स्पॉट सिल्वर लगभग स्थिर रहकर 85.82 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार करता दिखा। पश्चिम एशिया तनाव का असरबाजार विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। ऐसे समय में निवेशक अक्सर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं, जिससे सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं की मांग बढ़ जाती है। पिछले कुछ दिनों में इसी वजह से इन धातुओं की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। तेल और डॉलर के कारण कमजोर हुआ रुपयाइसी बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और डॉलर की मजबूती के कारण भारतीय मुद्रा Indian Rupee भी दबाव में आ गई। गुरुवार को रुपया अमेरिकी मुद्रा United States Dollar के मुकाबले करीब 0.3 प्रतिशत गिरकर 92.3575 के स्तर पर पहुंच गया, जो अब तक का रिकॉर्ड निचला स्तर है। इससे पहले इसी सप्ताह रुपया 92.3475 के स्तर तक गिरा था, जिसे गुरुवार को पार कर दिया गया।

सोने-चांदी के दामों में गिरावट, महंगाई और युद्ध ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई

नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर बढ़ती महंगाई और मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष ने भारत में सोना और चांदी के बाजार को प्रभावित किया है। आज सुबह 9:15 बजे के आसपास एमसीएक्स पर अप्रैल वायदा सोना 0.10% गिरकर ₹1,61,660 प्रति 10 ग्राम पर आ गया, जबकि चांदी मई वायदा 0.57% की गिरावट के साथ ₹2,66,969 प्रति किलोग्राम पर थी। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों ने ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों को कमजोर किया है, जिससे डॉलर मजबूत हुआ और सोने पर दबाव बढ़ गया। ब्लूमबर्ग के अनुसार सिंगापुर में सुबह 8:05 बजे सोने की कीमत 0.9% गिरकर $5,132.76 प्रति औंस और चांदी 1.5% गिरकर $84.44 प्रति औंस पर आ गई। इसी दौरान प्लैटिनम में 1% और पैलेडियम में 0.8% की गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञ हेबे चेन के मुताबिक, सोने की गिरावट को “हार मानने” की तरह नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि यह एक “अस्थायी ठहराव” है। उन्होंने कहा कि बढ़ती महंगाई और मजबूत डॉलर ने फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों में कटौती की संभावनाओं को टाल दिया है, जिसके चलते निवेशक फिलहाल सोने से किनारा कर रहे हैं। सोने का यह गिरना निवेशकों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह अभी भी सुरक्षित निवेश के रूप में लोकप्रिय है। हालांकि, ब्याज दरों की बढ़ोतरी और वैश्विक तनाव के कारण सोने में तत्काल लाभ की संभावना कम हो गई है। एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETF) में भी युद्ध के बाद सोने की मात्रा में गिरावट आई है, हालांकि पिछले सप्ताह इसमें कुछ निवेश दर्ज किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि सोने का सुरक्षित निवेश का दौर खत्म नहीं हुआ है। इस साल अब तक सोने की कीमतों में लगभग 20% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के समय यह निवेशकों को भरोसा देता रहा है। चेन का कहना है कि फिलहाल सोने की रफ्तार थमी हुई है, लेकिन यह सिर्फ एक “सांस लेने” का दौर है, और लंबी अवधि में इसका महत्व बरकरार रहेगा। कीवर्ड्स: सोना, चांदी, महंगाई, डॉलर मजबूती, युद्ध

1 अप्रैल से महंगी होंगी Audi की गाड़ियां, कंपनी ने 2% तक बढ़ाई कीमतें

नई दिल्ली। भारत के लग्जरी कार बाजार में एक बार फिर कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। जर्मन लग्जरी कार निर्माता Audi की भारतीय इकाई Audi India ने गुरुवार को अपनी गाड़ियों की कीमतों में 2 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी करने की घोषणा की। कंपनी के अनुसार नई कीमतें 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगी और यह वृद्धि भारत में बिकने वाले सभी मॉडलों के एक्स-शोरूम दामों पर लागू होगी। कंपनी का कहना है कि हाल के महीनों में बढ़ती इनपुट लागत और मुद्रा दरों में उतार-चढ़ाव के कारण उत्पादन और संचालन की लागत बढ़ गई है, जिसके चलते यह फैसला लिया गया है। कंपनी ने ग्राहकों पर असर कम रखने की कोशिश कीऑडी इंडिया के ब्रांड निदेशक Balbir Singh Dhillon ने कहा कि कंपनी ने कीमतों में बढ़ोतरी का निर्णय काफी सोच-समझकर लिया है और कोशिश की गई है कि ग्राहकों पर इसका असर न्यूनतम रहे। उन्होंने कहा कि हाल ही में कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में अस्थिरता के कारण कंपनी की लागत बढ़ी है। ऐसे में कीमतों में सीमित बढ़ोतरी करना आवश्यक हो गया था। ढिल्लों ने भरोसा दिलाया कि कंपनी अपने ग्राहकों को बेहतर प्रोडक्ट और प्रीमियम अनुभव देने के लिए प्रतिबद्ध है और आगे भी गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। कई लोकप्रिय सेडान और एसयूवी मॉडल भारत में उपलब्धभारत में ऑडी की कई लग्जरी सेडान और एसयूवी मॉडल काफी लोकप्रिय हैं। कंपनी देश में प्रीमियम सेडान और एसयूवी सेगमेंट में कई विकल्प उपलब्ध कराती है। इनमें Audi A4, Audi A6 जैसी सेडान और Audi Q3, Audi Q5, Audi Q7 और Audi Q8 जैसी एसयूवी शामिल हैं। कीमतों में बढ़ोतरी इन सभी मॉडलों के एक्स-शोरूम दामों पर लागू होगी। हालांकि कंपनी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि अलग-अलग मॉडल के हिसाब से कीमतों में कितनी वृद्धि होगी, लेकिन अधिकतम बढ़ोतरी 2 प्रतिशत तक हो सकती है। अन्य लग्जरी कार कंपनियां भी बढ़ा सकती हैं कीमतेंऑडी इंडिया के इस फैसले के बाद ऑटो सेक्टर में यह चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले समय में अन्य लग्जरी कार निर्माता कंपनियां भी कीमतों में बढ़ोतरी कर सकती हैं। आमतौर पर जब किसी बड़े ब्रांड की ओर से कीमतों में संशोधन किया जाता है, तो अन्य कंपनियां भी लागत बढ़ने का हवाला देकर इसी तरह के कदम उठा सकती हैं। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि आने वाले महीनों में लग्जरी कार सेगमेंट में कीमतों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। बिक्री और प्री-ओन्ड कार कारोबार में भी मजबूतीऑडी इंडिया के प्रदर्शन की बात करें तो कंपनी ने पिछले साल जनवरी से जून की अवधि में भारत में 2,128 यूनिट्स की बिक्री दर्ज की थी। इसके अलावा कंपनी का प्री-ओन्ड कार कारोबार भी लगातार मजबूत हो रहा है। ऑडी के ‘ऑडी अप्रूव्ड: प्लस’ कार्यक्रम के तहत बेची जाने वाली प्रमाणित प्री-ओन्ड कारों की मांग में भी अच्छी बढ़ोतरी देखी गई है। कंपनी के अनुसार इस सेगमेंट में जनवरी-जून अवधि के दौरान करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। देश में प्री-ओन्ड कार नेटवर्क का विस्तारऑडी इंडिया अपने प्री-ओन्ड कार कारोबार को भी लगातार विस्तार दे रही है। फिलहाल देशभर में कंपनी के 26 प्री-ओन्ड कार शोरूम मौजूद हैं। कंपनी की योजना इस नेटवर्क को और मजबूत करने की है ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों तक प्रमाणित प्री-ओन्ड लग्जरी कारों की सुविधा पहुंचाई जा सके। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में लग्जरी कारों का बाजार धीरे-धीरे विस्तार कर रहा है और प्री-ओन्ड कार सेगमेंट भी इस वृद्धि में अहम भूमिका निभा रहा है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद ऑडी जैसे प्रीमियम ब्रांड के लिए भारतीय बाजार में मांग बनी रहने की संभावना है।

वैश्विक संकट के बीच भी भारत की तेज रफ्तार, FY27 में 7% विकास दर की उम्मीद

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रह सकती है। जापान के दिग्गज निवेश बैंक Nomura ने अपने ताजा आकलन में कहा है कि वित्त वर्ष 2027 में भारतीय अर्थव्यवस्था करीब 7 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। हालांकि बैंक ने यह भी कहा कि यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबा खिंचता है तो यह भारत के आर्थिक संतुलन की परीक्षा ले सकता है। इसके बावजूद मजबूत घरेलू मांग और संरचनात्मक सुधारों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती बनी रहने की संभावना जताई गई है। भारत के ‘गोल्डीलॉक्स पीरियड’ की हो सकती है परीक्षानोमुरा के मुताबिक वर्तमान समय भारत के लिए तथाकथित “गोल्डीलॉक्स पीरियड” जैसा है। अर्थशास्त्र में Goldilocks Economy उस स्थिति को कहा जाता है जब आर्थिक वृद्धि दर मजबूत होती है और महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित रहती है। अगर पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है और ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आता है, तो यह संतुलन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में भारत की आर्थिक नीतियों और घरेलू मांग की मजबूती की असली परीक्षा होगी। जीडीपी, महंगाई और चालू खाते के अनुमान में बदलावनोमुरा की भारत और एशिया (जापान को छोड़कर) की मुख्य अर्थशास्त्री Sonal Varma ने अर्थशास्त्री Aurodeep Nandi के साथ मिलकर जारी रिपोर्ट में कहा कि वित्त वर्ष 2027 के लिए कुछ प्रमुख आर्थिक संकेतकों के अनुमान में बदलाव किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार चालू खाते के घाटे यानी Current Account Deficit (सीएडी) के अनुमान को 0.4 प्रतिशत बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद का 1.6 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी Consumer Price Index आधारित महंगाई का अनुमान 0.7 प्रतिशत बढ़ाकर 4.5 प्रतिशत कर दिया गया है। हालांकि जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को मामूली रूप से 0.1 प्रतिशत घटाकर 7 प्रतिशत किया गया है। घरेलू खपत और उद्योग में बनी रह सकती है रफ्तारनोमुरा के अनुसार 2026 की पहली तिमाही के शुरुआती संकेत बताते हैं कि भारत में उपभोग और औद्योगिक गतिविधियों में गति बनी रह सकती है। हालांकि निर्यात और सरकारी खर्च में कुछ कमजोरी देखने को मिल सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने का जोखिम बना हुआ है, खासकर प्राकृतिक गैस की संभावित कमी घरेलू उद्योग और सेवा क्षेत्र की गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है। नीतिगत सुधार और वेतन वृद्धि से मिलेगा सहारारिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत की अर्थव्यवस्था को कई सकारात्मक कारकों से समर्थन मिल रहा है। इनमें पिछली नीतिगत ढील, संरचनात्मक सुधार, वेतन वृद्धि और वैश्विक व्यापार संबंधों में सुधार शामिल हैं। खास तौर पर अमेरिका के साथ व्यापार तनाव में कमी से भारत के लिए नए अवसर बन सकते हैं। इन कारकों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय सुधार देखने को मिल सकता है और विकास की रफ्तार बरकरार रह सकती है। ऊर्जा कीमतों से बढ़ सकता है महंगाई का दबावनोमुरा ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतें एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई का दबाव बढ़ा सकती हैं। फिलहाल कई एशियाई देशों में महंगाई अपेक्षाकृत कम स्तर पर है, लेकिन कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेजी से स्थिति बदल सकती है। ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है असररिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक मौद्रिक नीति पर भी पड़ सकता है। ऐसे हालात में कई केंद्रीय बैंक फिलहाल अपनी नीति दरों को स्थिर रख सकते हैं, लेकिन अगर महंगाई का दबाव बढ़ता है तो भविष्य में ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना भी बन सकती है। ऐसे में वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में आने वाले महीनों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

मिडिल ईस्ट संकट गहराया, Crude Oil की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पार

नई दिल्ली।मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया और कीमतें फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष और तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के कारण निवेशकों में चिंता बढ़ गई है, जिसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ा है। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई में तेज उछालअंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude की कीमत 9 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 100.76 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। वहीं अमेरिकी मानक कच्चे तेल WTI Crude का भाव भी करीब 9 प्रतिशत की तेजी के साथ लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता नजर आया। तेल बाजार में इस तेज उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। आईईए ने इमरजेंसी रिजर्व से तेल जारी करने का फैसलाकच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए International Energy Agency (आईईए) ने बड़ा कदम उठाया है। 32 सदस्य देशों वाले इस संगठन ने अपने आपातकालीन भंडार से 400 मिलियन बैरल कच्चा तेल जारी करने की घोषणा की है। यह आईईए के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा इमरजेंसी रिलीज माना जा रहा है। इसका उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों में तेजी को कुछ हद तक नियंत्रित करना है। अमेरिका ने भी रणनीतिक भंडार से तेल जारी करने की घोषणा कीआईईए के फैसले के अलावा United States Department of Energy ने भी अलग से बड़ा ऐलान किया है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने अपने Strategic Petroleum Reserve से 172 मिलियन बैरल तेल जारी करने की घोषणा की है। अमेरिकी ऊर्जा सचिव Chris Wright के अनुसार इस तेल की आपूर्ति अगले सप्ताह से शुरू हो सकती है और इसे पूरा होने में लगभग 120 दिन का समय लग सकता है। पहले भी 119 डॉलर तक पहुंच चुका है कच्चा तेलविशेषज्ञों के अनुसार हाल के दिनों में मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के कारण कच्चे तेल की कीमतें पहले भी तेजी से बढ़ी थीं और एक समय यह 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। हालांकि बाद में बाजार में कुछ स्थिरता आने के बाद कीमतें गिरकर लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक आ गई थीं। लेकिन मौजूदा हालात ने फिर से बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का केंद्रतेल बाजार में तेजी की एक बड़ी वजह Strait of Hormuz में बढ़ता तनाव भी है। यह मध्य पूर्व का एक संकरा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया में उत्पादित होने वाले करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार होता है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। तेल टैंकरों पर हमलों से बढ़ी चिंतामध्य पूर्व में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण स्थिति और गंभीर हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तेल टैंकरों को भी निशाना बनाया जा रहा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ गया है। यही कारण है कि निवेशकों और ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है और कच्चे तेल की कीमतों में फिर से तेज उछाल देखने को मिल रहा है।

मिडिल ईस्ट तनाव का भारतीय बाजार पर असर, BSE Sensex में एक फीसदी से ज्यादा गिरावट

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष का असर गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। कारोबारी सत्र की शुरुआत में ही बाजार दबाव में नजर आया और प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ खुले। सुबह करीब 9:19 बजे BSE Sensex 963 अंक यानी लगभग 1.25 प्रतिशत गिरकर 75,899 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। वहीं Nifty 50 303 अंक यानी करीब 1.27 प्रतिशत फिसलकर 23,563 के स्तर पर पहुंच गया। वैश्विक अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के कारण निवेशकों में सतर्कता का माहौल देखने को मिला। कई सेक्टरों में दिखा भारी दबावशुरुआती कारोबार में बाजार के लगभग सभी सेक्टरों में गिरावट देखी गई। ऑटो, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, मीडिया, रियल्टी, मेटल, पीएसयू बैंक, डिफेंस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के शेयरों पर सबसे अधिक दबाव रहा। निवेशकों ने जोखिम से बचने की रणनीति अपनाते हुए कई सेक्टरों में मुनाफावसूली की। इस वजह से बाजार का मूड नकारात्मक बना रहा और प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बने रहे। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर भी दबाव मेंकेवल लार्जकैप ही नहीं बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी गिरावट का असर देखा गया। Nifty Midcap 100 इंडेक्स करीब 1,070 अंक यानी 1.90 प्रतिशत की गिरावट के साथ 55,390 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। वहीं Nifty Smallcap 100 इंडेक्स लगभग 286 अंक यानी 1.75 प्रतिशत गिरकर 16,127 पर पहुंच गया। इससे साफ है कि बाजार में बिकवाली का दबाव व्यापक स्तर पर देखने को मिला। सेंसेक्स के कई बड़े शेयरों में गिरावटसेंसेक्स पैक के कई बड़े शेयर शुरुआती कारोबार में नुकसान में दिखाई दिए। इनमें प्रमुख रूप से Mahindra & Mahindra, Tata Steel, ICICI Bank, Titan Company, Larsen & Toubro, Maruti Suzuki, Bajaj Finance, State Bank of India, Axis Bank, Infosys और HDFC Bank जैसे शेयर शामिल रहे। दूसरी ओर आईटी सेक्टर के कुछ शेयरों में मजबूती देखने को मिली, जहां Tech Mahindra और HCLTech हल्की बढ़त के साथ कारोबार करते नजर आए। एशियाई और अमेरिकी बाजारों से भी मिला कमजोर संकेतवैश्विक बाजारों से भी कमजोर संकेत मिले हैं। एशिया के कई प्रमुख शेयर बाजार जैसे Nikkei 225, Shanghai Composite, Hang Seng Index और KOSPI भी गिरावट के साथ खुले। वहीं अमेरिका में भी पिछला कारोबारी सत्र कमजोर रहा, जहां Dow Jones Industrial Average लाल निशान में बंद हुआ था। इन वैश्विक संकेतों का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछालबाजार में गिरावट की एक बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी भी है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। खबर लिखे जाने तक Brent Crude लगभग 9.31 प्रतिशत की तेजी के साथ 100.54 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया था, जबकि WTI Crude भी करीब 9 प्रतिशत की बढ़त के साथ 95.14 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था। एफआईआई की बिकवाली से बढ़ा दबावबाजार पर विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव भी बना हुआ है। बुधवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 6,267.31 करोड़ रुपये की निकासी की। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार को कुछ सहारा देते हुए लगभग 4,965.53 करोड़ रुपये का निवेश किया। इसके बावजूद वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशकों की सतर्कता के कारण बाजार में गिरावट का रुख बना रहा।

बढ़ती डिमांड से मार्केट में कमी, Induction Cooktop क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर हुए आउट ऑफ स्टॉक

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत के घरेलू बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। संभावित एलपीजी आपूर्ति बाधा की आशंका के बीच देशभर में इलेक्ट्रिक इंडक्शन चूल्हों की मांग अचानक तेजी से बढ़ गई है। उपभोक्ता भविष्य में गैस सिलेंडर की कमी या कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका के चलते वैकल्पिक कुकिंग विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी कारण कई शहरों में इंडक्शन चूल्हों की खरीदारी तेजी से बढ़ गई है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इनकी उपलब्धता कम हो गई है। क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर खत्म हुआ स्टॉकतेजी से बढ़ती मांग का असर क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर साफ देखा जा रहा है। कई शहरों में Blinkit, Zepto, Swiggy Instamart और BigBasket जैसे प्लेटफॉर्म पर इंडक्शन चूल्हे “आउट ऑफ स्टॉक” हो गए हैं। आमतौर पर ये प्लेटफॉर्म कुछ ही मिनटों में डिलीवरी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अचानक बढ़ी मांग के कारण इनके पास उपलब्ध स्टॉक तेजी से खत्म हो गया। इससे साफ है कि उपभोक्ता गैस के विकल्प के रूप में इलेक्ट्रिक कुकिंग उपकरणों को तेजी से अपना रहे हैं। ई-कॉमर्स साइट्स पर भी ऑर्डर में भारी उछालसिर्फ क्विक-कॉमर्स ही नहीं बल्कि बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी इंडक्शन चूल्हों की मांग तेजी से बढ़ी है। Amazon और Flipkart जैसी कंपनियों ने भी बिक्री में भारी बढ़ोतरी की पुष्टि की है। अमेजन इंडिया के एक प्रवक्ता के अनुसार पिछले दो दिनों में इंडक्शन चूल्हों की बिक्री में 30 गुना से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके अलावा राइस कुकर और इलेक्ट्रिक प्रेशर कुकर जैसे उपकरणों की मांग भी सामान्य से लगभग चार गुना ज्यादा हो गई है, जबकि एयर फ्रायर और मल्टी-यूज इलेक्ट्रिक केतली की बिक्री लगभग दोगुनी हो गई है। कई राज्यों में अचानक बढ़ी मांगफ्लिपकार्ट के मुताबिक पिछले चार से पांच दिनों में इंडक्शन चूल्हों की बिक्री में लगभग चार गुना वृद्धि हुई है। कंपनी ने बताया कि दिल्ली, कोलकाता और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में मांग विशेष रूप से तेज रही है। इन इलाकों में उपभोक्ता भविष्य में गैस की कीमतों में संभावित उतार-चढ़ाव और आपूर्ति में कमी की आशंका के चलते वैकल्पिक कुकिंग विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। गैस आपूर्ति को लेकर बढ़ी चिंतामांग में आया यह उछाल इस बात का संकेत है कि घरों और छोटे व्यवसायों में एलपीजी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ रही है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। यही वजह है कि कई लोग पहले से ही इलेक्ट्रिक कुकिंग उपकरण खरीदकर खुद को संभावित संकट के लिए तैयार करना चाहते हैं। जरूरी संस्थानों को प्राथमिकता देने की तैयारीरिपोर्ट के अनुसार तेल विपणन कंपनियों ने एलपीजी वितरकों से अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों जैसे आवश्यक संस्थानों को गैस आपूर्ति में प्राथमिकता देने का अनुरोध किया है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार और ऊर्जा कंपनियां आपूर्ति की स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं और आवश्यक सेवाओं को प्रभावित होने से बचाने के लिए पहले से कदम उठा रही हैं। सरकार ने बढ़ाया एलपीजी उत्पादनइस बीच Ministry of Petroleum and Natural Gas ने घरेलू एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं। मंत्रालय के अनुसार सरकार ने देश में एलपीजी उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि की है और इसे घरेलू उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए निर्देशित किया गया है। इसके अलावा 8 मार्च को जारी आदेश में रिफाइनरियों और पेट्रोकेमिकल कंपनियों को एलपीजी उत्पादन को अधिकतम करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि संभावित आपूर्ति संकट की स्थिति में भी उपभोक्ताओं को कुकिंग गैस की कमी का सामना न करना पड़े।

रसोई से कारोबार तक असर: एमपी में LPG की भारी कमी, सिर्फ इमरजेंसी सेवाओं को सप्लाई

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में एलपीजी गैस की कमी अब आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगी है। पिछले तीन दिनों से प्रदेश में कमर्शियल गैस सिलेंडरों की सप्लाई लगभग ठप पड़ी है, जबकि घरेलू सिलेंडर के लिए भी लोगों को 5 से 7 दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है। ऑयल कंपनियों के अनुसार फिलहाल प्रदेश में सिर्फ करीब 15 प्रतिशत एलपीजी ही उपलब्ध है, जिसे प्राथमिकता के आधार पर इमरजेंसी सेवाओं और घरेलू उपयोग के लिए रखा गया है। ऐसे में गुरुवार से प्रदेश में गैस संकट और गहराने की आशंका जताई जा रही है। कमर्शियल गैस की सीमित सप्लाई के कारण अब सिलेंडर केवल अस्पतालों, सेना और पुलिस की कैंटीन, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट और बस स्टैंड की कैंटीन जैसे जरूरी स्थानों को ही दिए जाएंगे। इसके लिए खाद्य विभाग को जरूरत के हिसाब से ऑयल कंपनियों को सूची भेजनी होगी। दूसरी ओर होटल, रेस्टोरेंट, मैरिज गार्डन और छोटे कारोबारियों को फिलहाल कमर्शियल गैस नहीं मिल सकेगी। इससे खानपान और अन्य व्यवसायों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना है। राजधानी भोपाल में होटल और रेस्टोरेंट संचालकों की चिंता बढ़ गई है। भोपाल होटल एसोसिएशन के अनुसार शहर में करीब डेढ़ हजार होटल और रेस्टोरेंट हैं, जहां रोजाना दो से ढाई हजार कमर्शियल सिलेंडर की खपत होती है। जिन संस्थानों के पास कुछ स्टॉक बचा है, वे अधिकतम 48 घंटे तक ही काम चला पाएंगे। इसके बाद गैस सप्लाई नहीं मिलने पर कई होटल और रेस्टोरेंट बंद करने की नौबत आ सकती है। होटल संचालकों ने सरकार से कमर्शियल गैस की आपूर्ति बहाल करने की मांग की है। सरकारी स्तर पर घरेलू गैस की सप्लाई सामान्य होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर और जबलपुर समेत कई शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें देखी जा रही हैं। राजधानी के कई इलाकों में लोगों को सिलेंडर बुकिंग के बाद कई दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। कुछ जगहों पर लोगों के बीच सिलेंडर को लेकर भाग-दौड़ की स्थिति भी बनी है। इस बीच अधिकारियों का कहना है कि अब एक सिलेंडर की बुकिंग के बाद अगली बुकिंग करीब 25 दिन बाद ही की जा सकेगी। साथ ही सर्वर की तकनीकी समस्या और कुछ लोगों द्वारा अतिरिक्त सिलेंडर जमा करने की वजह से भी एजेंसियों के बाहर भीड़ बढ़ रही है। गैस संकट का असर शादी समारोहों पर भी पड़ सकता है। मार्च महीने में प्रदेश में करीब 20 हजार से ज्यादा शादियां होने वाली हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर कमर्शियल गैस सिलेंडर का इस्तेमाल होता है। पिछले तीन दिनों से सिलेंडर नहीं मिलने के कारण कैटरिंग और भोजन व्यवस्था करने वालों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उधर अंतरराष्ट्रीय हालात का असर भोपाल के बाजारों में भी दिखाई देने लगा है। व्यापारियों के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कई खाद्य वस्तुओं और ड्राई फ्रूट्स के दाम बढ़ गए हैं। दालों की कीमतों में तेजी आई है, जबकि मिर्च और धनिया जैसे मसाले भी महंगे हुए हैं। पिस्ता, अंजीर और केसर जैसे ड्राई फ्रूट्स की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है क्योंकि इनका आयात बड़े पैमाने पर ईरान के रास्ते होता है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर पैकेजिंग उद्योग पर भी पड़ा है। प्लास्टिक और पैकेजिंग से जुड़े सामानों के दामों में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी बताई जा रही है। वहीं खाद्य तेल के बाजार में भी तेजी देखी जा रही है। सोयाबीन तेल की कीमतों में पिछले पंद्रह दिनों में लगभग 14 रुपए प्रति किलो तक वृद्धि हुई है, जबकि मूंगफली तेल के 15 लीटर जार की कीमत भी तेजी से बढ़ी है। इधर गैस और जरूरी वस्तुओं की जमाखोरी रोकने के लिए केंद्र सरकार ने देशभर में आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 को लागू कर दिया है। इसके तहत गैस की सप्लाई को चार अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर वितरण की व्यवस्था की जा रही है, ताकि जरूरी सेवाओं और घरेलू उपयोग के लिए गैस की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। प्रदेश सरकार ने लोगों से घबराने की बजाय अधिकृत जानकारी पर भरोसा करने की अपील की है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी पेट्रोल, डीजल और गैस की उपलब्धता पर लगातार निगरानी रखने के निर्देश अधिकारियों को दिए हैं।

Agricultural loans India: देश में 7.72 करोड़ से अधिक किसान क्रेडिट कार्ड सक्रिय, बकाया लोन 10 लाख करोड़ रुपए से अधिक

   Agricultural loans India: नई दिल्ली। देश में 7.72 करोड़ से ज्यादा किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) सक्रिय हैं और इनमें बकाया लोन 10.2 लाख करोड़ रुपए के करीब है। यह जानकारी बुधवार को आधिकारिक फैक्टशीट में दी गई। सरकारी बयान में कहा गया कि केसीसी प्लेटफॉर्म से 457 बैंक जुड़े हुए हैं और इस पर 1,998.7 लाख से ज्यादा क्रेडिट एप्लीकेशन प्रोसेस की गई हैं, जिसमें से 631.5 लाख कमर्शियल बैंकों, 337.2 लाख रीजनल बैंकों और 1,030 लाख एप्लीकेशन कॉरपोरेटिव बैंकों द्वारा प्रोसेस की गई हैं। ये आंकड़े केसीसी के कार्यान्वयन में व्यापक संस्थागत भागीदारी को दर्शाते हैं और कृषि ऋण प्रदान करने में सहकारी बैंकों की केंद्रीय भूमिका को उजागर करते हैं। हालिया सुधारों, जिनमें ऋण सीमा में वृद्धि, संबद्ध क्षेत्रों तक विस्तारित कवरेज और किसान ऋण पोर्टल के माध्यम से डिजिटल एकीकरण शामिल हैं, ने केसीसी की पहुंच और पारदर्शिता में मजबूत सुधार किया है। आंकड़ों पर आधारित निगरानी को सक्षम बनाकर, ऋण प्रक्रिया को तेज करके और पारदर्शी दावा निपटान सुनिश्चित करके, इन उपायों ने कृषि ऋण वितरण की परिचालन दक्षता को मजबूत किया है। सरकार ने संशोधित ब्याज सब्सिडी योजना के तहत फसल ऋण सीमा को 3 लाख रुपए से बढ़ाकर 5 लाख रुपए कर दिया है और मत्स्य पालन और संबद्ध गतिविधियों के लिए ऋण सीमा को 2 लाख रुपए से बढ़ाकर 5 लाख रुपए कर दिया है। किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के तहत, सीमांत और गैर-सीमांत किसानों के लिए उनकी भूमि जोत के आकार, निवेश क्षमता और आजीविका आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, सावधि ऋण और समग्र ऋण सीमाएं अलग-अलग निर्धारित की गई हैं। भूमि जोत के आकार और फसल पैटर्न जैसे कारकों के आधार पर 10,000 रुपए से 50,000 रुपए तक की लचीली सीमा स्वीकृत की जा सकती है। समग्र केसीसी सीमा पांच साल की अवधि के लिए निर्धारित की जाएगी। किसानों को संस्थागत ऋण से जोड़ने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने और उनकी पहुंच में सुधार लाने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड के तहत कई सुगम उपाय लागू किए गए हैं।

भारत का डिजिटल पेमेंट मॉडल दुनिया के विकासशील देशों के लिए बना मिसाल: रिपोर्ट

नई दिल्ली। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत ने आधुनिक इतिहास में सबसे महत्वाकांक्षी फिनटेक (फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी) परिवर्तन में से एक को अंजाम दिया है, जिसकी बदौलत देश आज दुनिया के सबसे उन्नत डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में से एक बन गया है। यह मॉडल अब अन्य विकासशील देशों के लिए भी एक उदाहरण बन रहा है।अजरबैजान स्थित न्यूज डॉट एजेड की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का मॉडल दिखाता है कि सरकारी नीतियां, तकनीकी नवाचार और व्यापक मोबाइल कनेक्टिविटी मिलकर किस तरह एक प्रभावी भुगतान ढांचा तैयार कर सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की डिजिटल पेमेंट क्रांति ने वैश्विक स्तर पर काफी ध्यान आकर्षित किया है। अर्थशास्त्री और तकनीकी विशेषज्ञ इसे अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक सफल मॉडल के रूप में अध्ययन कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल पहचान प्रणाली, तेजी से बढ़ती मोबाइल कनेक्टिविटी, आधुनिक पेमेंट प्लेटफॉर्म और सरकार की सहायक नीतियों के संयोजन ने दुनिया के सबसे बड़े और कुशल डिजिटल इकोसिस्टम में से एक को जन्म दिया है। रिपोर्ट में सरकार की योजनाओं की सराहना करते हुए कहा गया कि वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने और लाखों लोगों को डिजिटल पहचान उपलब्ध कराने वाले सरकारी कार्यक्रमों ने इस व्यवस्था की मजबूत नींव तैयार की। साथ ही सस्ते स्मार्टफोन और तेजी से बढ़ती मोबाइल इंटरनेट सेवाओं ने डिजिटल भुगतान को बड़े पैमाने पर अपनाने में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा प्रधानमंत्री वाई-फाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफेस (पीएम-वानी) कार्यक्रम के जरिए सार्वजनिक इंटरनेट सुविधाओं का भी विस्तार हुआ है। फरवरी 2026 तक इस पहल के तहत 4,09,111 वाई-फाई हॉटस्पॉट स्थापित किए जा चुके हैं, जिन्हें 207 PDO एग्रीगेटर और 113 ऐप प्रदाता सपोर्ट कर रहे हैं। इसका उद्देश्य खासतौर पर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सस्ती और तेज इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना है। इन सभी विकासों ने बड़े स्तर पर डिजिटल वित्तीय सेवाओं के विस्तार के लिए जरूरी माहौल तैयार किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल पहचान को बैंकिंग और मोबाइल सेवाओं से जोड़ने से वित्तीय संस्थान उपयोगकर्ताओं की पहचान सुरक्षित तरीके से सत्यापित कर सकते हैं और लेनदेन को तेजी से प्रोसेस कर सकते हैं। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने नकदी पर निर्भरता कम करने में भी मदद की है, जिससे वित्तीय प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ी है और आर्थिक लेनदेन अधिक कुशल हुए हैं। सरकार ने हाल ही में एक बयान में कहा कि जनवरी 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, यूपीआई के जरिए हर महीने लगभग 28.33 लाख करोड़ रुपए के लेनदेन होते हैं। इस दौरान 21.7 अरब डिजिटल ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए, जो मोबाइल फोन के माध्यम से शून्य लागत पर रियल-टाइम भुगतान की सुविधा देते हैं और शहरों से लेकर गांवों तक तथा हर आय वर्ग में वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे रहे हैं।